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Tuesday 21 Nov 2017

धर्म अपनी प्रासंगिकता खो चुका है


पंकज बिष्ट

 समयांतर
79-ए, दिलशाद गार्डन
दिल्ली 95

उ.1, उ.2 हमें भूलना नहीं चाहिए कि आधुनिक सभ्यता के विकास में शोषण और दमन की महागाथा शामिल है। दुर्भाग्य से इसे अक्सर नजरंदाज कर दिया जाता है। योरोप ने धर्म को चुनौती दी और विज्ञान का विकास किया, इसका श्रेय उसे मिलना ही चाहिए। पर उसकी आर्थिक विकास की जड़ें मूलत: तीसरी दुनिया के देशों के विगत पांच सौ साल के दमन, शोषण और नरसंहारों से सिंची हैं।  पिछली सदी के मध्य में तीसरी दुनिया के देशों के इस गुलामी से मुक्त हो जाने के बाद योरोपीय देशों ने अमेरिकी नेतृत्व में दूसरे तरीकों से तीसरी दुनिया के देशों में हस्तक्षेप शुरू किया। यही नहीं कि इन ताकतों ने एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका में अपने पि_ूओं को सत्ता में बैठाया बल्कि कई ऐसे देशों का निर्माण किया जो न तो भौगोलिक रूप से और न ही सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से राष्ट्र की श्रेणी में आते थे। इसका नतीजा यह हुआ कि ये क्षेत्र लगातार आपसी टकराव (नस्ली और नस्लजनित) के कारण राजनीतिक अस्थिरता के शिकार हुए, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण पश्चिम एशिया है। साथ ही अड़ोस-पड़ोस में भी राजनीतिक वर्चस्व के संघर्ष में उलझे रहे। पश्चिम एशिया में इजराइल को लादना और उसके माध्यम से तेल संपदा से संपन्न इस क्षेत्र में अस्थिरता बनाए रखने से ही वैश्विक ताकतों द्वारा इसका दोहन करना संभव हो सका है। एशिया और अफ्रीका के कई क्षेत्रों में सतत चली आ रही अस्थिरता और खूनी संघर्ष का संबंध इसी से है। इस्लामिक आतंकवाद का जन्म कोई अचानक नहीं हुआ। जैसा कि सर्वविदित है अफगानिस्तान में तालिबानों को अमेरिकी नेतृत्व में पश्चिमी ताकतों ने पैदा किया उसी तरह आईएस का भी जन्म हुआ। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान से लेकर सीरिया और लेबनान से नाइजीरिया तक जो अस्थिरता नजर आती है उसमें हर कदम पर साम्राज्यवादी शक्तियों और उनकी नीतियों को देखा जा सकता है।  यह अचानक नहीं है कि दुनिया भर में धार्मिक आतंकवादियों के पास जो भी असलाह और संसाधन हैं वे सब पश्चिम द्वारा प्रदत्त हैं।  
उ. 3 धर्म के बारे में एक बात स्पष्ट तौर पर समझ ली जानी चाहिए कि यह मानव निर्मित एक ऐसी सामाजिक संस्था है जिसका आविष्कार हजारों वर्ष पहले किया गया था। तब न तो ज्ञान के विकास का वह स्तर था जो आज है और न ही विज्ञान तथा तकनीकी उस स्तर पर पहुंची थी जहां वह आज नजर आ रही है।  स्पष्ट है कि धर्म एक ऐसी संस्था है जिसकी प्रासंगिकता धूमिल पड़ती जा रही है। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि जो क्षेत्र ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जितना पीछे हैं वे उतने ही धर्म-आश्रित हैं। \ वाम की गलती यह नहीं है कि उसने धर्म की मानवीयता को महत्व नहीं दिया बल्कि उसकी गलती यह है कि उसने संसदीय राजनीति के दबाव में धर्म को वह चुनौती नहीं दी जो उसे मिलनी चाहिए थी। इसका सबसे अच्छा उदाहरण पश्चिम बंगाल है जहां वामपंथ ने तीन दशक तक शासन किया और वहां फिर चाहे वह दुर्गा पूजा हो या फिर मुल्ला मौलवियों का प्रभाव यथावत रहा। मुसलमानों का हाल तो यह रहा कि उसने उन्हें सीधे-सीधे मुल्लाओं की दया पर छोड़ दिया जो एक ही झटके में पाला बदल गए। अगर वाम ने अवाम को धर्म की अप्रासंगिकता को समझाने और उसे तार्किक और सेक्यूलर बनाने की कोशिश की होती तो यह नौबत नहीं आती।  
उ. 4  शिक्षा और वैज्ञानिक समझ का विकास।  
उ. 5  जैसा कि मैं कह चुका हूं, धर्म अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। धर्म और कुछ नहीं एक ऐसी संस्था रहा है जो एक ओर शासक वर्ग और दूसरी ओर पितृसत्ता को चलाने का सबसे मजबूत आधार रहा है।
हिंदू धर्म को लें। जातिवादी जैसी अमानवीय प्रथा क्या कहीं और देखने को मिलती है? स्त्रियों के प्रति दुनिया के धर्मों में जो भेदभाव है वह किस तरह से मानवीय है या हो सकता है? एक धर्म का दूसरे धर्म के अनुयायियों के साथ किया जानेवाला अमानवीय व्यवहार क्या नजरंदाज किया जा सकता है?
आधुनिक न्याय प्रणाली, समानता के मूल्य जैसी बातों के सामने धर्म किस तरह से टिकता है? स्पष्ट है कि मानवाधिकारों को धर्म के माध्यम से स्थापित नहीं किया जा सकता है क्योंकि धर्म जरूरत से कहीं ज्यादा सत्ताधारियों और पुरुषों के पक्ष में झुका है।
उ. 6  आपके सवाल में ही जवाब है। वैसे भी मैं पहले ही कह चुका हूं कि पश्चिम के निहित स्वार्थों का नतीजा ही आईएस है।  इसके लिए तीसरी दुनिया के जागरूक बुद्धिजीवियों की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। यह देखने की बात है कि आईएस अपनी क्रूरता को धर्म की आड़ में ही सही ठहराता है। यह तब है जबकि इस्लाम को दुनिया के उदार धर्मों में से माना जाता है।
निश्चय ही यह परंपरागत माध्यमों की सीमा है। उनका नियंत्रण मुख्यत: उन्हीं शक्तियों के हाथ में है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस तबाही-धर्म के नाम पर विस्थापन और विध्वंस के लिए जिम्मेदार हैं। इसके लिए सभी वैकल्पिक माध्यमों के इस्तेमाल की जरूरत है विशेष कर सोशल मीडिया के, जो आज कई गुना ज्यादा प्रभावशाली सिद्ध हो रहा है, अपने स्पेस और व्यापकता दोनों के कारण। इस पर भी सोशल मीडिया अंतिम नहीं है। इसे जब भी चाहे नियंत्रित या रोका जा सकता है। इसलिए साथ ही यह भी जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर सीधे जनता को जागरूक करने का हर स्तर पर माइक्रो से मैक्रो तक ग्रासरूट स्तर पर काम किया जाए।
 उ. 7 आतंकवाद को तब तक नहीं रोका जा सकता जब कि इसकी जड़ों में चोट न की जाए। उन हितों की दुरभिसंधि को ध्वस्त करने होगा, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर कई गुना ज्यादा प्रभावशाली और व्यवस्थित तरीके से काम कर रही हैं।