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Tuesday 21 Nov 2017

छतरी

ओमप्रकाश वाल्मीकि

जुमे के जुमे पैठ लगती थी, जिसे ‘जुमे की पीठ’ के नाम से जाना जाता था। जिसमें रोजमर्रा की जरूरत की सभी चीजें मिल जाती थीं। गांव के बीचोंबीच यह एक तिराहा था, जिसकी एक गली मस्जिद से होते हुए आगे जाकर कई हिस्सों में बंट जाती थी। दूसरे छोर पर प्रधानों का कुआं था। तीसरा रास्ता बनिस्बत इन दोनों के ज्यादा आड़ा-तिरछा था। वह गढ़ी के सामने मंदिर तक जाकर कई गलियों में बंट जाता था। इसी तिराहे के इर्द-गिर्द जुमे के रोज यह बाजार लगता था। जुमे की नमाज के बाद इस बाजार की चहल-पहल किसी मेले-ठेले से कम नहीं होती थी। तिराहे के एक कोने में डॉ. वेदप्रकाश शर्मा का दवाखाना था, तो दूसरी ओर लज्जाराम सुनार का घर और दुकान। उससे आगे दो दुकानें बनियों की थीं और उनके सामने भड़भूंजों की।
लज्जाराम की दुकान के सामने थोड़ा सा हटकर, बाहर गली में, शौकत चाचा बैठते थे। वैसे तो वे छतरी मरम्मत करते थे। लेकिन छतरी जैसी वस्तु गांव में इक्का-दुक्का लोगों के पास होती थी। इससे छतरी मरम्मत का ज्यादा काम नहीं मिलता था। इसीलिए छतरी मरम्मत के साथ-साथ वे ‘रफूगिरी’ का काम भी करते थे। उनके हाथ में कमाल का जादू था। फटे कपड़ों में ऐसा जोड़ बैठाते थे कि देखने वाला देखता ही रह जाए। सचमुच में वे एक कलाकार थे।
उस जुमे को बापू अपनी दिहाड़ी पर जाने के बजाय, मुझे साथ लेकर शौकत चाचा की दुकान पर गए थे। दरअसल हफ्ता भर पहले स्कूल से लौटते हुए तेज बारिश में, मेरी किताबें और कॉपियां बुरी तरह भीग गई थीं। इस बात से बापू दुखी हो गए थे। जब से बापू को यह पता चला कि मैं पढऩे में तेज हूं, तो बापू मुझ पर कुछ ज्यादा ही ध्यान देने लगे थे। गांव-देहात में छोटी-छोटी बातें भी हर कोई जान लेता है। इसीलिए जब राह चलते कोई बापू से कहता-
...‘सुणा है तेरा लडक़ा पढऩे में बहुत हुशियार है...’ बापू का सीना चौड़ा हो जाता था। वे अपनी ढुलकी मूंछों को ऊपर की ओर उठाकर पैना बनाने लगते थे। घर आकर जब मां को सुनाते तो मां मुझे पास बैठाकर मेरे बालों में उंगलियां घुमाने लगती थी। उनका यही तरीका था प्यार जताने का। उस वक्त मुझे बहुत सुकून मिलता था।
शौकत चाचा से बापू की पुरानी दोस्ती थी। दुआ-सलाम के बाद बापू ने कहा, मियां, तुम्हारे रहत्ते यो तुम्हारा भतीज्जा बारिश में भीगते हुए स्कूल जाता है। पिछले हफ्ते की बारिश में यो तो भीग्या ही, इनकी किताब्बों की भी बुरी हालत हो गई। जिन्हें सुखाणे में दो दिन लगे। कोई पुरानी-धुरानी छतरी पड़ी हो तो...कम से कम किताबें तो बची रहें।
शौकत चाचा ने मेरी ओर देखा। सफेद-खिचड़ी दाढ़ी में भी उनकी मुस्कराहट भली लगी थी। कोण सी जमात में पढ़े है बेटा? शौकत चाचा ने मुझसे पूछा।
जी...आठवीं में। मैंने धीमे स्वर में कहा।
आठवीं में! शौकत चाचा ने हैरानी जताई। जैसे उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था। होता भी कैसे, उन दिनों किसी चूहड़े का बच्चा स्कूल जाने की सोच भी नहीं सकता था, यदि कोई जाने की कोशिश भी करता तो उसे स्कूल में कोई घुसने भी नहीं देता था।
देख भाई सुगन, यों तो तैन्ने ढंग का काम कर दिया है, जो लौंडे कू पढऩे भेज दिया...मैं तो कहूं जिंदगी सुधर जागी इसकी...तू फिकर ना कर, अगले जुमे को इसे छतरी मिल जागी। मेरे पास सामान पड़ा है। बस जोड़-जाड़ करके उसपे कपड़ा चढ़ाना है। आ जाइयो बेटे अगले जुमे कू...शौकत चाचा ने मेरी ओर देखकर कहा।
मियां...पैसे कितने लग जांगे... बापू ने हिचकिचाते हुए पूछा।
पैसे?...देक्खी जागी.. शौकत चाचा ने कहा।
फेर बी...मैं एक साथ तो दे नहीं पाऊंगा...दिहाड़ी मजदूरी से जो बी बचेगा...थोड़ा-थोड़ा करके दे दूंगा... बापू ने विवशता जताई।
सुगन...मैं सब जाणूं...मैं भी कोई धन्ना-सेठ तो हूं नहीं...फिर भी...यो तेरा बेटा है तो मेरा भी तो कुछ लगे है...तू पैसे की बात तो मत ही कर...बस अगले जुमे कू इसे भेज देणा। छतरी ले जाएगा...आ जाइयो बेटे...शौकत चाचा ने बहुत स्नेह से मेरी ओर देखा।
शौकत चाचा का स्नेह देखकर मुझे अच्छा लगा था। बातचीत के साथ- साथ वे अपने काम में भी लगे हुए थे। रफू करते समय उनकी उंगलियों में सुई-धागा जिस फुर्ती से घूमता था, वह हैरान कर देने वाला था। मैं गौर से उनकी उंगलियों में इधर से उधर होती सुई को देख रहा था। उनके बैठने की जगह के आधे हिस्से में धूप थी, आधे में छांव। वे छांव में बैठे थे और सामान धूप में रखा हुआ था। उनकी दाढ़ी के बाल लगातार हिल रहे थे।
शौकत चाचा ने बंडल से बीड़ी निकालकर बापू की ओर बढ़ाई, ले...बीड़ी पी.. बापू ने बीड़ी सुलगाई, शौकत चाचा ने भी बीड़ी सुलगाकर दांतों में दबा ली और रफू के काम को उसी तन्मयता से करते रहे।
डॉक्टर वेदप्रकाश शर्मा के दवाखाने में रखे रेडियो पर समाचार आ रहे थे। कई लोग दवाखाने के बाहर खड़े होकर समाचार सुन रहे थे।
सुगन पता है, चीन ने हमारे मुल्क पर हमला कर दिया है। हजारों सिपाही हलाक हुए हैं। कल रेडियो पर पंडित नेहरू बता रहे थे। हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा धरा का धरा रह गया..
बापू चुपचाप सुन रहे थे। उन्हें कुछ ज्यादा समझ में नहीं आ रहा था। फिर भी पूछ ही लिया, मियां, यहां ते चीन कितने कोस होगा?
अरे, ये रहा हिमाला परबत के उस तरफ.. शौकत ने उत्तर दिशा की ओर हाथ उठाकर इशारा करते हुए कहा।
मतबल?.. बापू ने अचरज से पूछा।
उसने हिमाला परबत पे ऐसी-ऐसी तोपें लगा रखी हैं कि उनके गोले सीधे दिल्ली में जाके गिरेंगे...शौकत चाचा ने जोर देकर कहा। बापू आंखें फाडक़र चाचा की ओर देखने लगे थे। उनके चेहरे पर आश्चर्य और भय का मिला-जुला रंग एक साथ दिखाई दे रहा था। चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं।
तब तो बम के गोले यहां भी गिर सकें...म्हारे गांव में...चौधरी की गढ़ी पे...बापू ने भयभीत स्वर में पूछा।
हां, गिर सकें.. शौकत चाचा ने उसी रौ में कहा।
तब तो यहां सबकी जान कू खतरा है? बापू के चेहरे पर पसीने की बूंदें दिखाई देने लगी थीं...।
खतरा तो है ही...जब लड़ाई होवे है तो हम जैसे गरीब-गुरबा ही तो मरते हैं... शौकत चाचा ने गंभीर होते हुए कहा।
बापू सोच में डूब गए थे। जल्दी-जल्दी बीड़ी में कश लगाकर उसे नाली में फेंक दिया और चलने के लिए उठकर खड़े हो गए।
क्यूं, डर लग रिया है क्या? फिकर ना कर म्हारी फौजें भी बहादुरी से लड़ रही हैं...उसके गोलों को यहां तक आने ही ना देंगी... शौकत चाचा ने हंसते हुए बापू से कहा।
अच्छा, ऐसा हो...रहा है... बापू ने निश्ंिचत होने की कोशिश की।
सौदा-सुलफ लेते लोगों की भीड़ से बाजार की रौनक बढ़ गई थी। आस-पड़ोस के गांव से भी ग्राहक इस बाजार में आते थे।
बापू को शौकत चाचा की दुकान पर खड़े देखकर चौधरी मामराज ने पूछा, अबे सुगन, तू यहां क्या कर रहा है?
चौधरी को देखते ही बापू गर्दन झुकाकर खुद में सिमटने की कोशिश करने लगे थे, ताकि चौधरी की टेढ़ी नजर से बच सकें। अकसर वे किसी दबंग को देखकर इसी तरह हो जाते थे। पता नहीं बापू ऐसा क्यों करते थे।
शायद चौधरियों का दबदबा ही ऐसा था, जो सभी को झुकने पर मजबूर कर देता था।
बापू ने सहमे स्वर में चौधरी के सवाल का जवाब दिया, कुछ नहीं चौधरी जी...शौकत भाई से कुछ काम था।
यो तेरा लडक़ा है, जो स्कूल में पढ़े है? चौधरी ने मुझे घूरते हुए सवाल दागा।
जी...बापू ने गर्दन झुकाए धीमे स्वर में कहा। मानो मुझे स्कूल भेजकर बापू ने कोई अपराध किया हो।
हां, पढ़ाओ...पढ़ाओ, इब तो तुम्हारा ही राज है...बाकी को तो नौकरियां मिलेंगी नहीं...सरकारी महकमों में तुम लोगों के लिए मेज-कुर्सियां सजा के रखी हैं...सरकार के जमाई बण गए हो...इब तो मैं भी सोच रहा हूं कि अपणे महेंद्र का हरिजन सर्टिफिकेट बणवा लूं। तहसील में अपनी ही बिरादरी का तहसीलदार बैठा है। चौधरी एक ही सांस में कहते चले गए।
बापू सिर झुकाए बैठे थे। चौधरी की बात वे समझ नहीं पा रहे थे। धीमे से बोले, चौधरी जी...आपकी मेहरबान्नी से दो-चार अच्छर सीख लेगा तो अच्छा है।
चौधरी के तेवर अचानक बदल गए थे, बेकार की बात तो करे मत। इसे किसी काम-धंधे में लगा...दो रोट्टी कमाएगा...पढ़-लिखके क्या कर लेगा। न घर का रहेगा, न घाट का।
बापू के चेहरे के भी रंग बदलने लगे थे, लेकिन वे संयत रहे। चौधरी की फितरत से अच्छी तरह वाकिफ थे। उनकी बात का उलट जवाब देने का मतलब था, उनको और चिढ़ाना। चिढक़र वे गाली-गलौज पर उतर आते हैं। इसीलिए बापू बात को टालने की कोशिश में थे।
शौकत चाचा ने बात का रुख बदलने की कोशिश की, चौधरी जी, कभी हमें भी खिदमत का मौका दें...हम भी आपको अपना हुनर दिखाने की गुस्ताखी करना चाहते हैं।
हवेली में आ जाना...बंडी में रफू करना है...चौधरी ने कहा।
जी, जरूर आऊंगा.. शौकत चाचा ने विनम्रता से कहा।
शौकत चाचा के पास से लौटते ही मैंने अगले जुमे का इंतजार करना शुरू कर दिया था। स्कूल जाने के लिए छतरी मिलेगी, यह मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी थी। हर पल छतरी ही दिमाग में घूम रही थी। मेरी छतरी कैसी होगी, यह खयाल बार-बार आ रहा था। अभी तक जितने भी लोगों के हाथ में छतरियां देखी थीं, वे सब एक-एक करके मेरे जेहन में आने लगी थीं...ये सात दिन बहुत लंबे थे, जो बहुत उद्विग्नता से कटे थे। कई बार बापू से पूछ चुका था, कैसी छतरी लाएंगे चाचा?
बापू मेरी मन:स्थिति को समझ रहे थे। इसीलिए एक ही सवाल बार-बार पूछने के बाद भी उन्होंने मुझे डांटा नहीं था। सिर्फ हंसकर वे भी एक ही उत्तर दे रहे थे, जब आएगी तब देख लेना।
उस रोज मेरी नींद जल्दी खुल गई थी। बापू भी उठे हुए थे। वे बाहर चबूतरे पर बैठकर हुक्का गुडग़ुड़ा रहे थे। मैंने आंखें मलते हुए कहा, बापू, आज जुमा है।
 बापू ने हंसकर कहा,याद है...शौकत चाचा से छतरी लानी है, जिब तू स्कूल से वापस आएगा...छतरी तेरे हाथ में होगी।
मैं कहना चाहता था-बापू, आज मैं स्कूल नहीं जाऊंगा...शौकत चाचा से छतरी लेने मैं भी साथ चलूंगा। लेकिन कह नहीं पाया था। बापू गुस्सा न हो जाएं, यह सोचकर चुप रह गया। स्कूल में भी छतरी मेरे मन में घूम रही थी। किसी भी पीरियड में मेरा मन नहीं लग रहा था। छुट्टी की घंटी बजने का इंतजार था। लेकिन आज का यह दिन कुछ ज्यादा ही बड़ा लग रहा था।
घंटी बजते ही, दौड़ते हुए, मैंने स्कूल की चारदीवारी पार की थी। मेरे पीछे-पीछे अनिरुद्ध शर्मा भी दौड़ते हुए ही आ रहा था। उसने पूछा, जय, आज क्या बात है?...तू इतनी जल्दी में क्यों है? क्लास में भी गुमसुम था और अब घोड़े की तरह दौड़ रहा है।
हां, बात ही ऐसी है। मैंने कहा।
क्या बात है? उसने उत्सुकता से पूछा।
कल बताऊंगा...अब तू भी जल्दी चल। मैंने कहा।
हम दोनों क्लास में भी एक साथ बैठते थे। स्कूल से घर भी साथ-साथ ही आते थे। मुझे दौड़ता देखकर वह भी दौडऩे लगा था। उस रोज सडक़ के बजाय हमने खेतों की पगडंडी का रास्ता पकड़ा था। यह रास्ता छोटा था।
घर पहुंचते-पहुंचते मेरा दिल जोर से धडक़ने लगा था। छतरी जो मिलने वाली थी।
बापू सामने चारपाई पर बैठे हुक्का पी रहे थे। छतरी उनके पास रखी थी, जिसे देखते ही मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा था। सामने ही मां खड़ी थी। मैं एकटक छतरी को देख रहा था। न बापू कुछ बोल रहे थे, न मां।
आखिर मैंने ही पूछा, बापू, यही छतरी दी है चाचा ने? मेरा कौतूहल बढ़ गया था। बापू की सिर्फ मूंछें हिली थीं। कनखियों से मेरी ओर देखा भर था। मुझे लगा जैसे उन्होंने मेरे सवाल को अनसुना कर दिया है। मां ने हंसकर कहा था, पहले बस्ता तो रखके आ जा, तबी देख लेणा अपनी छतरी। इब तो ये तेरे ही पास रहेगी।
सचमुच वह दिन मेरे लिए एक ऐसी खुशी लेकर आया था, जिसके लिए मैंने हफ्ता भर इंतजार किया था। जो हर पल मेरे खयालों में छाई हुई थी, हर वक्त मेरी आंखों में बसी हुई थी, अब वही छतरी मेरे हाथ में थी। छतरी काफी बड़ी थी, जिसमें लकड़ी की छड़ी और मूठ लगी थी। कपड़ा था तो पुराना ही, लेकिन काफी मजबूत दिख रहा था। छतरी पुरानी होते हुए भी इस वक्त मेरे लिए मूल्यवान थी, एक तोहफा थी। जिसे पाकर मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।
अगले रोज मैं छतरी लेकर स्कूल गया था। मैं उत्साह से भरा हुआ था। चाल में अपने आप तेजी आ गई थी। रग-रग में आत्मविश्वास भर गया था। मैं अपने दोस्तों को बताना चाहता था कि देखो मेरे पास भी छतरी है। अब बारिश में मेरी किताबें नहीं भीगेंगी। जब मैं घर से निकल रहा था, बापू ने हिदायत देते हुए कहा था, संभाल के रखियो, कहीं छोडक़े मत आ जाणा।
शौकत चाचा के प्रति मेरे मन में आज ज्यादा ही आदरभाव पैदा हो गया था। मैंने मन ही मन कई बार चाचा से कहा था, चाचा, आपने इतनी अच्छी छतरी दी है मुझे। मैं बहुत खुश हूं। पता नहीं मेरे ये शब्द उन तक पहुंचे थे या नहीं लेकिन मेरी छतरी का आकार देखकर स्कूल के साथियों में खुसुर-फुसर शुरू हो गई थी। मेरी ही कक्षा के लक्ष्मीकांत ने चिढ़ाने वाले अंदाज में कहा था, अबे चूहड़े के, छतरी कहां से उठा लाया?
उसके शब्दों ने मुझे भीतर तक बींध दिया था। मेरी आंखों में आंसू छलछला उठे थे। एक गहरी टीस मन में उठी थी। लेकिन उसे व्यक्त करने का साहस उस समय मुझमें नहीं था। क्षण भर को छतरी पाने की खुशी गायब हो गई थी। मुझे चुप देखकर वह जोर से खिलखिलाकर हंसते हुए अपनी जगह बैठ गया था। लेकिन मेरे भीतर जैसे कोई गर्म चीज थी जो खदबदाने लगी थी।
शनिवार को दोपहर बाद ‘स्कूल-सभा’ होती थी। यह सभा प्रिंसिपल के ऑफिस के सामने बरामदे में होती थी। एक तरफ कुर्सियों पर मास्टर और प्रिंसिपल बैठते थे। दूसरी ओर छात्र फर्श पर बैठते थे। इस सभा में भाषण, गीत, कविता आदि प्रस्तुत किए जाते थे। चीन-भारत का युद्ध चल रहा था। इसीलिए इस शनिवार का विषय ‘देशप्रेम’ था। बारहवीं कक्षा का छात्र विकास माखनलाल चतुर्वेदी का ‘देशप्रेम’ गीत प्रस्तुत करेगा। उसके बाद मास्टर और प्रिंसिपल भाषण देंगे।
घंटी बजते ही सभी कक्षाओं के विद्यार्थी बरामदे में आने लगे थे। कुछ लडक़े मस्ती के मूड में थे, जो खूब जोर-जोर से एक-दूसरे से बतिया रहे थे। पीटी मास्टर गुलाब सिंह कई बार उन्हें चुप रहने की चेतावनी दे चुके थे। लेकिन उन पर इस चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद वे फिर उसी तरह ऊंची आवाज में चिल्लाने लगे थे। प्रिंसिपल अभी तक सभा में नहीं आए थे। शोर करने वाले छात्रों की आवाज शोरगुल में बदल गई थी। अब वे एक-दूसरे के साथ धक्का-मुक्की पर उतर आए थे।
मास्टर ईश्वरचंद्र ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा को पढ़ाते थे। सांवले रंग के मोटे थुलथुल, आंखें केकड़े जैसी। जब भी बोलते तो चीख-चीखकर ही बोलते, जैसे उनके सामने खड़े सभी लोग गूंगे और बहरे हों। अक्सर उत्तेजित दिखाई पड़ते थे। लोग उन्हें राष्ट्रभक्त कहते थे। जब भी मैंने उन्हें देखा जोर-जोर से बोलते, देशप्रेम की ह्रास होती भावना पर कुढ़ते ही देखा था। जब कभी अकेले होते, एक बेचैनी उनके इर्द-गिर्द दिखाई देती।
लडक़ों के हो-हल्ले को चुप कराने के लिए वे ऊंची आवाज में चीखे, अबे, मादर...चुप हो जाओ...वर्ना...वहीं आकर.. मास्टर ईश्वरचंद्र की इस बंदर घुडक़ी का कोई असर उन लडक़ों पर नहीं हुआ था। वे अपनी मस्ती में वैसे ही डूबे रहे। मास्टर ईश्वरचंद्र का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया था। कनपटियों का रंग बदलने लगा था। नथुने फूल गए थे। वे उठकर खड़े हो गए थे। मैं और अनिरुद्ध शर्मा दीवार से सटकर बैठे थे। मास्टर ईश्वरचंद्र हमारे पास से होकर उन लडक़ों की ओर बढ़े, अचानक जाते-जाते पलटे। मेरे कंधे से टिकी मेरी छतरी पर उनकी नजर पड़ी। उन्होंने फुर्ती से मेरी छतरी झपट ली और उन लडक़ों पर पिल पड़े, जैसे कोई सेनानायक दुश्मन पर टूट पड़ता है। मास्टर ईश्वरचंद्र ने छतरी से उन लडक़ों को पीटना शुरू कर दिया। दो-तीन बार में ही छतरी बीच से टूट गई। जिसे देखकर मेरा दिल दहल गया था। मैं अवाक् रह गया था। छतरी की जो दुर्गति मास्टर ने की थी, उसे देखने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। लगा जैसे मेरे जिस्म का समूचा रक्त जम गया हो।
मास्टर ईश्वरचंद्र ने टूटी छतरी बरामदे से बाहर फेंक दी और हांफते हुए अपनी कुर्सी पर बैठ गए। मार खाने वाले लडक़े भी खामोश हो गए थे।
मैं जोर-जोर से रोने लगा था। अनिरुद्ध शर्मा मुझे चुप कराने की कोशिश कर रहा था। प्रिंसिपल के सभा में आते ही कार्यक्रम शुरू हो गया था। बारहवीं के छात्र विकास ने माखनलाल चतुर्वेदी की कविता शुरू कर दी थी। लेकिन मुझे उसका कोई भी शब्द सुनाई नहीं पड़ रहा था। मैं सिर्फ अपनी टूटी पड़ी छतरी की ओर देख रहा था। पूरी सभा देशप्रेम में डूब चुकी थी और मैं अपनी छतरी के तोड़ दिए जाने का मातम मना रहा था। सभा के लिए मेरी छतरी का टूटना अर्थहीन था। देशप्रेम के सामने छतरी एक नगण्य वस्तु थी। लेकिन मेरे लिए छतरी का टूटना सपनों के टूट जाने जैसा था। मैंने मास्टर ईश्वरचंद्र की ओर देखा। वह शांत मुद्रा में कविता पर झूम रहा था।
मेरे सीने में एक हूक-सी उठी और मैं सभा से निकलकर बाहर आ गया। अपनी टूटी छतरी को उठाकर तेजी से मास्टर ईश्वरचंद्र के सामने ला पटका। निस्तब्ध और गहरी उदासी से मेरा पोर-पोर जकड़ा हुआ था। मुझे सामने खड़ा देखकर मास्टर ईश्वचंद्र चौंका। गुस्से में उसके नथुने फडफ़ड़ाने लगे थे।
लेकिन उनके इस तरह क्रोधित मुद्रा में देखने का मेरे ऊपर कोई असर नहीं हुआ था। मैं उसी तरह खड़ा रहा। मास्टर योगेंद्र सिंह मिश्र भारत-चीन संबंधों पर बोल रहे थे। लेकिन मुझे उनके भाषण का कोई भी शब्द जैसे सुनाई ही नहीं पड़ रहा था। मेरे कान बंद हो गए थे, जैसे किसी ने मेरे कानों में पिघला हुआ शीशा डाल दिया हो।
ईश्वरचंद्र मास्टर की खूंखार आंखें मेरे बचे-खुचे वजूद को छिन्न-भिन्न करके बरामदे से बाहर फेंक देने को आतुर थीं। मेरी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। ईश्वरचंद्र की आंखें झाडिय़ों में छिपे जंगली जानवर-सी मुझे लगातार घूर रही थीं, जो किसी भी क्षण मुझ पर झपट्टा मार सकती थीं। मैं अपनी चेतना के विलुप्त होने का इंतजार कर रहा था।