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Thursday 23 Nov 2017

नवां विश्व नास्तिक सम्मेलन


नवां विश्व नास्तिक सम्मेलन छह और सात जनवरी को विजयवाड़ा में सम्पन्न हुआ। इसका आयोजन भारत के प्रख्यात सामाजिक क्रांतिकारी गोपाराजू रामचन्द्र राव ‘गोरा’ द्वारा 1940 में स्थापित विश्व के पहले ‘नास्तिक केन्द्र’ ने किया। संयोजन गोराजी के सुपुत्र डॉ. विजयम ने किया जो इस नास्तिक केन्द्र के वर्तमान निदेशक हैं। सम्मेलन की अध्यक्षता जर्मनी के फ्रीथिंकर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. वाकर मूलर ने की और उद्घाटन भाषण पेरियर मनिए माइ विश्वविद्यालय, तमिलनाडु के कुलपति तथा द्रविड़ कडग़म के अध्यक्ष डॉ. के. वीरामणि ने दिया। सम्मेलन के मुख्य अतिथि महाराष्ट्र की अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति के युवा अध्यक्ष और शहीद नरेन्द्र दाभोलकर के साथी अविनाश पाटिल को बनाया गया। डॉ. विजयम ने सम्मेलन के मुख्य विषय ‘आलोचनात्मक चिंतन और धर्म निरपेक्ष दृष्टि की आवश्यकता’ पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा- नास्तिक केन्द्र भारत के सभी क्षेत्रों और जर्मनी, नार्वे, अमेरिका आदि देशों से आए हुए प्रतिभागियों का स्वागत करता है, जो एक उत्तर धार्मिक शास्त्रों का सपना साकार करने के लिए यहां एकत्र हुए हैं। यह केन्द्र पिछले पचहत्तर सालों से वैज्ञानिक और आलोचनात्मक चिन्तन और दृष्टिकोण के विकास तथा राज्य और धर्म के बीच दूरी बनाते हुए एक धर्मनिरपेक्ष समाज की रचना के लिए संघर्ष करता रहा है। नास्तिक केन्द्र की अध्यक्षा श्रीमती जे. मेत्री ने कहा कि यह समय हमारे लिए राष्ट्र धर्म, नस्ल आदि की दीवारें लांघकर एक ऐसे वैश्विक मानवीय समाज की रचना करने का है, जो तर्क-विवेक और करुणा पर आधारित हो और मानव मात्र की समता और स्वतंत्रता की रक्षा करता हो। एक ऐसा समाज जिसमें एक मनुष्य का अधिकार दूसरे मनुष्य का कर्तव्य बन जाए, वह दूसरे के अधिकारों की रक्षा को अपना कर्तव्य माने। नास्तिकता केवल एक दर्शनमात्र नहीं है, वह एक जीवन पद्धति है जो हमारे जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित करती है। डॉ. वाकरमूलर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि मुक्तचिंतन, विवेकवाद, मानववाद, अज्ञेयतावाद, संदेहवाद और निरीश्वरवाद एक ही सत्य के अलग-अलग आयाम हैं और हम अपने आपको किसी भी नाम से पुकारें हमारा उद्देश्य जातियों, धर्मों, नस्लों, लिंगों और राष्ट्र राज्यों में विभाजित इस मानव समाज को समता, स्वतंत्रता, न्याय और विवेक के आधार पर पुनर्गठित करना है। वैज्ञानिक और धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण का विकास इस पुनर्गठन के लिए निहायत जरूरी है। डॉ. के. वीरामणि ने अपने  उद्घाटन भाषण में कहा कि प्रारंभ में मनुष्य ने अपने प्राकृतिक परिवेश को भय और आश्चर्य से देखा, पर उसकी विचार पद्धति धीरे-धीरे बदलने लगी। जब उसने फल एकत्र करने और शिकार करने से आगे बढक़र खेती करना और उसके कारण अपना घुमन्तू जीवन छोडक़र एक बस्ती में रहना शुरू किया, उसमें एक तार्किक और वैज्ञानिक रुख विकसित होने लगा। उसने खेती संबंधी तकनीकें विकसित कीं। और खुद अपने लिए फल, अन्न और पशुओं को पालकर उनका मांस प्राप्त करना सीखा। उन्होंने कहा कि हमारे संविधान ने धारा 51ए (अ) के द्वारा भारत के सभी नागरिकों के बुनियादी कर्तव्यों में वैज्ञानिक रुख, अनुसंधान की प्रवृत्ति और मानववाद के विकास को निर्धारित किया है। वैज्ञानिक रुख का मतलब है प्रेक्षण, विभाजन, विश्लेषण और उस वस्तु को, बिना दिव्य हस्तक्षेप की कल्पना किए, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक प्रक्रिया के साथ जोडक़र देखना। वैज्ञानिक रुख हर रुढि़ पर सवाल उठाता है, यह हमारी मानवीय विरासत है और हमें अन्य पशुओं से अलग करता है। वैज्ञानिक मि•ााज न होता तो हम अभी भी गु$फाओं में में रह रहे होते और कच्चा मांस खा रहे होते।
डॉ. रणजीत
मो. 9019303518