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Thursday 23 Nov 2017

अमेरिका ही बाज़ार है और बाज़ार ही अमेरिका


पंकज सुबीर
पी.सी. लैब, शॉप नं 3-4-5-6, सम्राट कॉम्प्लेक्स बेसमेण्ट,

बस स्टैण्ड के सामने, सीहोर, म प्र 466001
मो. 09977855399

उ.1 मेरे विचार में फंडामेंटलिज़्म वह दुराग्रह है, जो यथास्थिति बनाए रखने हेतु होता है। अब यह यथास्थिति क्या है? यह वास्तव में किसी धर्म की किसी खास पुस्तक में वर्णित की गई स्थिति है। या वर्णित नहीं भी की गई हो, तब उस पुस्तक की किसी बात का किसी खास मकसद से, अपनी सुविधा हेतु निकाला गया अर्थ है। भारत में यह बरसों-बरस तक होता रहा। जो पढ़ सकता था, वेदों को, पुराणों को, संस्कृत को, वह अपनी सुविधा से अर्थ बता देता था। चूँकि अर्थ धर्म बताता था, इसलिए माना भी जाता था। खैर वह लम्बी बात है तथा विषय से अलग भी है। मेरा कहना यह है कि धर्म एक ऐसा रिमोट है, जिसके सहारे आप बहुत से कमज़ोर दिमागों को बहुत आसानी से नियंत्रित कर सकते हैं। चारों प्रमुख धर्मों हिन्दू, ईसाइयत, इस्लाम और यहूदीयत में यही किया गया। और चारों ने ही इसका उपयोग आतंकवाद हेतु किया। अब आतंकवाद तो वैचारिक भी होगा न? लेकिन यदि परिभाषा के हिसाब से ही चला जाए, तो हमें व्यापक दृष्टि से इस बात को देखना होगा। हमें उत्तरी आयरलैंड, फिलिस्तीन की भी पड़ताल करनी होगी। आतंकवाद कोई एक रेखीय शब्द नहीं है, ना ही उसका केवल एक आयाम है। यह बहुरेखीय और बहुआयामी शब्द है। दूसरे धर्मों ने धर्म की परिभाषाओं को अपने हिसाब से गढ़ा और टूल की तरह उपयोग किया, वही इस्लाम में भी हुआ। आप क्या सोचते हैं क्या बाकी के धर्मों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिंसा नहीं की? जहाँ धर्म है वहाँ हिंसा का आना स्वभाविक प्रक्रिया है। क्योंकि धर्म आपको दुराग्रही बनाता है, आपको एक प्रकार से सोचने के लिए विवश करता है।
उ.2  मुझे लगता है कि यहाँ पर ‘शिव-भस्मासुर’ वाली कहानी जैसा ही कुछ है। राजनीति अपने उपयोग के लिए सभ्यता के ज्ञात इतिहास से ही आतंकवाद के पैदा करती रही है और बाद में वह आतंकवाद ही अपने को पैदा करने वाली राजनीति को भस्म करने उसके पीछे पड़ता रहा है। बहुत पहले किसी पुस्तक में यह वाक्य पढ़ा था -‘आतंकवाद राजनीतिक क्रियाविधि की एक पद्धति है।’ अराजकता, क्रांति और आतंकवाद यह तीनों बहुत ही बारीक लकीर द्वारा एक दूसरे से अलग रहते हैं। कई बार यह पहचानना भी मुश्किल होता है कि कहाँ क्या है ? इस मामूली से फर्क का उपयोग राजनीति अपने हिसाब से कर लेती है। मुझे लगता है कि यह ठीक-ठीक कहना बहुत मुश्किल है कि यह रिश्ता कब बना? हाँ यह ज़रूर है कि 1947 में एक धर्म ईसाइयत ने दो दूसरे धर्मों हिन्दू और यहूदियत को चौथे धर्म इस्लाम के खि़लाफ खड़ा कर दिया। इस सिरे पर भारत और उस सिरे पर फिलीस्तीन। ब्रिटेन ने दोनों का विभाजन किया1947 में, धर्म के आधार पर। यहूदी इजऱाइल में और मुस्लिम फिलीस्तीन में। इसी प्रकार हिन्दू हिन्दुस्तान में और मुस्लिम पाकिस्तान में। यह बहुत सोच-समझ कर किया गया विभाजन था। इसके द्वारा एक विरुद्ध दो को खड़ा किया गया। आतंकवाद का जो भी परिदृश्य आज है उसका एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु1947 है। एक रोचक तथ्य यह भी है कि भारत ने यूएन में फिलिस्तीन के बँटवारे के खि़लाफ वोट दिया था। भारत अगस्त में बँट चुका था और फिलीस्तीन को नवंबर 1947 में बांटा जा रहा था। मैं हमेशा इस निष्कर्ष पर पहुंचता हूं कि इस्लाम और आतंकवाद की एकरूपता का प्रचार पश्चिम के मीडिया ने अपने देशों की चालाकियों और गलतियों को छिपाने के लिए किया।  
उ.3 वाम राजनीति ने एक गलती यह की कि वह बजाय गांधी के माक्र्स के सिद्धांतों पर चली। मैं माक्र्स के सिद्धांतों को खारिज नहीं कर रहा लेकिन, देश-काल-परिस्थितियां भी बड़ा कारक होती हैं। भारत में गांधी का ‘हिंद स्वराज’ ज़्यादा कारगर होगा। वाम राजनीति ने भारतीयता को महत्त्व नहीं दिया। गांधी ने उसे हमेशा सर्वोपरि माना। जिस धर्म के उदार मानवीय रूप की आप बात कर रहे हैं, उसको गांधी ने पहचान लिया था, और उसे एक टूल के रूप में उपयोग भी किया। मेरी बात से हो सकता है कई लोग असहमत हों, किन्तु मुझे लगता है कि जिस देश में गांधी हो चुके हों, वहाँ गांधी दर्शन से बेहतर टूल क्या हो सकता है, जनमानस को समझने और उसमें पैठने हेतु। गांधी ने न धर्म को खारिज किया न राष्ट्रीयता को, जबकि वाम राजनीति सबसे पहले इन दोनों को खारिज करती है, इसीलिए वह आमजन से दूर हो जाती है। फिर यह भी ध्यान रखना होगा कि यदि आप किसी एक धर्म के प्रतीकों को, सिद्धांतों को, कट्टरता को खारिज कर रहे हैं, तो आपको ऐसा सबके लिए करना होगा, तभी आपकी विश्वसनीयता बनी रहेगी। सुविधा के आधार पर आप यदि विरोध या समर्थन तलाशेंगे, तो आपकी विश्वसनीयता कभी नहीं बन सकती। आपको तस्लीमा नसरीन का भी समर्थन करना ही होगा, बिना अपनी असुविधा का खयाल किए। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के 1992 से 2005 तक महासचिव रहे स्व. हरकिशन सिंह सुरजीत अपने धार्मिक प्रतीकों पगड़ी, केश को जीवन भर धारण करते रहे और वामपंथी भी रहे। बात यदि धार्मिक प्रतीकों की ही की जाए, तो क्या यह सुविधा अन्य धार्मिक प्रतीकों को धारण करने वालों को भी दी जा सकती है? नहीं। बात बहुत ही छोटी है लेकिन समझा जाए तो इसके मूल में बहुत कुछ छिपा है। भारतीय जनता में और दुनिया के दूसरे देशों की जनता में बहुत अंतर है, यह अंतर समझने की आवश्यकता है वामपंथी राजनीति को।  
उ.4 मुझे नहीं लगता कि इस समस्या का कोई समाधान है। ग्रंथों को लेकर एक विचित्र प्रकार की उग्र विचारधारा लोगों के मन में दिखाई देती है। जैसे जो कुछ सत्य था वह लिखा जा चुका है और अब इसके अलावा कुछ भी सत्य नहीं है। हिन्दुओं में तो बाकायदा पूजा भी की जाती है धर्म ग्रंथों की। यह उसी प्रकार है जैसे गांधी के बताए मार्ग पर चलने के लिए आप किसी सडक़ का नाम गांधी के नाम पर रख दो। एक बात और जो मेरे देखने में आई, सारे धर्म ग्रंथों को पढ़ते समय, वह ये कि मुख्य धर्म ग्रंथों में उतनी कट्टरता नहीं है, उनके जो उपग्रंथ हैं उनमें अधिक कट्टरता है। इस्लाम में जो कट्टरता है वह कुरान के कारण न होकर हदीसों के कारण अधिक है, वहीं हिन्दुओं में कट्टरता गीता के कारण न होकर पुराणों तथा उसके बाद के ग्रंथों के कारण अधिक है। जिसके कारण भी यह कट्टरता हो, लेकिन मुझे इसका कोई समाधान नहीं दिखाई देता।  
उ.5 असल में परेशानी यह है कि कोई भी धर्म के सार तत्त्व की बात करना ही नहीं चाहता। सारे धर्मों के सार तत्त्व कुछ असुविधाजनक हैं। नहीं तो यही देखिये न कि जो बौद्ध धर्म और जैन धर्म वास्तव में हिन्दू धर्म की मूर्ति पूजा से विरोध के चलते पैदा हुए, आज वह हिन्दुओं से बड़े मूर्ति पूजक हैं। क्योंकि आप महावीर की उन बातों को तो मान नहीं सकते जो महावीर ने कही हैं, जिनमें त्याग, अपरिग्रह जैसी बातें शामिल हैं। इसका एक सीधा हल यह निकाला जाता है कि महावीर को ही पूजना शुरू कर दो, यही बौद्ध कर रहे हैं और यही शायद गांधी के अनुयायी भी कर रहे हैं। धर्म के सार तत्त्व आज किसी को नहीं चाहिए। मैंने कुरान को कई-कई बार पूरा पढ़ा है और बाइबिल को भी तथा गीता को भी। कई सारी बातें उन सबमें मुझे समान दिखाई दीं। कुरान की कई बातों में गीता की ध्वनि सुनाई दी। बस कहने का तरीका जऱा अलग लगा। तो, बात वही सामने आती है कि धर्म के सार तत्त्व की बात कर ही कौन रहा है? हम धर्म में से केवल अपनी सुविधा की चीज़ें ही तो ले रहे हैं। मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि छोडि़ए धर्म तत्त्वों को, गांधी का ही दर्शन अपना लीजिए, सब कुछ ठीक हो जाएगा। गांधी दर्शन में मुझे कई बातें गीता से ली गई दिखती हैं, तो कई कुरान से, तो कई महावीर के दर्शन से। असल समस्या धर्म के सार तत्त्व को रूढि़वादिता बताने की नहीं है, असल समस्या तो धर्म के सार तत्त्व तक किसी के पहुंच ही नहीं पाने की है।
उ. 6 यह तो शत प्रतिशत सही बात है कि यह सारा खेल वास्तव में तेल पर कब्ज़े का ही है। सीरिया पर आईएसआईएस के कब्ज़े के पीछे का खेल यही तो है। सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद ने भी तो वही किया था जो सद्दाम हुसैन ने किया था। अमेरिका और ब्रिटेन को कम कीमत पर तेल देने से इन्कार करना। सद्दाम के साथ अमेरिका ने सीधे सामने आकर खेल खेला था और सीरिया के मामले में आईएसआईएस को आगे कर दिया। चूंकि तानाशाही का आरोप लगाकर सद्दाम हुसैन की तरह बार-बार सीधा हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता था, तो अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप कर दिया गया। चंूकि असद शिया थे, इसलिए अमेरिका का रास्ता और भी आसान हो गया। आज यही अमेरिका और यूरोपीय देश उसी आईएसआईएस से, उसके कब्ज़े वाले सीरिया से तेल बहुत ही सस्ते दामों पर खरीद रहे हैं। इस बात को आम जनता नहीं समझ सकती, और समझाने की कोशिश कहीं से की भी नहीं जा रही है। जैसा आपने कहा कि प्रचार तंत्र तो पूरा का पूरा अमेरिका के हाथों में कैद है। यहाँ तक कि भारतीय मीडिया भी अब पूरी तरह से वहीं से नियंत्रित होता है। जो कुछ थोड़ा बहुत मीडिया वहां से नियंत्रित नहीं भी है, तो वह धुर दक्षिणपंथी है, जिसे वैसे भी अमेरिका अधिक पसंद है, इस्लाम विरोध के चलते। जो दिखता है उसे ही सच माना जाता है, उसके पीछे का खेल समझने की कोशिश कोई नहीं करता है। और आजकल तो सोशल मीडिया नाम का एक और खतरनाक प्रचार तंत्र है, जो बड़े से बड़े झूठ को भी घंटे भर के अंदर सच की तरह स्थापित कर देता है। कोई अपनी बुद्धि का उपयोग करना ही नहीं चाहता है। पूरी दुनिया इस समय अमेरिका के वैचारिक कब्ज़े में है। किसी न किसी रूप में। जो अमेरिका चाहेगा वही होगा। अमेरिका ही बाज़ार है और बाज़ार ही अमेरिका है। धुर दक्षिणपंथ अमेरिका के लिए सुविधाजनक स्थिति होती है।
उ.7 पूर्व में कहा जाता था कि जैसे-जैसे शिक्षा का प्रचार-प्रसार होगा, वैसे-वैसे धार्मिक कट्टरता भी समाप्त होगी और धर्म के नाम पर होने वाला आतंकवाद भी समाप्त होगा। कहा जाता था कि अशिक्षा तथा अज्ञान के कारण ही यह सब हो रहा है। लेकिन, अगर हम आज के समय पर नजऱ डालें तो पाते हैं कि पढ़े-लिखे डॉक्टर, इंजीनियर, एमबीए और दूसरे उच्च शिक्षा प्राप्त लोग भी कट्टर हैं, तथा कई मामलों में आतंकी घटनाओं में उनकी संबद्धता भी सामने आई है। इसका मतलब यह है कि हम इस स्तर पर इसे खत्म नहीं कर सकते, बल्कि शिक्षा तो आतंक के हाथ का एक हथियार बन रही है। कठोर नीतियों से यदि समाप्त होना होता, तो अभी तक हो जाता। असल में वर्तमान शिक्षा प्रणाली में पूरा ज़ोर शिक्षा पर है, वैचारिक तथा बौद्धिक विकास पर कतई नहीं है। ऐसे में यह शिक्षा केवल मशीनी प्रोफेशनल्स तैयार कर रही है। यह मशीनी प्रोफेशनल्स कभी आतंकवादी संगठनों की कठपुतली बन जाते हैं और जो नहीं बन पाते तो अमेरिका सहित पश्चिम देशों की तो बन ही जाते हैं। दो चीज़ें हैं पहला तो यह कि असमानता की जो खाई बढ़ती जा रही है उसे दूर करने के उपाय किये जाएँ। जैसे यह आँकड़ा कि दुनिया के 85 सबसे अमीर लोगों के पास दुनिया की करीब आबादी के आधे जितना पैसा है, संपत्ति है। यह आंकड़ा जब तक बना रहेगा, तब तक आतंकवादी संगठनों को लडऩे के लिए लड़ाके मिलते रहेंगे। दूसरी बात यह कि बौद्धिक विकास हेतु कुछ करना होगा। बौद्धिक विकास ही कुछ कर सकता है, शिक्षा नहीं कर सकती। एक और बात यह भी है कि हमें उन षड्यंत्रों को भी उजागर करना होगा, जो दुनिया भर में कुछ देशों द्वारा दादागिरीपूर्वक किए जा रहे हैं। यह षड्यंत्र ही आतंकवादी पैदा करते हैं और फिर ये ही हथियार बेचते हैं। दुनिया में अमन-चैन कायम हो जाए, तो फिर हथियार बेचने वाले सौदागर तो भूखे ही मर जाएँगे।
उ.8  मेरे विचार में तीन चीज़ें हैं धर्म, अध्यात्म और दर्शन। आप क्रमश: पहले धार्मिक होते हैं, विकास के क्रम में अध्यात्म से होते हुए दार्शनिक होते हैं। और यह भी सच है कि जब तक आप धार्मिक हैं, तब तक आप बाद के दोनों नहीं हो सकते। धर्म एक प्रकार की जड़ता है। अध्यात्म बीच की स्थिति है जबकि दर्शन जड़ता की पूरी तरह समाप्ती है, वह चेतनता है। इसमें एक समस्या यह आती है कि जब आप पहली सीढ़ी पार करके दूसरी या तीसरी मतलब अध्यात्म या दर्शन पर आ चुके होते हैं, तब कई लोग पहली पर ही होते हैं। कई लोग जीवन भर उसी पर रहते हैं, मतलब धर्म पर, उनका कुछ विकास नहीं होता। जो धार्मिक है वह असहिष्णु होगा ही, आप एक साथ सहिष्णु और धार्मिक नहीं हो सकते। वह संभव ही नहीं है। अध्यात्म कुछ सहिष्णुता पैदा करता है और दर्शन आपको पूरी तरह से सहिष्णु बना देता है। समस्या यह है कि भारत जैसे देशों में धर्म का एक और अर्थ राष्ट्रवाद भी होता है। धर्म का विरोध मतलब राष्ट्र का भी विरोध। यह वही अस्मिता का प्रश्न है जिसका जिक्र आपके प्रश्न में भी हुआ है। जड़ता हमेशा चेतनता का विरोध करती है, उसी के कारण टकराहट होती है। धर्म के पास सिद्धांत होते हैं, दर्शन के पास विचार होते हैं। सिद्धांत जो परंपरा से जन्म लेते हैं, विचार जो बुद्धि से जन्म लेते हैं, अनुभवों से जन्म लेते हैं। धर्म के पास तर्क नहीं होते, इसलिए उसे चिल्लाना पड़ता है, आतंक का सहारा लेना पड़ता है, उसे चिल्ला कर ही भेड़ों को बाड़े में रखना है, एक भेड़ भी अगर बाड़े से बाहर चली गई, तो उसके पीछे सारी चली जाएँगीं। धर्म इसीलिए असहिष्णु होता है।
उ.9 प्रश्न में आपने कहा है -बढ़ रहा है, मैं इससे थोड़ा असहमत हूँ। यह हमेशा से ही था। प्रत्यक्ष या परोक्ष रहा हो, पर रहा है। बस यह कि आज यह कुछ स्पष्ट दिख रहा है। असल में धर्म, राजनीति और आतंकवाद यह एक त्रिभुज की तरह हैं, हर भुजा दूसरी दोनों भुजाओं से जुड़ी हुई है। तीनों को एक दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। राजनीति ने धर्म का उपयोग औज़ार की तरह कब नहीं किया ? कम से कम हमारे देश में तो हमेशा से यही होता आया। हाँ लेकिन वर्तमान में चिंता का विषय अधिक इसलिए है कि वर्तमान में ऐसा आभास हो रहा है कि राजनीति के स्थान पर एक धर्म विशेष ही शासन कर रहा है। या आभास शब्द को भी हटाएँ तो सचमुच ही ऐसा है। यह निश्चित रूप से एक खतरनाक स्थिति है। यह भी एक प्रकार का आतंकवाद ही है, वैचारिक आतंकवाद। आतंकवाद का अर्थ आम जन में भय पैदा करना ही तो है, तो यह भय तो एक धर्म विशेष के लोगों के मन में आज व्याप्त है ही। इसलिए इसे आप आतंकवाद से अलग कुछ और नहीं कह सकते, यह भी आतंकवाद ही है।
उ.10 इस प्रश्न का उत्तर मैंने ऊपर दिया है, कि अब विचारों की आवश्यकता किसी को नहीं है। बाज़ार को विचारों से सबसे ज़्यादा डर लगता है। बाज़ार तो चाहता है कि विचार नष्ट हो जाएँ। एक और बात इसमें यह भी जोडऩा चाहूँगा कि बुद्धिजीवी का अर्थ क्या? आप किन्हें बुद्धिजीवी कहेंगे ? जब आप एक प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था के हामी होते हैं, उसे पोषित करते हैं अपनी बुद्धि से, तब आप अपनी विश्वसनीयता खो रहे होते हैं। जब विपरीत राजनीतिक व्यवस्था आती है, जो समाज के लिए, देश के लिए गलत होती है, तब भी आपकी भूमिका उसे ठीक करने में नहीं हो सकती, क्योंकि आपने तो अपनी विश्वसनीयता पूर्व में ही खो दी है। अंग्रेज़ी के शब्द का प्रयोग करूँ तो आप ‘बायस्ड’ हो गए हैं। आपने अपनी बुद्धि से पूर्व की सत्ता को स्थापित किया तथा उसके लाभ लूटे, तो अब जब सत्ता विपरीत हो गई है, तो आप भले ही देशहित में भी आवाज़ उठा रहे हैं, तब भी वह अनसुनी रह जाएगी। मैं मानता हूँ कि बुद्धिजीवी की परिभाषा वही है जो कबीर ने दी है -‘जो घर फूँके आपना चले हमारे संग’। कितने हैं इस प्रकार के बुद्धिजीवी आज देश में? विश्व में? जो अपना घर फूँक चुके हैं। दूसरी बात यह कि भूमिका देगा कौन आपको? आपको तो स्वयं ही लेनी है अगर आप समझते हैं कि आप समाज को, परिस्थितियों को बदल सकते हैं तो। छोटे-मोटे बलिदान नहीं, कबीर की तरह घर फूँकना पड़ेगा। जो गलत है उसे गलत कहने का साहस पालना पड़ेगा, भले ही वह गलत आपकी सुविधा का गलत हो। मुझे नहीं लगता कि इस प्रकार के बुद्धिजीवी अब शेष हैं। वातानुकूलित कमरे अगर क्रांति पैदा कर सकते, तो दुनिया भर में क्रांति कब की आ चुकी होती।