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Tuesday 21 Nov 2017

अक्षर पर्व की इस रचनावार्षिकी में धर्म को केन्द्र में रखकर कट्टरता, आतंकवाद, असहिष्णुता, वैचारिक स्वतंत्रता और बुद्धिजीवियों की भूमिका इत्यादि बिन्दुओं पर चर्चा करने का उपक्रम किया गया है

प्रस्तावना
ललित सुरजन

अक्षर पर्व की इस रचनावार्षिकी में धर्म को केन्द्र में रखकर कट्टरता, आतंकवाद, असहिष्णुता, वैचारिक स्वतंत्रता और बुद्धिजीवियों की भूमिका इत्यादि बिन्दुओं पर चर्चा करने का उपक्रम किया गया है। इस हेतु संपादक ने अनेक जाने-माने बुद्धिजीवियों को प्रश्नावली भेजकर उनसे उत्तर चाहे थे। जिन्होंने जवाब भेजे हैं वे इस अंक में प्रकाशित है। उन पर टिप्पणी करने का मेरा कोई इरादा नहीं है बल्कि दिसंबर-2015 की प्रस्तावना में पेरिस पर आतंकी हमले की पृष्ठभूमि में मैंने जो विचार रखे थे उन्हीं पर कुछ और त$फसील के साथ यहां चर्चा करने की इच्छा है। वर्तमान समय में धर्म, धार्मिक कट्टरता, धार्मिक उन्माद और आतंकवाद की चर्चा जब भी होती है हमारा ध्यान कहीं और न जाकर सीधे इस्लाम पर जाता है। यह बात हमारे मन में बैठ गई है कि इस्लाम है तो हिंसा और आतंक होना ही होना है। एक समय पाकिस्तान की मांग, फिर पाकिस्तान का निर्माण; तदनंतर अफगानिस्तान में पहले मुजाहिदीन, फिर तालिबान के किस्से; इसके आगे बढ़े तो 9/11, उसके उपरांत अफगानिस्तान और इराक पर अमेरिका के सैन्य आक्रमण-इन सबने मिलकर इस्लाम की एक ऐसी छवि निर्मित कर दी है जो एक जटिल व गंभीर मसले के अन्य आयामों को देखने व उनकी समीक्षा करने से रोकती है; दूसरी ओर इनका सरलीकरण करने की तरफ प्रेरित करती है।
हमने जिस छवि को अंतिम सच मान लिया है उसमें भारतीय उपमहाद्वीप के वर्तमान इतिहास को भी हम ध्यान में नहीं ला पाते कि बंगलादेश का निर्माण या दूसरे शब्दों में कहें तो पाकिस्तान के दो टुकड़े किन कारणों से हुए। तानाशाही के विरुद्व जनतांत्रिक आकांक्षाएं और एक पराई भाषा थोपे जाने के विरुद्ध देशज भाषा याने बांग्ला की मान्यता- ये दो प्रमुख कारण थे जो पाकिस्तान के विभाजन की बुनियाद में थे। इसी तरह इंडोनेशिया में सनातनी परंपरा के देवी-देवताओं की आराधना तथा वहां की रंगपरपंरा में रामायण की लोकप्रियता का गुणगान जब होता है तब यह तथ्य सुविधापूर्वक भुला दिया जाता है कि इंडोनेशिया न सिर्फ एक मुस्लिम बहुल राष्ट्र है बल्कि वह विश्व में मुस्लिम आबादी वाला सबसे बड़ा देश भी है। इसके बरक्स श्रीलंका का उदाहरण लिया जा सकता है, जहां बौद्ध धर्म मानने वाले सिंहलियों ने बहुमतवाद चलाते हुए अल्पसंख्यक हिन्दू तमिलों के साथ लगातार दोयम दर्जे का बर्ताव किया क्योंकि वे मुख्यत: चाय बागानों में काम करने के लिए लाए गए मजदूर थे। श्रीलंका का गृहयुद्ध कितना लंबा चला और उसने कितनी बलियां लीं यह बताना शायद आवश्यक नहीं है, लेकिन इससे यह तो पता चलता ही है कि सहिष्णु हिन्दू और करुणामय बौद्ध अपने वास्तविक या कल्पित अधिकारों तथा अस्मिता के लिए कितने बेरहम और हिंसक हो सकते हैं।
नेपाल की स्थिति श्रीलंका से कुछ अलग है, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि राजनीतिक विचारधारा की लड़ाई के चलते इस देश ने एक लंबा गृहयुद्ध झेला जिसमें हजारों लोग मारे गए। आज भी सत्तारूढ़ पहाड़ी नेपाली तराई इलाके के मधेशियों को अपने बराबर मानने कोतैयार नहीं हंै, जबकि दोनों हिन्दू धर्म के मानने वाले ही हैं। जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने विश्व के एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल से बहुत ही आशाएं बांध रखी थीं क्या वह यह बता पाएगा कि राष्ट्रपति विद्या भंडारी की भारत यात्रा क्यों रद्द हुई? तथा नेपाल ने भारत से अपने राजपूत को वापिस बुलवाकर दोनों देशों के बीच बढ़ते अविश्वास को अधिक गहरा करने का काम क्यों किया? यही सवाल इराक और ईरान के संबंधों पर उठाया जा सकता है। दोनों इस्लामी देश हैं और पड़ोसी हैं, फिर भी दोनों के बीच दस साल लंबी लड़ाई चली सो क्यों? अगर जवाब यह है कि तब इराक में सुन्नी राष्ट्रपति था तो फिर एक नई बात पैदा होती है कि धर्म स्वयं में एक पूर्ण इकाई है या अपने विभिन्न सम्प्रदायों से बनी कोई बहुरंगी तस्वीर। तब तो उसमें अन्य भेद-उपभेद उभरने की गुंजाइश भी बनती है। मसलन वैष्णव भले ही एक माने जाएं, लेकिन उनमें राम और कृष्ण को मानने वाले अपनी अलग छाप-तिलक-माला लेकर चलते हैं और उनमें भी कितनी ही शाखाएं-प्रशाखाएं  हैं।
ईसा को मानने वाले सारे लोग ईसाई कहलाते हैं, लेकिन वेटिकन के पोप का एकछत्र साम्राज्य कभी स्थापित नहीं हो सका। उसे लगातार चुनौतियां मिलती गई तथा आज ईसाईयों के कितने सम्प्रदाय हैं कोई ठीक-ठीक नहीं बता सकता। मैं याद करने की कोशिश करूं तो पन्द्रह-बीस पर आकर गाड़ी अटक जाएगी। इतिहास के विद्यार्थी जानते हैं कि ईसाई राजाओं ने जहां अन्य धर्मों के साथ लड़ाइयां लड़ीं व अपने साम्राज्य का विस्तार करने की कोशिश की वहीं इसी वजह से अपने समधर्मा ईसाई राजाओं अथवा सामंतों के साथ युद्ध छेडऩे में कोई कसर बाकी नहीं रखी। अगर तटस्थ दृष्टि से, नीर-क्षीर विवेक के साथ विचार किया जाए तो इस नतीजे पर पहुंचना मुश्किल नहीं है कि धर्म अपने संगठित रूप में कट्टरता व उन्माद को जन्म देता है, और यह बात विश्व के सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होती है। ऐसे में जब इस्लाम को निशाने पर लाया जाता है तब यह समझना आवश्यक है कि इसके पीछे कौन सी शक्तियां व कारण रहे हैं। पॉल कैनेडी ने 1985 में प्रकाशित अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘द राइज एंड फॉल ऑफ द ग्रेट एम्पायर्स’ में स्पष्ट तौर पर व्याख्या की है कि विश्व में अधिकतर लड़ाइयों के पीछे साम्राज्य विस्तार के मंसूबे और आर्थिक संसाधनों पर कब्जा करने की होड़ ही सर्वप्रमुख कारण रहे हैं। अपनी पुस्तक में उन्होंने सिलसिलेवार उदाहरण दिए हैं। इस्लाम की कहानी की बुनियाद भी यही है। अरब के रेगिस्तान में तेल की खोज के साथ औद्योगिक राष्ट्रों याने यूरोप और अमेरिका की इन तेल भंडारों पर कब्जा करने की नीयत से एक दुरभिसंधि प्रारंभ होती है। ईरान तो एक स्वतंत्र देश और सभ्यता थी, किन्तु अरब जगत मोटे तौर पर कबीलों के बीच बंटा हुआ था। वहां के छोटे-मोटे सरदारों को लालच देकर उन्हें अमीर, सुल्तान और शाह बनाकर तेल भंडारों पर कब्जा किया गया तथा दो हजार साल पहले फिलिस्तीन छोडक़र जा चुके यहूदियों को होमलैण्ड के नाम पर वापिस लाकर बसाना, इजराइल की स्थापना करना तथा उसके माध्यम से अरब जगत में दादागिरी करना, ये सब आर्थिक संसाधनों पर कब्जा करने की सोची-समझी चालें थीं। यही तो इसके पहले उन्होंने अफ्रीका में किया तथा रत्नगर्भा भूमि को अंधकार के महाद्वीप में तब्दील कर दिया। हम भारतवासियों से बेहतर इस बात को भला और कौन जान सकता था, लेकिन बंदर हमारे हिस्से की रोटी हजम किए जा रहा था और हम हिन्दू और मुसलमान बनकर बिल्लियों की तरह लड़ रहे थे और लड़ रहे हैं।
मैंने अपने दिसम्बर-15 के लेख में अयान हिरसी अली का जिक्र किया था। अयान सोमाली मूल की महिला हैं। अपने घर, परिवार और समाज के कट्टरपंथी माहौल के चलते साहस का परिचय देते हुए वे एक दिन मौका मिलते ही वहां से बाहर निकल आईं और हॉलैंड या द नीदरलैंड्स में आकर राजनीतिक शरण ले ली। फिलहाल वे अधिकतर समय अमेरिका में रहती हैं। उन्होंने इनफिडेल : माई लाइफ शीर्षक से अपनी आत्मकथा लिखी है। इस पुस्तक की काफी चर्चा हुई है तथा इसे मानो एक अकाट्य प्रमाण के रूप में पेश किया जाता है कि देखो इस्लाम में कितनी कट्टरता है। मैंने लगभग साल भर पहले इस आत्मकथा को पूरी गंभीरता और गहरी सहानुभूति के साथ पढ़ा था।  एक बार फिर मैंने इस आत्मवृत्तांत को सरसरी तौर पर हाल में पढ़ा। यह सच है कि युवा लेखिका ने अपने प्रारंभिक जीवन में बहुत से कष्ट उठाए तथा भांति-भांति के दुखदायी अनुभवों का सामना किया, किन्तु मैं जितना समझ सका उसके अनुसार अयान हिरसी अली के जीवन की त्रासदियों के लिए इस्लाम कम बल्कि सोमालिया की सामाजिक परंपराएं और उससे भी अधिक लेखिका के अपने परिवार का अस्थिर और अनिश्चित माहौल जिम्मेदार रहा है। लेखिका की मां अयान के पिता से विवाह होने के पूर्व पन्द्रह-सोलह साल की उम्र में अकेले यमन जाकर रहने लगी थीं जहां उसकी बड़ी सौतेली बहन पहले से रहती थी। बाद में हम देखते हैं कि सोमालिया की राजनीतिक अस्थिरता के चलते अयान के पिता स्वयं यहां-वहां भटकते रहे और स्वतंत्र निर्णय लेने वाली मां बच्चों के साथ कभी सऊदी अरब, तो कभी इथोपिया, कभी वापस सोमालिया और कभी केन्या इस तरह भटकती रही। इस पारिवारिक माहौल में पिता की छाया से दूर अयान ने खुद भी स्वतंत्र बुद्धि से निर्णय लिए और कई बार संयुक्त परिवार के बड़े-बूढ़ों की इच्छा के सामने सिर झुकाना पड़ा। मेरा अनुमान है कि लेखिका को यूरोप, अमेरिका में खुलेपन का माहौल मिलने के साथ जो मार्गदर्शक मिले, उनकी प्रेरणा से वह अपने जीवन की हर परिस्थिति के लिए इस्लाम पर दोषारोपण करने के लिए प्रस्तुत हुई।
मैं पाठकों का ध्यान तत्वचिंतन की गंभीर अध्येता करेन आर्मस्ट्रांग की पुस्तक : फील्ड्स ऑफ ब्लड : रिलीजिन एण्ड द हिस्ट्री ऑफ वायलेंस की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। करेन ने यूं तो विश्व के तमाम धर्मों का अध्ययन कर उन पर विस्तारपूर्वक लिखा है; किन्तु यह उनकी नवीनतम पुस्तक है, इस नाते मैं इसी को आधार बनाकर उनके विचारों से पाठकों को परिचित कराना चाहता हूं। लेखिका विश्व इतिहास से अनेक प्रमाण संकलित कर बतलाती हैं कि- धर्म के नाम पर जितनी हिंसा हुई है उससे कई गुना हिंसा अन्य कारणों से हुई है। मसलन फ्रांस की राज्य क्रांति जो समता, स्वतंत्रता और बंधुता के मूल्यों को स्थापित करने के लिए हुई थी, उसमें आज से दो सौ साल पहले ढाई लाख से अधिक फ्रांसीसी लोग मारे गए थे। करेन अपनी पुस्तक में भारत का उल्लेख करते हुए एक जगह कहती हैं कि- यह विडबंना है कि जिन अंग्रेजों ने अपने सामाजिक जीवन से धर्म को पृथक कर दिया था वे जब राज करने आए तो भारतीयों को उन्होंने हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई ऐसे मजबूत खांचों में जकड़ दिया। वे एक अन्य स्थान पर इतिहासकार लॉर्ड एक्टन की दूरंदेशी का उल्लेख करती हैं कि उन्होंने राष्ट्रीयता की अवधारणा की भत्र्सना यह कहते हुए की थी कि ऐसा होने से जनसामान्य की स्वाभाविक इच्छाओं तथा उसे प्राप्त स्थापित अधिकारों का हनन करने का अवसर सत्ताधीशों को मिल जाएगा।
हम जिस विषय पर बात कर रहे हैं उसमें बहस का कोई अंत नहीं है। लेकिन इस सवाल का जवाब तो हमें देना ही होगा कि हम बुद्धिजीवियों की इस बारे में क्या भूमिका है। अभी कोई दो दशक पहले तक हमें भारतीय समाज में समरसता होने का गर्व था तथा बड़े निश्चिंत भाव से हम दावा करते थे कि भारत में आतंकवाद के लिए कोई जगह नहीं है। फिर ऐसा क्या हुआ कि एकाएक हम एक-दूसरे पर अविश्वास करने लगे। ऐसा क्या हुआ कि इस्लामी आतंकवाद के साथ-साथ हिन्दू आतंकवाद की बात भी उठने लगी। इस बीच हमने बहुत सी गोष्ठियां कीं, बहुत सी परिचर्चाएं व परिसंवाद किए और जब से फेसबुक का मंच मिला है तब से तो हमारी सक्रियता का कहना ही क्या है। लेकिन क्या यह वक्त हमारे लिए अपने घर में बैठे रहने का है या समाज के बीच जाकर अपने विचारों को फैलाने का है, क्या यह तय करने का समय नहीं आ गया है?