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Monday 21 May 2018

अनुपम मिश्र के वक्तव्य ( जीवन का अर्थ : अर्थमय जीवन ) को देखा तो सहज ही ये इच्छा हुई

 

नवनीत कुमार झा,
हरिहरपुर, दरभंगा - 847306
अनुपम मिश्र के वक्तव्य ( जीवन का अर्थ : अर्थमय जीवन ) को देखा तो सहज ही ये इच्छा हुई कि देखूँ तो कि अपने संबोधन में अर्थमय जीवन के संदर्भ में क्या कुछ कहा है अनुपम जी ने! वैसे यह काम विविध भक्ति चैनलों पर तथाकथित संतजन अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं पर निश्चय ही उन धर्मगुरुओं में अनुपम जी के जैसी स्पष्टवादिता का अभाव है और तभी तो उनमें से एक भी अनुपम मिश्र की तरह यह नहीं कहते - मुझे खुद अपनी पोल आप सबके सामने खोल देनी चाहिए, मुझे खुद जीवन का अर्थ नहीं मालूम!
जब अपनी अयोग्यता के स्वाभाविक स्वीकार का ऐसा विरल दुस्साहस देखा तो समझ गया कि भले ही वे स्वयं को अनुपयुक्त कह रहे हैं, पर  हकीकत में ऐसा नहीं है और जैसे-जैसे मैं इस भाषण को पढ़ता रहा मेरा यकीन और पुख्ता होता गया! बात को बिना लाग लपेट के कहा है अनुपम जी ने पर उन्होंने जो कुछ कहा है वो यथार्थ है! हम में से हरेक के लिए अर्थमय जीवन के मायने अलग हैं और हरेक आदमी अपनी-अपनी तरह से अपने जीवन को सफल बनाने में लगे हुए हैं! हमें अपने विचार की कमियाँ नहीं दिखती पर दूसरों के विचारों की कमियों को हम एक्सरे की तरह से एकदम स्पष्ट देख लेते हैं! अर्थमय जीवन की चर्चा करते हुए उन्होंने जो कुछ कहा है वो बहुत अर्थमय है !! मैं समझता हूँ कि अनुपम जी को न सिर्फ अर्थमय जीवन का बोध है बल्कि वो यह भी चाहते हैं कि उनका यह बोध अकेले उनका न रहे और अपने अन्त:प्रकाश से वह समष्टि को अर्थमय होता देखना चाहते हैं तभी तो अपने भाषण में उन्होंने कबीर के उस न्यारे घर को ढूँढने को प्रेरित किया है जिस न्यारे घर में बिन ज्योति उजियारा है !!!