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Monday 20 Nov 2017

देशप्रेम की छतरी

393 डी.डी.ए., कनिष्क अपार्टमेंट्स
ब्लाक सी एंड डी,
शालीमार बाग़,
दिल्ली-110088
अस्मिताई लेखन का अपना संसार है। कहीं खुला तो कहीं बंद और भींचा हुआ। कहानी के साथ दिक्कत यह है कि आप शोषण की बातें करते हुए कहानी को समाजशास्त्रीय विवेचन की वस्तु तो बना सकते हैं लेकिन एक कलाकृति के रूप में तब उसे नष्ट होने से नहीं बचा पाते। यह समस्या कभी जनवादी स्वरों के साथ लिखी जा रही कहानियों की भी थी। लेकिन अनेक कथाकारों ने खलनायकों और महानायकों से बचते हुए मामूली लोगों के सहारे बड़ी कहनियाँ लिखकर दिखाईं। स्त्री और दलित विमर्शों की स्थिति अलग है। वहां शत्रु आवश्यक है। यह स्थिति आंदोलन के लिए उत्साहवद्र्धक तो है लेकिन रचनाशीलता में ऐसी बातें देर तक काम नहीं आतीं। मसलन दलित को रोजगार न मिलने की स्थिति पर कहानी में अब सवर्ण को खलनायक बनाना बचकाना ही होगा। बहरहाल।
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपने कथा लेखन के उत्साही दिनों में जहाँ दलित संघर्ष और पीड़ा की कहानियाँ लिखीं वहीं दूसरी तरफ वे दलित समाज के अंतद्र्वंद्वों की कहानियां लिखने में भी सफल हुए। उन्हें समूचे दलित लेखन में बड़ा लेखक मानने का असल तर्क यहां भी देखा जा सकता है और वह है रुढिय़ों से मुक्ति। उनके कथा लेखन के आखिरी दौर की कहानी है छतरी। जिसे इन दिनों याद करना सुखद प्रतीत होता है क्योंकि राष्ट्र की घनघोर हुंकारों में एक दलित की पीड़ा का यह स्वर कोमल और मार्मिक है। कहानी एक बच्चे की है। दलित बच्चा जो स्कूल जा रहा है और पढऩे में खूब होशियार है। ऐसा कि जब राह चलते कोई उसके बापू से कहता - सुणा है तेरा लडक़ा पढऩे में बहुत हुशियार है। तो बापू का सीना ऐसा चौड़ा होता कि वे ढुलकी मूंछों को ऊपर की ओर उठाकर पैना करने लगते। और यह नेहरू जी का जमाना है जब चीन का आक्रमण हो गया है और छोटे लोग भी इससे घबराए हैं। हुआ यह कि एक दिन बारिश में इस बच्चे की किताबें भीग गई तो बापू ने सोचा कि इसे छतरी दिलवा देनी चाहिए। लेकिन कैसे? बापू के दोस्त रफू और छतरी के कारीगर शौकत चाचा से कहा गया तो उन्होंने अगले जुम्मे को एक सेकण्ड हेंड छतरी देने का वादा कर दिया। बच्चा अब छतरी का ही सपना देख रहा है -शौकत चाचा के पास से लौटते ही मैंने अगले जुमे का इंतजार करना शुरू कर दिया था। स्कूल जाने के लिए छतरी मिलेगी, यह मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी थी। हर पल छतरी ही दिमाग में घूम रही थी। मेरी छतरी कैसी होगी, यह खयाल बार-बार आ रहा था। अभी तक जितने भी लोगों के हाथ में छतरियां देखी थीं, वे सब एक-एक करके मेरे जेहन में आने लगी थीं... ये सात दिन बहुत लंबे थे, जो बहुत उद्विग्नता से कटे थे। कई बार बापू से पूछ चुका था, कैसी छतरी लाएंगे शौकत चाचा। आखिर जुम्मे का दिन आया और बच्चा दिन उगते ही दिन बीतने शाम होने की मीठी प्रतीक्षा में डूब गया। देखिये तो - सचमुच वह दिन मेरे लिए एक ऐसी खुशी लेकर आया था, जिसके लिए मैंने हफ्ता भर इंतजार किया था। जो हर पल मेरे खयालों में छाई हुई थी, हर वक्त मेरी आंखों में बसी हुई थी, अब वही छतरी मेरे हाथ में थी। छतरी काफी बड़ी थी, जिसमें लकड़ी की छड़ी और मूठ लगी थी। कपड़ा था तो पुराना ही, लेकिन काफी मजबूत दिख रहा था। छतरी पुरानी होते हुए भी इस वक्त मेरे लिए मूल्यवान थी, एक तोहफा थी। जिसे पाकर मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।
अगले रोज मैं छतरी लेकर स्कूल गया था। मैं उत्साह से भरा हुआ था। चाल में अपने आप तेजी आ गई थी। रग-रग में आत्मविश्वास भर गया था। मैं अपने दोस्तों को बताना चाहता था कि देखो मेरे पास भी छतरी है।
कहानी में स्कूल का असल दृश्य अब आता है। शनिवार का दिन है और आज स्कूल सभा है। एक तरफ कुर्सियों पर मास्टर और प्रिंसिपल बैठते थे। दूसरी ओर छात्र फर्श पर बैठते थे। इस सभा में भाषण, गीत, कविता आदि प्रस्तुत किए जाते थे। चीन-भारत का युद्ध चल रहा था। इसीलिए इस शनिवार का विषय ‘देशप्रेम’ था। बारहवीं कक्षा का छात्र विकास माखनलाल चतुर्वेदी का ‘देशप्रेम’ गीत प्रस्तुत करेगा। उसके बाद मास्टर और प्रिंसिपल भाषण देंगे। लेखक पाठकों को पीटी मास्टर गुलाब सिंह के बाद मास्टर ईश्वरचंद्र का परिचय देता है। जरा देखें - मास्टर ईश्वरचंद्र ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा को पढ़ाते थे। सांवले रंग के मोटे थुलथुल, आंखें केकड़े जैसी। जब भी बोलते तो चीख-चीखकर ही बोलते, जैसे उनके सामने खड़े सभी लोग गूंगे और बहरे हों। अकसर उत्तेजित दिखाई पड़ते थे। लोग उन्हें राष्ट्रभक्त कहते थे। जब भी मैंने उन्हें देखा जोर-जोर से बोलते, देशप्रेम की ह्रास होती भावना पर कुढ़ते ही देखा था। जब कभी अकेले होते, एक बेचैनी उनके इर्द-गिर्द दिखाई देती। सभा है तो हल्ला गुल्ला स्वाभाविक है और हल्ला गुल्ला है तो मास्टर ईश्वरचंद्र का चीखना भी स्वाभाविक है  - लडक़ों के हो-हल्ले को चुप कराने के लिए वे ऊंची आवाज में चीखे, अबे, मादर...चुप हो जाओ...वर्ना...वहीं आकर... मास्टर ईश्वरचंद्र की इस बंदर घुडक़ी का कोई असर उन लडक़ों पर नहीं हुआ था। वे अपनी मस्ती में वैसे ही डूबे रहे। मास्टर ईश्वरचंद्र का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया था। कनपटियों का रंग बदलने लगा था। नथुने फूल गए थे। वे उठकर खड़े हो गए थे। मैं और अनिरुद्ध शर्मा दीवार से सटकर बैठे थे। मास्टर ईश्वरचंद्र हमारे पास से होकर उन लडक़ों की ओर बढ़े, अचानक जाते-जाते पलटे। मेरे कंधे से टिकी मेरी छतरी पर उनकी नजर पड़ी। उन्होंने फुर्ती से मेरी छतरी झपट ली और उन लडक़ों पर पिल पड़े, जैसे कोई सेनानायक दुश्मन पर टूट पड़ता है। मास्टर ईश्वरचंद्र ने छतरी से उन लडक़ों को पीटना शुरू कर दिया। दो-तीन बार में ही छतरी बीच से टूट गई। जिसे देखकर मेरा दिल दहल गया था। मैं अवाक् रह गया था। छतरी की जो दुर्गति मास्टर ने की थी, उसे देखने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। लगा जैसे मेरे जिस्म का समूचा रक्त जम गया हो।
बच्चा जोरजोर से रो रहा है। बारहवीं का विकास माखनलाल चतुर्वेदी की कविता सुना रहा है। लेकिन मुझे उसका कोई भी शब्द सुनाई नहीं पड़ रहा था। मैं सिर्फ अपनी टूटी पड़ी छतरी की ओर देख रहा था। पूरी सभा देशप्रेम में डूब चुकी थी और मैं अपनी छतरी के तोड़ दिए जाने का मातम मना रहा था। सभा के लिए मेरी छतरी का टूटना अर्थहीन था। देशप्रेम के सामने छतरी एक नगण्य वस्तु थी। लेकिन मेरे लिए छतरी का टूटना सपनों के टूट जाने जैसा था। मैंने मास्टर ईश्वरचंद्र की ओर देखा। वह शांत मुद्रा में कविता पर झूम रहा था।
आखिर बच्चा उठकर टूटी छतरी लाता है और मास्टर ईश्वरचंद्र के सामने ला पटकता है। गुस्से में मास्टर ईश्वरचंद्र के नथुने फडफ़ड़ा रहे हैं।  सभा में राष्ट्रभक्ति पर भाषण चल  रहा है, लेकिन उनके इस तरह क्रोधित मुद्रा में देखने का मेरे ऊपर कोई असर नहीं हुआ था। मैं उसी तरह खड़ा रहा। मास्टर योगेंद्र सिंह मिश्र भारत-चीन संबंधों पर बोल रहे थे। लेकिन मुझे उनके भाषण का कोई भी शब्द जैसे सुनाई ही नहीं पड़ रहा था। मेरे कान बंद हो गए थे, जैसे किसी ने मेरे कानों में पिघला हुआ शीशा डाल दिया हो।
पहले कहानी के शिल्प पर थोड़ी बात करें। यह अनायास नहीं है कि अनिरुद्ध शर्मा बच्चे का सबसे अच्छा मित्र है जो पग पग पर उसके साथ खड़ा है। वही है जो बच्चे को रोते देखकर उसे चुप कराने का प्रयत्न कर रहा है। दलित कहानी में सवर्ण खलनायक होते हैं लेकिन सवर्ण मित्र देखने की जैसी आँख वाल्मीकि जी के यहाँ है वह सबको नसीब नहीं होती। यहाँ आकर उनकी कहानियां अस्मिताई संकरेपन से मुक्त होकर व्यापक जीवन के दुखों का बयान बन सकी हैं। पीडि़त वही नहीं है जो दिखाई दे रहा है अपितु उसके साथ अकारण पीड़ा भोग रहे मनुष्य को देखना बड़ी बात है। शौकत चाचा भी हैं जो बच्चे के पिता सुगन को सहारा देना जानते हैं। दूसरी बात है आत्मविश्वास तोडऩे की कुटिलता। समाज के वंचित लोग उठकर हमारे बराबर न आ खड़े हों और अपना हिस्सा न मांगने लगें। इसके लिए जरूरी है कि उनका आत्मविश्वास तोड़ दिया जाए। यह कहानी इस बात को भी बार-बार रेखांकित करती  बिना शोर मचाए। चौधरी मामराज का कथन सुनिए -बेकार की बात तो करे मत। इसे किसी काम-धंधे में लगा...दो रोट्टी कमाएगा...पढ़-लिख के क्या कर लेगा। न घर का रहेगा, न घाट का। और यह व्यंग्य भी -हाँ, पढ़ाओ...पढ़ाओ, इब तो तुम्हारा ही राज है...बाकी को तो नौकरियां मिलेंगी नहीं...सरकारी महकमों में तुम लोगों के लिए मेज-कुर्सियां सजा के रखी हैं...सरकार के जमाई बण गए हो...इब तो मैं भी सोच रहा हूं कि अपणे महेंद्र का हरिजन सर्टिफिकेट बणवा लूं। तहसील में अपनी ही बिरादरी का तहसीलदार बैठा है।
राष्ट्रवाद का खोखलापन कैसा होता है यह कहानी दिखा रही है। राष्ट्र। देश। युद्ध। न्यौछावर। और एक बच्चे की छतरी। यह सम्बन्ध मुश्किल लगता है। आखिर बच्चे की छतरी का देश से क्या लेना? एक तरफ महान राष्ट्र है और दूसरी तरफ एक मामूली लडक़े की पुरानी-धुरानी छतरी। यही बात समझने की है जिसे राष्ट्र के उन्माद में समझना असम्भव है। इस कठिन सवाल से पहले एक सरल सवाल पर विचार किया जाए। एक देश या राष्ट्र बनता कैसे है? जवाब है लोगों से। कल्पना कीजिये यदि भारत के समस्त निवासी अमरीका रहने चले जाएँ और एक भी भारतीय भारत में न हो। भारतीयों की जगह यहां अमरीकी रहने आ जाएँ। क्या तब भी यह भू-भाग भारत कहलाएगा? समझने की बात यही है कि देश और राष्ट्र को वहां के लोग बनाते हैं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था अगर मेरे देश का एक कुत्ता भी भूखा है तो मुझे कोई अधिकार नहीं कि मैं धर्म और ग्रंथों की बात करूं। हमारे देश के एक मासूम नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन जीने से रोका जा रहा है, उसे लांछित-अपमानित किया जा रहा है और उसके जीवन के सबसे मधुर सपने को नष्ट किया जा रहा है तब भी यह उम्मीद कर रहे हैं कि वह राष्ट्रभक्ति में डूब जाए। यह कैसे सम्भव है? और आत्मविश्वास तोडऩे का ढंग तो देखिए, पहले चौधरी साहब घुडक़ाते थे और अब मंत्री जी कहते हैं कि यूनिवर्सिटी में आए हैं और वजीफा ले रहे हैं तो पढ़ाई करें - राजनीति नहीं। राजनीति तो उनके करने की चीज है। कहानी में आई छोटी सी बात को थोड़ा व्यापक ढंग से सोचें तो आज के भारत के अनेक विवादित मसलों को समझने में मदद मिल सकती है। यह समझ आ सकता है कि कोई क्यों राष्ट्रवाद के नशे में लिथड़ा हुआ बेकार की हुंकार भर रहा है और कोई नागरिक क्यों इस जुलूस में शामिल होने से इंकार कर रहा है। एक और कल्पना की जाए यह बच्चा बड़ा हो गया है और एक विश्वविद्यालय के छात्रावास में रहकर पढ़ रहा है। आप हैं कि कभी उसकी छतरी तोड़े दे रहे हैं, कभी छात्रवृति रोके दे रहे हैं और फिर भी उम्मीद कर रहे हैं कि वह आपके साथ जुलूस में शामिल होकर हुंकार भरे। नहीं। तब वह हुंकार नहीं प्रतिकार करेगा और कहानी से बाहर आकर देखिये आज के ऐसे गुस्सैल नौजवानों में यह बच्चा दिखाई देगा।