Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

धर्म का सारतत्व और रूढि़वादिता


इला कुमार
सी 1235, गौड़ ग्रीन एवन्यू, अभयखंड -2, इंदिरापुरम, गाजियाबाद-201014
धर्म के सारतत्व, रूढि़वादिता आदि के संदर्भ में जब हम विचार करने बैठते हैं, तो सहज रूप से सर्वप्रथम धर्म की परिभाषा के बारे में सोचते हैं और वह इस शब्द-भाव-रूप में करीब आ जाता है-... ध्रियते लोको नेण धरती लोकं वा...
अर्थात् कर्तव्य, जाति, सम्प्रदाय, आदि के प्रचलित आचार का पालन! धर्म को कुछ इसी ढंग से उचित तरह से परिभाषित किया जा सकता है कि जो भी प्रचलित आचार-विचार, व्यवहार और कत्र्तव्य, सम्प्रदायों के बीच सदियों से प्रयोग में हैं उन सब का नियमपूर्वक पालन करना ही धर्म है। शायद इसी कारण हम पाते हैं कि शीतप्रधान देशों में रहने वाले समुदायों का खानपान, सामाजिक नियम कानून, गर्म- रेगिस्तानी प्रदेशों के समुदायों से सर्वथा भिन्न होता है और उनके धर्म पालन के तौर-तरीके भी बिलकुल भिन्न होते हैं।
धर्म शब्द में निहित अर्थ को समझने की चेष्टा करते हुए उसकी यह वास्तविक और पारदर्शी परिभाषा हमें चकित करती है—किसी वस्तु विशेष की विधायक आंतरिक वृत्ति को ही उसका धर्म कहते हैं .. अर्थात् प्रत्येक पदार्थ का व्यक्तित्व जिस भी वृत्ति पर निर्भर है, वही उस पदार्थ का मूल और वास्तविक धर्म कहलाता है; धर्म की वृद्धि से उस पदार्थ की वृद्धि और धर्म की कमी से उस पदार्थ का क्षय होता है। यह परिभाषा थोड़ी क्लिष्टता लिए हुए है अत: उदाहरण द्वारा इस बात को  इस तरह समझा जा सकता है कि- मोगरे का धर्म उसकी सुगंध है, सुगंध की वृद्धि उसके कली का विकास है और सुगंध का ह्रास पुष्प का ह्रास है, उदहारण के स्तर पर यह तथ्य हमें मोहता है और साथ-साथ हमें कुछ इस रूप में शिक्षित करता है कि इस समझ के कारण सहज ही हमारे अन्दर दूसरों को परखने वाली एक अंतर्दृष्टि का उदय होता है, जो जीवन के व्यावहारिक उतार-चढ़ाव में हमारा सहायक बन सकता है।
समय-समय पर धर्म को अलग-अलग शब्दों और वाक्यों में परिभाषित किया गया है, जिनको एक साथ पढऩा यह साफ इंगित कर देता है कि उन सभी के बीच एक किस्म की एकसूत्रता है, सकारात्मकता की एकसूत्रता! सबसे पहले वेद के कथन को उद्धृत करें, तो कहना पड़ता है कि आचार और साधु-आत्मा का संतोष, यह सभी धर्मों का मूल है। सूत्र रूप में यह मनु-स्मृति में इस प्रकार इंगित किया गया है -
वेद: स्मृति: सदाचार: स्वस्य च प्रियमात्मन:,
एतच्च्तुर्विध  प्राहु: साक्षाध्द्धर्मस्यलक्षणं  
अर्थात् श्रुति-स्मृति, सदाचार और अपने आत्मा का संतोष - यही साक्षात् धर्म के चार लक्षण (कसौटी) कहे गए हैं !
महाभारत के वनपर्व में स्थित यक्ष-युधिष्ठिर संवाद को बिना उद्धृत  किये हुए धर्म के बारे में कुछ भी कहना-सुनना अर्थहीन सा प्रतीत होता है, जहाँ तालाब से पानी लाने के क्रम में युधिष्ठिर धर्म के विषय में, यक्ष के सम्मुख यह कहते हैं- धर्म ही मनुष्य की रक्षा करता है और धर्म से विमुख होने पर मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है।
यक्ष के साथ किया गया युधिष्ठिर का यह पौराणिक-संवाद आज के इस अत्याधुनिक काल में भी उतना ही सत्य दीख पड़ता है, जितना कि कभी उस काल में रहा होगा। इसी क्रम में कुछ प्रश्न एवं उनके उत्तर यहाँ उद्धृत करती हूँ-
मनुष्य का वास्तविक साथ कौन देता है?
धैर्य !
हवा से भी तेज कौन चलता है?
मन !
किस चीज के खो जाने से दु:ख नहीं होता है ?
क्रोध !
सर्वोत्तम लाभ क्या है ?
आरोग्य !
युधिष्ठिर सत्पुरुषों जैसा धर्म, तप को बताते हैं, और परनिंदा को असत्पुरुषों जैसा आचरण बताते हैं।
इस तरह हम पाते हैं कि यक्ष-युधिष्ठिर संवाद न जाने कितनी मान्यताओं का प्रतिस्थापन करता है और सच के धर्म को, मनुष्यों के उत्तम आचार को और व्यावहारिक धरातल के अकाट्य सत्यों की बात पर भी प्रकाश डालता है। इस संवाद में एक किस्म की परीक्षा, यक्ष द्वारा युधिष्ठिर के ज्ञान की, सम-सिद्धांतों की, सम्यक-सामाजिक आचार की ली गयी थी। धर्म के सारतत्त्व से जुड़ा हुआ यह संवाद हमें यह सोचने पर बाध्य करता है कि वास्तव में धर्म का निरपेक्ष स्वरूप कैसा हो सकता है, और अभी के समय में यह कैसा है, साथ ही आज की तारीख में निरपेक्ष धार्मिक आचरण को प्रतिष्ठित करने के लिए प्रेरित करता हुआ दीख पड़ता है।
धर्मं के सही और निरपेक्ष स्वरुप की  थोड़ी चर्चा करने के बाद यदि अब हम बड़े परिप्रेक्ष्य में रूढि़ और रूढि़वादिता जैसे बेहद उलझे हुए तत्वों पर विचार करने बैठें तो एकबारगी मन संभ्रम के बीच विचलित हो उठता है कि इतने सारे मनोवैज्ञानिक खेल, और वो भी धर्म के नाम पर? होता यह है कि सामाजिक सु-रीतियाँ अपने आप आगे बढ़ती रहती हैं- इसका सबसे बड़ा उदाहरण ‘योग’ और योगासनों की बढ़ती लोकप्रियता है और मात्र स्त्रियों के सम्बन्ध में कहें तो मंगलसूत्र और सिंदूर भी भारत में हर राज्य, हर जाति की स्त्रियों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। इसी तर्ज पर रूढिय़ों के बनने के समय पर दृष्टि डाली जाए तो हम पाते हैं कि वे भी इसी प्रकार बनती हैं- कोई एक काम किसी ने किया ,दूसरे ने लाभ होते देख उसे अपना लिया, फिर तीसरे ने उसे अपनाया और सकारात्मक फल की आशा में वह कर्म, वह पूजा, वह उपासना, धीरे धीरे रूढि़ में तब्दील हो गयी। इसी सन्दर्भ में वर्षों से साथ चल रहे अनुभव , दृश्य वगैरह(नकारात्मक) स्वयं ही अगल बगल आकर खड़े हो जाते हैं। मन में प्रथम दृश्य जो उभरता है वह है- जगन्नाथपुरी के मंदिर में गर्भगृह की ओर प्रतिमा दर्शन को जाते श्रद्धालुओं की पीठ पर पंडा द्वारा लकड़ी से प्रहार ! मानों वे भक्तों के ऊपर भगवान् का अनुग्रह बरसा रहे हों और आश्चर्य कि भक्तगण उस प्रहार को पाकर थोड़ा धन्य ही हो जाते हैं, नाराज नहीं होते। इसी तरह के अन्य कई दृश्य भी याद आते हैं-जैसे गाय की पूंछ पकडक़र उसे ब्राह्मण को दान किया जाना और जमीन पर लोट-लोट कर पूजा स्थल, मंदिर तक जाना। इसमें  शक नहीं हर व्यक्ति को अपनी श्रद्धा को अपने ढंग से प्रकट करने की छूट है। लेकिन यह सारा का सारा व्यवहार धर्म नहीं है, यह रूढि़वादिता है। रुढिय़ों के सदर्भ में थोड़ा और विचार करने पर हम पाते हैं कि रूढिय़ां जन्म लेतीं हैं मनुष्यों की वैसी इच्छाओं की पूर्ति के लिए, जो सहज ही संभव नहीं है, और यही कारण है कि अच्छे-भले  पढ़े-लिखे लोगों से लेकर असाक्षर तक अपनी इच्छापूर्ति के लिए, परिवार के कल्याण के लिए , पंडित द्वारा बताये गए कर्मकांड विधि को अपनाते हैं और पूजा-पाठ में अनाप-शनाप खर्च करते हैं। काली छाया की तरह रूढिय़ां पंडे-पुजारियों के कारण चढ़ावा-दक्षिणा आदि के रूप में, धर्म के पर्याय स्वरूप प्रचलित हैं, रूढिय़ों के निर्माण के क्रम में पंडे-ज्योतिषी पहले तो कुंडली में ग्रह-दोष वगैरह बताकर लोगों के मन में भय जगाते हैं, अनदेखे का भय! फिर अनिष्ट से बचने का उपाय बताते हुए दान-धर्म करने की सलाह देते हैं और इसी क्रम में रूढिय़ां अपना आकार लेती रहती हैं, और दूर तक सदियों का सफर तय करती हैं। रूढिय़ां समाज में नकारात्मक प्रथा की तरह उपस्थित हैं और पंडित-गण इसे हमेशा धर्म से जोडक़र पेश करते हैं। लेकिन ‘ धर्म ‘ अलग है और रूढिय़ाँ अलग और इनमें कोई आपसी सम्बन्ध नहीं होता। धर्म का जो वास्तविक मतलब है, जो उसका सारतत्त्व है, उसकी जो मान्यताएं हैं, वे सभी न तो समाज- विरोधी हैं न ही मानवाधिकार विरोधी।
धर्म तत्व और रूढि़वादिता दो अलग चीजें हैं। भारत में सदियों से प्रचलित धर्म विज्ञान आधारित भी है और समाज-कल्याणकारी भी। वह एक ओर कल्प, संवत्सर, एवं चतुर्युगियों की गणना करना बताता है, तो दूसरी ओर मनुष्य-शरीर और जीवात्मा के स्थूलत्व और सूक्षमत्व को मैटर और एनर्जी की तर्ज पर विस्तार में बताता है, साथ ही मनुष्यत्व की कसौटी को भी इंगित करता चलता है। अभी के समय में यदि धर्म के सारतत्व को प्रतिष्ठित करना है, तो रूढिय़ों का छिद्रान्वेषण करके तमाम नकारात्मकता को नकारने की जरूरत हमें है, और तब स्वयं ही यह सत्य सामने आ जायेगा कि वास्तविक धर्म को मानवविरोधी किसी भी तरह नहीं कहा जा सकता। मानवविरोधी शीर्षक के अंतर्गत निरपेक्ष धर्म का कोई भी अंश नहीं आता ,ठीक उसी प्रकार जैसे कि वेदान्त शीर्षक के अंतर्गत शरीर से सम्बंधित कोई भी तथ्य निरुपित नहीं किया जाता। वेदान्त तो ना अहम् देहो, न मे देहो ......की तर्ज पर मात्र जीव, आत्मा और स्व की बात करता है। अत: अंत में सभी पक्षों पर नजर डालने के बाद सहज रूप से कहा जा सकता है कि धर्म के सारतत्त्व के बीच कहीं से भी रूढि़ उपस्थित नहीं हैं और स्वाभाविक रूप से धर्म मानवाधिकार विरोधी भी नहीं है, बल्कि धर्म का सारतत्व तो अपने आकार को बढ़ाता हुआ वसुधैव-कुटुम्बकम की तर्ज पर एक किस्म के महाभाव से जुड़ जाने की क्षमता से भरा हुआ है। यहाँ पर  शिकागो (1893) की विश्व धर्म-सभा में स्वामी विवेकानन्द द्वारा कही गयी बातों को उद्धृत करना तर्क संगत लगता है-  वी बीलीव नॉट ओनली इन युनिवर्सल टालरेंस बट वी एक्सेप्ट ऑल रिलीजन एज ट्रू।