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Monday 20 Nov 2017

प्रस्तावना में ललितजी साइकिल के बहाने पुराने ज़माने में ले गए।

लंबी छुट्टियों के बाद लौटने पर अक्षरपर्व का मार्च अंक पढऩे का अवसर मिला। प्रस्तावना में ललितजी साइकिल के बहाने पुराने ज़माने में ले गए। आज साइकिल न तो सहूलियत का साधन रही है और न ही शौक़। वह पेट का घेरा घटाने का साधन रह गई है। साइकिल से जुड़ी कई यादें पाठकों को याद हो आई होंगी। रिक्शेवालों की ईमानदारी हमें इंसानियत पर भरोसा करना सिखाती हैं। इस बहाने ललितजी ने हमें राजेंद्र रवि से भी परिचित करवा दिया। निदा फ़ाज़ली को दी गई आपकी श्रद्धांजलि सबसे अलग है। वे हिंदी उर्दू के बड़े शायर थे। हिंदी वाले भी उन्हें अपना ही मानते थे। सम्मन कहानी सदियों से चले आ रहे पूँजीवादी ज़हर का बयान करती है। देवास को इस बात का गर्व होना चाहिये कि प्रभु जोशी और जीवन सिंह के बाद एक और सशक्त कहानीकार सामने आया है। श्रीकृष्ण त्रिवेदी ने इंग्लिश के सही उच्चारण पर टिप्पणी की। हमारे यहाँ इंग्लिश का स्कर्ट हरण पहले दिन से ही हो जाता है जब टीचर पढ़ाती है, ए फ़ार एप्पल। भारत में हर प्रांत में इंग्लिश के उच्चारण अलग अलग हैं। सभी ख़ुद को सही मानते हैं। सरकारों ने भी सही इंग्लिश पर ध्यान देने की कोशिश नहीं की। शब्दकोश भी एकमत नहीं हैं।
    दिलीप गुप्ते, इंदौर