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Monday 20 Nov 2017

वैश्विक समाज का संकट और युद्ध


केदारनाथ पांडेय

सदस्य, बिहार विधान परिषद
विश्व आज इतना सिमट और सिकुडक़र छोटा हो गया है कि परिवार का लघु रूप हो गया है। इसलिए एक नया शब्द प्रचलन में आया है ग्लोवल इिलेज। इस ग्लोवल इिलेज के पीछे दुहरी दुनिया और संकटों का अभूतपूर्व पहाड़ खड़ा है जो दिखाई पड़ते हुए भी अदृश्य है। यूं कहें कि दृश्य होते हुए भी एकता और संघर्ष को जन्म नहीं दे पाता और विभिन्न संचार माध्यमों के दुष्प्रचारों द्वारा अपनी आकर्षक छवि बनाने में कामयाब हो चुका है।
1991 में जबसे अपने देश में भी आर्थिक नीतियों में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ है। हर सरकार आर्थिक सुधारों की रफ्तार को बढ़ाने के लिए बेचैन और आमादा है। उसके नारे ‘‘कर लो दुनिया मुट्ठी में’’ और ‘‘कौन बनेगा करोड़पति’’ बेइन्तहा लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं। संविधान की उद्देशिका में वर्णित सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य की परिकल्पना और सभी नागरिकों को सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता प्रदान करने और बढ़ाने का मान तथा संकल्प तिरोहित हो चुका है।
देश के किसी महानगर में कहीं भी आप आधे घंटे के लिए खड़ा हो जाएं आपको वैश्विक समाज दिखाई पड़ जाएगा। एक ही देश में दो दुनिया दिख जाएगी। महानगरों में इसकी अनुभूति ज्यादा तीव्रता से होगी। अगर प्रात:काल का समय है तो अनेक पुरुषों, महिलाओं, नौजवानों को आप गाड़ी में अथवा पैदल पार्कों, इको पार्क, संजय गांधी जैविक उद्यानों और खेल स्टेडियमों की ओर दौड़ते हांफते पाएंगे। ये लोग ऐसे लोग हैं जो सामान्य से कुछ ज्यादा ऊपर के खाते पीते तथाकथित संभ्रांत लोग हैं लेकिन उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, कोलस्ट्राल आदि बीमारियों से ग्रस्त हैं और इनका प्रात:काल घूमना, टहलना अनिवार्य सा है। इनमें महिलाओं की संख्या भी अब काफी अधिक है। पटना जैसे महानगर में यही वक्त है जब आप मध्यमवर्गीय महिलाओं को अपने छोटे-छोटे बेटे-बेटियों को पीठ पर भारी भरकम बस्ता लादे, पानी की बोतल लिए चौक-चौराहों पर बसों का इंतजार करते अथवा बसों पर चढ़ाते पाएंगे। दूसरी तरफ इसी वक्त में घुटने तक की धोती और मैला-कुचैला कुर्ता, गंजी पहने सिर या कंधे पर गमछा, तौली, फावड़ा रखे कामगारों की टोलियां भी मिल जाएंगी। चौक-चौराहों पर काम के इंतजार में बैठी, ग्राहकों की टकटकी लगाए घंटों खैनी खाते, बीड़ी पीते इंतजार करते। उन्हें दिन भर के लिए काम की तलाश होती है ताकि शाम को रोटी प्याज आदि खाने का कुछ सामान खरीद कर ला सकें और रात का चुल्हा जल सके। इसी वक्त प्लास्टिक के थैलों को पीठ पर लादे कुछ बच्चे, अधैड़ औरतें, मर्द भी मिल जाएंगे जो प्लास्टिक की थैलियां, बोरे के चट, कागज के टुकड़े आदि बटोरते दिखेंगे। इस प्रकार की दुनिया दिखती है जिनमें आपस में कोई सामाजिक सांस्कृतिक संबंध नहीं है और यह एक परिघटना है जिसे आधुनिक वित्तीय पूंजीवाद ने पैदा  किया है। छोटे नगरों, कस्बों में भी थोड़े-मोड़े अंतर के साथ यह दृश्य दिखाई पड़ जाएगा क्योंकि वहां भी पब्लिक स्कूलों की फौज खड़ी हो चुकी है, माल बन चुके हैं और चौक-चौराहों पर मंडियां कायम हो चुकी हैं।
वर्तमान पूंजीवाद के पहले और सामंतवाद के जमाने में भी समाज दो वर्गों में विभाजित था और उत्पादन के साधनों पर सम्पन्न वर्ग का एकाधिकार था। गांव या शहर सर्वत्र दासों पर मालिकों के जुल्म भी होते थे और छात्रों, मजदूरों को कोई आजादी नहीं थी और यह मेरे गांव में मेरे बचपन यानि 50 के दशक में भी देखने को मिलता था लेकिन तब सामंत, दासों और रैयतों का ख्याल भी रखते थे। उनकी बीमारी, बेटी की शादी आदि की नैतिक सामाजिक जवाबदेही मालिक की होती थी क्योंकि मालिक का हित परोक्षत: उनसे जुड़ा होता था। 60 के दशक के पूर्वाद्ध तक नौकरों, दासों को हम बच्चे चाचा कहकर संबोधित करते थे। पर्व, त्यौहार पर बढिय़ा भोजन, कपड़े आदि मुहैया कराए जाते थे। धनी गरीब सब साथ-साथ रहते थे। मालिक उनका माई बाप होता था।
आधुनिक पूंजीवाद के प्रारंभिक दिनों तक पेरिस में एक ही इमारत में धनी गरीब दोनों रहते थे। धनी निचले तल्ले में और गरीब ऊपरी तल्ले में। क्योंकि लिफ्ट की सुविधा नहीं थी। औद्योगिक क्रांति ने इसमें बदलाव ला दिया और सामाजिक संतुलन और परम्परागत जिम्मेदारियों को समाप्त कर दिया। फिर एक ही देश नगर, गांव में दो दुनिया पैदा हो गई। अब तो यह बंटवारा इतना तीखा और गहरा हो गया है कि महानगरों और नगरों में तो साफ-साफ दिखने लगा है। मानसिक रूप से भी इसने विभेदकारी स्थिति की घाटी गहरी कर दी है।
आर्थिक नीतियों में आए तीव्र उदारीकरण ने एक लम्बा गैप कायम कर दिया है। एक ओर करोड़पतियों, अरबपतियों की संख्या बढ़ती जा रही है तो गरीबों की संख्या में भी व्यापक बढ़ोतरी और अंतर है। बैंकों का 18 लाख हजार करोड़ रुपए ऋण लेने वाले देश छोडक़र विदेशों में खुलेआम रह लेते हैं और हजार लाख रुपए कर्ज लेने वाले जेलों की सीकचों में रहने को मजबूर हैं या आत्महत्या करने को। दो लाख चौदह हजार करोड़ रुपए का घोषित एनपीए है। दूसरी तरफ लगातार ब्याज दरें घटाई जा रही हैं। मासिक आमदनी यथा वेतन में 100 फीसदी से भी ज्यादा का गैप है। असमानता ने विकराल रूप धारण कर लिया है। जनतंत्र के मंदिरों यथा संसद, विधान मंडल, नगर निकाय में धनपशुओं की संख्या उफान पर है। मूल्य, नैतिकता, संवेदना सिर्फ शब्दकोश तक सिमट गए हैं। मानवता का नामोनिशान मिट चुका है। शिक्षा अलगाव भेदभाव, वैमनस्य, आतंकवाद पढ़ा रही है बढ़ा रही है, ‘ऊपर-ऊपर पी जाते हैं जो पीने वाले हैं।’ पंक्ति युगसत्य बन चुकी है। ऐसे वैश्विक समाज में जीना कितना दुश्वार है, कहा नहीं जा सकता। मुझे 1991 की आर्थिक नीतियों पर संसद में तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर के बीच हुआ संवाद याद आ रहा है। वित्त मंत्री ने कहा था कि इन नीतियों से 20 वर्षों बाद भारत में आर्थिक असमानता और गरीबी घट जाएगी। रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और भारत में खुशहाली आएगी। सांसद वित्त मंत्री के भाषण पर मेजें थपथपा कर खुशियां व्यक्त कर रहे थे तो चन्द्रशेखर ने प्रतिवाद किया कि वित्त मंत्री जी जो स्वप्न दिखा रहे हैं वह बिल्कुल निराधार और सत्य से परे है। मैं दावे के साथ कहता हूं कि देश में बीस वर्षों बाद और गरीबी बढ़ जाएगी। रोजगार के अवसर घट जाएंगे और जनता का जीवन दूभर हो जाएगा। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिन्हा राव को लक्ष्य करते हुए कहा हमने आपके हाथ में फल काटने के लिए एक चाकू दिया था और आप उससे हृदय का ऑपरेशन कर रहे हैं। चन्द्रशेखर की यह टिप्पणी आर्थिक नीतियों के उदारीकरण से उपजे वैश्विक समाज के गहराते संकट पर पूरी रोशनी डालती है।
प्रश्न है कि इस संकट से उबरने के रास्ते क्या हैं? और यहीं बुद्ध याद आते हैं। बुद्ध अदम्य इच्छाओं, भोगों और सुनहरे सपनों के लोभ में भिक्षु नहीं बने थे वरन् उनके समय में शाक्य और कोलिय गणराज्यों के बीच अक्सर विभिन्न कारणों से युद्ध होते रहते थे। बुद्ध असीम धन की लिप्सा के कारण मानव समाज में व्याप्त हिंसा का निदान चाहते थे। क्योंकि आज के वैश्विक समाज में धनलिप्सा की कोई सीमा निर्धारित नहीं है और धनलिप्सा हिंसा को जन्म देती है। बुद्ध के धर्म की एक बात सर्वाधिक अच्छी लगती है, वह यह कि अज्ञात को लेकर जितनी भी मान्यताएं हैं वह उनकी उपेक्षा करता है और दैनन्दिन की घटनाओं को विचारणीय मानता है। उसका आदर्श न स्वर्ग है न किसी परमात्मा की प्राप्ति। वह अंधविश्वास को भी नहीं मानता बल्कि तर्क को स्वीकारता है। धर्म का आधार मिथ्या विश्वास परम्परा, विश्वास करने की चेतना न होकर यथार्थ बुद्धिवाद है। वे कहते हैं कि गुरु, माता, पिता अथवा किसी श्रेष्ठ की बात इसलिए मत मान लो कि वह तुमसे बड़ा है बल्कि तर्क की कसौटी पर कसकर उसका वैज्ञानिक परीक्षण करो, तब स्वीकार करो। वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण के पक्षधर हैं। इसीलिए वे चाहते हैं प्रत्येक व्यक्ति संदेह से आरंभ करें। किसी के बताए रास्ते पर चलने की बजाय पूरी तरह अपना समाधान कर ले। वस्तुत: बौद्ध धर्म की आंतरिक भावना पूरी तरह समाजवादी है। वह सामाजिक उद्देश्य के लिए मिलकर काम करने की शिक्षा देता है। इस प्रकार वह उस औद्योगीकरण की सख्त विरोधी है जो अबाध, दुर्गंधपूर्ण, अनैतिक और संवेदनारहित धनार्जन को स्वीकारता है। आज की व्यापारिक सभ्यता केवल स्वार्थ सिद्धि को जन्म देती है। उसी को श्रेय और प्रेय मानती है। वे कहते हैं कि आलसी और अनुद्योगी के सौ वर्षों के जीवन से दृढ़ उद्योग करने वाले के जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है। वे स्वयं को स्वामी होने का उद्घोष करते हैं और यह सीधी-सादी बात नहीं है वरन मनुष्य की सर्वोच्चता का जयघोष है। वे मनुष्य को अपना पसंदीदा रंग चुनने की आजादी देते हैं, रंग को थोपते नहीं। इसके लिए स्वर्ग-नरक का भय भी नहीं दिखाते। उन्हें मनुष्य की स्वतंत्रता ज्यादा श्रेष्ठ महसूस होती है। इसलिए महापरिनिब्बान के समय भी आनंद को ‘‘अप्प दीपो भव’’ यानि अपना दीपक स्वयं बनो का उपदेश देते हैं। यही कारण हैं कि बौद्ध धर्म केवल वैचारिक रूप से क्रांतिकारी नहीं है वरन् प्राणियों के बीच समानता, करुणा तथा समाज में नये यथार्थ और अनुभव के धरातल पर खड़ा भविष्य का धर्म है। वह एक प्रकार से माक्र्सवादी और समाजवाद का आदि पुरुष है। संसार जब जाति, समुदाय, रंग, देशभाषा आदि संकीर्णताओं से उबर जाएगा, धनलिप्सा खत्म हो जाएगी तभी स्वाभाविक रूप से सबका दीपक बनेगा। बुद्ध संसार को दुखमय कहते हैं तो जीवन की वास्तविकता की ओर हमारा ध्यान खींचते हैं। बुद्ध ने जो भी कहा हमें बुद्ध बनाने के लिए कहा।
आज का ब्राह्मणवाद, मनुवाद, पूंजीवाद के खिलाफ, समस्त प्रकार की हिंसाओं के खिलाफ वे मानववाद की स्थापना पर बल देते हैं जो त्याग, करुणा, संवेदना पर आधारित समाज का मूल है। इसलिए वैश्विक समाज के संकटों का वही समाधान है। आज पूंजी की लिप्सा में युद्धोन्माद, आतंक, भय, अंधविश्वास, मिथ्यावाद, अशांति से जब भरोसे की अकाल मृत्यु हो रही है बुद्ध अधिक प्रासंगिक है।