Monthly Magzine
Monday 20 Nov 2017

जीवन का चक्रव्यूह

रमाकांत श्रीवास्तव
एल.एफ-1, कनक स्ट्रीट
ई-8/218, त्रिलंगा, भोपाल-462039
मो. 9977137809
‘स्वागत अभिमन्यु’ ओम भारती की दस कहानियों का संग्रह है। कविता और आलोचना के अतिरिक्त ओम भारती ने कहानियां भी लिखी हैं। सातवें-आठवें दशक में लिखी गई उनकी कहानियां ही इस संकलन में हैं। मुझे लगता है कि रचना पर बात करते समय उसके रचनाकाल और प्रकाशन वर्ष का, अथवा उस गुजरे वक्त को दृष्टिपथ में रखने से अधिक आवश्यक यह है कि देखा जाय कि रचना अपने समय को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्त कर सकी है या नहीं। कथ्य की जिस पृष्ठभूमि को लेखक ने चुना है उस देश-काल के आदमी की समस्याओं से वह रू-ब-रू हो सका है या नहीं? उन समस्याओं को देखने-परखने का उसका नजरिया क्या है? अपने चित्रित देश-काल में वह रचना में पक्ष-विपक्ष को किस तरह परिभाषित कर रहा है? ओम भारती अपनी कहानियों में जिस समय के मनुष्य के संघर्ष को आधार बना रहे हैं वह देश के औद्योगिक पूंजीवाद का समय था जिसने विषमता और शोषण की व्यवस्था को मजबूत बनाया था और आधुनिकता तथा विकास की भ्रमपूर्ण परिभाषाएं निर्मित की थीं। इस समाज व्यवस्था में आदमी का अकेलापन पहले से कहीं अधिक बढ़ रहा था।
साहित्य लेखन में कमलेश्वर ने देश के आम आदमी के त्रास और संघर्ष को चित्रित करने का नारा दिया था। हिन्दी के कई कथाकारों ने इसे गंभीरता से लिया था लेकिन जल्दी ही वह जज़्बा एक रुढि़ बन गया। उस समय के रचना परिदृश्य को ओम भारती ने अपने संकलन की एक कहानी ‘ऐसा है, बड़े भाई!’ के एक पात्र के माध्यम से चित्रित भी किया है। कहानी में नैरेटर पात्र के रूप में लेखक कहता है- ‘उन दिनों हम लेखक मित्रों के रूमानी साहित्य पर वैश्विक मंदी का संकट घिरना शुरू हो चुका था, और करमचंद चौक वाले इंडियन कॉफी हाउस में बैठकर हम लोग आम आदमी वाला फार्मूला अपनाने के बारे में गंभीरता से सोचने लगे थे। स्तरीय बताई जाने वाली कथा पत्रिकाओं में आम आदमी के इर्द-गिर्द घूमने वाली चालू कहानियां की भरमार थी। राजकुमारों के प्रेम प्रसंगों तथा शहजादों की मुहब्बत की सदाबहार दास्तानों से भी अधिक गर्मी अब हमारी बिरादरी वालों को मध्य वर्ग के बेडरूमों में न•ार आने लगी थी। हमारा ख्याल था कि ‘मध्यवर्गीय गृहस्थी’ की बखिया उधेडऩा ही हमारा प्रमुख रचना धर्म होना चाहिए।’ ध्यातव्य है कि समान्तर आंदोलन के इस चित्रण में व्यंग्य भाव है। कहानी की अंतर्वस्तु पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि यह कहानी एक छोटे आदमी की सामाजिक समझ और उसके संघर्ष को रेखांकित करती है। कहानी का नैरेटर पात्र तो मध्यवर्गीय है लेकिन केन्द्रीय पात्र बिहारी, जिसे नैरेटर, जो स्वयं लेखक है, अपना ‘पहला शिकार’ मानता है जिस पर वह भविष्य में कहानी लिख सकेगा। बिहारी मध्य वर्ग का भी नहीं है वह गली में स्थित अपनी छोटी-सी दुकान से  गुजर-बसर करता है। जब लेखक का उससे परिचय हुआ तो उसे कुछ यूं अनुभव  हुआ- ‘मैंने पाया कि उसमें हमारे समसामयिक साहित्य का आम आदमी बनने की अर्हता ही नहीं है। न तो वह ठंडे, नाकाम या नपुसंक क्रोध वाले व्यक्ति निकले और न ही उनमें महिमा मंडनीय लिजलिजापन था।’ अपनी गरीबी के बावजूद बिहारी, साहस के साथ सट्टेबाजों के खिलाफ खड़ा होता है। वह अपने परिचितों को सट्टा खेलने से मना करता है। परिणाम स्वरूप सट्टा खिलाने वाले सेठ की नाराजगी मोल लेता है लिहाजा वह सट्टा वाले सेठ के गुर्गों से पिटता है। इतना ही नहीं षड्यंत्र रचकर उसे ही सट्टा खिलाने के आरोप में पुलिस पकड़ लेती है। बिहारी भैया के चरित्र को अस्वाभाविक बनाए बगैर लेखक व्यवस्था की चालाकी और भ्रष्टाचार को उसके माध्यम से प्रस्तुत करता है। बिहारी का कथन है- ‘हमारे पिता कहते थे, जब राजकुमार और शहजादे एक ऐयाश आजादी के लिए हथियार उठाते हैं तो उसे क्रांति और बगावत कहा जाता है, मगर आम दरबारी अगर अपनी रोटी-छाप आजादी के लिए हथियार उठाता है तो उसे दंगा-फसादी और अमन का दुश्मन जैसे फतवों से कुचल दिया जाता है।’ सरकार बदलना काफी नहीं है, बिहारी भैया ‘असली दुश्मन की पहचान’ के कायल हैं।
संकलन की कहानियों का मूल स्वर समाज के छोटे आदमियों के भीतर जागृत स्वाभिमान की भावना और व्यवस्था से उनकी असहमति को, व्यक्त करना है। ‘स्वाभिमान’ कहानी की रघ्घो, ‘सावन भादो की धूप’ का वर्मा, ‘पुरजा’ का साक्षात्कार के लिए आया अनाम प्रत्याशी, ‘नारियल ना रियल’ का ठेलेवाला रामलाल, ‘मगर एक दिन’ का कथानायक ‘वह’ अपने-अपने अलग चेहरों के बाद भी सोच में ऐसे पात्र हैं, जो विषम परिस्थितियों में फंसे उस आदमी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसके भीतर धुंधआता हुआ गुस्सा है। ये पात्र विद्रोह तो करना चाहते हैं लेकिन अपनी आर्थिक-दरिद्रता में फंसे हुए हैं। वे व्यवस्था की तलछट में हैं जहां असहमति को अपने भीतर ही जज्ब करके जीने के लिए संघर्ष करना ही उनकी नियति है।
गली में रहने वाली रघ्घो श्रमजीवी वर्ग की है। जिसकी मैत्री शील से हो जाती है जो खाते-पीते मध्य वर्ग की है जिसका परिवार गली के एक मकान में किराएदार बनकर आ गया है। शील और उसके भाई-बहन का रघ्घो से व्यवहार दोस्ताना है। शील अपने प्रेमी के साथ भाग जाती है तो सदाशयतावश रघ्घो शील के घर जाती किन्तु शील की मां जैसे उसकी औकात उसे बतलाते हुए कहती है- ‘पानी, बरतन, कपड़े-झाड़ू और कुछ ऊपरी काम कर देना, दस रुपया दिया करूंगी महीने के। ऊपर कुछ खाने-वाने को तो निकलता ही है घर में।’ सन्न रह गई रघ्घो से वह आगे कहती है- ‘वैसे तो मैं नौकर लगाती नहीं, पर तू कुछ भरोसे की दिखती है। ईमानदारी से, घर जैसा समझकर अच्छा काम करेगी तो फिर बढ़ा दूंगी तेरी तनख्वाह।’
दरअसल ओम भारती की कहानियों में यह सामाजिक सत्य उभरकर सामने आता है कि मध्य वर्ग में छोटे लोगों के प्रति एक विरक्ति भरा व्यवहार करके अपने को महत्वपूर्ण समझने की मनोग्रंथि भी है क्योंकि उसके जैसा होने के लिए जिन अकूत साधनों की जरूरत होती है वह उसके पास सपने में भी नहीं हो सकते। नतीजा यह कि वह उनकी भोंडी नकल भर कर पाता है। रघ्घो जैसे बेबस लोग मन ही मन अपमान का घूंट पीकर रह जाते हैं पर प्रतिकार में कुछ कर नहीं पाते। रघ्घो की इच्छा भी होती है कि वह शील की मां से कहे- ‘तू हमको ट्यूशन पढ़ाएगी, बोल?’ ओम भारती अपनी कहानियों में रचे पात्रों के माध्यम से स्वाधीनता प्राप्ति के बाद के भारतीय नागरिक के अंतर्मन की उन लहरों को पकडऩे का प्रयास करते हैं जो असंतोष से उपजी हैं। छोटे समझे जाने वाले लोग पूरी तरह पराश्रित हैं। यह रेखांकित किया जा सकता है कि सातवें-आठवें दशक की स्थितियां इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भी बदली नहीं है। विषमता बढ़ी ही है। आज भी वैसा ही अभाव, त्रास और अपनी विवशता पर गुस्सा है।
‘नारियल ना रियल’ कहानी में बरफ की चुस्की बेचने वाला रामलाल भी रघ्घो की तरह नाराज पात्र है। ठेले पर बर्फ बेचकर जीवन चलाने वाले रामलाल के वश में, महंगाई के कारण सब्जी खरीदना संभव नहीं है (आज के विकास के मॉडल में भी हाल वही है) तो वह मंगूमल की दुकान पर नारियल खरीदने जाता है जहां उसकी हैसियत स्वागत योग्य ग्राहक जैसी नहीं है। यह पूछे जाने पर कि उसे नारियल पानी वाला चाहिए या सूखा? यह कहता है- ‘पानी अब आदमी में नहीं रहा... तो बड़ी-बड़ी बूच वाला..अपने कडिय़ल हालात जैसा नारियल। आज कुछ खाऊंगा नहीं, नारियल फोडक़र ही रहूंगा... मगर।’ इस ‘मगर’ के पीछे तंज और आत्मपीड़ा के साथ कुछ न कर पाने का गुस्सा भी है।
‘सावन भादो की धूप’ का पात्र वर्मा एम.ए. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करके एक कार्यालय में अस्थायी डेलीवेजर की श्रेणी में नौकरी पर है। बड़े बाबू के अंगूठे के नीचे वह अपने को अपमानित अनुभव करते हुए समय गुजारता है। यह हमारी समाज व्यवस्था का विद्रूप है कि कर्मचारियों से काम पूरा लिया जाता है किन्तु उन्हें स्थायी नौकरी नहीं दी जाती। उल्टे, उनसे हस्ताक्षर अधिक भुगतान की राशि पर लिए जाते हैं लेकिन वास्तविक भुगतान कम किया जाता है। बड़े बाबू, छोटे बाबू जैसे लोग अपने ही वर्ग के लोगों का शोषण बिना किसी लज्जाभाव के करते हैं। ऐसी परिस्थिति में जब वर्मा को अपने अस्तित्व का बोध कराने की इच्छा होती है तो वह बड़े बाबू से कहता है- ‘क्या कहा वर्मा? बदतमीज! बात करने का ढंग सीखो बड़े बाबू, मिस्टर वर्मा कहो, मिस्टर वर्मा। तुम्हारे बाप का नौकर नहीं हूं।’ जब उसकी उत्तेजना का लावा फूटा तो वह पेपरवेट उठाकर बड़े बाबू के सिर पर मार देता है। एक पेपरवेट वह बड़े बाबू के चमचे पांडे की ओर भी फेंकता है जो मस्टररोल पर डेलीवेजर्स के दस्तखत लेता है। एक अन्य कहानी ‘मगर एक दिन’ का परेशान कथानायक अपने बॉस के मरने पर दुखी नहीं होता। वह इस सत्य से परिचित है कि उसी कुर्सी पर पुराने बॉस जैसा ही दूसरा भ्रष्ट सरकारी अफसर आकर बैठेगा। उस पात्र की मानसिकता उसके अमानवीय या कठोर हृदय होने की परिचायक नहीं है बल्कि बेईमान समाज के दुष्चक्र में फंसे आदमी की सहज प्रतिक्रिया है। मानवीय संबंधों को जूते की नोंक पर रखने वाले बेईमानों से कैसे आत्मीय संबंध हो सकते हैं। भला, उनके लिए दुखी क्यों हुआ जाय जो स्वयं दूसरों के दुख के कारण हैं! यह हमारे सामाजिक जीवन में व्याप्त सहज संवेदना का हृास है।
मध्यवर्गीय खोखलेपन के मनोविज्ञान को ओम भारती अपनी कहानी ‘पुरजा’ के माध्यम से व्यक्त करते हैं। ब्रिटिश शासनकाल में जो बॉसिज्म था उसका स्वाधीन भारत में भी, नौकरशाही ईमानदारी से पालन करती है। अंग्रेज अधिकारी नौकरी के इच्छुक ‘ब्लडीनेटिव’ को कागज का पुर्जा पकड़ाकर कहता है- इसे जोर से पढ़ो फिर अपनी मदरटंग में इसका अनुवाद करो।  प्रत्याशी को पढऩा पड़ता- आइ एम ए डंकी। आइ एम सन ऑफ ए डंकी। इसी पद्धति से अधिकारी बने कथानायक ने गंभीरता से अपनी कार्यपद्धति का सूत्र बनाया। अपने को गधा मानने वाले अधिकारी की स्वीकारोक्ति इस तरह है- ‘वैसे बताया न, अफसर हूं। प्रोबेशन ऑफिसर। उस जमाने का, जो अब नहीं रहा। मैं तो कहता हूं अंधा युग है, आज भी है। रहेगा। जब तक मुझ जैसा एक भी बचा है। अंधा युग रहेगा। और माफ कीजिए, मेरे वक्त में तो मेरी ही प्रजाति के लोग भर्ती किए जाते थे। कमोबेश अब भी वही-ढर्रा, बदले कौन? यह नौकरशाही का वह पुर्जा है जो अपने मातहतों में वैसा ही गधा चाहता है जैसा उसे बनने के लिए बाध्य किया गया था। जब वार्डन पद के लिए वह साक्षात्कार लेता है तो हर प्रत्याशी से कहता है- ‘बोलो मैं गधा हूं।’ साक्षात्कार के बाद जब वह बाहर आता है, और चयनित ना होने वाले प्रत्याशी को देखता है जिसने ‘मैं गधा हूं’ बोलने से साफ इंकार कर दिया था तो वह आतंकित हो जाता है। उसे स्वयं महसूस होता है- ‘क्या इस व्यवस्था का पुरजा होकर मैं इतना अमानवीय हो गया हूं। क्या मैं खुद ही बुरी तरह नहीं घिरा हुआ हूं।’ लेखक का इंगित यह भी है कि हर समय की युवा पीढ़ी के स्वभाव में दब्बूपन नहीं होता। असफलता उसकी नियति है। स्वाभिमान उसका सहज गुण है। वस्तुत: यह मनुष्य होने का लक्षण है। यदि हम इस प्रसंग को फैलाकर देखें तो जिस पात्र ने अंग्रेज अफसर के सामने समर्पण करके कहा- ‘मैं गधा हूं’ उसी के काल में युवा पीढ़ी आजादी की लड़ाई भी लड़ रही थी। लडऩे वाला अपना स्वाभिमान बचा लेता है, समर्पण करने वाला मनोरोगी भी हो जाता है। बेईमान व्यवस्था में समझौतापरस्त आदमी पुरजा ही नहीं पशु (वह भी ‘गधा’) बन जाता है। समय बदलता है किन्तु यह सत्य नहीं बदलता। विवशताएं हैं किन्तु तासीर में परिवर्तन नहीं हुआ है।
इस तासीर में स्थितियों से जूझने की उम्मीद भी भरी होती है। संकलन की शीर्षक कहानी ‘स्वागत अभिमन्यु’ कहानी में लेखक इस ओर इशारा करता है। नहर बनाने के लिए साधारण किसान की उपजाऊ जमीन इसलिए ले ली गई ताकि सरपंच की जमीन का अधिग्रहण न किया जाए। सरपंच राजनैतिक दलों के वोट बैंक की चाबी है। जिसकी जमीन छिनी, उसे मुआवजा जरूर मिला लेकिन उसकी व्यथा है- ‘अभी तक गरीब था, पर किसान तो था भइया, अब भीख मांगने वाला हो गया, समझो।’ संकलन की इस शीर्षक कथा को दो बिन्दुओं के माध्यम से देखना उचित होगा। किसान और जमीन के संबंध गहरे होते हैं। उन संबंधों के कितने ही रूप हैं जो साहित्यिक कृतियों में चित्रित होते रहे हैं। प्रेमचंद की रचनाओं में ही होरी, गोबर, हल्कू के खेती के विषय में भिन्न दृष्टिकोण हैं। भारत में किसान, किसान ही रहना चाहता है, यह हजारों साल का उसका संस्कार है जो आज भी उसकी चेतना में शेष है। आज के दौर में सरकारी नीतियों के कुचक्र में फंसे किसान आत्महत्या कर रहे हैं। उसके पीछे उनकी यह वेदना भी है कि वे अपनी आत्मा से जुड़े कर्म में सफल होने की आशा छोड़ चुके होते हैं। ‘स्वागत अभिमन्यु’ के ‘बब्बा’ की व्यथा ठेठ भारतीय प्रकृति की है। अभिमन्यु का शहर जाना महाभिनिष्क्रमण है जिसमें जीने की तलाश छिपी है। कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण बिन्दु उसकी जिजीविषा है जो उसके कथन ‘अपन लड़ेंगे भइया। लड़ेंगे अपन। शहर तो कह रहा है ‘स्वागत अभिमन्यु।’ कौन सा संवेदनशील पाठक होगा जो अभिमन्यु की जीने की इच्छा के साथ नहीं होगा किन्तु उसकी नियति से परिचित नहीं होगा! अभिमन्यु का स्वागत करने वाले शहर में अभिमन्यु का प्रवेश महाभारत की कथा का दुहराव भी हो सकता है।’
‘गति’ कहानी को इस संकलन की विशिष्ट रचना के रूप में रेखांकित किया जा सकता है। दलित वर्ग की व्यथा हमारे सामाजिक इतिहास की विराट पीड़ा  है किन्तु किसी भी साधनहीन विपन्न मनुष्य का जीवन संघर्ष भी इतिहास की पीड़ा है भले ही उस पीड़ा की निमित्त में उसी वर्ग का हाथ है जिस वर्ग का कथानायक है। सिंचाई विभाग के इंजीनियर एस.डी.ओ. को अपने परिवार के पुरोहित पंडित बालमुकुंद बाजपेयी कथावाचक, गीत रत्न, साहित्याचार्य, ज्योतिर्विद से अर्से के बाद मिलने पर उनकी दशा इस तरह दयनीय लगी। ‘आधी बांह के कुर्तानुमा बनियान में उनकी दुर्बल देह पंडिताइन के किचन की दयनीय दुरवस्था का खुला भाष्य थी। मुझे लगा कि मेहनतकशों की भूखों भरती जमात में वे भी कहीं खड़े हैं।’ पंडित जी इतिहास के उस दौर में हैं जहां उन्हें परंपरा से मिली जीवन पद्धति और ज्ञान किसी काम के नहीं रहे, दरिद्रता के उपरांत संस्कार से मिला स्वाभिमान या कहें जातिगत अभिमान भी आत्मा की किसी भीतरी सतह में गतिशील है अत: पुरोहिती छोडक़र मजबूरी में स्टोर कीपरी करने पर भी किसी का जूठा गिलास धोना उन्हें गवारा नहीं। लेकिन वही पंडित जी नौकरी छोडक़र मजदूरी करने लगते हैं। कथा के प्रमुख पात्र इंजीनियर साहब देखते हैं- ‘पंडित बालमुकुंद बाजपेयी अपने दुबले-पतले किन्तु संयत हाथों से गैंती चला रहे थे। धूल-पसीने से लथपथ उनके श्रमनिष्ठ चेहरे पर जवान होते सूर्य ने एक नई और अपूर्व चमक बिखेर रही थी। मैं कुछ पल उन्हें अपलक निहारता रहा।’ पंडित जी की श्रमनिष्ठा उनके चरित्र का उदारीकरण है जो समय की रफ्तार भी है। लेखक पाठक की दृष्टि को उस तरफ ले जाना चाहता है जहां पोथी-पत्रा से बंधे पंडित जी तो दीन-हीन मनुष्य दिखलाई देते हंै किन्तु श्रम से जुडक़र उन्हीं में एक नया व्यक्तित्व नजऱ आता है। उनका आर्थिक संघर्ष अभी भी जारी है किन्तु अब वे करुणा के नहीं, सम्मान के पात्र हैं।
ओम भारती से परिचित लोगों को यह मालूम होगा कि उन्हें शब्दों से खिलवाड़ करके आनंद उठाना पसंद है। यह स्वभाव उनकी कहानियों की भाषा में, उनके खिलदंड़पन में भी झलकता है। सामान्यत: हिन्दी कहानी का स्वभाव सीधी-सरल, बोलचाल की भाषा के रूप में ग्रहण करने का रहा है किन्तु ओम भारती, थोड़ा अलग हटकर, कहन में ट्विस्ट पैदा करके मजा लेते हैं। भाषा को एक विशेष तेवर देने का उनका प्रयास ‘बारिश’ कहानी में स्पष्ट दिखलाई देता है, जो मुझे सायास लगा। कहानी प्रेम संबंध में आकर्षण-विकर्षण, अपेक्षा-उपेक्षा और अनिश्चय-संशय के भावों के ताने-बाने में बुनी गई है। प्रेम जैसी सघन भावना भरी रचना के शिल्प को रचने में ओम भारती भाषा को लेकर अधिक सजग हो गए हैं, ऐसा मुझे लगा। सात हिस्सों में बंटी यह कहानी अपने कथ्य के अनुरूप पाठक को बांध नहीं पाती। लेखक की भाषा में बारीकी तो है किन्तु वह बारीकी कहानी के रूमानी कथ्य के अनुरूप नहीं लगती। कथा नायक और प्रिया के बीच एक नाजुक सी डोर है। लेकिन प्रिया उन नायिकाओं में नहीं जिनके विषय में कहा जाता है- कच्चे धागे में बंधे सरकार चले आएंगे। •ााहिर है कि कथानायक की बेचैन प्रतीक्षा ही कहानी के केन्द्र में है। किन्तु कथानायक का संशय और अकेलापन, शिल्प के वितान में छिप सा गया है। हम दो उदाहरण लें। 1. ‘फिर वह गई। कुछ दिन उसने मुझे और मैंने उसे इतना एकल नहीं होने दिया। मैं यहीं दिल्ली में ही वहां उसके संग रहा। फिर वह मुझे वापस करके अपने एकांत में जम गई। अपने लौटे हुए ‘मैं’ में मिला हुआ मैं मानो दोहरा अकेला था। चूंकि एक मेरा उसके बिना रहने से, और नम्बर दो, उसके द्वारा निस्संग छोड़ दिए जाने से।’ 2. ‘अंतिम पद मोटे अक्षरों में कहा था मैंने, और ऐसा बोल देने से मेरा एक एकांत कम हुआ। कारण कुछ और नहीं, केवल वह भ्रम या भरम था, जिससे मैं उसके साथ खड़े रहने को लगभग उडक़र चला गया था। यह जाने बगैर कि वह कहां और किस दीवार से टकरा रही है।’ इन पंक्तियों में संवेदना की गहराई की अपेक्षा शिल्प की तराश अधिक दिखलाई देती है। दरअसल भाषा के मामले में ओम भारती की सजगता उनकी शैली का हिस्सा है। वे शब्दों की सजावट का मजा लेते हैं तभी ‘नारियल ना रियल’ जैसा शीर्षक भी वे बनाते हैं।