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Saturday 25 Nov 2017

भारतीय सिनेमा को लोकतांत्रिक चेहरा बनाना : वीरा साथीदार


ज्ञानचंद्र पाल

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा में 21वीं सदी के दलित महानायक एवं नेशनल अवार्ड प्राप्त तथा ऑस्कर नामित फिल्म कोर्ट के राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अभिनेता, अंबेडकरी सामाजिक कार्यकर्ता एवं रंगकर्मी श्री वीरा साथीदार का आगमन हुआ। इस अवसर पर विश्वविद्यालय में अंबेडकर स्टूडेंट फोरम द्वारा विचार गोष्ठी विषय दलित सिनेमा: विशेष संदर्भ ऑस्कर नामिनी फिल्म कोर्ट का आयोजन किया। मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए वीरा साथीदार ने अपने आरंभिक जीवन से अब तक के संघर्षों का इतिहास सभी लोगों के सामने प्रस्तुत किया। नागपुर जिले के एक दलित परिवार में जन्मे वीरा साथीदार को बचपन में गाय चराना और पशु-पक्षियों के साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता था। वे बचपन से ही बाबासाहब को अपना आदर्श मानते रहे हैं। किताबों के प्रति उनका लगाव बचपन से ही रहा है। मैक्सिम गोर्की के विश्व प्रसिद्ध उपन्यास माँ को उन्होंने नागपुर के कबाड़ी की दुकान से पचास पैसे में खरीद कर पढ़ा। उनके जीवन में बदलाव की प्रक्रिया यहीं से शुरू होती है। सवर्णों द्वारा भेदभाव के चलते वे हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाए, इसका खेद उन्हें आज तक टीसता है। फिल्में देखने का उन्हें बचपन से ही बहुत शौक रहा। शायद इसी लगाव ने इन्हें फिल्मी दुनिया मेंइस मकाम पर लाकर खड़ा किया। उन्होंने मजदूरों के शोषण को देखकर मजदूरों का संगठन बनाया। मजदूर जीवन से कोर्ट फिल्म का नायक बनने तक के सफर का वर्णन किया। कोर्ट फिल्म में उनके संघर्षशील जीवन का यथार्थ दिखाई देता है। उन्होंने बताया एक कलाकार का काम समाज को उन्नत बनाने के लिए होना चाहिए। कोर्ट फिल्म का इस्तेमाल हमने अपनी दबी-कुचली जनता के लिए किया। अभी तक 19 राष्ट्रीय अवार्ड और 10 अंतरराष्ट्रीय अवार्ड इस फिल्म को मिल चुके हैं। हम लोग भारतीय सिनेमा को एक ऐसा लोकतांत्रिक चेहरा बनाना चाहते हैं, जिसमें सामाजिक मुद्दों की बनी हुई फिल्मों का भी इतिहास लिखा जाएगा। कार्यक्रम का संचालन रजनीश कुमार अंबेडकर तथा आभार अनु सुमन बड़ा ने व्यक्त किया।                  
केंद्रीय समिति, अंबेडकर स्टूडेंट्स फोरम, वर्धा
मो. 7744932075