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Thursday 23 Nov 2017

आस्था और विचारधारा पर मचा बवाल

डॉ. व्रजकुमार पांडेय
समता कॉलोनी,
हाजीपुर ;वैशाली
मो. 9934982306
फिर कम्युनिस्टों के बीच आस्था और विचारधारा को लेकर दंगल शुरू हो गया है। यह दंगल कोई नया नहीं है। यह बहुप्रचारित है कि कम्युनिस्ट धर्म विरोधी होते हैं। यह प्रचार इतना व्यापक रहा है कि धर्म परायण जनता कम्युनिस्ट पार्टी से दूर-दूर भागती रही है। इस भ्रम को पाटने के लिए कम्युनिस्टों ने अपने संविधान में धर्म में आस्था रखने वालों को पार्टी की सदस्यता देने का प्रावधान किया है। यह बात सही है कि कम्युनिस्ट होने और माक्र्सवादी होने में अन्तर है। एक माक्र्सवादी धर्म में आस्था और विश्वास नहीं रखता है लेकिन एक कम्युनिस्ट धर्म में आस्था रख सकता है। यह बात भी सही है कि कम्युनिस्ट पार्टियां माक्र्स के विचारों को साकार करने के लिए बनी हैं। लेकिन भारत जैसे देश में जहां कि बहुसंख्यक जनता धर्म में आस्था रखती है जिसमें अधिकांश शोषित-पीडि़त-दु:खी, दरिद्र ही हैं जो कम्युनिस्टों के नेतृत्व में अपनी मुक्ति की लड़ाई लड़ती हैं, अपनी स्थापना के करीब पचासी वर्षों में भी कम्युनिस्ट अपनी कतार में चलनेवालों को धर्म के विरुद्ध समझा-बुझा नहीं सके हैं। जबतक देश में दलितों के लिए मंदिर प्रवेश निषिद्ध था-उनमें मंदिरों में बैठे भगवान के दर्शन की उनमें कितनी ललक थी-हम सभी अपने इतिहास में झाँककर महसूस कर सकते हैं। जब संविधान से उन्हें छूट मिल गई है-वे अधिकार से मंदिरों में आने-जाने लगे हैं। फुले और अम्बेडकर के लाख प्रयास के बावजूद हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं के प्रति उनकी आस्था में कोई कमी नहीं आयी। कम्युनिस्ट अपने ही परिवार के सदस्यों को धार्मिक आचरण करने से रोक नहीं पाते हैं। यहाँ यह बात गौर करने की है कि हमारे यहाँ त्योहारों को भी धार्मिक बना दिया गया है जिसका सीधा संबंध हमारी सांस्कृतिक गतिविधियों से है। जबकि पश्चिमी देशों में इस प्रकार के प्रश्न सामाजिक प्रश्नों की श्रेणी में रखकर धर्म से अलग कर दिये गये हैं। ऐसी स्थिति में कम्युनिस्टों को चाहिए था कि वह इस सवाल पर गंभीरता से विचार करते और देश की एक सांस्कृतिक नीति तैयार करते। माक्र्स और लेनिन ने धर्म के सवाल पर किताबें लिखी। अपनी सोच को दुनिया के सामने रखा लेकिन कम्युनिस्टों का फर्ज था कि वे जनता के बीच उसे ले जाते। रूस में सरकारी आदेश से धर्म पर प्रतिबंध था। इसका 70 वर्षों तक सरकारी आदेश से पालन भी होता रहा लेकिन जैसे ही समाजवादी व्यवस्था ढही-लोग ईश्वर, पादरी और गिरिजा घर के शरण में जाने लगे।
धर्म की अवधारणा ‘जनता के लिए अफीम’ के रूप में अभिव्यक्त की जाती है। इस अवधारणा के प्रवर्तक कार्ल माक्र्स और नास्तिक अराजकवादी माने जाते हैं। किन्तु कार्ल माक्र्स ने धर्म संबंधी इस धारणा (धर्म जनता के लिए अफीम हैं) को किस अर्थ में ग्रहण किया था-उसे लोग भूल जाते हैं। उसने तो धर्म सम्बन्धी विचारों और संस्थाओं को मानव के क्रिया कलापों के चरित्र से पैदा होने वाला और उसी को व्यक्त करने वाला माना था। इस अवधारणा की व्याख्या करते हुए ब्रितानी माक्र्सवादी विचारक आर्थिवाल्ड रॉबर्टसन ने कहा था कि माक्र्स और एंगिल्स के अनुसार व्यक्ति सोच सकें इसके पहले केवल उपासना की जाए कि उन्हें जीना चाहिए-कि उन्हें भोजन, जल, आवास, वस्त्र और जीवन की अन्य आवश्यक वस्तुएँ मिले। उनके अनुसार, आदमी कार्य करता है और विश्व को बदल देता है, जिसका वह अंग है। विचार, उपकरणों में से एक हैं जिनसे वह ऐसा करता है। अत: इतिहास केवल विचारों का प्रगटीकरण नहीं है, बल्कि विश्व को बदलने के लिए किये गये संघर्षो की श्रंृखला है। (माक्र्स और एंगिल्स)
माक्र्स के विचार में धार्मिक भावनाएँ जैसे आश्चर्य, विस्मय, निराश्रय और दु:ख आदि अनुभूति में प्रकट होते हैं जो सर्वप्रथम मनुष्य की प्रकृति की शक्तियों के डर और उसके नियंत्रण की कठिनाई से उत्पन्न होते हैं। जो उसके ‘बाहर’ और हमेशा उसके ‘ऊपर’ प्रतीत होते हैं और बाद में, वर्गों और वर्गजुल्म पर आधारित समाज और मनुष्य की उस समाज की समझ या नियंत्रण की अक्षमता के उदय के साथ ऐसा प्रतीत होने लगता है कि वह उससे ‘बाहरी और उसके ऊपर’ की चीज है। माक्र्स ने कहा था कि धर्म दमनात्मक सामाजिक परिस्थितियों की अभिव्यक्ति और उसके विरुद्ध विद्रोह करनेवाला दोनों ही है। इस सन्दर्भ में अफीम संबंधी माक्र्स की सूक्ति के अवतरण को उद्धृत किया जा सकता है।
धार्मिक अनुताप एक ही समय वास्तविक अनुताप की अभिव्यक्ति और वास्तविक अनुताप का प्रतिकार भी है। धर्म दु:खी जीव की आह हैं, हृदयहीन विभव का हृदय है, आत्मविहीन स्थिति की आत्मा की तरह यह व्यक्ति के लिए अफीम है। व्यक्ति के भ्रामक सुख के आधार पर धर्म का उन्मूलन उनके वास्तविक सुख के लिए आवश्यक है। अपनी दशा के प्रति भ्रम के त्याग का अर्थ उस दशा का त्याग होगा जिसे भ्रम की आवश्यकता है। अत: धर्म की आलोचना शोक की घाटी की आलोचना के भू्रण में स्थित है, धर्म जिसका प्रभामंडल है।’’ (माक्र्स और एंगिल्स)
इस अवतरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि माक्र्स धर्म को न केवल भ्रम मानता है जो एक हृदयहीन विश्व में एक स्वापक के समान हैं, बल्कि इससे भी अधिक वह इसे ऐसे विश्व के विरुद्ध विद्रोह करनेवाला भी मानता है, जब तक कि ऐसे विश्व का अस्तित्व है। इसको वह एक जरूरत के रूप में स्वीकारता है।
यदि धर्म एक सामाजिक रचना है तो यह एक सामाजिक शक्ति भी है जो सामाजिक विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इस प्रकार इसके दो पहलू हैं और यह समाज में वर्ग संघर्ष के दोनों पहलुओं को प्रतिम्बित करता है। एक तरफ  धर्म यदि आम जनगण के द्वारा आत्मसमर्पण और यथास्थिति को स्वीकार करने के लिए शासक वर्ग के हाथों में एक हथियार के रूप में इस्तेमाल होता है और यथार्थ रूप में सामाजिक विकास के क्रमिक अवस्थान में यदि इसकी भूमिका रही है तो दूसरी तरफ  यह शोषित वर्गों के हाथ में शासकों के विरुद्ध विद्रोह के हथियार के रूप में भी प्रयुक्त हो सकता है। धार्मिक परचमों के नीचे विश्व में शोषक और शोषित दोनों पक्षों की ओर से वर्ग युद्ध लड़ा जा सकता है और दुनिया में ऐसे युद्ध लड़े जाते रहे हैं।
दुनिया के इतिहासकारों ने कुछ ऐसी गलत अवधारणाओं का निर्माण किया है कि दुनिया में बहुतेरे युद्ध धर्म के नाम पर या धर्म की रक्षा के लिए लड़े गये थे। किन्तु क्या यूनानियों और रोमवासियों ने किसी धर्म को फैलाने के लिए युद्ध किया था ? इसका जबाव मिलता है- नहीं। ये युद्ध तो स्पष्ट रूप में गुलामी के लिए लोगों को बंदी बनाने और अन्य समाजों की सम्पत्ति लूटने के लिए लड़े गये थे।
ईसाई धर्म जो कि गुलामी के विरुद्ध एक विचारधारा और धर्म के रूप में उदित हुआ था और जिसने ट्यूटोनी कबीलों के साथ मिलकर रोमन साम्राज्य और गुलामी को उखाड़ फेकने में कुछ भूमिका अदा की थी, स्वयं साम्राज्य और ईसाई धर्म युद्धों का एक विजय- ध्वज बन गया। ईसाइयों और यहूदियों के बीच द्वन्द्व के परिणामस्वरूप ईसाई जनता रोमन कैथालिक तथा प्रोटेस्टेंट नाम के दो सम्प्रदायों में बँट गई। यूरोप के प्रत्येक देश में इस सम्प्रदाय-भेद से राजा और प्रजा में साधारण झगड़ा ही न रहने लगा, वरन् बड़े-बड़े खून-खराबे होने लगे। धर्मभेद के कारण राजा प्रजा पर अत्याचार करते थे और प्रजा राजा को पदच्युत करने का प्रयत्न करती थी। इंग्लैंड के ट्यूडर-वंश के राज्य-काल में तो इस प्रकार के अत्याचार का ताँता बँध गया था। जब ईसाई धर्म के समानान्तर अरब में इस्लाम धर्म का उदय हुआ तो शीघ्र ही, इसका विकास बड़ी तेजी से होने लगा। कारण था कि ईसाई धर्म की ज्यादती के विरुद्ध इस्लाम धर्म में जनतंत्र और बराबरी के गुण थे। इसमें निजी भूमि सम्पत्ति पर रोक थी और गुलामी के प्रति मानवीय भावनाएँ संविहित थीं। इस्लाम की इन अच्छाइयों के परिणामस्वरूप इसका प्रचार-प्रसार सम्पूर्ण विश्व में तेजी से होने लगा। बड़े-बड़े सामंती साम्राज्य इसके प्रभाव के कारण विलीन होने लगे। किन्तु जैसे ही इस्लाम अपनी मूल आत्मा से हटकर खलीफों, सरदारों और सामन्तों का सेवक बना, धर्म के नाम पर इस्लाम धर्म में प्रशिक्षित शोषकों ने जनता का खून चूसना शुरू किया। वे लगातार युद्धों, विजय अभियानों, हत्याओं और उन सभी कार्यों में संलग्न रहने लगे, जो शोषक वर्गों के शासन के साथ जुड़े हुए होते हैं।
जब गुलामों पर अधिकार रखने वाले साम्राज्यों का कृषक-भूदासों पर स्वामित्व रखनेवाले सामंती राजतंत्रों की, जिसकी पूंछों में व्यापार और वाणिज्य पूँजी बंधी थी, ऐतिहासिक भूमिका समाप्त हो गयी तथा पूँजीवाद ने उन्हें किनारे कर दिया और विश्व पर फिर से विजय प्राप्त करना शुरू किया, तब अपने प्रहार में सहायक होने के लिए उन्हें धर्म की कोई विशेष जरूरत नहीं रह गई।
एशिया और अफ्रीका के मुल्कों में धर्म की भूमिका राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में आदर्शवादी रही है। इसका स्वरूप निश्चित रूप से यूरोपीय देशों की औद्योगिक क्रान्ति के माध्यम से जन्मी जनतांत्रिक क्रान्ति से भिन्न रहा है। यूरोप ने धर्म का निषेध कर जनतांत्रिक क्रान्ति को आगे बढ़ाने का काम किया। लेनिन ने कहा था कि पूर्वी देशों का बुर्जुआ वर्ग ‘‘फ्रांस के महान प्रबुद्ध चिन्तकों और अठारहवीं सदी के समाप्तिकाल के महान नेताओं का सुयोग्य सहचर है।’’ उनका आशय था कि पूर्व के देशों में बुर्जुआ विचारधारा के प्रगतिशील तत्वों की प्रवृतियों को उन ठोस आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में स्पष्ट करना जो उस विचारधारा को जन्म देती और प्रतिबिम्बित करती है।
पूर्व के धर्म के अत्यधिक प्रभाव को देखते हुए राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग के सिद्धान्तकार अनीश्वरवादी और भौतिकवादी विश्व दृष्टिकोण के प्रतिपादक नहीं बन सके। इसके विपरीत इनकी सैद्धान्तिक प्रवृतियाँ आमतौर से स्थिति के अनुसार धार्मिक और आदर्शवादी स्वरूप ग्रहण करने लगीं।
इस प्रकार, यह लक्षित करते हुए कि 1905-1907 की रूसी क्रान्ति के बाद पूर्व की जनतांत्रिक क्रान्ति सम्पूर्ण दक्षिण पूर्व एशिया में फैलने लगी, लेनिन ने लिखा...‘‘जनवादी आन्दोलन जावा के अवाम में विकसित हो रहा है, जहां इस्लाम के झंडे के नीचे एक राष्ट्र्रंवादी आन्दोलन उठ खड़ा हुआ है।’’ जी. वेगेनर की पुस्तक-‘आधुनिक भारत, भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना और समस्याएँ’ पर अपनी टिप्पणियों में लेनिन ने भी ‘‘अंग्रेजों के खिलाफ , एशियाइयों के लिए, स्वयं अपने लक्ष्यों के लिए, हर एशियाई चीज के लिए आन्दोलन की ओर संकेत किया।’’
पश्चिमी यूरोप के मध्यवर्ग की धर्म के विरुद्ध बुर्जुआ युद्ध की एक परम्परा थी और यह युद्ध समाजवाद के बहुत पहले शुरू हुआ था। इसके विपरीत पूर्व के देशों के धर्म के विरुद्ध जनतांत्रिक संघर्ष का प्रश्न आम कार्यक्रम का अंग कभी नहीं बना।     निस्संदेह, राष्ट्रीय जागरण के काल में मध्यवर्ग ने धार्मिक विचारधारा के परम्परागत सिद्धान्तों को सदा ही तत्परतापूर्वक नहीं स्वीकार किया। अनेक अवसरों पर उसने धार्मिक सुधार के नारे का भी इस्तेमाल किया और सामन्ती पूर्व में धार्मिक नैतिकताओं की सर्वाधिक घृणित रूढिय़ों और सिद्धान्तों को हटाने या बदलने के जनवादी विचारों को सामने रखा। लेकिन मध्यवर्ग कभी धर्म के सर्वथा विरुद्ध नहीं रहा। इसके विपरीत उसने धर्म को भौतिकवादी पश्चिम के ‘दूषित’ कुप्रभाव का प्रतिकार करनेवाली प्रमुख राष्ट्रीय परम्परा की भूमिका सौंप दी।
पूंजीपति वर्ग द्वारा धर्म के इस उपयोग का कारण अन्य बातों के अलावा यह तथ्य भी है कि धार्मिकता सामाजिक मनोभाव का एक प्रमुख तत्व रही है। अत: यह स्वाभाविक ही था कि पूँजीपति वर्ग के सिद्धान्तकार इसकी उपेक्षा नहीं कर सके और सर्वाधिक सामान्य परम्परा के रूप में धर्म को अपनी लक्ष्य सिद्धि के लिए उपयोग किया। पूँजीवादी विचारधारा की यह खूबी है कि वह सामाजिक मनोभावना के समनुरूप होती है। यही कारण है कि आम जनता में इतने व्यापक रूप में फैली है, जिससे वह एक जोरदार सामाजिक शक्ति बन गयी है।
जवाहर लाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा ‘मेरी कहानी’ में लिखा है-‘‘पूर्व के अन्य स्थानों की भाँति भारत का भी नया राष्ट्रवाद, अनिवार्यत: धार्मिक राष्ट्रवाद था।’’ पं. नेहरू के अनुसार स्वदेशी आन्दोलन का-जो इस शताब्दी के प्रारम्भ का राष्ट्रीय आन्दोलन था, इसका आधार भी ‘धार्मिक राष्ट्रवाद’ ही था। सर्वाधिक उग्रवादी आतंकवादी संगठनों की विचारधारा में भी धार्मिक पुट था। ये संगठन धर्म की सहायता से जनता पर जो प्रभाव डाल सकते थे उसे ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों को भी स्वीकार करना पड़ा।
महात्मा गांधी ने मुक्ति आन्दोलन के दौर में जिस सैद्धान्तिक प्रणाली को विकसित किया था उसमें धर्म ने तो सामाजिक-राजनीतिक सिद्धान्तों की पुष्टि में अग्रणी भूमिका अदा की थी। वह राजनीति से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध था और यहाँ तक कि राजनीति पर वह पूरी तरह से हावी भी था। गांधीजी ने कहा था कि-‘‘मैं बिना किसी संशय के और फिर भी पूर्ण विनय के साथ यह कह सकता हूँ कि जो लोग यह कहते हैं कि धर्म का राजनीति से कोई मतलब नहीं हैं, वे जानते ही नहीं कि धर्म का अर्थ क्या है?’’ कुछ खास धार्मिक और नैतिक सिद्धान्त-प्रेम, अहिंसा और सत्य आदि को राजनीति के क्षेत्र में भी गाँधीजी ने प्रसारित कराया। उदाहरण के लिए गाँधीजी ने अहिंसा के सिद्धान्त को एक जोरदार राजनीतिक शक्ति कहा। इसी प्रकार, गाँधीजी सत्य को भी राजनीतिक संघर्ष का एक सिद्धान्त मानते थे और यह कहते थे कि ‘स्वराज्य’ सत्य का ही एक भाग है। गाँधीजी की तरह बर्मी राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं ने भी देश के रूपांतरण और सामान्यत: समाज के विकास में बौद्धधर्म की भूमिका को निर्णायक माना। उदाहरणार्थ उनू धर्म को ‘विश्व की अन्तिम आशा’ मानते थे। इसी विचार को बर्मा के सोशलिस्ट नेता उ बा स्वे ने स्पष्ट करते हुए कहा: ‘‘मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि धर्म न केवल व्यक्ति को नैतिक शक्ति को दृढ़ता प्रदान करता है, वरन् यह किसी देश की प्रगति का भी मुख्य स्रोत है। धर्म रहित मनुष्य पतवार रहित नौका के समान है जो समुद्र के विशाल विस्तार में लक्ष्यहीन हो भटकती रहती है।’’ महान् समाजवादी विचारक डॉ. लोहिया ने भी भारत के तीर्थों, नदियों की सफाई और रामायण मेला के माध्यम से भारत की अवरुद्ध क्रान्ति, रेनेसां और रिफॉर्मेशन को सांस्कृतिक स्तर प्रदान करने का अभियान चलाया था।
पूर्व के देशों में राष्ट्रीयतावादी विचारधारा का धार्मिक रंग धर्मशास्त्रीय तर्कों, आत्मा की अपील और धार्मिक-नैतिक आत्मोन्नति के विचारों को मुक्ति आन्दोलन की एक निर्णायक शर्त के रूप में पेश करनेवाली शिक्षाओं में अभिव्यक्त हुआ है। इसकी यह विशेषता उसकी सामाजिक प्रकृति का परिणाम थी। इसने पूर्व के सामान्य ‘जागरण’ के सिलसिले में सामाजिक और राजनीतिक संबंधों के विघटन को भी प्रतिबिम्बित किया है। राष्ट्रीय आन्दोलन में अभिव्यक्त धार्मिक विचार कोई वैयक्तिक चीज नहीं थी, यह पूर्वी देशों के विचारकों और मुक्ति आन्दोलन के नेताओं की कोई सनक या झक नहीं थी वरन् यह एक ऐसे विचारधारा की स्वीकृति थी जिनको लाखों-लाख लोगों ने संजोया था और जिनके बीच वे शताब्दियों से रहते आ रहे थे।
    सामाजिक व्यवस्था को रूपान्तरित करने वाली ऐसी विचारधारा का एकमात्र कारण आम जनता में वैज्ञानिक विचारों एवं चेतना का अभाव तथा समाज में राजनीतिक अपरिपक्वता के अस्तित्व को माना जा सकता है।
    आज की दुनिया में सामाजिक अन्तर्विरोधों में काफी वृद्धि और विभिन्न धर्मों में अनुभव किये जा रहे सैद्धान्तिक संकटों के कारण बहुत से देशों में पूंजीवाद विरोधी और साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष जनता और क्रान्तिकारी मजदूरवर्ग के व्यापक हिस्सों में मैत्री की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती जा रही हैं। वैज्ञानिक भौतिकवादी विश्व दृष्टिकोण के प्रवक्ताओं और धार्मिक जनता के बीच युद्ध और शान्ति पूँजीवाद और समाजवाद, नव उपनिवेशवाद और विकासशील देशों की समस्याओं पर बातचीत और साम्राज्यवाद के विरुद्ध तथा जनतंत्र और समाजवाद के लिए संयुक्त कार्रवाइयों के सामयिक महत्त्व को भी समझने और इनके विरुद्ध लडऩे की तैयारी धर्म-प्राण जनता क्रान्तिकारी मजदूर वर्ग के साथ मिलकर करने लगी है। इस प्रकार व्यापक संपर्क और संयुक्त कार्रवाइयों द्वारा-धर्म में आस्था रखने वाली जनता के व्यापक हिस्से साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में और दूरगामी सामाजिक परिवर्तनों को क्रियान्वित करने में एक सक्रिय शक्ति बन सकते हैं, ऐसी संभावना के आसार नजर आने लगे हैं। भारत में आर्य समाज और रामकृष्ण मिशन द्वारा किए गये सामाजिक भेदभाव और साम्राज्यवाद विरोधी वैचारिक संगम की भूमिका को कौन नजरअंदाज कर सकता है ?