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Saturday 18 Nov 2017

आतंकवाद एक तरह का अंधापन है

 

डॉ. निदा नवाज़

निकट नूरानी नर्सिंग कालेज एक्सचेंज कोलोनी पुलवामा .192301 कश्मीर
मो. 09797831595
उ.1 आतंकवाद के और भी कई सशक्त आधार रहे हैं लेकिन 21वीं शताब्दी में विश्व भर में सामने आ चुके आतंकवाद को धर्मतत्ववाद (फंडामेंटलिज्म) ने ही जन्म दिया। वैचारिक धरातल पर जितने-जितने चरमपंथी या धर्मतत्ववादी  पराजित होने लगे उतने ही वे आतंकवाद का रास्ता इख्तियार करने लगे। इतिहास साक्षी है कि धर्म के नाम पर ही सब से ज्यादा मानव भावनाओं को उत्तेजित किया जाता रहा है और मनुष्य को अंधा बनाया जाता रहा है। आतंकवाद एक तरह का अंधापन ही तो है।
उ.2  देखा जाये तो राजनीति और आतंकवाद का रिश्ता उतना ही पुराना है जितना स्वयं मानव समाज का। वैश्विक राजनीति पर 20वीं और 21वीं शताब्दी में विशेष तौर पर आतंकवाद छा गया। 20वीं शताब्दी में हुए दो विश्वयुद्धों ने राष्ट्रीयता की धारणा को मजबूती से विकसित किया और बाद में जाति, रंग और धर्म खुले तौर पर राष्ट्रीयता के आधार बनते गए। विश्वयुद्धोंं के बाद आतंकवाद साम्राज्यवादी देशों की नीति बन गई। 20वीं शताब्दी के आखिरी वर्षों में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने पाकिस्तान की सहायता से अफगानिस्तान में आतंकवाद को तालिबान के रूप में विकसित किया जिसके परिणाम आज तक दक्षिण एशिया में विभिन्न आतंकवादी घटनाओं में देखे जा सकते हैं। आईएस पश्चिमी देशों की साम्राज्यवादी सोच के उसी तरह के एक बड़े मॉड्यूल का नाम है।
उ.3  वाम राजनीति में पूंजीवाद चर्चा का मुख्य मुद्दा रहा है और पूंजीवाद की आधारशिला धार्मिक कट्टरवाद पर ही ज्यादा रही है। इस बात को लेकर हमेशा चर्चाएं होती रही हैं। जहां तक धर्म के उदार मानवीय रूप की बात है, यह केवल एक कल्पनात्मक तथ्य है, धर्म का बुनियादी तौर पर कोई उदार मानवीय रूप होता ही नहीं है जिस पर चर्चा करने की आवश्यकता हो।
उ.4  जब हम मानव के क्रमिक-विकास का अध्ययन करते हैं तो यह बात सुस्पष्ट हो जाती है कि अँधेरे से उजाले की तरफ का सफर जारी है। जितनी ज्यादा आधुनिक शिक्षा प्रणाली विकसित होती जा रही है,विज्ञान के नए-नए आयाम सामने आते जा रहे हैं, ब्रह्माण्ड की परतों को खोला जा रहा है, उतने ही धार्मिक ग्रन्थों के तथाकथित ईश्वरीय आदेश बेनकाब होते जा रहे हैं। इस भ्रम को तोडऩे के सब से बड़े उपाय, तर्क पर आधारित शिक्षा प्रणाली को विकसित करने, युवाओं में विज्ञान के प्रति मिज़ाज विकसित करने और धार्मिक-कट्टरवाद की आड़ में रचे जाने वाले शोषण को सामने लाने सम्बंधित ही हैं।
उ.5 धर्म की बुनियादें या सारतत्व ही असमानता की शिक्षा देते हंै जो सुस्पष्ट तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन है और इससे मुक्ति उसी सूरत में संभव है जब इस संसार को धर्मों से मुक्ति मिले।
उ.6 आईएस को आम लोग एक भावुक मुस्लिम समुदाय पर आधारित संगठन मानते हैं जो विश्व में इस्लामी शासन की स्थापना चाहता है, यह पूरा सच नहीं है। आईएस दरअसल विश्वस्तर पर पावर-स्ट्रगल का एक बड़ा परिणाम है। इस के अंतर्गत एक तरफ साम्राज्यवाद के परम्परागत हथियार, बांटो और राज करो को इस्तेमाल करके अरब देशों को शिया-सुन्नी समुदायों के नाम पर, अन्य देशों को इस्लामी गैर-इस्लामी देशों के नाम पर बांटा जा रहा है और उद्देश्य केवल प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा जमाने और एक नए ब्रांड का साम्राज्यवाद विकसित करने का ही है। यह पश्चिमी ताकतों की पुरानी चाल ही है जिसका नेतृत्व अब की बार अमेरिका कर रहा है।
उ.7 आतंकवाद को किसी भी सूरत में केवल कठोर नीतियों से खत्म नहीं किया जा सकता। कठोर नीतियों का परिणाम हम अपने देश के राज्यों, जम्मू व कश्मीर और नार्थ-ईस्ट में देख चुके हैं। जम्मू व कश्मीर को लेकर हमेशा एक शार्टटर्म स्ट्रेटजी अपनाई गई। कश्मीर समस्या को कभी भी, किसी भी सरकार ने संजीदगी से लिया ही नहीं बल्कि यदि यह कहा जाये कि पूरे उपमहाद्वीप के राजनेताओं ने इसको सुलगाये रखने और अपने हिस्से की रोटियां सेंकने के लिए ही इस्तेमाल किया तो गलत नहीं होगा। इसी तरह नार्थ-ईस्ट राज्यों में दशकों से आम लोग जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को तरस रहे हैं। इन राज्यों में ज्यादा क्लास-गैप के कारण क्लास-स्ट्रगल भी है जिसके चलते आम लोग आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सतहों पर पराधीन हुए हैं। जरूरत है बुनियादी समस्याओं को एड्रेस करने की, ताकि न ही आम लोग पराधीन हो जाएं और न ही उन्हें शोषण करने का, धार्मिक दलालों और पूंजीपतियों को अवसर मिले।
उ.8 धर्म स्वयं क्रूर, पाखण्डी और तर्कहीन विचारों पर ही आधारित होते हैं। लड़ाई वही पुरानी है असहिष्णुता बनाम वैचारिक स्वतंत्रता की, जो कभी सुकरात, गैलेलियो, लेनिन, माक्र्स आदि महापुरुषों ने लड़ी थी और आज के युग में कलबुर्गी, पानसरे, दाभोलकर, इख़लाक़ और रोहित वेमुला के रूप में लड़ी जा रही है। धर्म की दहलीज पर बैठे कठमुल्ला, भगवा-जुनूनी आदि शक्तियां पहले वैचारिक धरातल पर ही आतंक का निर्माण करते हंै तब जा के जमीनी-सतह पर आतंकवाद सामने आ जाता है। जहां तक तर्क, दलील और यथार्थ के धरातल पर विचारों के विकसित होने की बात है उसे किसी भी तरह आतंक के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। वैचारिक स्वतन्त्रता बुनियादी मानव-अधिकार है जबकि असहिष्णुता मानव के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन है।
उ.9 आतंकवाद केवल वह नहीं है जिसमें बन्दूक, गोलाबारूद आदि का इस्तेमाल होता है। आतंकवाद का सब से खतरनाक रूप तो राजनीति की आड़ में पल रहा कठमुल्लापन है। धार्मिक कट्टरवाद को जब-जब भी राजनीति की सरपरस्ती मिलती है, आतंकवाद का सब से क्रूर रूप सामने आ जाता है। उदाहरण हमारे देश का वर्तमान असहिष्णुता भरा चेहरा है।
उ.10 वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को सुधारने में बुद्धिजीवियों की भूमिका को किसी भी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। विश्वस्तर पर युद्ध या आतंकवाद से किसी भी समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता। आखिर पर हर समस्या बातचीत से ही और वैचारिक धरातल पर ही हल की जाती है और उसमें बुद्धिजीवियों की भूमिका आधारणीय है। यदि कुछ लोग ऐसा समझते हैं तो वे धार्मिक कट्टरवादी,साम्राज्यवादी और पूंजीपति हैं जिनको हमेशा बुद्धिजीवियों से डर महसूस होता है।