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Wednesday 22 Nov 2017

बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि

सर्वमित्रा सुरजन
भारत के संविधान निर्माता बाबा साहेब अबंडेकर की 125 वींजयंती पर उन्हें याद करने का सबसे अच्छा तरीका यह होता कि उन मूल्यों का सम्मान किया जाता, जिनकी स्थापना के लिए वे आजीवन संघर्ष करते रहे। लेकिन 14 अप्रैल 2016 को देश में अलग-अलग दलों के शीर्ष नेताओं ने अपने राजनीतिक गुणा-भाग को ध्यान में रखकर अंबेडकर को याद किया। हर दल की कोशिश यही रही कि वह अंबेडकर को अपनी धरोहर साबित कर सके और खुद को दलितों का सबसे बड़ा हितैषी। नरेन्द्र मोदी ने अपनी शैली में अंबेडकर को याद किया। राहुल गांधी-सोनिया गांधी ने अपने तरीके से उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस बार अरविंद केजरीवाल भी मैदान में है, क्योंकि पंजाब में चुनाव होने वाले हैं और बसपा प्रमुख मायावती तो अंबेडकर पर अपना एकाधिकार ही समझती हैं। टुकड़ों-टुकड़ों में बाबा साहेब की थाती बंट गई, उनकी स्मृतियां खंडित तो नहींहैं, किंतु खंड-खंड में बांट दी गई हैं। हर टुकड़े, हर खंड का अपना राजनीतिक स्वार्थ। इससे पहले गांधी, पटेल, बोस को हम ऐसे ही राजनीतिक रूप से विभाजित होते देख चुके हैं, फिर अंबेडकर को क्यों बख्शा जाता, विशेषकर तब जबकि कुछ राज्यों में विधानसभा चुुनाव हो रहे हैं और कुछ में होने वाले हैं।
अंबेडकर जयंती के एक दिन पहले ही हरियाणा सरकार ने गुडग़ांव का नाम बदलकर गुरुग्राम करने की घोषणा की। बताया गया कि यहां की जनता लंंबे समय से इसकी मांग कर रही थी। कहा जाता है कि यहां का संबंध गुरु द्रोणाचार्य से है, इस वजह से ही इसे गुरुग्राम कहा जाता था, जो कालांतर में बदलते-बदलते गुडग़ांव हो गया। अगर ऐसा हुआ है तो इसमें कोई अचरज नहीं है। लोकवाणी में अक्सर शब्दों के उच्चारण बदल जाते हैं। हिंदी व्याकरण में तत्सम और तद्भव शब्दभेद के जरिए इसे समझा जा सकता है। गुरुग्राम गुरग्राम हुआ होगा और बाद में गुडग़ांव। संस्कृतनिष्ठ शब्द ने लोकभाषा में रूप परिवर्तन कर लिया, जो शायद धर्म और भाषा में शुद्धता के आग्रहियों को खटक रहा होगा। संस्कृत में जो लिखा है वह उच्चश्रेणी का है और क्षेत्रीय या लोकभाषा में स्तरीयता नहींहोती, ऐसी मानसिकता वाले देश में बहुत हैं। इस मानसिकता के कारण ही जाति और वर्ण व्यवस्था मजबूत होती रही है। रंगभेद और वर्णभेद की जड़ें भी यहींसे निकलती हैं। गुडग़ांव, गुरुग्राम बन जाएगा, तब भी यहां की सामाजिक, आर्थिक, कानूनी समस्याएं वही रहेंगी। उनमें तब बदलाव आएगा, जब सरकार और प्रशासन उन्हें प्राथमिकता सूची में रखेंगे। लेकिन फिलहाल यह नजर आ रहा है कि हरियाणा सरकार की प्राथमिकता नाम बदलने में है। गुरुग्राम बनाम गुडग़ांव के मुद्दे पर एक बार फिर कुलीनोंं, अभिजात्यों की जीत हुई और पिछड़े लोग पीछे ही रह गए। जबकि बाबा साहेब ने अपना पूरा जीवन इन पिछड़े लोगों को आगे लाने में ही समर्पित कर दिया।
अपनी बुद्धि, ज्ञान और राजनीतिक कौशल के बूते देश के कई सवर्ण, संपन्न नेताओं से वे आगे निकल गए, इस उपलब्धि पर घमंड करते हुए वे ठाठ से जीवन बिता सकते थे, जैसा आजकल के कई नेता कर रहे हैं। लेकिन उन्होंने ऐसा नहींकिया, वे अपने साथ-साथ दूसरों को भी आगे बढ़ता देखना चाहते थे, जाति, धर्म के आधार पर भेदभाव समाप्त करवाना चाहते थे, हिंदू धर्म की चतुर्वर्ण व्यवस्था के जाल से भारतीय समाज को मुक्ति दिलाना चाहते थे। 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने नागपुर में हिंदू धर्म की बुराइयों को पीछे छोड़ते हुए बौद्ध धर्म अपना लिया। धर्म पर अभिमान करने वालों के लिए यह आत्ममंथन का अवसर था कि वे सोचते कि बुराइयों को कैसे दूर किया जाए। लेकिन ऐसा नहींहुआ, जाति और वर्ण की दीवारें मजबूत होती रहींऔर इतने वर्षों बाद भी बरकरार हैं। बाबा साहेब अंबेडकर के बौद्ध धर्म स्वीकार करने के 60 साल बाद रोहित वेमुला की मां और भाई ने अब बौद्ध धर्म अपनाया है। रोहित वेमुला एक होनहार शोधार्थी था, दलित था और जिसने भेदभाव व उत्पीडऩ का शिकार होकर आत्महत्या कर ली थी। रोहित के नाम पर खूब राजनीति हुई, लेकिन उसे इंसाफ नहींमिला। अंबेडकर की 125 वींजयंती पर ढोल पीटने वाले क्या कभी डंके की चोट पर कह पाएंगे कि वे हिंदू धर्म से बुराइयों को खत्म करेंगे ताकि किसी इंसान का अपमान उसके जन्म के आधार पर न हो, न किसी को जाति या वर्ण के कारण अन्याय का पात्र बनना पड़े। बाबा अंबेडकर को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि तो यही होती।