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Friday 24 Nov 2017

गहरे जीवन बोध के शायर हरेराम समीप

 

महेश अश्क
372, कौशल्या कुंज
पानी की टंकी,पादरी के मकान के पास बशारतपुर
गोरखपुर- 273004  
हरेराम समीप हिन्दी के उन गज़़लकारों में हैं, जिनमें गहरे जीवनबोध के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण-संवद्र्धन की भी वाजिब और जागरूक जिम्मेदारी मिलती है। उनकी गज़़लों से गुजरते हुए शिद्दत से महसूस होता है कि उनके शेर अपनी आवाज में आशावादी स्वर की खुराक, जीते जागते व्यावहारिक जगत से ही ग्रहण करते हैं, जिसकी प्राथमिकता में घर-परिवार और उसका समूचा परिवेश सबसे ऊपर है। हरेराम समीप जी के संग्रह ‘इस समय हम’ से कुछ शेर इसी परिप्रेक्ष्य में देखने टटोलने की कोशिश करते हैं - अपना ही घर दूर निकल कर
देख रहा हूँ आंखें मल कर
शेर में मंतव्य को थोड़ा-सा कहकर बाकी को अनकहा रहने दिया गया है। यही दरअस्ल इस शेर का सौंदर्य है। क्योंकि ‘अनकहा’ रह जाने की वजह से ही शेर में अर्थ की सतह पर कई एक संभावनाएं उभर रही हैं, जो अपने आप में इस बात की चुनौती भी हैं कि हम उन्हें संज्ञान में लेते हुए, शेर के अस्ल मंतव्य को पकडऩे की कोशिश में इस तरह आगे बढ़ें कि हमारी कोशिश शेर के वाजिब अर्थ सुनिश्चित कर सकें। शेर में संभावनाओं का उभार इस प्रकार है-
1 .शेर के अनुसार, देखने वाले के लिए, घर को आँखें मलकर देखने की स्थिति तब पैदा होती है, जब वह घर से निकलकर दूर आ गया है। दूसरे शब्दों में, देखने वाला जब तक घर से दूर न था, घर को आँखें मल कर देखने की स्थिति उसके लिए न थी।
2.‘आँखें मलकर देखना’ कहने से स्पष्ट है कि देखने वाले को घर का जो स्वरूप नजर आ रहा है, वह सामान्य नहीं है। अर्थात आंखें मलकर देखने की स्थिति तभी आ सकती है, जब देखने वाले को अनूठा, अद्भुत या अप्रत्याशित स्वरूप में नजर आए।
3. घर अनूठा या अद्भुत स्वरूप का तब ही होगा, जब उसने लीक से हटकर कुछ ऐसा दिखाया हो, जिसकी सामान्यत: उससे कल्पना या उम्मीद न की गयी हो।
अब अगर बात सिर्फ इस वजह से अनूठा या अद्भुत दिखने की है, कि घर ने कोई उपलब्धि हासिल कर ली हो, या लीक से हटकर कोई सकारात्मक कारनामा कर दिखाया हो, तो उसे आँखें मलकर देखने के लिए, उससे निकलकर दूर जाने का औचित्य क्या है? क्योंकि उपलब्धि या कारनामा तो घर में रहते हुए भी, यानी घर से दूर गए बिना भी महसूस होगा, दिखाई देगा।
यहाँ पर आकर बात फँस जाती है, यानी अनूठेपन की वजह अगर उपलब्धि या कोई सकारात्मक कारनामा मानें, तो यह हमें शेर का अस्ल मंतव्य समझने की दिशा में आगे नहीं ले जा रहा है, इसलिए हमें किसी और संभावना की तरफ बढऩा चाहिए।
4 .आँखें मलकर घर को देखने की एक स्थिति है कि, घर ने कोई सकारात्मक उपलब्धि हासिल नहीं की, और न ही ऐसा कोई कारनामा किया, जिससे सिर ऊँचा हो, बल्कि हुआ यह कि घर को जिस सकारात्मक दिशा में ले जाने के लिए अथक प्रयास किया गया, घर उसके ठीक विपरीत दिशा में विकसित हुआ, जिसका अंदाजा देखने वाले को तब हो रहा है, जब वह घर से निकलकर दूर आ गया है। अब जब घर का यह अवांछित और अप्रत्याशित स्वरूप उसकी आँखों के सामने है, तो वह उस पर विश्वास नहीं कर पा रहा है, और आँखें मलकर उसे बस देखे जा रहा है।
इस चौथी संभावना में शेर जो कुछ कहता है वह उसकी कथन भंगिमा को देखते हुए उसके मंतव्य के तार्किक रूप से करीब बैठता है और इसकी पुष्टि हरेराम जी के एक और शेर से भी होती है, मजे की बात यह है कि इस शेर में भी घर से दूरी की बात कही गयी है, ‘आँखें मलकर’ वाले शेर से इस शेर का फर्क सिर्फ यह है कि इसमें घर से दूरी की वजह लगभग बयान कर दी गयी है और इससे पहले वाले शेर में यह बयान नहीं है। शेर इस प्रकार है -
घर से अब दूर दूर रहता हूँ
ख्वाहिशों का बड़ा है कारोबार
किसकी ख्वाहिशों का कारोबार बड़ा है, यह स्पष्ट नहीं किया गया है, नतीजन ‘ख्वाहिशों का कारोबार बड़ा है’ का टुकड़ा दोनों तरफ के लिए कारगर समझा जा सकता है, अर्थात हम कह सकते हैं कि शेर का कथनकर्ता स्वयं, संसाधन कमाने के कारोबार में स्वयं को इस कदर संलिप्त किए हुए है कि वह अपने घर वालों को, आश्रितों को अपेक्षित समय नहीं दे पा रहा है, लिहाजा खुद को घर से कटा-कटा या दूर-दूर तस्लीम कर रहा है।
दूसरी स्थिति यह हो सकती  है कि कथनकर्ता घर से दूर नहीं है, वह घर पर ही है, घर के अन्य सदस्यों के साथ है, लेकिन घर में उसके अलावा जो लोग हैं, उनकी ख्वाहिशें जरूरत से ज्यादा बड़ी हुई  हैं। वे फिजूलखर्च किस्म के लोग हो गए हंै और कथनकर्ता जिस पर घरवालों के भरण पोषण का, हो सकता है दायित्व हो, एड़ी चोटी का जोर लगा कर भी, न तो उन्हें संतुष्ट कर पा रहा है, और न ही अपनी ख्वाहिशें कम करने की तरफ मोड़ पा रहा है। ऐसी स्थिति में कथनकर्ता की दिलचस्पी अपने घरवालों में लगातार कम होती जा रही है या बिल्कुल कम हो गयी है, जिसे शेर में वह ‘घर से दूर दूर रहता हूँ ’ कहकर व्यक्त करने की कोशिश कर रहा है, यहाँ ‘घर से दूर दूर रहने’ का मतलब घर के लोगों की तरफ से भावनात्मक रूप से दूर होना हो जाता है, और शेर का यह अर्थ ‘आँखें मलकर’ वाले शेर की अंतिम निष्पत्ति को बल प्रदान करता है। घर के परिवेश से जुड़ा और अर्थ का प्राय: इसी तरह का आस्वाद रखने वाला उनका यह शेर भी पढऩे और सोचने के लिए उकसाता है -
सादगी अब हो गई घर का पुराना रेडियो
जिसको दादाजी चलाए शून्य में खोए हुए
शेर में यथार्थ के दो स्तरों की बात एक साथ कही जा रही है। इनमें एक तो दादाजी, सादगी और घर का पुराना रेडियो वाला है, जबकि दूसरा यथार्थ उन लोगों का है जो रह तो उसी घर में रहे हैं, जिसमें दादाजी हैं, लेकिन उनकी दुनिया, दादाजी की दुनिया से एकदम अलग, एकदम बेमेल है। इन लोगों की घर में मौजूदगी को शेर ‘घर का’ कहकर और दादाजी का उल्लेख करके, उसके जरिए दर्शा रहा है। यहाँ अलग से शायद यह स्पष्ट करने की जरूरत न हो कि दादाजी अगर पुराने मूल्यबोध के प्रतीक हैं, तो उनसे अलग दुनिया में जी रहे घर के बाकी लोग नये मूल्यबोध का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
शेर के कथन के अनुसार दादाजी शून्य में खोये हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद वह रेडियो ‘ऑन’ कर ले रहे हैं, इससे स्पष्ट है कि दादाजी का शून्य में खोया हुआ होना, ‘कोमा’ में चले जाने जैसे कोई स्थिति नहीं है, इसलिए समझा जा सकता है कि दादाजी अपने आप में संज्ञाशून्य नहीं हुए हैं बल्कि वह सचेत हैं, बात सिर्फ यह हो सकती है कि घर में उनके अलावा जो लोग हैं, दादाजी ने उनकी गतिविधियों की तरफ से अपनी आँखें बन्द कर ली हैं, या मुँह मोड़ लिया है, वह उन्हें किसी बात के लिए रोक-टोक नहीं रहे हैं, उनके काम में कोई हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं। यहाँ हम यह कह सकते हैं कि दादाजी का यही हस्तक्षेप न करना, सीधे सीधे न रोकना-टोकना, अपना मुंह हमेशा के लिए उनके मामले में बन्द कर लेना, ऐसी स्थिति है जिसे शेर में उनके शून्य में खोये हुए होने के रूप में व्यक्त किया गया है।
शेर के कथन पर थोड़ा और गौर करें तो यह बात भी सामने आती है कि दादाजी रेडियो चला जरूर रहे हैं लेकिन उससे लुत्फंदाज नहीं हो रहे हैं, दूसरे शब्दों में रेडियो ‘ऑन’ है लेकिन दादाजी उसमें ‘इन्वाल्व’ नहीं हो रहे हैं। इन बिन्दुओं को निगाह में रक्खें तो शेर से यह भी ध्वनित हो रहा है कि , दादाजी, रेडियो अपने लिए चला नहीं रहे हैं बल्कि वह रेडियो इसलिए ऑन कर रहे हैं कि वह इसके जरिए घर के अन्य लोगों को यह एहसास कराना चाहते हैं कि - देखो, अपनी नासमझी में तुम लोगों ने जिस चीज को यानी रेडियो या सादगी को पुरानी और आउटडेटेड या अप्रासंगिक कहकर चलन से बाहर करार दे रक्खा है, काम तो वह अब भी कर रहा है, यानी प्रासंगिक तो वह अब भी है। यहाँ दादाजी का रेडियो चलाना और उसमें ‘इन्वाल्व’ न होना, पुराने मूल्यबोध की तरफ से नए मूल्यबोध के खिलाफ अस्वीकार के रूप में एक प्रतिरोधी कारवाई बन जाता है। खूब शेर है, इसकी तह में थोड़ा और जाएँ तो अर्थसंदर्भों की मार्मिकता में और भी इजाफा हो सकता है।
उनके एक और शेर पर नजऱ डालते हैं जो इस प्रकार है -
तेरहवीं के दिन बेटों के बीच बहस बस इतनी थी
किसने कितने खर्च किए हैं अम्मा की बीमारी में
आत्मीय रिश्तों का लगातार छीजते जाना और उसके नतीजे में स्वार्थ परायणता का हावी होते जाना, हमारे युग की जैसे पहचान है। यह शेर अत्यंत मार्मिक ढंग से इसी त्रासदी पर हमारा ध्यान केन्द्रित करता है। तेरहवीं के दिन बेटों की नजर में यह महत्वपूर्ण नहीं रह गया है कि मां चल बसी, उन्हें अपने अपने फायदे की पड़ी है और हुज्जत या बहस का मुद्दा यह बन गया है कि बीमारी के दिनों में मां पर किसने कितना अधिक पैसा खर्च किया। निहितार्थ यह है कि जिसका सबसे अधिक पैसा खर्च होना साबित होगा, मां की विरासत में यानी रुपया पैसा, जेवर अथवा अन्य प्रकार की सम्पत्ति में उसकी हिस्सेदारी का उतना ही अधिक हक होगा। यानी उसे ‘क्षतिपूर्ति’ का उतना ही बड़ा हिस्सा हासिल हो सकेगा। अर्थात तेरहवीं का दिन मां की आत्मा की शान्ति के लिए कुछ करने का मौका न होकर बेटों के लिए अधिक से अधिक ‘क्षतिपूर्ति’ हथियाने की अर्हता हासिल करने की प्रतियोगिता बन गया है।
दूसरी स्थिति यह हो सकती है कि मान लिया जाय कि मां अपने पीछे फूटी कौड़ी भी नहीं छोड़ गयी, तब भी शेर बेटों की जिस हृदयहीनता की बात कर रहा है, उसमें उनकी बहस इसलिए भी जारी रह सकती है कि भले ही पैसा कौड़ी मिलने की गुंजाइश न हो, घर मोहल्ले में यह शोहरत ही क्या कम माने रखेगी कि लोग कहें, फलाँ के इतने बेटों में, एक यही थे जिन्होंने अपनी मां के लिए कुछ भी उठा नहीं रक्खा, और अंतिम दिनों तक उनकी खूब-खूब सेवा की। इस प्रकार यह शेर भी मौजूदा जीवन शैली पर एक तीखी व्यंग्यात्मक टिप्पणी बन जाता है। समीप का अगला शेर भी हृदयहीनता की इसी भावभूमि पर खड़ा महसूस होता है, शेर यूँ है-
बस इसलिए कि जश्न में पड़ जाए न खलल
माँ चल बसी, ये दाब रखी है खबर अभी
हरेराम समीप की खासियत यह है कि वह अपना कथ्य हमारी व्यवहारिक जिन्दगी के ऐसे ही मार्मिक संदर्भों से उठाते हैं और शेर कहने के अपने कौशल से उसे दो मिसरों में ढाल कर ऐसा चमका देते हैं कि उनका कहा हुआ, हमारी रोजमर्रा दुनिया का एक देखा हुआ, भोगा हुआ यथार्थ बन कर हमारे सामने आता है और हमें अपनी गिरफ्त में ले लेता है ।
समय के अनुरूप खुद को ढालने की मौजूदा दौर में हमारी जो विवशता है, और जब हम खुद को वक्त के खाँचे में बैठने लायक किसी हद तक बना लेते हैं और वहाँ से जब पीछे मुडक़र देखते हैं तो खुद को किस दर्जा कचोट की स्थिति में और ठगा हुआ पाते हैं, ये दोनों विषय भी हरेराम जी के कलम से टकराए हैं। इस तरह के कुछ शेर ये हैं -
वक्त के इस शार्पनर में जिन्दगी छिलती रही
मैं बनाता ही रहा इस पेंसिल को नोकदार
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घर में, दफ्तर में, सफर में, देखकर हालात मैं
रोज अपने आप को छोटा बड़ा करता रहा
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साथ चलने से दिल बहलता है
हम सभी राहगीर जैसे हैं
बहार आई तो इस बार भी यही होगा
हमारे हाथ में कागज के फूल आएँगे
इन और इन जैसे उनके और शेरों की रोशनी में समझा जा सकता है कि समीप जी का शायराना मिजाज हमारे समय और समाज की जानी पहचानी चिन्ताओं को घेरते हुए जिन्दगी के विभिन्न पहलुओं को शेर में आकार देने की कोशिश करता है। वह समाज की बहुसंख्य आशाओं अभिलाषाओं की आवाज की विश्वसनीय तस्वीर पेश करने की हरचन्द कोशिश करते हैं और शेरों में इस दृष्टि से, जहां बात बन जाती है, वहाँ उनके शेर हमारी जिन्दगी के साथ कदम से कदम मिला कर आगे बढ़ते हैं।
हरेराम समीप अपने लेखन में न तो अतिशय बौद्धिकता का गुँजलक पैदा करते हैं और न ही अपनी कविता को सपाट या सतही होने देते हैं। शायरी में उनका यह एप्रोच भी सराहनीय है। अपने संग्रह ‘इस समय हम’ में हरेराम समीप ने कुछ प्रयोग करने की भी गज़़ल की सतह पर कोशिश की है। संकलन में शामिल एक मात्र ‘बाल गज़़ल’ उनके इसी प्रयास का उदाहरण है, नख शिख से दुरुस्त इस गज़़ल में बाल मनोविज्ञान की भी अपनी सूक्ष्म पहचान पकड़ का पता हरेराम जी देते हंै, जिसे इस बाबत एक शुभ संकेत समझना चाहिए।
इन पंक्तियों के साथ मैं कह सकता हूँ कि हरेराम जी के इस संग्रह से यह उम्मीद बँधती है कि उनका लेखन और भी रफ्तार पकड़ेगा और भविष्य में उनसे और अच्छे, और मुकम्मल शेर सुनने पढऩे को मिलते रहेंगे। ठ्ठ