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Wednesday 22 Nov 2017

धर्म और संस्कृति एक सिक्के के दो पहलू हैं

प्रो. गिरीश्वर मिश्र
कुलपति
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,
पो. हिंदी विश्वविद्यालय,
 गांधी हिल्स, वर्धा.442001
उ.1 मेरी दृष्टि में धर्म आतंकवाद का मूल कारण नहीं है। धर्म और हिंसा का जोड़ नहीं बैठता। धर्म का दुरुपयोग कर या कहें धर्म की आड़ में आतंक को ईश्वरेच्छा कह भोले भाले लोगों को फंसा कर आतंक का उपकरण बनाना घिनौनी राजनैतिक चाल होती है। अतिवाद से दृष्टि धूमिल पड़ जाती है और सच पर पड़ा आवरण नहीं दिखता। जिंदा बम बन कर आतंक फैलाना और जिहाद और बलिदान का भाव जगा कर उसे सही ठहराना और औचित्य स्थापित करना मूलत: राजनैतिक मुहिम का ही हिस्सा होता है। आज लश्कर ए तोएबा, अल कायदा और हमास जैसे आतंकी संगठन धर्म के नाम पर हिंसा कर रहे हैं। पहले भी ऐसा हुआ था। स्टालिन के रूस और नाजी जर्मनी में जो नरसंहार हुआ वह विचारधारा और राष्ट्रीयता की संकल्पना को उभार कर हुआ। ऐसे ही धार्मिक अतिवादिता भी संकुचित विचारधारा को जन्म देती है। अतिवादिता से उपजे भ्रमजाल में विवेक कहीं खो सा जाता है। ऐसे में एकांगी विचार पर ही जोर बना रहता है और दूसरे या भिन्न किस्म के विचार किनारे पड़ जाते हैं। धार्मिक रूढि़वादिता आंखों पर पर्दा डाल देती है और उसके असर में अभिमंत्रित जैसा व्यक्ति बिना यह विचार किए कि यह ठीक है या नहीं उन कृत्यों में शामिल हो जाता है जो जीवन के ही विरुद्ध होते हैं। इस्लामी, यहूदी और क्रिश्चियन इतिहास में ऐसी लड़ाइयों के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमला, मुम्बई में ताज होटल, ओबेराय होटल, रेलवे स्टेशन अन्यत्र आतंकी हमले और पेरिस और ब्रुसेल्स में हुए ताजे आतंकी नरसंहार में धार्मिक विश्वास जुड़े हो सकते हैं परन्तु इनके तार राजनैतिक आकाओं के चुने लक्ष्य से भी महत्वपूर्ण रूप से जुड़े हैं।
हम जिसे आतंक कहते हैं वह उसके पोषक अतिवादी व्यक्ति की दृष्टि में आतंक न हो कर स्वतंत्रता, स्वायत्तता और सही राह की यात्रा होती है, इसलिए वह गर्व से आतंक की जिम्मेदारी उठाता है और उसका उत्सव मनाता है। रिलीजन से जुड़ कर पैदा धुंध में उसका मताग्रह और तीव्र हो उठता है। उसके सामने कोई विकल्प शेष नहीं रहता और वह एकांत समर्पण के साथ, अदृश्य शक्ति की कल्पना के जोर से बड़े आवेग और आवेश के साथ हिंसा की राह पर चल पड़ता है।
आतंकियों में मनोरोग की संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। पर आतंक के उद्भव के पीछे सामाजिक-आर्थिक कारणों की अनदेखी नहीं की जा सकती। जिन क्षेत्रों में आज आतंकवाद का साया मंडरा रहा है वहां की अस्थिरता, प्रजातांत्रिक संस्थाओं की असफलता और लम्बे अर्से से चली आ रही व्यापक आर्थिक विषमता, अभाव तथा वंचन का इतिहास मिलता है। सामाजिक चेतना आने से विसंगति की कुरूपता भयानक हो उठती है और शायद असह्य भी। ऐसी स्थिति में धार्मिक अतिवादिता को आधार बना कर निहित स्वार्थ वाले कुछ कारोबारी धर्मांध जनों को गुमराह कर अपनी रोटी सेंकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में विशेषत: अमेरिका द्वारा ईराक पर की गई कारवाई के बाद इस्लामी देशों में जैसे अफगानिस्तान, पाकिस्तान, ईराक, नाइजीरिया और सीरिया आतंकवाद की गिरफ्त में हैं।
उ.2 वैश्विक राजनीति में जब राज-सत्ता का ध्रुवीकरण होता है तो तात्कालिक लाभ पाने और अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कई अस्वाभाविक हथकंडे अपनाने में भी संकोच नहीं किया जाता है। शीत युद्ध खत्म होने के बाद वैश्विक स्तर पर राजनैतिक समीकरण बदला है। अब बड़े पश्चिमी देशों में श्रम की शक्ति की उपेक्षा और तकनीकी प्रगति ने सत्ता की शक्ति के नए आयाम खोल दिए हैं। शोषण और सहयोग दोनों के ही कई रास्ते खुले हैं। आर्थिक और राजनैतिक सत्ता पर काबिज होना आतंक से जुड़ा हुआ है। पेट्रोल पर अधिकार और उसका उपयोग कई तरह से हिंसा और युद्ध से जुड़ रहा है।
उ.3 यह दुर्भाग्य की बात है कि धर्म के तत्व का विश्लेषण करने से हम बचना चाहते हैं और उपेक्षा करते हैं। गीता में धर्मस्य तत्त्वं निहितो गुहायाम कहा है अर्थात उस तक आसानी से नहीं पहुंचा जा सकता। अधिकाँश धर्म अपने स्वाभाविक रूप में इकबाल की पंक्ति कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना की ही पुष्टि करते हैं। वाम दृष्टि अधूरी है और पूरे सत्य को नहीं देखती। धर्म के स्वरूप को समझना जरूरी है और उनमें अनुस्यूत अर्थ को ग्रहण करना भी। धर्म निरपेक्षता (सेकुलरिज्म) के नारे का अधूरा अर्थ ही लगा कर तटस्थता की दृष्टि अपनाने से बहुत सारे जीवनोपयोगी तत्वों से दूर होते गए, इससे उपजे अपरिचय और निरक्षरता से धर्म में जो अच्छा था उससे भी हम दूर होते गए और इसका परिणाम रिलीजन की समाप्ति में न होकर दुराग्रह, भेदभाव, ऊंच-नीच के भाव, और हिंसा में प्रतिफलित हुआ। आपसी भरोसा जाता रहा। तेरा मेरा या निज और पर का भेद गहराता गया और समाज में टूट पैदा होने लगी।
तीव्र आधुनिकीकरण के युग में परम्परागत चीजों के बारे में हमारा विचार काफी दुविधाग्रस्त होता जा रहा है, विशेषत: संस्कृति और धर्म को लेकर। संस्कृति को लेकर हम भावुक हो उठते हैं। उसकी रक्षा करते हैं पर धर्म को बाहर कर रखा है मानो वह ऐसा अंधविश्वास है जो प्रगति के मार्ग का रोड़ा है। धर्म और संस्कृति एक सिक्के के दो पहलू हैं। चुनौती है कि पुरानी दुनिया जिसमें धर्म की मुख्य भूमिका थी और आज की सेकुलर दुनिया जिसमें कम महत्व है। नैतिकता के स्थान पर तटस्थता और उपयोगितावाद अब प्रमुख हैं। मनुष्य और आत्मा के बीच संसर्ग। सेकुलर दृष्टि में मशीनी दुनिया और निर्धारणवाद महत्त्व के हैं।
उ.4 धर्म और ज्ञान की राजनीति ने सहज और मानवीय को परोक्ष और पारलौकिक बना दिया और अपनी रोटी सेंकनी शुरू की। धर्म ग्रंथों के खुले मन से पाठ (रीडिंग) होने चाहिए। यह मसला उससे परिचय से न कि उनकी उपेक्षा से हल होगा। अधिकाँश धर्मग्रंथों में एक वैश्विक दृष्टि का प्रवाह है जिसमें सारी मनुष्य जाति और सारी सृष्टि की चिंता ध्वनित होती है।
उ.5 आज के लोकप्रिय आधुनिक, वैज्ञानिक और सेकुलर नजरिये के चलते अज्ञानवश कई भ्रम खड़े कर दिए गए हैं। धर्म के प्रति द्वेष और हीनता का रवैया आधुनिक होने की निशानी बनती जा रही है। पर जीवन में धर्म का स्थान कितना महत्वपूर्ण है यह धार्मिक स्थलों की लोकप्रियता और वहां पर आगंतुकों की निरंतर बढ़ती भीड़ से लगाया जा सकता है। मक्का मदीना, चार धाम, मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह, काशी विश्वनाथ, अमृतसर का स्वर्णमंदिर, बेसीलका, प्रयाग का संगम, शिरडी के साईँ, तिरुपति के बाला जी, किसी भी जगह का नाम लें लोग अटे पड़े हैं। उनका भरोसा है कि उन्हें उनके कष्टों से मुक्ति मिलेगी। उनका यह अगाध विश्वास किसी के डिगाए नहीं डिगता और तो और विज्ञान को मानने वाले भी धर्म में श्रद्धा रखते हैं। दोनों का सह अस्तित्व है। धर्म के तत्व जीवनदायी हैं बशर्ते उनका स्वाभाविक और वास्तविक रूप सामने लाया जाय।
उ.6 स्वार्थी तत्व कहाँ तक नुासान पहुंचा सकते हैं यह इसी से स्पष्ट है कि शिया और सुन्नी एक ही धर्म के अंश हो कर भी लड़ रहे हैं। विश्व जनमत को इस तरह की लड़ाई की व्यर्थता और सह अस्तित्व की आवश्यकता को रेखांकित करना होगा। ऐसी ही हिंसा चलती रही तो मानव अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
 उ.7 सभी तरह या स्थान के आतंकवाद को एक नाम या एक श्रेणी में रख देना शायद उचित नहीं होगा। यह एक तरह की अनर्थकारी अतिव्याप्ति हो जाएगी। सबके आशय को उनके इतिहास और भूगोल के सन्दर्भ में समझना होगा। हाँ, आतंक एक जीवन शैली बन रही है, अपनी बात मनवाने की युक्ति बन रही है। यह अपनी बात कहने और समझाने का अलोकतांत्रिक और अमानवीय तरीका है। संवाद की गुंजाइश निकालनी चाहिए।
उ.8 समाज की बहुलता आज की एक बड़ी सच्चाई है। जाति, धर्म, आयु, भाषा, समुदाय, रंग-रूप, कद-काठी सबमें भिन्नता आसानी से दिख जाती है। लोगों की विभिन्न क्षेत्रों में आवाजाही और मूल स्थान से विस्थापन के कारण समाज में विविधता तेजी से बढ़ी है। विविधता यानी भिन्नता अक्सर न्यूनता या कमी का पर्याय बन जाती है। इसके पीछे इस कुतर्क का आधार होता है कि चूंकि हम और हमारे ही ठीक हो सकते हैं, इसलिए हमसे भिन्न हमसे खराब ही होगा। अपने समूह के सदस्यों में हम समानता ढूँढते हैं और अपने से भिन्न समुदाय को आवश्यकता से अधिक भिन्न मान बैठते हैं। निज और पर के बीच भेद हम बढ़ाते जाते हैं। उनकी अस्मिता को तीव्र करते जाते हैं। अस्मिताओं को लेकर संघर्ष चल रहा है और यह आर्थिक राजनैतिक उद्देश्यों से जुड़ा है। संवाद से ही इसका समाधान मिल सकता है।
उ.9 राजनीति स्थिर अवधारणा नहीं है। भारत में राजनीतिक सोच के अनेक प्रयोग हुए हैं और उसके परिणामस्वरूप आज कोई वर्चस्व की अकेली धारा नहीं है। राजनीति का लक्ष्य पहले जनसेवा हुआ करता था और वह कुछ मूल्यों के प्रति समर्पित रहती थी। मैं अभी भी आशान्वित हूँ कि राजनीति में सामाजिक सरोकार को महत्त्व मिलेगा और निजी स्वार्थ की भूमिका कम होगी और देश को और उसके आम जन को उसका जायज स्थान मिलेगा। उसकी आवाज सुनी जाएगी।
उ.10 बुद्धिजीवी वर्ग से यह स्वाभाविक अपेक्षा थी कि वह जन चेतना का वाहक बनेगा। बाह्य परिस्थितियों ने सबकी वरीयताएँ उलट-पलट दी हैं। बुद्धिजीवी भी बाहर की चकाचौंध में चकित हो ठगे जा रहे हैं। वे भी औरों की तरह ही शेष दुनिया से प्रभावित हैं। सफलता, संपत्ति का अर्जन, रुतबा और प्रसिद्धि की ललक ने परम्परा और आधुनिकता के बीच झूल रहे अधिकाँश बुद्धिजीवियों के सामाजिक विवेक को कमजोर किया है। पर विचार-मंथन भी हो रहा है। मुझे भरोसा है कि सन्मति आएगी और दायित्वबोध के साथ सभी राष्ट्रनिर्माण के कार्य में व्यापक मानवीय दृष्टि से जुट सकेंगे। बुद्धिजीवी को खुद अपना उद्धार करना होगा। उसे अपना दीपक स्वयं बनाना होगा।