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Friday 17 Aug 2018

फरवरी अंक में आपने शब्दकोश पर ध्यान केन्द्रित किया है।

गफूर तायर

दमोह, मप्र

फरवरी अंक में आपने शब्दकोश पर ध्यान केन्द्रित किया है। यह एक उपेक्षित पर महत्वपूर्ण तथ्य है जनाब कि शब्दकोश की जरूरत सभी को होती है, पर उसके लेखक को कम ही याद किया जाता है। इस मुद्दे पर श्याम सुंदर दास का लेख देने हेतु साधुवाद। निदा नवाज़ की उम्दा गज़़लें हैं। रामनाथ शिवेन्द्र, अशोक गुजराती, और निवेदिता जेना की कहानियां अच्छी लगीं। डा.सेवाराम त्रिपाठी का आलेख रंगमंच के कई रंगों से परिचय ही नहीं कराता, उनके परिश्रम का पता भी देता है। रायप्रवीण पर शोधपरक और सार्थक लेख पर गुणसागर जी को बहुत मुबारकेें। बेशक अभी इस पर और पड़ताल की जरूरत है। संदीप राशिनकर, परमानंद अश्रुज की समीक्षाएं ध्यान खींचती हैं। कृष्णा सोबती पर पल्लव जी का लेख और सिक्का बदल गया कहानी देकर आपने पत्रिका को जीवंत कर दिया है। एक भरपूर सार्थक और संपूर्ण विश्लेषण से युक्त उपसंहार में कृष्णा सोबती को रेखांकित करने के लिए सर्वमित्रा जी को मुबारकेें।