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Tuesday 21 Nov 2017

‘अक्षर पर्व’ फरवरी 2016 का अंक भी पिछले अंकों की तरह रचनात्मक एवं ज्ञानात्मक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

-डॉ. (श्रीमती) मृदुला शुक्ल,
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग
इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय
खैरागढ़ (छ.ग.) 491-881
‘अक्षर पर्व’ फरवरी 2016 का अंक भी पिछले अंकों की तरह रचनात्मक एवं ज्ञानात्मक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। कविताएं, कहानियां तथा अन्य स्तंभों की रचनाएं भी पठनीय हैं किन्तु हिन्दी के महत्वपूर्ण एवं वरिष्ठ लेखक श्याम सुंदर दास के लेख ‘हिन्दी शब्द सागर प्रथम संस्करण की भूमिका’ के लिए आपको विशेष धन्यवाद है। अत्यंत उपयोगी जानकारियां उससे प्राप्त हुई।
महेन्द्र राजा जैन का लेख ‘उसने कहा था’ के प्रकाशन के सौ वर्ष: कुछ अनुत्तरित प्रश्न अपने मूल विषय के स्तर पर नितांत उपयुक्त है। उनके प्रश्न निश्चय ही विचारणीय हैं तथा उनके उत्तर मिलने की स्थितियां निर्मित होनी चाहिए। यह एक प्रकार से हिन्दी साहित्य के अध्येताओं के लिए एक चुनौती ही है कि वे ऐसे प्रश्नों के उत्तर देने हेतु तत्पर हों। इस लेख में उनके द्वारा विशेष रूप से निराला पर केन्द्रित कार्यक्रम न होने का प्रश्न उठाया गया है। मैं इस पर बताना चाहती हूं कि छत्तीसगढ़ स्थित इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ के हिन्दी विभाग में प्रतिवर्ष निराला जयंती पर एक कार्यक्रम होता है, जिसमें विद्यार्थियों को निराला की कुछ रचनाओं का वाचन कराया जाता है तथा शिक्षक उनके साहित्य के किसी एक पक्ष को लेकर चर्चा-गोष्ठी के तहत विचार करते हैं। पिछले तीन वर्षों से तो यह कार्यक्रम दो चरणों में हो रहा है। पूर्वान्ह में संकाय स्तर पर विचार-गोष्ठी वकाव्य पाठ होता है तथा संध्या को उनकी किसी एक महत्वपूर्ण रचना की मंचीय प्रस्तुति, कुछ गीतों के गायन के साथ होती है। तात्पर्य यह है कि हिन्दी विभाग ही नहीं, पूरा विश्वविद्यालय निराला जयंती मनाता है। इस वर्ष निरालाकृत ‘कुल्ली भाट’ के मंचन के अलावा उनके दो गीतों का गायन एवं एक गीत पर नृत्य की सामूहिक प्रस्तुति भी हुई।
मेरा दृढ़ विचार है कि केवल संकल्प करने की बात है। ‘जहां चाह होती है, वहां राह’ स्वमेव निकल आती है। निश्चय ही ऐसे आयोजन साहित्य से नई पीढ़ी को जोडऩे में विशेष सहायक होते हैं। उनकी रचनात्मकता के विकास में, उनमें मानवीय मूल्यों के संचार में इनकी विशेष भूमिका होती है।