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Tuesday 21 Nov 2017

विचारों का खुलापन जरूरी

परिचय दास
76, दिन अपार्टमेंट्स , सेक्टर-4, द्वारका, नई दिल्ली-110078
मो. 09968269237

उ.1 अतिवादी जड़ताओं को धर्म नहीं कहा जा सकता। जहां अपने से अलग किसी और के लिए सम्मानपूर्ण जगह न हो, विचारों की रूढि़ हो, वह धर्म तत्त्ववाद की तरफ जाएगा ही। वहां भय के विविध रूप होंगे। अपनी बात को बलपूर्वक मनवाने में झूठ, भय, अत्याचार व अनाचार का साथ लेना ही होगा, जो आतंकवाद होगा। इसलिए विचारों का खुलापन व बहुवचन भयहीनता  हेतु  ज़रूरी है. वहीं से उदारता  आएगी। वहीं से खुला आसमान।
उ.2 जहाँ भय व आतंक होगा, वहाँ राजनीति भी मनुष्यविरोधी होगी। समकालीन विश्व ऐसी कट्टरताएँ झेल रहा है, बल्कि कहें त्रस्त हैं। ये एक दूसरे के अन्योन्याश्रित हैं।
 उ.3 वाम राजनीति का तो नहीं पता, हर वैचारिक सोपान में धार्मिक समंजन आवश्यक है। यह पूरी मनुष्यता के लिए ज़रूरी है। विचारधाराएँ मनुष्य के लिए हैं, मनुष्य ज़रूरी नहीं कि विचारधारा की परिधि में सिमटा रहे। वैसे भी विचार और विचारधारा अलग-अलग हैं। सिर्फ धर्म ही उदार क्यों हो, समूचा जीवन, उसकी प्रणाली ही उदार क्यों न हो। अतिरेक अतिरेक है,  सामंजस्य सामंजस्य ही है।
उ. 4 मनुष्य का विवेक ही कट्टरता पर विजय पा सकता है। लचीला होना कमज़ोरी नहीं, एक शक्ति भी है। मानना ही है तो अंत:ध्वनि को सुनिए। वहीं से रास्ता निकलेगा। न धार्मिक कट्टरता चाहिए, न ही विचारधारा का अतिवाद।
उ.5 धर्म के संगठित रूप के बदले मानवशील मूल्यों- क्षमा, करुणा, दया, परहित, निर्मलता, उदारता, सबके लिए प्रेम, हिंसा का अधिकतम निषेध आदि पर जाइये। यह मानव का मूल्य है, कर्तव्य  है। यहीं से मानव के अधिकार भी आएंगे। जब बराबरी होगी, प्रेम होगा, सहनशीलता होगी, एक दूसरे के लिए आदर होगा तो मानव के प्राकृतिक अधिकार भी मिलेंगे। फिर वहीं से स्वाधीनता, अभिव्यक्ति आदि आएंगे, जिसके बिना आदमी का कोई अर्थ नहीं।
 उ.6 पूरे विश्व में एक दूसरे पर क़ब्ज़ा करने, हड़पने , दूसरे की संस्कृति को क्षति पहुंचाने, अपने के अलावा किसी की न सुनने, मतवाद को ही विचार का आधार समझने, अशिक्षा, हिंसा आदि बढ़ रहे हैं। जितने संगठन इन पर चल रहे हैं, उनको पुनर्विचार की आवश्यकता है। दूसरों की इज़्ज़त, उनकी तहज़ीब को महत्त्व देते ही संघर्ष का अतिरेक व हिंसा काफी कम या गैर ज़रूरी हो जाएगी।
उ.7 आतंक हमेशा भयभीत होता है। वह सोचता है कि वह दूसरे को आतंकित करेगा। किन्तु प्रकृति के मनोविज्ञान के अनुसार वह भय से पहले सौ बार मरता है। जियो और जीने दो। सुखमय ढंग से जीने दो। आतंकवाद अपनी ज़मीन पर बहुत कमज़ोर होता है। उसे अच्छे विचारों, कोमलता व सृजन से भी दो चार करें। शासन अपने स्तर पर जोडऩे की नीति बनाए। वैचारिक सख्ती भी ज़रूरी है। आतंकवाद आज एक नये कि़स्म के युद्ध का आमंत्रण है। युद्ध के कुछ ज़रूरी सूत्र होते हैं। लड़ाइयां सिर्फ अच्छाई की ओर ले जाएँ, आवश्यक नहीं। वे पीढिय़ों को नेस्तनाबूत भी कर सकती हैं। यह देखा जाना चाहिए। बेहतर हो, जागरूकता लायी जाए और शांति के हित में सहनशीलता व एक दूसरे को बर्दाश्त करने की प्रवृत्ति को भी विकसित किया जाय।
उ. 8 उग्रता भी हिंसा ही है। जैसा मैंने पहले कहा, अतिवाद समाज, व्यक्ति, साहित्य, कला व जीवन को मुरझा देता है। वहाँ विचार की जामुनी सुगंध नहीं होती, एक दूसरे पर थोपना होता है। अस्मिता अपने साथ दूसरों को भी जगह देने का नाम है। जैसे मैं हूँ वैसे ही अन्य भी। अन्य को इज़्ज़त दें।
उ.9 कठमुल्लापन अतिचार है, वह आत्यंतिक रूप से विचारहीन होना है। आतंक के भाव में विचार व भावना दोनों नहीं। जिस तरह कमज़ोर लोग, बच्चे, स्त्रियाँ, वंचित, बूढ़े बगैर किसी गलती के मार दिए जा रहे हैं, वहां न संवेदन है, न ही विचार। वहाँ राजनीति भी नहीं, क्योंकि अच्छी राजनीति दुखी के दुख को हराने के लिए, गैर बराबरी  को मिटाने के लिए है। अच्छा संवेदनशील विचार समंजनपूर्ण होगा और आतंक से रहित- भय से विमुक्ति का कारक।
उ.10 बुद्धिजीवी बुद्धि पर पलने वाले लोग नहीं, बुद्धि को सकारात्मक व मनुष्य के पक्ष में उपयोग करने वाले लोग हैं। बुद्धिजीवी कहने के बदले उन्हें सप्राण कहना बेहतर होगा। सिर्फ दिमाग नहीं , हृदय भी चाहिए। वे बुद्धि के अनुचर नहीं, महाप्राणता के रूपक होने चाहिए। समाज में सकार का विकास व व्यक्ति में अन्य के लिए जगह- यही तो महानायकत्व  की रोशनी के बिम्ब हैं। ये महानायक हर क्षेत्र में चाहिए। वर्तमान को क्रियाशील बनाने के लिए व्यवस्था का सुधार, समाज में एक दूसरे का आदर, जीवन जीने के लिए न्यूनतम से अधिकतम की ओर एक निश्चित योजना पर कार्यान्वयन, लिंग, वर्ण, भाषा , जाति, संप्रदाय, विचारधारा  का शिथिलीकरण, देशों की सीमाओं को दूसरों के लिए ग्राह्य बनाना ज़रूरी है। जितना चाहिए, उस से अधिक दें। सब के लिए दुनिया, सब के लिए न्याय। सबसे निचले आदमी को भी यदि व्यवस्था में सही जगह मिले तो तनाव, हिंसा कम हो सकते हैं। महाप्राणता व संवेदनमयता - दोनों को एकाकार करना होगा। साथ ही व्यवस्था को वैचारिक व व्यावहारिक रूप से मनुष्यापेक्षी बनाना होगा। केवल मनुष्य का अंतर्मन नहीं, अपितु बाहर के सिस्टम को भी लक्ष्य में लेना होगा।