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Thursday 23 Nov 2017

समय-साक्षी


केवल गोस्वामी
जे-363 सरिता विहार, मथुरा रोड़,
नई दिल्ली- 110076
मो. 9871638634

कहा गया है कि आतंकी की कोई जाति नहीं होती किन्तु यह सही नहीं है। घटना को अंजाम देने वालों के पीछे जो चेहरे होते हैं उनकी ठोस पहचान होती है। मजहब की आड़ में 26/11 का दुखांत घटित होता है उसके पीछे जो शक्तियां कार्यरत होती हैं वे धर्म के तत्ववाद के नाम पर इस प्रकार के घृणित कार्य करवाती है। मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस पर जो आक्रमण करते हैं उनके स्वामियों को पहचानने में कोई कठिनाई नहीं होती। इस्लामिक स्टेट और अखंड भारत की कामना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों संगठनकर्ताओं को यह भलीभांति मालूम है कि वर्तमान समय में इनकी कू्रर गतिविधियों द्वारा उनकी कुत्सित इच्छाएं पूरी होने वाली नहीं है। ये मध्ययुगीन परिकल्पनाएं हैं। पर ऐसा करने में उनकी अपनी-अपनी संस्थाओं में रक्त संचार होता है। पाप-पुण्य के सिद्धांत के द्वारा भोली-भाली जनता में भय व्याप्त किया जाता है फिर इसके निवारण के लिए या स्वर्ग में स्थान सुनिश्चित करने के लिए अपार धन बटोरा जाता है। कुछ अन्य शक्तियां भी हैं वे भी धन-बल में उनका साथ देती रहती हैं, इन दोनों के पीछे गरीबी और अज्ञान की स्थितियां भी सहायक होती है। बेकार युवकों को धन का लालच देकर या भयभीत करके इस आग में धकेला जाता है। धर्म अथवा मजहब को इन गतिविधियों से कितना लेना-देना है, यह इस्लामिक स्टेट के बाशिंदों की आतमगाहों में मिलने वाली औरतों के यौनशोषण या ब्लूस्टार ऑपरेशन के दौरान स्वर्ण मंदिर के तलहटों से मिली वस्तुओं से स्पष्ट हो जाता है।
धार्मिक तत्ववाद के प्रणेता अल्लाह या ईश्वर नहीं है। सामंतों की जागीर को सुरक्षित रखने के लिए भाड़े के पंडित-मुल्लाओं से इस प्रकार की भयानक कहानियों की रचना करवाई जाती है। पूर्वजन्मों के कर्मों के सिद्धांत रचे जाते हैं या कयामत के रोज होने वाले न्याय के हवाले दिए जाते हैं। जो कंगाल है वे अपने पूर्व जन्मों के कर्मों का कारण हैं जो धनवान है वे भी अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण है। कंगाल यदि दूसरों की सम्पत्ति पर कुदृष्टि डालेंगे तो अगले जन्म में भी उन्हें इसका हिसाब देना पड़ेगा। इस प्रकार किसी प्रकार के विद्रोह की आशंका को निर्मूल कर दिया जाता है। हर ग्रंथ की अंतिम पंक्तियों में अंकित है ब्राम्हणों को भूदान, स्वर्णदान अन्न- वस्त्र दान दो, नर्क के भयानक दृश्य उकेरे जाते हैं जैसे वे वहां से होकर आए हैं। फलत: अल्लाह या ईश्वर के नाम पर शोषण की इस व्यवस्था को मजबूत किया जाता है। धार्मिक संस्थाओं, मंदिरों, मस्जिदों की आड़ में जितने कुकर्म होते हैं उनके कारणों और निवारणों तथा ऐसे कुकृत्य करने वालों को दंडित करने वालों के लिए कानून बहुत कमजोर है। उल्टे उन्हें पूजा जाता है प्रोत्साहित किया जाता है। अरबों रुपए और टनों सोना तथा अकूत सम्पत्ति यदि समाज के विकास में लगाई जाए तो अनेक वंचितों अशिक्षितों का भला हो सकता है पर ऐसी व्यवस्था लाए कौन? चूंकि बहुधा सरकारें और नेता भी इन्हीं कार्यों में लिप्त पाए जाते हैं।
धर्म के उदार और मानवीय रूप का सिद्धांत भी बहुधा भ्रामक ही है। आप कट्टरता और उदारता में कहां विभाजक रेखा खींचेंगे। उदारमना धार्मिक नेताओं को भी अपने विचारों को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए एक आधार की आवश्यकता होती है जो बढ़ते-बढ़ते संस्था बन जाती है और बहुधा व्याख्याता ईश्वर से बड़ा हो जाता है। ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलेंगे जिन्होंने निस्वार्थभाव से ज्ञान का प्रसार किया होगा फिर भी परंपरा में ऐसे लोगों के भी उदाहरण मिलेंगे, पर बहुत कम, उन्हें भी राज्याश्रय की जरूरत पड़ी और अधीनस्थ हो गए। धर्म की अवधारणा के साथ-साथ पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क की अवधारणा भी अस्तित्व में आती है जो व्यक्ति को भीरू और अकर्मण्य बना देती है। वह पुरुषार्थ करने की अपेक्षा इन्हीं बाबाओं, साधु-संतों के फेर में ही जीवन बिता देता है। धर्म सामाजिक प्रगति में साधक कम, बाधक अधिक है, इसलिए माक्र्स ने इसे अफीम की नशा कहा है।
इन कट्टरताओं को फैलाने के जितने उपक्रम हैं उतने ही उससे भी अधिक शक्तिशाली उपक्रम उनको तोडऩे के लिए होने चाहिए। संघ अपनी शाखाओं के द्वारा सरस्वती शिशु मंदिरों के माध्यम से शिशुओं, युवकों और वृद्धों के मन-मस्तिष्कों को दूषित करने का कार्य करते हैं। मदरसों ने व्यक्ति को विध्वंसक बनाने की शिक्षा दी जाती है, पर हमारी प्रगतिशील सोच के व्यक्तियों ने यह कार्य सरकारों पर छोड़ दिया है। दुर्भाग्य से यदि सरकार भी ऐसी ही सोच की आ जाए, तो रही-सही उम्मीद भी धूमिल हो जाती है। इस प्रकार की कट्टरता का खण्डन करने के लिए जनजागृति अभियान, व्यापक स्तर पर शिक्षा पद्धति में पाठ्यक्रमों में आमूलचूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। इस क्रम में बुद्धिजीवियों, लेखकों, इतिहासकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा संचार माध्यमों की भूमिका महती है जो दुर्भाग्य से पूंजीपतियों के अधिकार क्षेत्र में है।
जब हम धर्म के सारतत्व की बात करते हैं तो हमारे सामने प्राय: हिन्दू धर्म ही रहता है शेष धर्म तिरोहित हो जाते हैं। तब हम किस सारतत्व की बात कर रहे होते हों। पहले तो हम धर्म के अस्तित्व को भी स्वीकार करते हैं, फिर पाप-पुण्य के सिद्धांत को, फिर स्वर्ग-नर्क की परिकल्पनाओं को, फिर कर्मगति के सिद्धांत को, इसमें मानवाधिकार कहां आता है। यह भी एक भ्रम है। मानवकल्याण केवल शोषणविहीन श्रम उत्पाद तथा उसके न्यायिक वितरण में है। कहते हैं सपेरा प्राय: सांप के काटने से ही मरता है। संत भिंडरावाले तथा ओसामा बिन लादेन के उदाहरण हमारे सामने हंै पर सपेरों को सांपों और सांपों ंको सपेरों की जरूरत रहती है। इंदिरा गांधी की हत्या और 9/11 की घटनाएं ज्वलंत उदाहरण के रूप में हमारे सामने हैं। प्रगतिशील शिक्षा और पुष्ट एवं न्यायिक आर्थिक आधार के बिना इस प्रकार के खेल कभी समाप्त नहीं होंगे। स्वार्थपरक नीतियां ऐसा कभी होने नहीं देंगी। यहां क्रूर आतंकी संगठनों की गतिविधियों और स्वार्थपरक प्रशासनिक नीतियों में कहीं-कहीं समानता भी दिखाई देती है। अमरीका का आर्थिक आधार शस्त्रों के उत्पादन तथा उनके विक्रय पर निर्भर करता है इसलिए उसे विश्व के किसी न किसी हिस्से में आग जलाए रखने में ही अपना हित दिखाई देता है। सद्दाम हुसैन को वह इसलिए तबाह नहीं करना चाहता था कि वह तानाशाह था या उसके पास आणविक अस्त्रों का जखीरा होने के कारण विश्व शांति को खतरा था। बल्कि इसलिए कि वह तेल के कुओं पर काबिज था। जिससे अमरीका का कार्य व्यापार सुगमतापूर्वक नहीं चल पा रहा था। यही कारण था कि उसने इराक में यह खूनी खेल खेला होगा।
आज दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं है जो आतंकवाद से प्रभावित न हों। स्वयं पाकिस्तान में आतंकवाद के कारण जितनी तबाही हुई है उतनी शायद हिन्दुस्तान की न हुई हो। आईएसआई तथा सेना को मालूम है कि हिन्दुस्तान से दो-दो युद्ध करके देख लिए परिणाम उनके पक्ष में नहीं रहा पर आतंकी गतिविधियों से भारत पर लगातार दबाए रखने में वे एक सीमा तक सफल हुए हैं। अमरीका भी अपनी निहित स्वार्थपरक नीतियों के कारण पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करना नहीं चाहता। चीन की अपनी मजबूरियां हैं वस्ततु: भारत को ही इन निरंतर आतंकी आक्रमणों के विरुद्ध ठोस तथा कड़े कदम उठाने होंगे। मात्र प्रतिरोध करने से कोई अनुकूल परिणाम निकलनेवाला नहीं है।
असहिष्णुता के कारण इस उपमहाद्वीप में देश के विभाजन का क्रूर कांड हुआ। इसी असहिष्णुता के चलते बाबरी मस्जिद के ध्वस्त का काला कारनामा हुआ। अल्लाह-ईश्वर एक दूजे को बर्दाश्त नहीं कर पाए। शंकराचार्य सांईबाबा को नेस्तनाबूद कर देना चाहते हैं। आज विश्व में नए सवाल हैं- भूमंडलीकरण और नवसाम्राज्यवाद और संसाधन वर्चस्व में युद्ध तथा दादागिरी के, नई आर्थिक नीति में विश्व बेरोजगारी और आतंकवाद के, विकास नीतियों से उपजी प्राकृतिक आपदाओं के, इन सवालों से विकसित एवं विकासशील देश लगातार जूझ रहे हैं। शायद कोई हो जो इस उहापोह से उबारने में सफल हो।
केवल पूंजीवाद खेमे के राजनीतिक सिद्धांतों में कठमुल्लापन नहीं बड़ रहा। प्रगतिशील और वामपंथी दलों में भी यह लगातार बढ़ रहा है। इसके चलते 35 वर्षों के शासन के बाद बंगाल में उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा और आज देश में फासीवाद के लगातार खतरे के सम्मुख वामदलों का एक होना एक बड़ी विडम्बना है। 1925 में कम्युनिस्ट पार्टी वजूद में आई और 1925 में ही स्वयंसेवक संघ की नींव पड़ी आज एक सत्ता के शीर्ष पर है और दूसरा अस्तित्व के लिए भी संघर्ष कर रहा है।
बुद्धिजीवियों ने जिस प्रकार इनामों की होड़ में स्वयं को झोंक दिया है और किसी न किसी राजनीतिक दल का पुच्छला बनना स्वीकार कर लिया है, इसी करण उनकी यह दशा होना स्वाभाविक था। रायपुर में भाजपा सरकार के निमंत्रण पर हमारे प्रगतिशीलों ने भागीदारी करके अपनी भद्द पिटवाई। फासीवाद के आक्रमणों से सरेआम बुद्धिजीवियों की हत्याओं का हमारे लेखक लामबंद होकर उत्तर नहीं दे पाए। प्रगतिशील लेखक संघ तथा जनवादी लेखक संघ की अकर्मण्यता इसका ज्वलंत उदाहरण है। इस संकट की घड़ी जिस प्रकार संगठित होकर इन संस्थाओं को अपनी भूमिका निभानी चाहिए थी, वे नहीं कर पाए। प्रेमचंद के ‘कफन’ को हम वर्षों से दोहरा रहे हैं कि लेखक रणनीति के आगे मशाल लेकर चलने वाली प्राणी है किन्तु व्यवहार में इसका बिलकुल उल्टा है। ऐसे बुद्धिजीवियों को स्वयं अपनी स्थिति पर पुर्नविचार करने की जरूरत है। लेखक संगठनों की प्रासंगिकता पर नए सिरे से बहस करने की जरूरत है।