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Wednesday 22 Nov 2017

आतंकवाद पूंजीवादी अर्थनीति के साथ गहरे से जुड़ा है


प्रो. मणि मोहन

विजयनगर , सेक्टर - बी
गंज बासौदा ( म. प्र .)
मो. 9425150346

उ.1. धर्मतत्ववाद मानवीय विवेक और चेतना को जड़ और पशु की तरह हांकता है, उसके पास आदेश देने और उसे यथावत मनवाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। इस अर्थ में वह मानव चेतना को स्वयं क्रियाशील और सोचने विचारने की क्षमता से रहित मानकर उसके साथ पशुवत व्यवहार करता है। मनुष्य एक चिंतनशील प्राणी है और वह स्वयं अपने और अपने परिवेश तथा समाज के सम्बन्ध में सोच विचार कर सम्बन्ध बना सकता है , यह बात धर्मतत्ववाद और आतंकवाद दोनों ही स्वीकार नहीं करते। दोनों ही मानवीय चेतना को निरन्तर जड़ता में बदलने के लिए एक दूसरे का सहारा लेकर षड्यंत्र रचते रहते हैं। दोनों की कार्यप्रणाली और तकनीक एक ही प्रकार की है। उनके लक्ष्य और लक्ष्यभेद करने का आंतरिक तरीका भी एक जैसा ही होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि धर्मतत्ववाद मानव की चेतना को परलोक के भय से आतंकित कर अपने आदेश मानने को विवश करता है और आतंकवाद पहले कुछ लोगों को परलोक भेजकर शेष लोगों की चेतना का भयादोहन करता है। खासकर वह उन लोगों को घेरे में लेता है जो धर्मतत्ववाद को चुनौती देते हैं।
उ.2 वैश्विक राजनीति द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जिस साम्राज्यवादी विचारधारा के आधार पर स्वयं को विस्तारित कर रही थी, उसके रास्ते में आनेवाली बाधाओं से निपटने के लिए जो तरीके अपनाये गए उनमें आतंकवादी गतिविधियों को विकसित करना भी एक तकनीक थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद समाजवादी और पूंजीवादी खेमे में शक्तिपरीक्षण और निरन्तर विस्तार की जो भूख पैदा हो रही थी उसको पूरा करने के लिए प्रत्यक्ष युद्ध जैसी तकनीक जब बेअसर होने लगी तो अप्रत्यक्ष युद्ध को तरजीह दी गई। इस अप्रत्यक्ष युद्ध की तकनीक जिन पूंजीवादी देशों ने समाजवादी व्यवस्थाओं को धराशायी करने के लिए ईजाद की थी, आज यही तकनीक जब स्वयं अपने जन्मदाताओं पर ही पलटवार करने लगी तो उसे आतंकवाद जैसा नाम दे दिया गया। वैश्विक राजनीति एवं क्षेत्र वर्चस्व स्थापित करने के लिए जिस वर्ग का सहारा अपने दुश्मन को अंदर से तोडऩे के लिए लिया गया था, उस वर्ग के सामाजिक और आर्थिक हितों को जब लगातार अनदेखा किया गया और उनके जमीनी स्रोतों पर ही जब अधिकार जमाया जाने लगा तो यह वर्ग भस्मासुर की तरह उन ताकतों और उनके समर्थक देशों पर हमले करके अपने अस्तित्व की लड़ाई में शामिल हो गया।
भारत पर आतंकवादी हमलों के इतिहास को ध्यान से देखा जाए तो हम पाते हैं कि जैसे-जैसे भारतीय राजनीति और अर्थनीति समाजवादी विचारधारा और उसके समर्थक देशों से विमुख होकर पूंजीवादी राजनीति और अर्थनीति को अपनाती गई वैसे -वैसे ही आतंकवादी हमले भी बढ़ते गए। भारत में आतंकवाद पूंजीवादी अर्थनीति के साथ गहरे से जुड़ा है।
यह समस्या जीवन के लिए जरूरी साधनों और संसाधनों के असमान वितरण के कारण पैदा हुई है। यही बात नक्सलवाद के सन्दर्भ में भी सच है। विकास के अंतर्विरोधों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि धार्मिक कट्टरता इन तमाम तरह की समस्याओं के हथियार हैं न कि इनके जन्म होने के कारण ।
उ.3 धार्मिक कट्टरता पर तो चर्चा होती रहती है, भले ही यह पार्टी फोरम में हो , अखबारों में भी इस सम्बन्ध में बयान आदि आते रहते हैं परन्तु धर्म के उदार मानवीय रूप पर चर्चा न करना या उसे महत्व न देना कहीं न कहीं आम जन के बीच वाम राजनीति की सीमाओं को दर्शाता है। जनता के बीच स्पेस तलाशकर सम्वाद कायम करने की अत्यंत जरूरत है और वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए यह बहुत जरूरी जान पड़ रहा है।
उ.4 यह प्रश्न भी दरअसल तीसरे प्रश्न का ही एक हिस्सा है। जब तक सामान्य जन के बीच (जिसमें मध्यम वर्ग को भी शामिल मानें ) वाम दलों, बुद्धिजीवियों , लेखकों, विचारकों की इनके बीच आवाजाही नहीं होगी, सम्वाद स्थापित नहीं होगा तब तक यह भ्रम सुनियोजित तरीके से फैलाया जाता रहेगा। आप देखिये कि प्रतिगामी ताकतें हर उस स्पेस पर मौजूद हैं जहां से उन्हें आमजन से सम्वाद का मौका मिलता है। इन्हीं स्पेस पर खड़े होकर तमाम तरह के भ्रम फैलाये जा रहे हैं। चैतन्य वर्ग की चुप्पी से धार्मिक कट्टरता और भ्रम बढ़ता है और यह हाल ही में हुई घटनाओं के सन्दर्भ में भी देखा जा सकता है।
उ.5 इसमें बहुत लम्बा समय लगेगा। हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था सड़ांध मार रही है। स्कूल और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम कचरे के ढेर पर फेंकने लायक हैं। वैज्ञानिक चेतना से लैस सामग्री को पाठ्यक्रमों में शामिल किये जाने की जरूरत एक लम्बे समय से बनी हुई है परन्तु अकादमिक दुनिया के कुँए में तो भांग पड़ी हुई है ।
उ.6 यह बात सही है कि इस षड्यंत्र के बैकग्रॉउण्ड में प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा जमाने की होड़ और चाल है परन्तु यह भी सच है कि हाल ही के दिनों में इस आतंकवादी संगठन ने बड़ी तेजी से पश्चिमी एशिया के बाहर अपनी हिंसक गतिविधियों का विस्तार किया है। आज यह संगठन अल्जीरिया, लीबिया, माली, दक्षिणी सूडान और ट्यूनीशिया जैसे देशों में आतंक फैला रहा है। नाइजीरिया के बोको हराम जैसे आतंकी संगठन ने इससे हाथ मिला लिया है। हमारे अपने उपमहाद्वीप में (पकिस्तान में कहीं) इसकी शाखा खुल चुकी है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत सावधानीपूर्वक पूरी तैयारी और कूटनीति  के साथ आगे बढऩे की जरूरत है।
उ.7 भारतीय सन्दर्भों में बात करें तो भ्रष्टाचार और वोट की राजनीति सबसे बड़ी बाधा है ।
उ.8 भारत के ही सन्दर्भ में पुन: बात करें तो यहां धर्म, विचार और देशभक्ति का विचित्र मिश्रण देखने में आ रहा है। एक ओर जहां युवा वर्ग के बीच विचार शून्यता बढ़ी है तो दूसरी तरफ प्रतिगामी विचारों का आतंक बहुत सोची समझी रणनीति के साथ फैलता दिखाई दे रहा है। अकादमियों और सांस्कृतिक केन्दों में अयोग्य या औसत लोगों को बिठाकर मनमाफिक काम कराया जा रहा है।
उ.9 राजनीतिक सिद्धांतों में कठमुल्लापन तो लगातार बढ़ रहा है। यह कठमुल्लापन हमारे देश और समाज के जरूरी मुद्दे जैसे गरीबी, भ्रष्टाचार , बेरोजगारी आदि को हाशिये पर धकेलने के साथ ही हमारा ध्यान भटकाकर येन केन प्रकरण सत्ता पर बने रहने का सबब भी बन रहा है। यह बात हमारे युवा वर्ग को जितनी जल्दी समझ में आ जाए उतना बेहतर होगा ।
उ.10 बुद्धिजीवियों की भूमिका को खारिज करने की कोशिशें जारी है और इसके लिए खारिज करने वाले नहीं बल्कि खारिज होने वाले ही जिम्मेदार हैं। मठों, गुटों, संघों में बंटे हुए लेखक, विचारक, संस्कृतिकर्मी और पत्रकार कितनी ताकत और ऊर्जा के साथ विपक्ष में खड़े होकर प्रतिरोध की मशाल जलाये रख सकते हैं, अंदाज लगाया जा सकता है। अपने-अपने आत्ममुग्धता के वृत्त में कैद होकर अपने समय और समाज के लिए क्या कर रहे हैं इस पर विचार होना चाहिए। जिन लोगों को केंद्र में रखकर लिख रहे हैं उस जनमानस के बीच कितनी आवाजाही है, इस पर भी मन्थन होना चाहिए। हालांकि पिछले दिनों असहिष्णुता के मुद्दे पर हमारे देश में सृजनधर्मियों के बीच जो भी थोड़ी बहुत ही सही पर सहमति बनी है उससे आशा की एक किरण दिखाई दे रही है ।