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Tuesday 21 Nov 2017

रचना वार्षिकी: भूमिका


क्षरपर्व रचनावार्षिकी इस बार केन्द्रित है वैश्विक आतंकवाद और धर्म के नाम पर की जा रही हिंसा पर। विगत वर्षों में कभी साहित्यकारों की जन्मशतियों पर, कभी कहानियों-कविताओं पर, कभी लोककलाओं पर तो कभी फिल्मों पर हमने विशेषांक प्रकाशित किए हैं। लेकिन इस बार आतंकवाद जैसे जटिल विषय पर विशेषांक निकालने का विचार इसलिए उपजा क्योंकि रोम के जलने और नीरो के बांसुरी बजाने की परिपाटी से मानवता की अपूरणीय क्षति हो चुकी है। साहित्य मात्र मनोरंजन के लिए नहींहोता, समाज को आईना दिखाना और इसके साथ-साथ सही दिशा बताना भी उसकी जिम्मेदारी है। किस्से-कहानियां, गीत-संगीत का आनंद तभी लिया जा सकता है जब दुनिया से बारूद की गंध और बमों के धमाके खत्म हो सकेें। विश्वशांति स्थापित करना महज कुछ देशों की, राजनैतिक दलों की ही जिम्मेदारी नहींहै, जनता का साथ सबसे बड़ी जरूरत है और इसमें बुद्धिजीवियों को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। चंद बौद्धिक, लेख लिखकर अपनी चिंताएं प्रकट करें, बंद कमरों में विचार-विमर्श करें, मात्र इससे जनता को जागरूक नहींकिया जा सकता। दूसरी ओर धार्मिक नेताओं पर भी सारा दारोमदार नहींडाला जा सकता कि वे अपने-अपने अनुयायियों को समझाएं। अब तक ऐसी प्रवृत्ति हावी रही, शायद इसलिए विश्व में आतंकवाद की घटनाएं बढ़ती रहीं। हर घटना के बाद उस क्षेत्र के सत्ताधारियों ने आतंकवाद का कड़ाई से मुकाबला करने का वचन दोहराया, लेकिन ऐसे वचनों का खोखलापन अगली घटना के बाद जाहिर हो जाता है। दुनिया में शांति की चाह रखने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है और दहशत के कारोबारियों की संख्य कम है। लेकिन फिर भी अशांति तेजी से बढ़ रही है। इसका कारण यह है कि हम आतंकवाद के उपजने की जड़ों तक जाने की जगह ऊपरी स्थितियों का आकलन और विश्लेषण करने लगे हैं। इतिहास को अपनी सुविधा से लिखा जा रहा है, ताकि वर्तमान और भावी पीढिय़ां इतिहास की गलतियों से सबक न ले सकेें। आतंकवाद का धर्म से क्या, कैसा और कितना संबंध है और इसकी जड़ों को खाद-पानी देने में धन का क्या योगदान है, इस समीकरण को जानबूझ कर लोगों से छिपाया जा रहा है, ताकि धर्म के नाम पर इंसानियत को गुमराह किया जाता रहे और मुट्ठी भर लोगों का, कुछ देशों का आर्थिक फायदा होता रहे। धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक स्वार्थ की प्रवृत्ति से विश्व बर्बाद होने की कगार पर आ पहुंचा है और विगत दो-तीन सदियों में विकास की जो ऊंची छलांग इंसान ने लगाई है, उसमें तेजी से पतन दिखने लगा है। यह याद रखना होगा कि 18 वीं और 20वींसदी के बीच औद्योगिक, तकनीकी, वैज्ञानिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तमाम क्षेत्रों में विकास की अद्भुत गाथाएं इंसान ने लिखी। लेकिन इसी कालखंड में उपनिवेशवाद का क्रूरतम रूप भी देखने मिला। दो-दो विश्वयुद्धों की विभीषिका से दुनिया गुजरी और व्यापक तौर पर यह समझ विकसित हुई कि विकास ही सभ्य होने की कसौटी नहीं है। दुनिया में शांति के प्रसारण के लिए राष्ट्र संघ फिर संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई। इधर भारत ने औपनिवेशिक दासता से आजाद हुए देशों के सामने विश्व के दो गुटों में से किसी एक के साथ जाने के दबाव के बरक्स गुटनिरपेक्ष आंदोलन का विचार दिया। गुटनिरपेक्षता के विचार में धर्मनिरपेक्षता की सोच भी जुड़ी थी और इसी वजह से दुनिया में शीतयुद्ध के बावजूद लंबे अरसे तक शांति बनी रही, कभी गुलाम रहे देशों को आत्मनिर्भर, स्वावलंबी व स्वाभिमानी बनने का अवसर मिला। उम्मीद थी कि 21वीं सदी में ऐेसे विचार आगे बढ़ेंगे और इंसानियत बढ़ेगी, हर तरीके से, हर सलीके से। लेकिन अफसोस कि ऐसा नहींहुआ। इंसान ने उन सारी कल्पनाओं को सच कर दिखाया, जिनका जिक्र पौराणिक कथाओं में होता था। लेकिन किस्से-कहानियों में जिन भयंकर जीवों, दैत्यों को बुराई का प्रतीक बनाकर पेश किया जाता था, वे भी 21वीं सदी में आतंकवाद की शक्ल में सामने आने लगे। आतंकवाद से भी डरावनी बात यह है कि हम आतंकवाद का मुकाबले के लिए किसी अवतार के प्रकट होने की प्रतीक्षा में हैं। कभी हम एक देश की ओर ताकते हैं, कभी दूसरे की ओर, कि ये लोग नित नए उभरते आतंकवादी संगठनों को खत्म करेंंगे। आतंकवाद अलग-अलग शक्लों और रूपों में हमारे सामने आ रहा है। केवल हथियारों से ही नहीं, विचारों से भी आतंक फैलाने की कोशिश देखी जा सकती है। दुनिया भर में जनता का एक बड़ा वर्ग कई तरह की वंचनाओं से गुजर रहा है। एक ओर शिक्षा, रोजगार, भोजन, पानी, स्वास्थ्य का संकट, वैचारिक स्वतंत्रता पर खतरा,  दूसरी ओर आतंकवाद का भय। हमारा एक पैर 21वीं सदी में आगे बढ़ रहा है, दूसरा पैर अंधकार युग में वापस खींच रहा है। इस अंधेरे को दूर करने के लिए अब कौन से पत्थर आपस में रगडऩे होंगे कि मुक्ति की आग प्रज्ज्वलित हो। विश्व के वर्तमान परिदृश्य पर कुछ सवाल अक्षरपर्व की रचनावार्षिकी के लिए हमने तैयार किए, जिसमें वरिष्ठ साहित्यकार रमाकांत श्रीवास्तव का मार्गदर्शन हमें प्राप्त हुआ, हम उनके आभारी हैं। आभार उन तमाम लेखकों, पाठकों, विचारकों का, जिन्होंने रचनावार्षिकी के लिए अपने विचार, जवाब हमें प्रेषित किए। प्रश्न नीचे दिए जा रहे हैं और इनके जवाब अकारादि क्रम में आगे के पृष्ठों पर हैं। उम्मीद है पाठक हमारे इस प्रयास का नीर-क्षीर विवेक से विश्लेषण करेंगे और अपने विचार हम तक पहुंचाएंगे।  - संपादक
प्रश्नावली
1. धर्मतत्ववाद (फंडामेंटलिज्म) और आतंकवाद के संबंध को किस रूप में देखा जाना चाहिए?
2. वैश्विक राजनीति और आतंकवाद का रिश्ता किस तरह बना और विकसित हुआ?
3. धार्मिक कट्टरता और धर्म के उदार मानवीय रूप पर चर्चा न करना, उसे महत्त्व न देना क्या वाम राजनीति की गलती नहींहै?
4. धार्मिक ग्रंथों की कट्टरता को ईश्वरीय आदेश मानने का भ्रम फैलाया गया, उसे तोडऩे के क्या उपाय हो सकते हैं?
5. धर्म के सारतत्व को रूढि़वादिता बतलाकर इसे मानवाधिकार का विरोधी निरूपित किया जा रहा है, इससे मुक्ति कैसे संभव है?
6. आईएस जिस तरह का आतंकवाद धर्म के नाम पर फैला रहा है, वह दरअसल क्रूरता के अलावा कुछ नहींहै। सुन्नी और शिया को लड़वाने के खेल या सभ्यता के संघर्ष के नाम पर दो कौमों को मरने-मारने के लिए एक-दूसरे के सामने खड़े करने का षड्यंत्र दरअसल प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा जमाने की पश्चिमी ताकतों की पुरानी चाल है। एक और आई एस के खात्मे की ललकार और दूसरी ओर उसे परोक्ष समर्थन ऐसी ही चाल है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे कैसे समझाया पर  सकता है, जबकि प्रचार प्रसार के साधन भी पूंजीवादी शक्तियों के कब्जे में हैं।
7. क्या आज के आतंकवाद को केवल कठोर नीतियों से ही खत्म किया जा सकता है, या इसके कोई और उपाय भी हैं?
8.  वर्तमान में भारत ही नहीं विदेशों में भी असहिष्णुता बनाम वैचारिक स्वतंत्रता का प्रश्न ज्वलंत है। क्या यह कहा जा सकता है कि इस वक्त धर्म ही नहीं, विचारों का भी आतंक फैलाया जा रहा है और इसे अस्मिता के साथ जोडक़र उग्रता को बढ़ावा दिया जा रहा है?
9. राजनीतिक सिद्धांतों में जिस तरह का कठमुल्लापन बढ़ रहा है, क्या उसे आतंकवाद की गतिविधियों से अलग मानना जायज है?
10. वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को सुधारने में बुद्धिजीवियों की भूमिका को खारिज किया जा रहा है, इसके लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?