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Thursday 23 Nov 2017

अतिवाद घातक


डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया
ए-7, फारचून पार्क, जी-3, गुलमोहर, भोपाल
(म.प्र.) 462033
स्वतंत्र स्वाभिमानी, विश्वभावी, ईमानदार चिन्तन दिनोंदिन सूख रहा है। यदि हमारा बुद्धिजीवी जगत ईमानदारी से बिना किसी पक्षपात के अपनी वैचारिक क्रांति के लिए दृढ़ता से संकल्पबद्ध हो तो वातावरण में नई चेतना का संचार हो सकता है जिससे स्वतंत्र चिन्तन में बाधाएं आती हैं, लेकिन सच्चाई की कलम कभी सत्ता की मुखापेक्षी नहीं रही। उसने स्वाभिमान से सौदा नहीं किया। हर युग में, हर देश में वैचारिक क्रांति ने परिस्थितियों को बदला है। कई क्रांतियां इसकी साक्षी हैं। सत्ता के बंधन कलम के आगे अधिक दिन नहीं टिक पाते।
धर्म का संबंध परोपकार जनकल्याण, अहिंसा तथा मानवता से है जबकि आतंकवाद की धारणा हिंसा और प्रतिहिंसा की भावना से परिचालित है। आतंकवादियों का अपनी कट्टरता को धर्म की रक्षा का नाम देना पाखंड और धूर्तता के सिवाय कुछ नहीं है। संसार का कोई धर्म निर्दोष, महिलाओं, बच्चों, लोगों की हिंसा का समर्थन नहीं करता। इस्लाम धर्म के नाम पर नगरों, गांवों, धार्मिक स्थलों, पुस्तकालयों में आग लगाना, लोगों को बंधक बनाकर गोलियों से भूनना, कत्ल करना क्रूर अमानवीय कृत्य है। आतंकवाद को धर्म की छतरी से ढंकना लोगों के साथ छल करना है। तालिबानों द्वारा अफगानिस्तान में हजारों साल पुरानी पुरातात्विक महत्त्व की बौद्ध  धार्मिक प्रतिमाओं को तोडऩे, नष्ट करने का कोई औचित्य नहीं है। किसी को भी धर्म विशेष के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
आज की वैश्विक राजनीति सुनीति से परिचालित न होकर स्वार्थ, अनीति और छलनीति से परिचालित है। हर देश अपनी स्वार्थ दृष्टि से लाभ को प्राथमिकता देता है। दोस्ती भी लाभ-हानि के गणित पर निर्भर है। यदि दूसरे की हानि से हमें लाभ है तो हम हानिकर्ता को प्रेरित, प्रोत्साहित करने से नहीं हिचकते। मुंह में राम बगल में छुरी का आचरण है। विशेष कर पूंजीवादी देश अपना व्यवसाय बढ़ाने और दूसरों के लाभकारी ठिकानों को हथियाने की नीयत से पीठ पीछे आतंकियों की मदद भी करते हैं और सार्वजनिक रूप से निंदा का प्रदर्शन करते हैं। सारा विश्व बाजार बना हुआ है। अमेरिका इसमें अग्रणी है। यूरोप और तमाम इस्लामिक देश इन आतंकवादियों के कारनामों से त्रस्त हैं। आतंकवाद के पीछे पूंजीवादी राजनीति काम कर रही है ताकि हथियारों और तेल सम्पदा का कारोबार फले-फूले।
वाम राजनीति दुराग्रही विचारों से संचालित है। यद्यपि उसकी समाजवादी धारणा तथा अभावग्रस्तों, कमजोरों को उठाने एवं पूंजीवादी दुर्नीति का विरोध करना जनहितकारी विचार है किन्तु इसकी आड़ में धार्मिक आस्थाओं के जबरन विरोध का कोई औचित्य नहीं है। भारतीय प्रगतिशीलों ने उसका उचित उपयोग नहीं किया। लेखन और संगठन में वहां भी अतिवाद है। इस दृष्टि से आरएसएस और वामपंथी अतिवादी प्रगतिशीलों में कोई अंतर नहीं है। अब इसमें क्या तुक है कि देवी-देवताओं के पूजन का विरोध करो। सरस्वती को मत मानो। धार्मिक ग्रंथों को झुठलाओ। आग्रह तो था, किन्तु वैचारिक विविधता बराबर रही। शंकराचार्य से लेकर आज तक यह विद्यमान है। अद्वैत, द्वैत, अद्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत, सगुण, निर्गुण, बौद्ध, जैन आदि धार्मिक विचारधाराएं, यहां तक कि चार्वाक चिन्तन भी भारतीय चिन्तन में स्वीकृत और विद्यमान है। आस्तिक भी और नास्तिक भी। शताब्दियों से शास्त्रार्थों की परम्परा रही है। वह सभी मानते हैं कि अंतिम सत्य तक पहुंचना संभव नहीं है। अनेकान्तवाद, स्वायदवाद आदि उसी के परिणाम है। धार्मिकता और अधार्मिकता में अंतर है। वसुधैव कुटुम्बकम की धरती पर हिंसक अमानवीय आचरण अधार्मिक ही माना जाएगा। आज अनेक धार्मिक नेता धार्मिक तथ्यों की मनमानी व्याख्या करके वातावरण को प्रदूषित कर विद्वेष फैला रहे हैं। प्रगतिशीलता का दावा करने वाले बौद्धिकों को अपने नकारात्मक दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करना चाहिए। उदार चिन्तन ही समाधान है।
निश्चित रूप से धार्मिक ग्रंथों में अनेक अंधविश्वास प्रचलित है जो कट्टरता के पोषक हैं। वर्तमान जीवन में ऐसी कट्टरता अस्वीकार्य है जो मानवीय सोच को सीमित कर दे। दुनिया का ज्ञान और परिदृश्य बदला है। लोगों को सुशिक्षित कर उसके दुष्परिणामों से अवगत कराया जाना चाहिए। साथ ही कट्टरता के साथ दुराग्रहपूर्वक जुड़े लोगों के अनुचित कृत्यों पर कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। समझौते की मानसिकता विनाशक है। धर्म तो जनकल्याण और विश्वबंधुत्व की भावना का समर्थक है। वहां अयं निज: परोवेत्यि के लिए कोई स्थान नहीं है। धर्मनिरपेक्षता जिस रूप में आजकल ली जा रही है, वह भ्रामक और घातक है। धर्मनिरपेक्षता का आशय धर्म का तिरस्कार करना अथवा अधार्मिक होना नहीं है। इस शब्द ने भी राजनेताओं के शब्दजाल में पडक़र बड़ा अनर्थ किया है। धर्म अफीम नहीं, औषधि है जो व्यक्ति को सदाचारी होने के संस्कार देता है।
आज असहिष्णुता की बड़ी चर्चा है। यह सत्य है कि स्वार्थनीति के कारण समसरता का औदार्य संकुचित हो रहा है। सारा विश्व इससे पीडि़त है। किन्तु हर काम और हर कदम में असहिष्णुता खोज-खोज कर तिल का ताड़ बनाना उचित नहीं है। यह भी एक तरह की दुराग्रही असहिष्णुता है। असहिष्णुता का शोर मचाने वाले कभी अपनी ओर क्यों नहीं देखते। क्या वे शत-प्रतिशत सहिष्णु हैं। अपनी फूटी आंख देखने की बजाय दूसरे की फूली झुक-झुक कर देखना बौद्धिकता नहीं है। आग्रही मानसिकता इसी प्रकार के विकार से ग्रस्त होकर व्यवहार करती है। शिया-सुन्नी, दक्षिण-वाम आदि जाने कितनी विडम्बनाएं हैं। धर्म, भाषा, क्षेत्र सभी में विवाद हैं। अब तो हालात यह है कि एक क्षेत्र दूसरे क्षेत्र की भूख-प्यास से द्रवित नहीं होता बल्कि अवसर भुनाने की जुगाड़ में रहता है। बड़े-बड़े देश एक-दूसरे को लड़ाने की राजनीति करते हैं।
स्वतंत्र स्वाभिमानी, विश्वभावी, ईमानदार चिन्तन दिनोंदिन सूख रहा है। यदि हमारा बुद्धिजीवी जगत ईमानदारी से बिना किसी पक्षपात के अपनी वैचारिक क्रांति के लिए दृढ़ता से संकल्पबद्ध हो तो वातावरण में नई चेतना का संचार हो सकता है जिससे स्वतंत्र चिन्तन में बाधाएं आती हैं, लेकिन सच्चाई की कलम कभी सत्ता की मुखापेक्षी नहीं रही। उसने स्वाभिमान से सौदा नहीं किया। हर युग में, हर देश में वैचारिक क्रांति ने परिस्थितियों को बदला है। कई क्रांतियां इसकी साक्षी हैं। सत्ता के बंधन कलम के आगे अधिक दिन नहीं टिक पाते। अमीर खुसरो, रहीम, रसखान, कबीर किसी जंजीर से बंधे नहीं थे। तुलसी और कुंभनदास जैसे संतों ने जनहित के लिए ही सत्ता का आमंत्रण बुलन्दी से ठुकराया था। महाराणाप्रताप, शिवाजी, गुरुगोविन्द सिंह और छत्रसाल जैसे योद्धाओं ने अपने लिए नहीं, राष्ट्रहित में संघर्ष किया था। चन्द्रशेखर आजाद और भगतसिंह जैसों का बलिदान स्वार्थ के लिए नहीं, देश की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए था। उन्होंने प्राण रहते राष्ट्रध्वज झुकने नहीं दिया। आज हमारी विश्वविद्यालय युवा पीढ़ी अ$फजल गुरु जैसे राष्ट्रघातियों की पुण्यतिथि का छाती ठोंक कर आयोजन करती है और इस कृत्य का विरोध करने पर चुनौती देने के लिए तैयार है। यह कैसी राष्ट्रीयता है? कैसी मानसिकता है? कैसा चिन्तन है? स्वतंत्रता का अर्थ दुरुपयोग नहीं है। क्या ओवैसी जैसे लोग अन्य देशों में भी ऐसा दुस्साहस कर सकते हैं? न जबरन भारत माता की जय बुलाई जा सकती है और न ही वह कहने का दुस्साहस किया जाना चाहिए कि चाहे प्राण चले जाएं पर मैं भारत माता की जय नहीं बोलूंगा। आरक्षण की नीति ने भी वातावरण को अशान्त किया है। उसके पीछे भी स्वार्थी नीतियां हैं। संविधान का अनुशासन और पालन सभी का कर्तव्य है। इसके साथ खिलवाड़ करना भी अराष्ट्रीय आचरण है। आज आवश्यकता है सर्वेभवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया की भावना से देश का हर नागरिक आचरण करें। और परस्पर सम्मान के लिए संकल्पित हों। अतिवाद समाप्त होना चाहिए।