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Monday 20 Nov 2017

असहमति को लेकर हम ज्यादा असहिष्णु होते जा रहे हैं


निर्मला भुराडिय़ा
116, उषानगर (मेन)
श्रीराम शरणम् के सामने
श्री निकेतन
इंदौर (मप्र)- 452.009

उ.1 सबसे पहले तो धर्म और अध्यात्म के बीच का फर्क समझना जरूरी है। अध्यात्म मन की उच्चतम अवस्था हो सकती है, मन की इस श्वेत, स्निग्ध परत में जाने के लिए जरूरी नहीं कि आपको किसी धर्म विशेष की राह से गुजरना पड़े। जबकि धर्म, मजहब, सम्प्रदाय ये ऐसी चीजें हैं जिनमें आप पहले से तय किसी खास विचारधारा, खास रूढिय़ों, खास प्रथाओं के हिसाब से चलते हैं। और इस तरह चलते हैं कि उसमें समय-काल अनुसार सुधार की चेष्टा या बात करना भी ब्लास्फेमी अथवा ईश विरोध की श्रेणी में रख दिया जाता है। लिहाजा धर्म के नाम पर अंधानुकरण करना धार्मिक होने की जरूरी शर्त हो जाता है। मजहब के नाम पर तर्क को पाप मानने वाले, समाज सुधार को परंपरा विरोधी मानने वाले लोगों की ऐसी फौज मनचाही करवाने वालों को मिल जाती है जिनका ब्रेन वॉश करके उन्हें किसी भी दिशा में ढकेला जा सकता है। इस तरह कट्टरपंथ को आतंकवाद से जुडऩे का सीधा-सीधा रास्ता मिल जाता है।
उ.2 हम सभी जानते हैं यह एक लंबा किस्सा है! फिर भी ताजा हालात में हम सोवियत संघ की अफगानिस्तान में घुसपैठ से शुरू करें, जब अमेरिका ने सोवियत संघ के विरुद्ध दखल कर पहले ओसामा बिन लादेन को अपना मुन्ना बनाया फिर वह दुश्मन नंबर वन बन गया। मतलब बड़ी ताकतों के बीच अहं की लड़ाई, वर्चस्ववाद ने युद्ध और बरबादी की और इस बरबादी की जमीन से मजहब की सिंचाई पाकर निकला आतंकवाद। धीरे-धीरे पूरा मध्यपूर्व घिरता गया। यदि किसी के पास उसकी ताकत अपना हथियार था तो किसी के पास उसका मजहब उसका हथियार था। लिहाजा एक जिसे आतंकवाद कहता है दूसरा उसे धर्मयुद्ध भी तो कह सकता है या कहता ही है। महाशक्ति वर्सेस धर्मयुद्ध के इस चक्र ने आतंकवाद को वैश्विक राजनीति से जोड़ दिया। वह अमेरिका जिसके बारे में कहा जाता था-वहां चिडिय़ा भी पर नहीं मार सकती, वहां ट्विन टॉवर गिर गए और अब योरप चपेट में है। दोनों विश्वयुद्धों के बाद ली गई कसमें टूट गई हैं, इतिहास के सब सबक गुम हो गए हैं, दुनिया फिर आग की कगार पर है, क्योंकि अब युद्ध नहीं दहशतगर्दी है, जो इस छोटी हो चुकी दुनिया को डरा रही है और विश्व राजनीति का सबसे गर्म मुद्दा बन चुकी है।
उ.3 ईश्वर, गॉड, खुदा के नाम पर अध्यात्म के बजाए कट्टरता अपनाना यदि अति का एक छोर है तो भोले आस्थावानों को पिछड़ों के तौर पर देखना भी अति का एक दूसरा छोर है। ईश्वरवादी या अनीश्वरवादी होना अपनी-अपनी व्यक्तिगत इच्छा हो सकती है। यह वाम राजनीति की गलती है या नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता, परंतु किसी वाद, पंथ या झंडे के तले धर्मरहित होने की सामूहिक कसम खाना स्वाभाविक इसलिए नहीं लगता, क्योंकि निश्चित ही इसमें धर्म से जुड़ी बुराइयों के साथ ही अच्छाइयों से भी अलग होना उस वाद या पंथ से जुडऩे की शर्त बन जाता है, इसमें धर्म के प्रति किसी के व्यक्तिगत विचार या आस्था के लिए जगह नहीं रह जाती और यह एक अलग किस्म की कट्टरता हो जाती है।
उ.4 जिनके निहित स्वार्थ जुड़े हैं उन्होंने ही धर्म और धर्मग्रंथों की मनचाही व्याख्या की है ताकि उनके पक्ष में यथास्थितिवाद बना रह सके। इस युग को भी कोई राजा राममोहनराय, महात्मा फुले, बी आर आम्बेडकर, सर सैयद अहमद चाहिए जिनकी अगुआई में समाज में जागरण हो सके, रूढिय़ों पर कुठाराघात हो, धर्म और परंपरा के नाम पर खोदे गए अंधे कुओं से लोग निकलें। मगर इस अन्यथा अग्रणी सदी में धर्म-मजहब-संप्रदाय के नाम पर कट्टरता बढ़ी ही है, कम नहीं हुई है। असहमति को लेकर हम ज्यादा से ज्यादा असहिष्णु होते जा रहे हैं, भले ही हम किसी भी धर्म के हों। जब तक हमारे जीवन में तर्क, विचार और सहमति-असहमति को प्रजातांत्रिक तरीके से देखने की दृष्टि नहीं बनती, किसी भी भ्रम या रूढि़ को तोडऩा असंभव है।
उ.5 कौन सा सारतत्व? पहले तो खुद रूढि़वादिता से मुक्ति चाहिए। रूढि़वाद मानवाधिकार के कोण से चीजें देख ही कहां रहा है। जो सही चश्मे से देख पाएं उनके लिए धर्म और मानवाधिकार दो अलग-अलग चीजें नहीं हैं। मगर यह चश्मा है कहां?
उ. 6 जैसा कि प्रश्न में ही निहित है सब कुछ तेल का खेल तो है ही जिसके लिए कुछ खास लोगों की संकीर्णता और मजहबी कट्टरता को भुनाया गया है। यह सच है कि प्रचार-प्रसार के साधन पूंजीवादी शक्तियों के हाथ में है, मगर सोशल मीडिया भी तो है, जहां से विचार प्रवाहित हो सकते हैं। हालांकि इसमें काफी अगर-मगर हैं, मगर फिर भी विचार तो बनाए ही जा सकते हैं।
उ.7 सवाल यह है कि यह कठोर नीतियां कौन बनाएगा और कौन लागू करेगा? कठोर नीति, तानाशाही और अनुशासन के महीन फर्कों को कैसे समझा जाएगा? सच तो यह है कि इस वक्त देश-दुनिया में आग लगी हुई है। एक-दूसरे के प्रति नफरत, अपने-अपने स्वार्थ, भ्रष्ट आचरण इस आग में घी का काम कर रहे हंै अत: इस सबके खात्मे का उपाय अलगाववाद में तो कतई नहीं ढूंढा जा सकता। एक-दूसरे के विचारों के सम्मान और प्यार-मुहब्बत में ही खोजा जा सकता है।
उ. 8 जब अस्मिता पर संकट आता है तो लोग अपनी पहचान को लेकर और उग्र हो जाते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी कैसी और कितनी हो यह इंसान को अपने विवेक से ही तय करना चाहिए। निषेध किसी भी चीज का इलाज नहीं है। निषेध तो फडफ़ड़ाहट को तेज ही करता है, धीमा नहीं।
उ.9 कठमुल्लापन और हठधर्मिता गलत है और चाहे वह धर्म में हो, समाज में या राजनीति में।
उ. 10 विचार की शक्ति अनंत है इसलिए बुद्धिजीवियों से सभी डरते हैं। जब कहीं कोई क्रांति या गृहयुद्ध वगैरह होता है तो बुद्धिजीवियों को चुन-चुनकर मारा जाता है ताकि वैचारिक नेतृत्व कर लोगों को सही दिशा में ले जाने वाले लोग न रहें और अंधद्रुतगामियों को अपने पीछे-पीछे लाकर अंधे कुएं में छलांग लगवाई जा सके। बस कुछ लोगों का यही स्वार्थीपन और चालाकी बुद्धिजीवियों की भूमिका को खारिज करने के लिए जिम्मेदार है।