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Thursday 23 Nov 2017

अशोक जैसा दूसरा उदाहरण दुनिया में नहीं


अमिय बिन्दु
 8 बी-2, एन पी एल कॉलोनी,
 न्यू राजेन्द्र नगर,
नई दिल्ली- 110060
मो. 9311841337
उ.1 फंडामेंटलिज्म को इसके वैश्विक संदर्भ में समझने की जरूरत है। यह कोई धर्म की ओर लौटने या धर्म का राजनीतिक प्रयोग की ओर प्रस्थान नहीं था। बल्कि यह धर्म के मूलतत्वों की बात करता है वह भी बिना किसी शास्त्र या धर्मग्रंथ पर जोर दिए हुए। लेकिन इस शब्द का इस्तेमाल जड़ता, धर्मांधता, असहिष्णुता और अनावश्यक हस्तक्षेप के साथ मिलाकर किया जाता है। बीसवीं सदी के उत्तराद्र्ध से फंडामेंटलिज्म हर धर्म में बढ़ा है-हिन्दू, इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, सिख, पारसी सभी धर्मानुयायियों में अपने धर्म के मूलतत्वों को जानने और उसे ओर बढऩे की ललक दिखी है।
वैश्विक रूप से इसके कारणों की तह में जाने की जरूरत है। इसके लिए कोई सरलीकरण नहीं अपनाया जा सकता। लेकिन एक तत्व हर जगह समान रहा है कि मनुष्य जीवन में अर्थवत्ता की खोज को लेकर परेशान रहा है। यह रूहानी परेशानी उसे धर्म की ओर खींचती है। इसे पहचान के संकट से भी जोडक़र देखा जा सकता है। मनुष्य अपने भीतर गहन छटपटाहट, प्यास महसूस करता है। उसे बुझाने के लिए या तो वह ड्रग्स, औषधि, काम की ओर कदम बढ़ाता है या फिर धर्म और अध्यात्म की ओर। ईरान की इस्लामिक क्रांति कोई अकेले इस्लाम में फंडामेंटलिज्म का उभार नहीं था। बल्कि उसी दौर में अमेरिका जैसे विकसित समाज में भी तथाकथित ‘नए ईसाई अधिकार’ जैसे आंदोलन चले, जिसे वहां के प्रशासन से सहयोग भी मिला। इसी तरह लैटिन अमेरिकी देशों में पेंटेकोस्टालिज्म जैसी अवधारणाएं बढ़ी। अफ्रीका और एशियाई देशों में भी धर्म को लेकर पहचान अधिक महत्वपूर्ण होने लगा। चीन में फालुन गांग नाम समुदाय बड़ी तेजी से आगे बढ़ा और एक समय तो इसके सात करोड़ अनुयायी बन चुके थे। सोवियत रूस के बिखर जाने के बाद वहां भी ऑर्थोडॉक्स ईसाईयत में बढ़ोत्तरी और उसके पुनरुत्थान के संकेत मिले वहीं जापान जैसे उदारवादी देश में भी ऑम शिनरिक्यो जैसा समुदाय उभरा जो कयामत के दिनों की बात करता था। व्यापक तौर पर वैसे भी पश्चिमी विकसित देशों का समाज पूर्वी रहस्यवाद, अध्यात्मवाद और व्यवहारगत उपाय अपनाने को उद्यत हुआ। योग, ध्यान, पाइलेट्स, शिआत्सु और अन्य रीतियों के प्रति पूरे वैश्विक समुदाय के झुकाव को समझा जा सकता है। इस तरह फंडामेंटलिज्म एक प्रकार से मनुष्य के अपनी पहचान, प्यास, जुनून से जुड़ा प्रसंग था। कहीं-कहीं इसने हिंसक रूप लिया तो उसके अन्य परिस्थितिजन्य कारण अधिक महत्वपूर्ण रहे।
उ.2 राजनीति में ‘ताकत’ और ‘प्रभाव’ दो तत्व बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं। वैश्विक राजनीति में इनके इस्तेमाल को टाला नहीं जा सकता। कोई भी देश कितना भी कहे वह समता के सिद्धांत पर विश्वास करता है लेकिन भारत के शासक अशोक जैसा दूसरा उदाहरण दुनिया में नहीं मिल सका जबकि शक्ति संतुलन को धता बताते हुए उसने एकतरफा अपनी तरफ  से युद्ध से मुंह मोड़ लिया था। आज की दुनियावी राजनीति में समय-समय पर अलग-अलग देश या महाद्वीप ताकत और प्रभाव को बढ़ाते हुए अपने वर्चस्व का सपना देखते रहते हैं। उत्तर औपनिवेशिक काल में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ कि यूरोप के अपने सिद्धांत राष्ट्रवाद ने उन्हीं की ताकत को कम करना शुरू कर दिया और उनका औपनिवेशिक शासन सिकुडऩे लगा। लग रहा था कि दुनिया किसी नई व्यवस्था की ओर बढ़ रही है लेकिन यूरोप के स्थान पर अमेरिका के वर्चस्व का दौर आया। उसे संतुलित करने के लिए यूरोप का ही वृहद राष्ट्र रूस अपने संगठन के बल पर खड़ा हुआ। इन दोनों शक्तियों की आपसी खींचतान में बहुत से नए स्वतंत्र हुए देश अपने को ठगा हुआ महसूस करने लगे। यहां तक कि पश्चिम एशिया में जहां अमेरिका ने ‘लोकतंत्र को बढ़ावा’ देकर उन्हें स्वतंत्र कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कालांतर में यह अमेरिका की रणनीति साबित हुई। लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता आदि मूल्य आधारित नारे देकर जो वृहद कार्य चल रहा था वह अमेरिका के प्रभाव बढ़ाने के रूप में सामने आया। फिर उसका जवाब देने के क्रम में उनमें अंदरूनी परिवर्तन हुआ और ईरान में इस्लामिक क्रांति एक मोड़ साबित हुई।
इस क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधन बल्कि सीधे सीधे कहें कि खनिज तेल की उपलब्धता और ताकत में उसके अहम योगदान के चलते वैश्विक राजनीति की दोनों शक्तियां अमेरिका और रूस जो कहने को तो वैचारिक आधार पर गुटों का नेतृत्व करते थे, इन संसाधनों पर अधिकार करने के होड़ में शामिल हो गए। उसके बाद की बातें तो इतिहास में दर्ज हैं कि किस तरह सोवियत रूस ने इस क्षेत्र में बढ़त हासिल करने के क्रम में अफगानिस्तान में कब्जा जमाने की कोशिश की और अमेरिका ने सीधे अपनी सेना भेजने की बजाय वहीं के लड़ाकों को सहायता देने की नीति अपनाई। इसमें वहां के स्थानीय पक्षकार पाकिस्तान, ईरान भी अपने स्वार्थवश शामिल थे। इन्हीं मुजाहिदीनों के विभिन्न समूह बाद में तालिबान के रूप में उभरे और अफगानिस्तान ही नहीं बल्कि बाद में सूडान, पाकिस्तान, सोमालिया और लेबनान में ताकत बटोरने में सफल हुए। अमेरिका के सहयोग से जन्मे ये समूह बाद में अपनी ताकत बढ़ाने और स्थानीय पहचान को बढ़ाने तथा उसमें एका लाने के लिए पश्चिमी मूल्यों के खिलाफ  होते गए जो एक तरह से अमेरिका की मुखलाफत भी थी। पिछली सदी के नब्बे के दशक में ऐसा ही समूह उभरा ‘अल कायदा’ जो सीधे अमेरिका को दुश्मन नं. एक मानता था। इस समूह ने अमेरिका और इजरायल का विरोध करते हुए स्थानीय राजनीति में कदम रखा और इसका व्यापक उद्देश्य था अरब क्षेत्र से अमेरिका की उपस्थिति हटाना और विशेष उद्देश्य था सऊदी अरब से अमेरिका का प्रभाव खत्म करना। अमेरिका विरोध या व्यापक रूप से कहें कि पश्चिमी परंपराओं के विरोध को इतना समर्थन और इतनी लोकप्रियता मिली कि यह समूह फिर से पुरानी आकांक्षाओं को सामने रखने लगा कि पूरी दुनिया पर इस्लाम का प्रभाव हो। आज यूरोप और अमेरिकी महाद्वीप जिस तरह से इस्लाम के ‘भय’ या ‘आतंक’ से डरे हुए हैं उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय?
उ.3 कट्टरता और उदार रूप की चर्चा तो दूर है सीधे धर्म को ही नकार देना मानवता के स्तर पर वाम राजनीति की बड़ी गलती रही है। धर्म अफीम है इसमें सच्चाई हो सकती है लेकिन क्या धर्म को हटाकर लोगों को अफीम दिया जा सकता है? क्या अफीम और हैलुसिनेषन पैदा करने वाले ऐसे ही मादक द्रव्यों के सहारे मनुष्य को छोड़ा जा सकता है? मनुष्य मानसिक संक्रियाओं के जटिल गुंजलक से निर्मित होता है। केवल पेट भरा होना या भौतिक सुख सुविधाओं से भरे रहना ही मनुष्य के शांत रहने या विद्रोही न होने की गारंटी नहीं हो सकता।
धर्म ही नहीं धर्म की तरह कोई भी ‘विचार’ अफीम हो सकता है। क्या समता का ‘यूटोपिया’ धर्म से बड़ा अफीम नहीं साबित हुआ जिसके दम पर लाखों करोड़ों नागरिकों में सपने को जगाकर अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए प्रेरित किया गया? इसी तरह राष्ट्रवाद भी एक अफीम है, वैश्वीकरण भी एक अफीम है, लोकतंत्र भी एक अफीम ही है। मनुष्य के हृदय में, मस्तिष्क में खालीपन उसे कचोटता है। कुछ करने को प्रेरित करता है। उसमें तड़प और प्यास जगाता है। इस खालीपन को भरने के लिए दुनिया भर में तमाम कलाओं, सांस्कृतिक रीति रिवाजों, त्यौहारों, विचारों और प्रथाओं को मान्यता मिली है। इसे धर्म का नाम दिया जाए, संस्कृति का नाम दिया जाए, परंपरा का नाम दिया जाए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मनुष्य को जीने के लिए इनकी जरूरत पड़ेगी इसे नकारकर कोई भी व्यवस्था स्थापित नहीं की जा सकती।
उ.4 दुनिया के अधिकतर धर्म किसी खास ग्रंथ पर आधारित हैं। धर्मों का ग्रंथ पर आधारित होना एक तरफ  तो इस रूप में सकारात्मक है कि उससे उनकी मूल बातों का पता चलता है दूसरी नकारात्मक यह है कि उक्त धर्म को उसी ग्रंथ तक सीमित कर दिया जाए। चाहे ईसाई धर्म हो या इस्लाम दोनों एक ही ग्रंथ पर आधारित हैं। दोनों धर्मों ने अपने-अपने ग्रंथों का खूब प्रचार प्रसार किया है। समस्या यह है कि प्रचार-प्रसार पर पश्चिमी देशों और उनके जैसे सोचने वालों का पूरी तरह कब्जा है। यदि इस्लाम में कोई एक समुदाय कुरान की कुछ अलग व्याख्या करता है या उसकी कुछ बातों के आधार पर अपना नया संगठन खड़ा करता है तो पश्चिमी बुद्धिजीवी उसे इस्लाम से अलग खड़ा कर देता है। वहाबी, सूफीज्म और ऐसी ही अन्य बहुत सारी धाराओं के बारे में दुनिया के लोगों को बहुत कम पता है या फिर वे भी इसे इस्लाम की मुख्यधारा से अलग मानते हैं जबकि ईसाई धर्म में न जाने कितने चर्च हैं जिनके विचार, प्रथाएं, रीतियां, व्याख्याएं, मान्यताएं बिल्कुल जुदा हैं। जुदा ही नहीं बल्कि एक दूसरे की कट्टर विरोधी हैं लेकिन उन्हें कभी भी ईसाईयत से अलग करके प्रस्तुत नहीं किया जाता। दुनिया के सामने सारे ईसाई एक लगते हैं लेकिन इस्लाम में सब अलग-अलग हैं। शिया और सुन्नी तो दो मुख्य धाराएं हैं जो राजनीतिक रूप से प्रबल हैं जबकि सूफी, वहाबी और अन्य अपने को स्थापित भी नहीं कर पाते।
क्या कभी यह सुना गया कि स्विट्जरलैण्ड और फ्रांस में रहने वाले ईसाई अलग-अलग हैं? कि उनके चर्च बिल्कुल अलग हैं? कि वे एक दूसरे के चर्च में जाते भी नहीं और जा सकते भी नहीं? जरूरत वैचारिक शक्ति पैदा करने की है। अधिकांश चिंतन में पश्चिमी देशों के चिंतकों का प्रभुत्व है और वे अपने चश्मे से ही दुनिया को देखते हैं चाहे वह इस्लाम हो या हिन्दू। यह कहकर नहीं बचा जा सकता कि मीडिया पर उनके अधिकार हैं। पश्चिमी और मध्य एशिया के देशों में तो मीडिया पर सरकारी नियंत्रण है इसके बावजूद आखिर वे अपने को प्रकट क्यों नहीं कर पा रहे हैं? मुख्य वजह है कि उनके चिंतक पश्चिमी देशों में जाते हैं तो वहीं का चश्मा पहन लेते हैं और जब सलमान रश्दी या तसलीमा नसरीन की पुस्तकों पर रोक की बात आती है तो वे भी रोक का पक्ष लेने लगते हैं। तह में कारण यह है कि पश्चिमी देशों में रहते हुए वे स्वयं को अलग-थलग, असुरक्षित, आशंकाग्रस्त पाते हैं। वहां के समाज से वे घुलमिल नहीं पाते और बौद्धिक वर्ग में मौलिकता और किसी अन्य विचार और सुकून की तलाश में अपने मूल देश और मूल धर्म की ओर देखते हैं। कहीं परिणाम फंडामेंटलिज्म के रूप में सामने आता है तो कहीं अपने ही धर्म की आलोचना करने में।
उ.5 ‘धर्म के सारतत्व’ को व्यापक अर्थ देना ठीक नहीं है। यह दरअसल हिन्दू धर्म और इस्लाम के संबंध में दुष्प्रचार है। इस दुष्प्रचार के पीछे खास आग्रह और मंतव्य हैं। फंडामेंटलिज्म या धर्म की ओर लौटने की प्रवृत्ति केवल एशियाई देशों में नहीं पाई गई बल्कि यह वैश्विक प्रवृत्ति जैसा कि पहले प्रश्न के संदर्भ में देखा गया। लेकिन फंडामेंटलिज्म को रूढि़वादिता का रूप देने के लिए धर्म के उन्हीं तत्वों पर जोर दिया जाता है जो नकारात्मक हैं। इस्लाम से ज्यादा रूढि़वादी और नकारात्मक बातें ईसाई धर्म में हैं लेकिन उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। इसका एक उदाहरण यह है कि एशियाई देशों के धर्मों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो वे महिलाओं के खिलाफ हों।
क्या महिलाओं का अधिकार पश्चिमी अवधारणा है? पश्चिमी विचारधारा के पैरोकार यह कहते हैं कि पूर्वी धर्मों में महिलाओं का सम्मान और स्थान बिल्कुल नहीं है। वे धर्म के बढ़ाव या व्यवहार को पितृसत्तात्मक सत्ता को थोपने के रूप में प्रचारित करते हैं। उनका कहना है कि धर्म के नाम पर महिलाओं के अधिकारों को संकुचित करने की कोशिश की जाती है। उदाहरण के लिए उनके पास मुस्लिमों में बुरका प्रथा और हिन्दुओं की मनुस्मृति। कितने हिन्दू परिवार मनुस्मृति पुस्तक अपने घरों में रखते हैं? उसके अनुसार व्यवहार करते हैं? बुरका को नकारा जा सकता है लेकिन उसके लिए खास दृष्टिकोण अपनाना होगा। वहाबी और सूफी तथा अन्य संप्रदायों की ओर ध्यान देना चाहिए कि वहां कैसे सुधार हुए? महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि महिलाएं क्या किसी संस्कृति से बाहर हैं? कहने का आशय यह है कि क्या मुस्लिम राष्ट्रों में भी महिलाओं को वही अधिकार और स्थिति दी जानी चाहिए। जैसे कि उन्हें मातृत्व और घर की जिम्मेदारियों से मुक्त कर देना ही एकमात्र उनके अधिकारों की मान्यता है? क्या घर की जिम्मेदारी और मातृत्व के प्रति कोई दूसरा दृष्टिकोण हो ही नहीं सकता? यदि पश्चिमी विचार ही सर्वोपरि हैं तो उनके समाज में यह परेशानी क्यों आ रही है कि उन्हें माँ आयातित करने की जरूरत पड़ी है? परिवार संस्था में विश्वास जमाने के लिए अतिरिक्त प्रयास हो रहे हैं? समाज में मूल्यों और परंपराओं की प्रतिष्ठा पर बल दिया जा रहा है? मुक्ति के प्रयास शुरू हो चुके हैं। भारत में विभिन्न धार्मिक कर्मकांडों में महिलाओं की भागीदारी की मान्यता और विभिन्न वंचित तबकों की बात को मान्यता देने की शुरूआत होने को इसी दिशा में उठे कदम के रूप में देखा जा सकता है। इस्लाम में भी जिस दिन आधी आबादी अपनी आवाज उठाने को तत्पर होगी उसके समर्थन में बाकी आधी आबादी का भी बड़ा हिस्सा साथ होगा और हिंसा तथा पितृसत्तात्मकता बीते दिनों की बात बन सकती है। ‘लोकतंत्र को बढ़ावा’ जैसे थोपे हुए समाधान किसी सभ्यता का भला नहीं कर सकते।
उ.6 पश्चिमी देशों का दुष्प्रचार और विचारों के थोपने का षड्यंत्र अब जाहिर हो चुका है। इसे प्रचार प्रसार के साधनों द्वारा बहुत दिनों तक बरकरार नहीं रखा जा सकता। महत्वपूर्ण है मनुष्य का जीवन। यदि जीवन प्रभावित होने लगे तो कोई प्रचार की रंगीनियत में नहीं पड़ता। वैश्वीकरण एक ऐसी ताकत बनकर आया जिससे लोगों, वस्तुओं और विचारों की आवाजाही बहुत तेजी से विभिन्न समाजों में हुई। इससे कई समाज तो उखड़ से गए। यह एक तरह से ‘ताकत’ की जगह ‘प्रभाव’ का विस्तार था।
उत्तर औपनिवेशिक काल में स्वतंत्र होने वाले विकासशील देशों में खासकर मुस्लिम देशों में पश्चिमी विचार बड़ी तेजी से आयात हुए। साथ ही इन देशों में पश्चिमी मूल्यों के प्रति स्वाभाविक ललक और लालच भी था। लेकिन जगह-जगह इस वैश्वीकरण के खिलाफ  स्थानीयता का नारा बुलंद हुआ। फंडामेंटलिज्म भी इसी तरह की एक फोर्स है जो वैश्वीकरण के अनैतिक और भ्रष्ट तंत्र के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ। हम कह सकते हैं कि प्रचार प्रसार के साधनों का प्रभाव वैश्वीकरण में दिखा लेकिन जिन देशों ने इन साधनों पर प्रतिबंध लगा रखा था आखिर वहां क्यों लोगों ने उस व्यवस्था को नकार दिया? पूंजीवाद या कोई भी व्यवस्था मनुष्य से ऊपर नहीं है। इस व्यवस्था को भी मनुष्य ने निर्मित किया है। मनुष्यता पर खतरे की घड़ी में वह इसे नकारकर कोई और व्यवस्था भी उतनी ही सहजता से अपना सकता है।
उ.7 आज आतंकवाद जिस स्थिति में है उसमें कठोर नीतियों के सिवाय कोई और उपाय नजर नहीं आता। कारण यह कि इसकी पहुंच वैश्विक हो चुकी है और यह स्वयं को ताकत की बुलंदियों पर मानता है। ऐसी स्थिति में कोई राजनीतिक पहल या समझौता या पेशकश को यह समूह कोई भाव नहीं दे रहे। ऐसे सारे पेशकश इनके लिए आकर्षक नहीं रह गए हैं। इन समूहों को लगता है कि वे ताकत के बल पर दुनिया पर राज करने के मंसूबों में सफल हो जाएंगे। फिर भी केवल सैन्य ताकत के अतिरिक्त इन पर कई आयामों में हमला करने की जरूरत है।
उदाहरण के लिए आतंक के लिए जरूरी चीज है- आदमी और हथियार। इन दोनों चीजों के लिए पैसा। इस तरह तीन बड़े साधन हैं- आदमी, हथियार और पैसा। सबसे पहले इनके धन के स्रोत पर हमला करना उपयुक्त होगा। इससे न तो वे नए लोगों की भर्ती कर पाएंगे न ही हथियार खरीद पाएंगे। ऐसा करने के लिए सख्त राष्ट्रीय कानूनों की जरूरत होगी जो मानव-व्यापार, ड्रग्स तस्करी, हथियार तस्करी, हवाला जैसे कारोबार पर पूर्णतया रोक लगा सके। मगर ऐसे सख्त कानूनों का दुष्परिणाम यह होता है कि कई बार इससे साधारण नागरिकों के अधिकारों और सुविधाओं में कटौती करनी पड़ती है। इसलिए समस्या इतनी सहज नहीं है जितनी सोची जा रही है।
दूसरा स्तर है इसे मिलने वाला लोगों का समर्थन। इसे खत्म करने के लिए जरूरी है कि इंसान को सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से सशक्त करना होगा जिससे वह ऐसे कार्यों में लिप्त होने से बचे। समाज की व्यवस्था ऐसी हो कि आखिरी व्यक्ति को भी अपने को साबित करने का मौका मिले। नहीं तो ऐसे असंतुष्ट लोग भी इनके झांसे में आ जाते हैं जो अपने जीवन में कुछ सार्थक नहीं कर सके होते हैं।
तीसरा स्तर है हथियार का। बहुत सारे देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए हथियारों के कारखाने लगा रखे हैं। उनके सामने इन्हें बेचने की समस्या है। कहते हैं हथियार बहुत दिनों तक गोदामों में रखे खराब हो जाते हैं इसलिए इनके खरीदार ढूंढते हुए वे लोग किसी को भी बेच देते हैं। हमें ऐसी आर्थिक गतिविधियों से दूरी बनानी होगी जो इस तरह के अतिरिक्त उत्पादन को बढ़ावा देता हो। लेकिन मजबूरी यह है कि मशीनी अर्थव्यवस्था में मशीन की लागत निकालने के लिए मशीन को भी लगातार चलाए रखने की जरूरत होती है। तो फिर आखिर समाधान कहां है? क्या हम फिर से प्रस्तर युग में लौट जाएं? ऐसा नहीं है। दुनिया भर के देशों को यह समझाने की जरूरत है कि हथियार सिर्फ  प्रयोग में आकर ही मनुष्य का विनाश नहीं कर रहे बल्कि हथियारों के निर्माण में जिन सामग्रियों का प्रयोग हो रहा उससे पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से ह्नास हो रहा है। हथियार कई स्तरों से मनुष्य के लिए घातक साबित हो रहे हैं। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की कोई अलग राह ही हमें इस समस्या का समाधान सुझा सकती है। जब तक मनुष्य है, मनुष्यता है हमें अपने ऊपर विश्वास रखना होगा।
उ.8 असहिष्णुता और वैचारिक स्वतंत्रता दो अलग चीजें हैं। असहिष्णुता मनुष्य के स्वभाव से जुड़ा मसला है जबकि वैचारिक स्वतंत्रता एक तरह का राजनीतिक अधिकार है। असहिष्णुता को केवल धर्म या विचारों के प्रति सहिष्णुता से जोडक़र नहीं देखा जा सकता। यह मनुष्य की सहन करने की क्षमता, सामंजस्य की क्षमता और धैर्य की क्षमता से जुड़ा मसला है। तकनीकी और गति के युग में मनुष्य की सहनशीलता घटी है। इसका केवल नकारात्मक असर ही नहीं है बल्कि कुछ सकारात्मक असर भी है। धर्म के नाम पर, परंपरा के नाम पर, होनी के नाम पर कुछ भी मानकर बैठ जाने वाला मनुष्य अब बीते दिनों की बात हो चुका है। शताब्दियों तक कुछ समूहों को यह कहकर बरगलाया जाता रहा कि तुम कमजोर पैदा हुए हो, तुम इसी काम के लिए पैदा हुए हो, तुम्हें अमुक-अमुक अधिकार नहीं है। वह इसे मानकर चलता भी रहा। अब अगर वह अपनी समझ से उन स्थापनाओं का विरोध करता है और सबके बराबर अधिकार मांगता है तो इसमें गलत क्या है? क्या उसे असहिष्णु कहा जाएगा? क्या हम कह सकते हैं कि कल तक तो तू चुपचाप मार सहन कर जाता था आज हमारे खिलाफ  रिपोर्ट लिखाने क्यों चला गया? तू तो बड़ा असहिष्णु हो गया है?
यह अधीरता मनुष्य का स्वभाव बनती जा रही है। वह चि_ियों का इंतजार के बदले तुरंत फोन करके सबकुछ जान लेना चाहता है। ऐसे स्वभाव में उसे अपने या दूसरे के धर्म में कुछ गलत लगता है तो उस पर भी प्रतिक्रिया करता है। केवल धर्म ही नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भी हम देख सकते हैं कि जो राजनीतिक दल जनता की इच्छाओं का सम्मान नहीं कर रहे जनता उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने में एक पल नहीं लगा रही। पहले ऐसा माहौल कहां था? भ्रष्टाचार या अन्य मुद्दों पर जिस तरह से जनता मुखर हुई है इन सब बातों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है।
रही बात वैचारिक स्वतंत्रता की तो यह भी सापेक्षता के सिद्धांत से संचालित होनी चाहिए। कहने का आशय यह है कि आखिर कितनी स्वतंत्रता? क्या एक की अबाध स्वतंत्रता दूसरे की स्वतंत्रता में बाधक नहीं होगी? क्या हमारी स्वतंत्रता दूसरे के विचारों या धर्म के निंदा तक जाती है? फिर सहिष्णुता का क्या होगा? युक्तियुक्त निर्बंधन की बात हमारा संविधान भी करता है। संविधान का निर्माण तब के सर्वोच्च बुद्धिजीवियों ने किया था। उन्हें भी ऐसी स्थितियों का भान रहा होगा। वैचारिक स्वतंत्रता पर अब तो यह कहकर कैंची चलाए जाने लगी है कि इससे आतंकवाद जैसे वैश्विक खतरे से निबटने में राष्ट्र कमजोर साबित हो रहे हैं। वैचारिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता के नाम पर लोग बच्चों को कुछ भी पढ़ा रहे हैं, कुछ भी सिखा रहे हैं।
धर्म या विचार के नाम पर आतंक नहीं फैलाया जा सकता। आमजन धीरे धीरे इस स्तर तक समझदार होता जा रहा है कि वह देख सके कि किसी विचार या धर्म की किसी रीति के पीछे असली मंतव्य क्या है? और उग्र होना हमेशा गलत ही नहीं होता। गलत काम होते देखकर भी आंख बंद कर लेना या चुप रह जाने से बेहतर है उग्र या हिंसक होना। स्वयं गांधीजी ने कहा था कि कायरता और हिंसा में से मुझे चुनना हो तो बेशक मैं हिंसा चुनूंगा। जीवन का सच भी यही है यदि आप अत्याचार सहन करने को तैयार हैं तो कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी आप पर अत्याचार करने से बाज नहीं आएगा। विचारों में, काम में उग्रता जरूरी है और होनी ही चाहिए। इसे हिंसा से जोडक़र नहीं देखा जा सकता।
उ.9 कठमुल्लापन एक जुमला है। बिल्कुल उसी तरह जैसे विकास एक जुमला है। एक समय था जब पश्चिमी देशों ने विकास-विकास का नारा देकर तरह-तरह के स्वार्थ सिद्ध किए। उन्होंने एक निश्चित पैमाना बनाया और उसे विकास कहकर अपनी दुकानदारी चलाई। यहां तक कि दुनिया को तीन भागों में बांट दिया- विकसित, विकासशील और अविकसित। इसी तरह कठमुल्लापन भी वहीं की अवधारणा है। यदि इसके अनुवाद वाले इस हिंदी शब्द पर ध्यान दिया जाए तो निश्चित इशारा मिल जाता है कि इसका इशारा किस ओर है। दरअसल पश्चिमी देशों ने लोकतंत्र का नारा देकर लोकतंत्र को शासन का सबसे बेहतर उपाय बताया। इस विचार के पीछे रूस और वामपंथी राष्ट्रों में तानाशाही का होना प्रतिक्रियाकारी शक्ति थी। क्योंकि यदि पश्चिमी देश वास्तव में लोकतंत्र के लंबरदार होते तो बहुत से देशों में तानाशाही शासकों का समर्थन नहीं करते। जब इन देशों के बुद्धिजीवियों द्वारा विभिन्न खांचों में फिट राजनीतिक सिद्धांत प्रतिपादित कर विभिन्न देशों से आग्रह किया गया कि वे उसे अपना लें तो अधिकतर ने शुरू में इनकी बातें मान लीं। कुछ ही बरसों में जगजाहिर हो गया कि ऐसे किसी भी सिद्धांत के पीछे इनका अपना निहित स्वार्थ होता था। यहां तक कि ‘उदारवाद’ जैसी अवधारणा अपने व्यवहार में कहीं से भी उदारवादी नहीं थी बल्कि क्रूर षोषक थी। तब विभिन्न देशों ने अपने पुराने इतिहास और स्थानीय परंपराओं को आधार बनाकर अपने राजनीतिक सिद्धांतों की आधारशिला रखी या राजनीति को आगे बढ़ाया। स्थानीयता के उभार से इनके मंतव्यों को सहारा नहीं मिल रहा था इसलिए इन बुद्धिजीवियों ने इसे कठमुल्लापन कहकर खारिज करने की कोशिश शुरू कर दी। जैसे यदि कोई इस्लामी राष्ट्र किसी कंपनी के अधिकतम लाभ पर सीमा बांध दे जैसा कि इस्लाम में व्यवस्था है तो यह नीति कठमुल्लापन की जद में आ जाएगी। इसका आतंकवाद से उतना ही दूर का नाता है जितना कि फंडामेंटलिज्म का जैसा कि पहले प्रश्न के संदर्भ में विस्तार से बताया है।
उ.10 बुद्धिजीवी आप किसे कह रहे हैं? मुझे ऐसा नहीं लगता कि बुद्धिजीवियों की भूमिका को कोई खारिज कर सकता है। दरअसल बुद्धिजीवी के नाम पर जो एक बहुत ही संकीर्ण परत थी समाज की जिसे एलीट ग्रुप कहा जा सकता है, उसे लोगों ने नकार दिया है। यह होना भी चाहिए। जिस तरह से साक्षरता और शिक्षा बढ़ रही है और लोगों की पहुंच ज्ञान के स्रोतों तक अबाध रूप से हो रही है वैसी अवस्था में हर व्यक्ति बुद्धिजीवी बन चुका है। इतने शिक्षक, इतने डॉक्टर, इतने इंजीनियर, इतने प्रोफेशनल क्या यह सभी बुद्धिजीवी नहीं हैं? सिर्फ बंद एसी कमरों में अंग्रेजी पढक़र पश्चिमी विचारों के चश्मे से देखने वाली बुद्धिजीविता खतरे में पड़ी है। फिर बौद्धिकता सिर्फ किताबें पढऩे से नहीं आती। जीवन की तमाम परिस्थितियों में संघर्ष से भी मनुष्य बहुत कुछ सीखता है, अनुभव करता है और वह समाज को दिशा दे सकता है। गांव में बुजुर्गों से सलाह लेने की हमारी बहुत पुरानी परंपरा रही है। ऐसा माना जाता था कि जिस गांव में या जिस कार्य में बुजुर्गों की सलाह नहीं ली गई है, उसके सफल होने में संशय है। तकनीकी ने सभी लोगों को अपने विचार प्रकट करने, उस पर चर्चा करने, बहस करने का माध्यम भी उपलब्ध कराया है जिससे अब किसी विचारधारा को थोपा नहीं जा सकता। यह आम जनता के सशक्त होते जाने, शिक्षित होते जाने का परिणाम है। यह मनुष्यता के लिए भी लाभकारी है कि मनुष्य को भेड़ों की तरह किसी एक विचार की डांडी से हांका न जा सके।