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Wednesday 22 Nov 2017

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी का खेल समझना ज़रूरी

चंचल चौहान
173, कादम्बरी
सेक्टर 9, रोहिणी
दिल्ली-110085
मो.09811119391
उ.1 दुनिया में हो रहे घटनाक्रम और तमाम तरह के सामाजिक कैंसरों को, जिनका आपके सवालों में जि़क्र है, समझने के लिए यह ज़रूरी है कि आज विश्व समाज पर क़ाबिज़ उन आर्थिक ताक़तों को दुनिया की अवाम पहचानें जो तमाम तरह की विकृतियों के बीजबिंदु हैं। आज भूमंडलीकृत दुनिया पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी का शासन चल रहा है, यह विश्वपूंजीवाद का नया और बदला हुआ चरित्र है जिसे दुनिया की अवाम पहचान नहीं रही, वह काल्पनिक ईश्वर की तरह सर्वव्यापी है, साकार होते हुए भी निराकार है, बिना किसी राष्ट्र-राज्य और उसके दमनकारी तंत्र के ही सर्वशक्तिमान है, उसका कोई एक चेहरा नहीं है, इसलिए पहचाना नहीं जाता। अक्ल़ की आंख से ही देखा जा सकता है। उसी की वजह से सारी दुनिया बेरोजग़ारी, बीमारी, गऱीबी, असमानता और सामाजिक अन्याय, हिंसा और युद्धों की मार झेल रही है। सारे पिछड़े विचार और प्रतिक्रियावादी विचारधाराएं इसी जनदुश्मन के गर्भ से जन्म ले रही हैं। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी की पहचान कर लें तो विश्व के घटनाक्रमों को समझने में देर नहीं लगती। दुनिया में या शोषित समाजों में वैज्ञानिक सोच न फैल पाये, इसके लिए सबसे कारगर हथियार फंडामेंटलिज्म़ और उसी को बुनियाद बनाकर आतंकवाद फैलाने का इस्तेमाल किया जा रहा है। सदियों से धर्म की आड़ ले कर शोषकवर्गों ने अपने शासन को क़ायम करने या उसे बनाये रखने की कोशिश की है क्योंकि दुखों में डूबे इंसानों को उसी अफ़ीम से राहत मिलती दिखायी देती है। दुनिया के आम इंसान धर्मों के मानवीय सारतत्व को ही अपनाते हैं, वे हिंसा, खूनखऱाबा और आतंकवादी कार्रवाइयों के समर्थन में कहीं भी नहीं हैं, यह सारा खेल साम्राज्यी ताक़तें चला रही हैं। वहीं से पैसा, वहीं से हथियार, गोला बारूद मिलता है, वे ही ताक़तें दुनिया को आतंकवाद से मुक्ति दिलाने की क़समें वादे करते हुए दिखायी देती हैं, यह दोहरा चरित्र शोषण व्यवस्था के सभी देशों में देखा जा सकता है। बाबा तुलसीदास ने इस चरित्र को सोलहवीं सदी में ही पहचान कर लिखा था, सासति करि पुनरू करहिं पसाऊ, नाथ प्रभुन कर सहज सुभाऊ। पहले मरवाओ, फिर दया दिखाओ। आतंकवाद का किसी मज़हब से लगाव नहीं, वह तो एक बहाना भर है। असली मक़सद तो साम्राज्यी ताक़तों को ही बल पहुंचाना है, वे उन्हीं ताक़तों के जऱखऱीद गुलाम हैं। मगर दुनिया को यह दिखाते हैं कि वे अपने मज़हब के लिए लड़ मर रहे हैं, यह झूठ है।
उ.2 दुनिया में पहले साम्राज्यवादी ताक़तें सर्वहारावर्ग की समाज व्यवस्थाओं और नवस्वाधीन देशों को नवउपनिवेशवादी चालों से अपने चंगुल में लाने और अपने शोषणपाप के परंपराक्रम को चालू रखने की कारगुज़ारियों में लगी रहती थीं, अफग़़ानिस्तान में जब सोवियत सेनाओं की मदद से शोषित अवाम ने एक प्रगतिशील शासन व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश की तो साम्राज्यवाद के सरगना अमेरिका ने तालिबान जैसे हिंसक रूढि़वादी तत्व न केवल पैदा किए, बल्कि उन्हें अपार धन और तमाम अस्त्रशस्त्र मुहैया करा दिये और उन्होंने वहां मज़हबी जनून पैदा करने की कोशिश करके वहां प्रतिक्रांति कराने में कामयाबी हासिल की। आज वे ही तत्व अमेरिका की शह पर सीरिया में असद की सेक्युलर बाथ पार्टी की सरकार को नेस्तनाबूद करने में जुटे हैं, जबकि दुनिया को यह बताया जा रहा है कि अमेरिका आतंकवाद और मज़हबी तत्ववाद के खि़लाफ  लड़ाई लड़ रहा है, यह झूठ है। सीरिया इस झूठ को खोलता है, वहां तालिबान से ले कर तुर्की और अरब देशों के आतंकवादी और तत्ववादी अमेरिका से मदद लेते हुए असद की सेक्युलर सरकार को नेस्तनाबूद करने में जुटे हैं जिससे वहां के तेल पर भी अमेरिका का और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी का कब्ज़ा हो जाये। रूस और चीन इस अमेरिकी षड्यंत्र को कामयाब नहीं होने दे रहे, वरना अब तक इराक की ही तरह वहां भी अमेरिकापरस्त निज़ाम क़ायम हो गया होता। इस स्वार्थ की पूर्ति के लिए इराक़, अफग़़ानिस्तान में अमेरिका ने सीधा वर्चस्व क़ायम कर ही लिया है, बाक़ी देशों में उसका परोक्ष वर्चस्व धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय पूंजी के माध्यम से क़ायम होता जा रहा है, भारत भी उसके चंगुल में आ चुका है। 1991 से जिन आर्थिक नीतियों पर हमारी सरकारें चल रही हैं, वे आइ एम एफ़  और विश्वबैंक के हितसाधन के लिए बनायी जा रही हैं। सरकार किसी भी राजनीतिक दल की दिखायी देती हो, अर्थव्यवस्था पर सीधे वहीं के भेजे हुए अर्थशास्त्री क़ाबिज रहे हैं। मनमोहन सिंह, मोंटेकसिंह अहलूवालिया, रघुराम राजन कांग्रेस के समय रहे, जिनमें से रघुराम राजन तो जमे ही हैं, बाकिय़ों की जगह अरविंद पानगारिया, अरविंद सुब्रह्मनियन भी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के भेजे हुए अर्थशास्त्री क़ाबिज़ हैं, वरना इस महान देश में गऱीब अवाम के हित में काम करने वाले एक से एक आला प्रोफेसर अर्थशास्त्री मौजूद हैं, आइ एम एफ़  और विश्वबैंक से आयात करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी। साफ़  नजऱ आता है कि भारत पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी का दिनों दिन कर्ज़ बढ़ता जा रहा है, इसके आंकड़े हमारा मीडियातंत्र जनता के सामने नहीं लाता, जबकि ये आंकड़े वित्तमंत्रालय की वेबसाइट पर मौजूद हैं। मगर आम जनता को तो छोडि़ए अच्छे ख़ासे पढ़े लिखे लोगों और बुद्धिजीवियों तक को पता नहीं। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए तमाम तरह के दकिय़ानूसी विचारों और प्रतिक्रियावादी विचारधाराओं, संगठनों और तत्वों को उभारने में मदद कर रही है। सारे फंडामेंटलिस्ट चाहे वे किसी भी मज़हब का मुखौटा लगा लें, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के हितसाधन में लगे हैं। वे ही उनको पालते पोसते और धनबल से मदद पहुंचाते हैं। पंजाब में आतंकवाद के समय जैन डायरी में हवाला की प्रविष्टियों के माध्यम से एक समय यह राज़ खुला भी था, आज तो कोई इस तरह के अनुसंधान में जाने की कोशिश ही नहीं करता कि आखिर इन तत्वों को धन और हथियार कहां से प्राप्त होते हैं। यह भेद खुल जाये तो तस्वीर साफ  हो जाये, मगर यह करे कौन। इन तमाम तत्ववादियों और आतंकवादियों के निशाने पर वे ही हैं जो विश्वपूंजीवाद की चालों को उद्घाटित करने में सबसे आगे हैं। इस दौर के सबसे क्रांतिकारी वर्ग, सर्वहारावर्ग की राजनीति, उसकी वैज्ञानिक विचारधारा और उसके हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों को नेस्तनाबूद करने में वे सब एक दूसरे से आगे आने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे देश में आर एस एस भी उन्हीं की सेवा में लगा हुआ सबसे मज़बूत फासिस्ट संगठन है जो जर्मनी की नाज़ी पार्टी की तरह देश के ही गऱीब अवाम के बीच मज़हब के आधार पर भेद पैदा करके खूनखऱाबा कराने और प्रगतिशील सोच के लेखकों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों को मौत के घाट उतार कर इस भेद को और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को इसी मक़सद से बढ़ा रहा है। दुर्भाग्य से आज राजनीतिक सत्ता भी आर एस एस जैसे देशविरोधी, जनविरोधी फ़ासीवादी संगठन के हाथों में आ गयी है। समाजशास्त्रियों ने ठीक ही कहा था कि फासीवाद या नाज़ीवाद अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी का सबसे घिनौना हथियार है। देशी विदेशी शोषकों के शोषण की मार से पिसते आम जनों पर राज करने का यह कारगर अस्त्र है।
उ. 3 यह सवाल जिस तरह पेश किया गया है, वह मेरे विचार से सही नहीं है। वाम राजनीति ने हमेशा ही धार्मिक कट्टरता के खि़लाफ़  अवाम को आगाह किया और धर्म के उदार रूप पर चर्चा की। ख़ुद माक्र्स ने भी और आज के वाम नेताओं और बुद्धिजीवियों ने भी। डी पी चट्टोपाध्याय, डी डी कोसांबी, बी टी रणदिवे, एस ए डांगे, ई एम एस नंबूदिरिपाद, इरफ़ान हबीब से ले कर सीताराम येचुरी तक के अधुनातम लेखों और पुस्तकों में यह चर्चा देखी जा सकती है। सारे प्रतिक्रियावादी संगठनों के निशाने पर वाम राजनीति ही रही है, हिटलर से ले कर उसके शिष्य आर एस एस के गुरु गोलवलकर तक, जिन्होंने अपनी अंग्रेज़ी पुस्तक, वी ऑर अवर नेशनहुड डिफ़ाइन्ड (देखें इस पुस्तक के पृष्ठ 87.88 जो इंटरनेट पर भी देखे जा सकते हंै) में नाजियों से सीख लेने की स्वीकारोक्ति की है, कम्युनिस्टों और अल्पसंख्यकों को अपना दुश्मन घोषित करते आये हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के वर्चस्व को दुनिया का सर्वहारावर्ग ही चुनौती दे सकता है। इसलिए विश्वपूंजीवाद की विचारधाराओं के दुश्मन वाम विचार और वाम राजनीति ही प्रमुख रूप से हैं। आज भी बहसों में हर जगह आर एस एस के निशाने पर कम्युनिस्ट ही रहते हैं जबकि कम्युनिस्ट शोषण की परंपरा और सत्ताधारी वर्गों के द्वारा फैलाये जा रहे झूठ को उजागर करते हैं। आम जन का कोई अहित नहीं कर रहे और उनकी शक्ति भी सीमित है, फिर भी वे ही आर एस एस की आंखों में खटकते हैं। बिना संदर्भ के भी मैंने संघी प्रवक्ताओं को अपनी नफरत का निशाना कम्युनिस्टों को बनाते देखा है, संसद में भी और टी वी चैनलों पर भी। यानी सच्चे और ईमानदार तरीके से धर्मनिरपेक्ष समाज और प्रशासन बने जैसा कि हमारे संविधान की आत्मा में निहित है, तभी हम एक आधुनिक सभ्य लोकतांत्रिक समाज निर्मित कर पायेंगे। हमारे संविधान में जो कुछ है, उसका अमल प्रशासन नहीं करता, पहले दिन शपथ समारोह करने के तुरंत बाद सरकारें अनेक तरह के धार्मिक अनुष्ठान करती हुर्इं और एक ही धर्म के पक्ष में अक्सर खड़ी दिखायी देती हैं, यह हमारे सामाजिक पिछड़ेपन का भी द्योतक है।
उ.4 दरअसल मानव समाज अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी में सबसे ज्यादा अहमियत अपनी आजीविका को देता आया है। उस आजीविका के साधनों और उनके मालिकान में तब्दीली आने के बाद समाज में तब्दीलियां आती रही हैं। मगर विचारों और रीतिरिवाजों में तब्दीली अपेक्षाकृत धीमे तौर पर आती है। धार्मिक विचारों का सिलसिला भी धीरे-धीरे बदलने वाला तत्व है। इस तब्दीली पर नजऱ डालने से यह तो साफ़  हो जाता है कि इस कट्टरता को समाज के आर्थिक आधार में सामाजिक क्रांति के माध्यम से तब्दीली ला कर ही तोड़ा जा सकता है। समाज सुधारक भी तभी समाज में पैदा होते हैं जब कोई सकारात्मक तब्दीली समाज के गर्भ में आने लगती है। धार्मिक कट्टरता में छिपे अमानवीय तत्वों का ख़ात्मा भी तभी हो पाया जब समाज विकास की प्रगतिशील मंजि़ल में दाखि़ल हुआ। इसका अर्थ यह है कि समाज में सकारात्मक आधारगत तब्दीली के लिए राजनीतिक लामबंदी हो, समाज को आगे ले जाने वाले तत्वों के नेतृत्व में नया वर्गीय संतुलन क़ायम हो, हर देश में और हमारे यहां भी पहले भी इसी तरह संभव हुआ और आगे भी ऐसे ही संभव हो पायेगा। कल्पना कीजिए कि यदि भारत के हर इंसान को आर्थिक समानता हासिल हो जाये, तो वर्णाश्रम व्यवस्था की कट्टरता जो कि गीता के कृष्ण के शब्दों में चातुर्वण्यं मया सृष्टम के आधार पर ईश्वरप्रदत्त है, खोखली हो जायेगी, उसे तोडऩे के वस्तुगत हालात पैदा हो जायेंगे जैसे कि पश्चिमी देशों में या अपने पड़ोसी देश नेपाल में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानने का कट्टर विचार पूंजीवाद के उदय के साथ धूल चाटने लगा। सो उपाय तो एक ही है, मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण पर आधारित समाज व्यवस्था की जगह शोषणविहीन मानव समाज की स्थापना, जिसे वैज्ञानिक समाजवाद भी कहा जाता है।   
उ.5  सारे धर्मों का सारतत्व मानवविरोधी नहीं है, वह कुछ ऐसे विचार ज़रूर समाज में फैलाता है जो वैज्ञानिक तर्कशीलता के विपरीत जाते हैं, ऐसी मिथ्याचेतना से बुद्धिजीवियों ने और वैज्ञानिकों ने संघर्ष किया, कुछ ने अपनी जानें भी कुर्बान कीं। ब्रूनो को जिंदा जला दिया गया, गेलीलियो को जेल में डाला गया, यह आज भी हो रहा है। नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम एम कलबुर्गी की हत्याएं तो अभी की घटनाएं हैं। आर एस एस के प्रगतिविरोधी तत्वों ने उनकी हत्या कर दी, गांधी जी की हत्या भी ऐसे ही तत्वों ने इसी वजह से की थी क्योंकि वे धर्म के सारतत्व में मानववादी अंशों के पक्षधर थे, कठमुल्ला हिंदू नहीं थे। बातों में राम और बग़ल में ईंटें या छुरा लेकर चलने वाले हिंदू तत्ववादी नहीं थे। वे सभी धर्मों में इंसान को बेहतर बनाने के लक्ष्य से अवगत थे। हिंदू धर्म में भी यह कहा जाता रहा है, सत्यं वद या सर्वे भवंतु सुखिन:सर्वे संतु निरामय: या परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई आदि आदि ऐसे ही सैकड़ों उपदेश हैं, जो मानवविरोधी नहीं हैं। संतों, सूफिय़ों और कवियों आदि ने धर्म के सारतत्व को ऐसे ही रूप में पेश किया जिससे उसमें रची बसी कट्टरता के लिए जगह नहीं बची। कट्टरता को तो देशी विदेशी शोषकवर्गों का हित साधन करने वाली राजनीति और उसके संगठन ही इस्तेमाल करके विभेद पैदा कर रहे हैं, गांधी जैसे धार्मिक महापुरुष तो यही गाते थे, कि वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाणे रे। सारे धर्म गर्व को सबसे बुरा अवगुण मानते रहे, मगर हमारे यहां आरएसएस के पास हर पंक्ति में गर्व की गुहार रहती है। यह सर्वधर्मविरोधी संगठन है। आरएसएस की विचारधारा और उसके कर्म हिंदू धार्मिक ग्रंथों का एक तरह से अपमान ही करते हैं। रामभक्त तुलसी कहते हैं, सुनहु राम कर सहज सुभाऊ जन अभिमान न राखहिं काऊ। आरएसएस के प्रचारक कहते हैं, गर्व से कहो, जैसे जर्मन नाज़ी आर्य नस्ल पर गर्व करने को कहते थे। यह हिंदू धर्म विरोधी नारा है, गर्व तो हर धर्म में पाप माना गया है। गीता, रामायण, बाइबिल या क़ुरान किसी को पढ़ लीजिए।
उ.6  जैसा कि मैंने कहा है, इस समय साम्राज्यवादी शक्तियां अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के माध्यम से दुनिया पर अपना वर्चस्व क़ायम करने की जीतोड़ कोशिश कर रही हैं। साम्राज्यवाद का सरगना अमेरिका दुनिया भर के खनिज तेल को अपने कब्ज़े में लेने की हमेशा से कोशिश करता आया है, इराक़ पर हमला भी उसी का खेल था, सीरिया जो कि मध्य एशिया का अकेला सेक्युलर देश है, उसके खिलाफ़  भी तालिबान जैसे तत्वों को शह दी। असद सरकार को इराक़ की तरह ही ध्वस्त करने की कोशिश की। अब दोनों देशों में इस्लामिक स्टेट के कट्टरपंथी भी उसी खनिज तेल पर क़ाबिज़ होने के लिए धर्मयुद्ध चला रहे हैं। अमेरिका की दोगली चाल रही है। एक ओर लोकतंत्र का मुखौटा दुनिया के सामने बनाये रखना चाहता है, उस मुखौटे से वह विश्वजनमत को अपने पक्ष में किये रखना चाहता है, दूसरी ओर, आतंकवादियों को अरब देशों और अपनी एजेंसियों के माध्यम से हथियार और धन भी मुहैया कराता रहा है। तालिबान को इसी तरह की मदद दे कर सोवियत संघ के खि़लाफ़  अफग़़ानिस्तान में लड़वाया था। हमारे यहां के अनेक आतंकवादी गुटों को, मसलन खालिस्तानियों आदि को भी उसी ने मदद पहुंचायी थी। जब तक साम्राज्यवाद का अत्याचार रहेगा, इस तरह के अतिवादी आंदोलनों का ख़ात्मा संभव नहीं। आज उसके बुद्धिजीवी दो सभ्यताओं के संघर्ष का फ़लसफ़ा इजाद करके पूरे इस्लाम को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, मानो साम्राज्यवाद देवता है और बाक़ी सब शैतानी ख़ेमे में हैं। सोवियत संघ के विघटन के बाद और विश्वपूंजीवाद के नये अस्त्र यानी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के माध्यम से शुरू किये गये भूमंडलीकरण और उदारीकरण की चाल से दुनिया के सारे देशों में पूंजीवाद के फैलाव के चलते समाजवादी खेमे में कमज़ोरी आयी है, इसलिए आज के समय में अगर विश्वसर्वहारा वर्ग दुनिया के स्तर पर नयी क़तारबंदी करे तो ही इस झूठ से मुक्ति मिल सकती है कि साम्राज्यी ताक़तें ही आतंकवाद से निपट सकती हैं जबकि वे उसे प्रश्रय और सभी तरह की मदद मुहैया करा रही हैं। आखिऱ हथियार बनाने और तमाम टेक्नालाजी के साधनों के कारखाने आतंकवादियों या इस्लामिक स्टेट के पास तो इस समय नहीं हैं, वे आते तो वहीं से हैं। दुनिया भर के अमनपसंद, जनपक्षधर बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, लेखकों आदि को साम्राज्यवाद के इस दोहरे चरित्र को उजागर करना चाहिए और विश्वसर्वहारा के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।
 उ.7 विश्वस्तर की किसी भी बुराई को ख़त्म करने का कोई एक सीधा सादा उपाय नहीं है। हर लड़ाई कई स्तरों पर लड़ी जाती है। मज़हब या नस्ल के आधार पर पनप रहे आतंकवाद को फ़ासीवाद का ही रूप मानना सही होगा जो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के हितों के लिए दुनिया में पनपाया गया। इसलिए उसकी हिंसा का जवाब दुनिया की ऐसी सभी ताक़तों को मिल कर सैन्य शक्ति से भी देना होगा और विचारधारा के माध्यम से भी, जो इस तरह की हिंसा के विरोध में सामने आती हैं। इसमें सावधानी यह बरतनी ज़रूरी है कि साम्राज्यी ताक़तों के दोहरे चरित्र को उजागर करने में कोताही न बरती जाये। सच्चे लोकतांत्रिक परिवर्तन के लिए तो सारी दुनिया को वर्गचेतस व विश्वचेतस होना ही होगा, जन के दुश्मन नंबर एक की चालाकिय़ां पहचानना ज़रूरी है। दुनिया को आर्थिक संकट की खाई में इस समय अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी ही तो धकेल रही है। अमेरिका इसका नेतृत्व कर रहा है। दुनिया का गऱीब और अधिक गऱीब होता जा रहा है। शोषण की मार से, महंगाई और बेरोजग़ारी से दुनिया तबाह हो रही है और विश्वबैंक व आइएमएफ  के कर्ज़ के बोझ से दबे लोगों पर टैक्सों का बोझ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के इशारे पर, भारत समेत सारी सरकारें बढ़ा रही हैं। इसलिए उसके कर्ज़ से दबे सभी देशों में बेचैनी है। अन्याय और नाबराबरी के खिलाफ़  लोग लड़ रहे हैं। लोगों के इस क्रोध को समतावादी सेक्युलर और जनवादी राजनीतिक ताक़तें बेहतर दुनिया के पक्ष में मोड़ पाने में कामयाब नहीं हो पा रही हैं, इसलिए हाल फि़लहाल कोई बना बनाया उपाय दिखायी नहीं देता। हर जगह लोग झूठ के बहकावे में आ रहे हैं और अन्याय जिधर है उधर शक्ति। इस वर्गीय संतुलन को बदलना ही वह ऐतिहासिक दायित्व है, जिससे बेहतर दुनिया मुमकिन है। यह प्रक्रिया बहुत बड़ी चुनौती पेश करती है और दुनिया का मध्यवर्ग अपने इस ऐतिहासिक दायित्व से बेख़बर है। खाओ, पियो और मस्त रहो। कोउ नृप होउ हमहिं का हानी, या फिर सर्वनिषेधवाद जैसे उत्तरआधुनिकतावादी फलसफ़ों में फंसा है सभी देशों का मध्यवर्ग। शोषण की मार से जब वह इन ताकतों के ख़ूनी पंजों तले आयेगा, तो शायद वह नये वर्गीय संतुलन के पक्ष में खड़ा हो, तब सिर्फ़  आक्यूपाइ वाल स्ट्रीट के नारे तक सीमित न रह कर सर्वहारावर्ग के साथ नयी समतामूलक विश्वव्यवस्था का निर्माण करने की ओर अग्रसर हो। ऐसी उम्मीद ही की जा सकती है।
उ.8 दरअसल, टेक्नालाजी का अद्भुत विकास मानव समाज को अधिक से अधिक आज़ादियां मुहैया करा रहा है। आज जब किसी भी समाज में अपनी बात कहने या अपनी निजी जि़ंदगी जीने की आज़ादी पर चोट पहुंचती है तो उस दमनकारी तंत्र का प्रतिरोध होगा ही, आज दमन किसी को सहन नहीं हो सकता। दुनिया में प्रतिगामी ताक़तें शोषण के तंत्र को बनाये रखने के लिए धर्म की आड़ में इस आज़ादी का हनन करने के लिए वैचारिक गुलामी थोपने की कोशिश कर रही हैं। वे सबसे अधिक असहिष्णु हो रही हैं। इसके लिए नये नये उपकरणों का भी खूब इस्तेमाल हो रहा है, ख़ासकर टी वी और इंटरनेट का। टी वी जैसा माध्यम ऐसी ही ताक़तों के हाथ में है जो प्रतिगामी विचारों को रातदिन फैलाने में अपने हित देख रही हैं और जनता को ठग रही हैं। दुनिया भर के चैनल बाबाओं, धर्मप्रचारकों और ढोंगियों व ठगों के उपदेश प्रचारित करते रहते हैं, यहां तक कि हमारे यहां के अनेक न्यूज़ चैनल भी अंधविश्वास फैलाने वाले बाबाओं से पैसे लेकर उनके अंधविश्वासों का खूब प्रचार प्रसार कर रहे हैं। यह वैचारिक आतंकवाद ही है जो प्रतिगामिता को बढ़ावा दे रहा है और विश्व-समाज को आगे ले जाने में बाधा डाल रहा है।
उ. 9  राजनीति का चरित्र वर्गीय होता है, एक ओर शोषकवर्गों की पार्टियां और शोषण व असमानता बनाये रखने के हित में अपने सिद्धांत बनाती मिटाती हैं, दूसरी ओर मज़दूर व मेहनतकश अवाम के हितों की रक्षा के लिए सारे पूंजीवादी देशों में जनवादी पार्टियां और कम्युनिस्ट पार्टियां भी हैं जो शोषित जनसमूह के हितों के लिए अपने सिद्धांत बनाती और उनमें फेरबदल करती हैं। वास्तविक प्रक्रिया तो यही है। शोषण दमन और असमानता बनाये रखने वाली राजनीति धार्मिक कठमुल्लापन से ले कर आतंकवाद तक किसी भी मानवविरोधी बुराई का सहारा लेने में नहीं हिचकती है, वह किसी भी हद तक गिर सकती है। इसलिए समाज में घटित होने वाली प्रक्रियाओं को इसी वर्गीय व वैज्ञानिक नज़रिये से देखना उचित होगा।
उ.10 बुद्धिजीवियों की भूमिका को कहां ख़ारिज किया जा रहा है, और कौन कर सकता है? सामंती ज़माने से ले कर इस समय तक बुद्धिजीवी अपने-अपने ख़ेमे के लिए विचारधारात्मक संघर्ष करते रहे हैं। हिंदी के महान कवि निराला ने राज्य और बुद्धिजीवी के रिश्ते को लेकर एक मशहूर कविता लिखी थी- राजे ने अपनी रखवाली की। शासक वर्ग अपने पालतू बुद्धिजीवी रखता है जो उसकी विचारधारा का भोंपू बजाते रहते हैं। दूसरी ओर, उनसे वैचारिक संघर्ष करते हुए शोषित अवाम के बुद्धिजीवी भी समाज में होते हैं, हर युग में रहे हैं और आज भी हैं। इसलिए बुद्धिजीवियों की भूमिका वर्गहित के अनुसार है। सत्ताधारी शोषकवर्ग जनता का शोषण पहले तो विचारों से लोगों को गुलाम बना कर ही करते हैं। बौद्धिक गुलामी फैलाने में शोषकों के बुद्धिजीवी अपनी भूमिका अदा करते हैं, उनसे वैचारिक संघर्ष करने वाले बुद्धिजीवी भी अपनी भूमिका अदा करते हैं। यह ज़रूर है कि उनकी भूमिका को शोषित जनगण और उनकी राजनीति ही पहचानती है, व्यापक तौर पर उन्हें प्रचार प्रसार का अवसर नहीं मिलता। संचार माध्यम तो सत्ताधारी शोषकवर्गों के ही नियंत्रण में हैं। प्रेस, टेलिविजऩ, रेडियो आदि पर आप दिन-रात शोषक वर्गों की विचारधाराओं का तरह-तरह से प्रचार होता देख सकते हैं। उसमें अच्छे ख़ासे पढ़े-लिखे प्रोफेसरों से ले कर सिने सितारों, अपढ़ बाबाओं, उपदेशकों, अंधविश्वास फैलाने वाले तांत्रिकों व ज्योतिषियों तक को आप देख सकते हैं। पूरा का पूरा एक प्रचार उद्योग हर तरह के झूठ फैलाने में और उस झूठ से अच्छा ख़ासा व्यापारिक लाभ कमाने में लगा है। कुछ बाबा तो इस तरह के झूठ के सहारे कारपोरेट घराना ही बन गये हैं और वे मौजूदा सरकार के सबसे बड़े हितैषी हैं। इसलिए यह सही नहीं है कि बुद्धिजीवियों की भूमिका को ख़ारिज किया जा रहा है। हां, यह ज़रूर है इस समय के ज्ञानमार्गियों को, वैज्ञानिक समझ व तर्कसंगत सत्य बोलने वालों, अंधविश्वासों के खि़लाफ़  लडऩे और गऱीब जनता को आगाह करने वालों की अवमानना ही नहीं, उनकी जान भी ली जा सकती है। कबीर के शब्दों में-सांच कहउ तो मारन धावैं, झूठहिं सब पतियाना। इधर कई ऐसे बुद्धिजीवी आर एस एस के गुंडों द्वारा मारे भी गये हैं, जिसकी वजह से बुद्धिजीवियों के बड़े समुदाय ने प्रतिरोध के तौर पर अपने अपने सरकारी पुरस्कार लौटाये। यह ज़रूर है कि सामाजिक बदलाव लाने का काम बुद्धिजीवी अकेले नहीं कर सकते, उसके लिए तो उन्हें वर्गचेतस हो कर, अपने पक्ष के बारे में सचेत हो कर सक्रिय राजनीति का सहयात्री बनना होगा क्योंकि बदलाव का माध्यम तो राजनीति ही रही है। सो आगे भी हिरावल दस्ता तो राजनीति का ही होगा, यह बुद्धिजीवी समुदाय पर निर्भर करता है कि वह अपनी प्रतिबद्धता किस वर्ग की राजनीति के साथ चल कर निभाना चाहता है। सबसे स्वतंत्र होना या सबके ऊपर खुद को समझना तो मात्र भ्रम है, वर्गविभाजित समाज में वर्गों से परे सर्वस्वायत्त सत्ता किसी की भी नहीं होती। पहले भी नहीं थी, आज भी संभव नहीं। हां, विचारों में गड्डमड्ड हो सकती है। कभी इस वर्ग के विचार आयें तो कभी दूसरे वर्ग के, मगर होंगे वे वर्गीय विचार ही।