Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

बुद्घिजीवी हमेशा अल्पमत में रहे हैं


प्रो. अपूर्वानंद
डी-12,मॉरिस
नगर, दिल्ली-7
उ.1 बुनियाद परस्ती का अर्थ है कि किसी विचार या वस्तु की बुनियाद या मूल के प्रति वफादारी। यह अपने आप में नकारात्मक नहीं है लेकिन यह विचार रूढि़वादिता को बढ़ावा अवश्य देता है। बुनियादपरस्त हिंसक बने यह जरूरी नहीं है लेकिन यह विचार संकीर्ण अवश्य बना सकता है। यह अपने विचार, सिद्घांत को स्थापित करने के लिए इसके मानने वाले को संकीर्ण बना सकता है। दूसरे शब्दों में इसे कट्टरता भी कह सकते हैं। लेकिन इसका दशहतगर्दी अथवा दहशतगर्द से सीधा रिश्ता नहीं है।  दूसरा शब्द दहशतगर्दी है, या आतंकवाद। इसका इस्तेमाल किसी विचार को स्थापित करने के लिए किया जा सकता है। यह तकनीक है, इसे रणनीति भी कहा जा सकता है। क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा और भगत सिंह ने  फिलोसफी ऑफ़ बॉम्ब में आतंकवाद को क्रांति के अनिवार्य चरण में स्थापित किया है। रूस और अल्जीरिया का उदाहरण ले सकते हैं। लेकिन यह भी साफ़ कि इसे निर्दोष की जान लेने में कोई हिचक नहीं। दहशतगर्द सीधे सत्ताधारियों पर हमला न कर उस वर्ग पर हमला करते हैं जो सत्ता के द्वारा संरक्षित है। इसके जरिए वह संरक्षक की सत्ता पर पकड़ चुनौती देते हैं। धर्मतत्ववाद भी वही है कि मैं धर्म के बुनियादी मूल तत्त्वों के प्रति वफादार हूं। मै नमाज़ पढ़ता हूं, मैं पूजा करता हूं अथवा किसी  भी विचार के प्रति निष्ठावान हूं, लेकिन यदि इसे जबरन दूसरे पर लागू करवाया जाए, थोपा जाए तो यह हिंसक हो जाता है। हिंसक धर्मतत्ववाद (आचरण) अस्वीकार्य है।
उ. 2 आज जिसे आतंकवाद समझा जाता है वह आलसी तरीके से हमारी बहस को इस्लामी आतंकवाद से जोड़ देता है। आतंकवाद जहां 30 वर्ष पूर्व नहीं था यदि आज है तो उसकी जड़ वहां नहीं है। यह तो देखना पड़ेगा कि आतंकवाद वहां पैदा कैसे हुआ? साफ दिखता है कि तालिबान अमेरिका की पैदाइश है। सऊदी अरब भी इसका स्रोत है, क्योंकि वह वहाबी इस्लाम को प्रचारित करना चाहता है। वह यूरोप का भी प्रिय है। सवाल उठता है कि आखिर दोनों उनके प्रिय क्यों हैं? टोनी ब्लेयर, बराक हुसैन ओबामा कहते हैं कि वह इस सभ्यता को नहीं, वरन क्षेत्रीय शक्तियां स्थापित करना चाहते हैं वह लोकतंत्र को स्थापित करना चाहते हैं। लेकिन सत्य है कि वैश्विक राजनीति में अमेरिका और इंग्लैंड की सख्ती से जांच की जरूरत है। आतंकवाद का वैश्विक स्तर पर तीसरा स्रोत फिलिस्तान पर इजऱाइल पर कब्ज़ा है। यह पूरी दुनिया जानती है कि फिलिस्तिनियों पर इजराइली राज्य ने  कितने जुल्म किए हैं। यह भी कहा जाना चाहिए कि आतंकवाद के जरिए विचार को स्थापित करने, अस्थिरता पैदा करने का सीधा संबंध ऊर्जा के नए स्रोतों पर कब्जा करना है।
उ. 3 वाम राजनीति के बारे में कहा जा सकता है कि जीवन को धर्म कैसे प्रभावित करता है,  इस पर उसे सोचना चाहिए था। क्योंकि संघर्षों को यदि हम देखें तो स्पष्टï हो जाता है कि मानव अपने वेतन, राजनीतिक संघर्ष के लिए जान नहीं देता लेकिन सांस्कृतिक कारणों पर जान दे सकता है। वामपंथ ने इसे या तो समझा नहीं या फिर इस दिशा में कार्य पर विचार ही नहीं किया। हां, जिसने इस पर कार्य किया है वह इसका उपयोग कर रहे हैं। जैसे भारतीय जनता पार्टी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने रामजन्म भूमि को राजनीतिक आंदोलन कहा था। श्रीपाद अमृत डांगे ने इस विषय पर काम किया है। गांधी नेहरू ने इस पर कार्य किया है लेकिन उसके बाद इस पर काम नही हुआ। राजनेताओं ने इसका सिर्फ इस्तेमाल किया है।
उ. 4 ग्रन्थों को पढऩा ही इस भ्रम को तोडऩे का सबसे मजबूत उपाय है। इन ग्रन्थों को न पढऩे से जहां बिचौलियों की उपस्थिति अनिवार्य हो जाती है वहीं इसके बाद ग्रन्थ को हिंसा के ग्रन्थ के तौर पर स्थापित करना भी आसान है। क्योंकि कुरान में जो लिखा है उसके ज्ञान के अभाव में किसी भ्रम को ईश्वरीय आदेश के तौर पर प्रचारित व पूज्यनीय बनाया जा सकता है। इसी प्रकार गीता में आखिर क्या लिखा है यह सिर्फ उसे पढऩे के बाद ही पता लगाया जा सकता है। धर्म को स्थिर वस्तु नहीं समझना चाहिए। इसे लेकर प्रयोग बहुत कम हुए हैं लेकिन गुरुनानक ने धर्म ग्रन्थों का अध्ययन किया और सभी प्रमुख धर्मों के अध्ययन के आधार पर प्रयोग किया और इस प्रयोग से नए धर्म की कल्पना की। 21वीं सदी के व्यक्ति से पूछा जाए कि आपने इस दिशा में क्या किया तो वह निरुत्तर ही रहेगा। गांधी इससे जूझे हैं, उन्होंने धर्म का जटिलता में अध्ययन किया । उन्होंने खुद हिंदू कहा लेकिन उसमें श्रेष्ठता का अहंकार नहीं है। गांधी जी में यह इत्मीनान था क्योंकि उन्होने हिंदू ग्रन्थों को पढ़ा, इस्लाम को पढ़ा, ईसाईयत को पढ़ा लेकिन कभी नहीं कहा कि मेरा धर्म श्रेष्ठ है। रामकृष्ण परमहंस में भी यह भाव था। वे जितनी स्वाभाविकता से  चर्च में आराधना कर सकते थे उतनी ही सहजता से मंदिर और मस्जिद में आराधना कर सकते थे।
उ. 5 पिछले सौ वर्षों को देखें तो रूढि़वादिता बढ़ती हुई दिखती है। लेकिन रूढि़वादिता को स्वीकार, अस्वीकार करने की बहस से अधिक घातक यह है कि रूढि़वादिता का संपर्क हिंसा से न हो जाए। क्योंकि आज ऐसे आधुनिक साधनों का अंबार है जो हिंसक भूमि पर विध्वंसकारी साबित हो सकते हैं। यदि रूढि़वादिता का रिश्ता हिंसा से हो जाएगा तो घातक होगा। इसलिये सचेत रहना होगा। यह प्रश्न रहा है रूढि़वादिता को सरंक्षण के तौर पर भी देखा जाता है। इससे मुक्ति सम्भव है, इसके लिए विशेष कोई प्रयास नहीं बल्कि सच्चे अर्थ में धार्मिक बन कर ईश्वर की सृष्टि में जैसे हमें भूमिका मिली है उसे निभाएं।
उ. 6 इस्लामिक स्टेट का मैं विशेषज्ञ नहीं हूं। लेकिन यह साफ़ कि इस्लामिक स्टेट कोई धार्मिक संगठन नहीं। वह शक्ति को हासिल करने के लिए, अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए दबदबा कायम करना चाहता है। इसके लिए वह कार्य भी कर रहा और वह दूसरे संप्रदायों के साथ-साथ अपने सम्प्रदाय के लिए भी हानिकारक है। शिया के साथ सुन्नी भी उनके निशाने पर हैं। मैं इसे धार्मिक युद्व नहीं कहता क्योंकि यह पूर्णरूपेण सांसारिक उद्देश्य से किया जा रहा कृत्य है। आतंकवाद सिर्फ एक नहीं है। इसे एक ही तरीके से न देखें। पिछले दो वर्ष में देखा जाए तो हिंसा की घटनाओं में स्रोत हिन्दुओं के नाम पर काम करने वाले संगठन भी हैं। अब यदि समाज में एक व्यक्ति को सिर्फ एक जानवर का गोश्त खाने के नाम पर मार दिया जाए अथवा एक आईएएस की परीक्षा दे रहे युवक को अपना नाम बदलना पड़े तो साफ हो जाता है कि आज मुस्लिम दहशत में हैं। इस आतंक का स्रोत जाहिर है, इस्लामिक स्टेट नहीं है।
 उ. 8 साम्यवाद में भी असहिष्णुता थी। जो भी दूसरे विचारों वाले लेखक, विचारक हुए उनको मार दिया गया। सत्ता का चरित्र है कि वो दूसरे विचारों वाले लोग नहीं चाहती और वह सत्ता किसी भी प्रकार की हो सकती  है। आम तौर पर भ्रम होता है कि पूँजीवादी सोच वाली सत्ता ज्यादा बेहतर होती है, लेकिन ऐसा नहीं है। ब्रिटेन में एक नीति प्रस्तावित हुई कि कॉलेजों में संदिग्ध तत्वों पर नजर रखनी है। ऐसे तो आप किसी को भी निशाना बना सकते हैं! इस नीति की हर तरफ आलोचना हुई और होनी भी चाहिए। अमेरिका इस दौर से गुजऱ चुका है। स्नोडेन ने अमेरिका से जाकर ब्रिटेन में शरण ली, लेकिन अमेरिका में अभिव्यक्ति की आज़ादी तो है ही, आप वहां राष्ट्रध्वज जला सकते है, और भारत की तरह आपके ऊपर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा नहीं होगा। अमेरिकी विश्वविद्यालयों में कई बार ध्वज जलाया गया, लेकिन छात्रों पर मुकदमा नहीं हुआ। यह एक प्रकार की परिपक्वता है। दूसरा स्तर है जब मैकारथिज्म के समय में लेखक, फिल्मकार व दूसरे लोगों पर निगरानी होने लगी। दक्षिण एशिया के देशों में यह ज्यादा बढ़ गया है, सीरिया, ईराक, ईरान, तुर्की, चीन में यह देखने को मिल जाता है। भारत में ख़तरा पिछले सालों में बढ़ता ही जा रहा। तो, आप चाहे साम्यवाद में हो, साम्राज्यवाद हो या लोकतंत्र में हो लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नकेल कसने की परंपरा आपको मिलती रहेगी।  ये संघर्ष चलता रहेगा और यही सत्ता का चरित्र है।
उ. 9 यह पहले के सवालों से जुड़ा प्रश्न है। कठमुल्लापन वहां मिलता है जहां यह प्रवृत्ति हो कि जो मैं कहूं वह सही है। ये किसी भी राजनीतिक सोच में हो सकता है, आतंकवाद की जननी सोच होती है, ये पूरी तरह से सांसारिक है। अभी जो सबसे ज्यादा स्वीकार्य शब्द है, वो है विकास। जब आप कहते हैं कि
विकास किसी भी कीमत पर होना चाहिए, तो आप उस विकास को हासिल करने के लिए नियामगिरी, छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर अत्याचार कर सकते हैं। चीन में भी यही चीज है, भारत में भी धीरे-धीरे प्रचलित हो रहा है। विकास कोई धार्मिक पद तो है नहीं, कि आपने उसे सर्वोच्च का दर्जा दे दिया, अगर आदिवासी ये कह रहा है कि आपके राष्टï्रीय विकास के चक्कर में हमारी जीवन पद्घतियां, स्मृतियां और परम्पराएं खत्म हो जाएंगी, तो हम कहते हंै कि खत्म हो जाए, इसे विकासवादी कठमुल्लापन क्यों न कहें ?
उ. 10 बुद्धिजीवियों की भूमिका को ख़ारिज किया जाना कोई नयी बात नहीं है। बुद्घिजीवी हमेशा अल्पमत में रहे हैं, लोगों को विकास में लाभ दिखता है, बुद्घिजीवी को हानि दिखती है। आम समाज के सोचने का तरीका इतना पेचीदा नहीं होता, इसलिए बुद्घिजीवी उन्हें नकारात्मक दिखते हैं। बुद्घिजीवियों का तो काम भी यही है कि वो हमे बताएं कि जो खुशफहमियां पैदा की जा रही है वो गलत हंै। बुद्घिजीवियों को ख़ारिज करने का काम सत्ता के साथ ही, समाज और मीडिया ने भी किया है। ज्यां द्रेज़ को भी मीडिया ने राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिया, जबकि उन्होंने अपने जन्म के  देश की नागरिकता छोड़ कर भारत में रहना स्वीकार किया। हम मानते है कि सोचने में मेहनत नहीं लगती। हम बुद्धि को काम मानते ही नहीं है। नौकरशाही काम को सरल करना चाहती है जबकि बुद्धिजीवियों का काम है जटिल बनाना।
(प्रस्तुति: अनिल सागर)