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Tuesday 21 Nov 2017

जीवन में काव्य-रस घोलते गीत


 युगेश शर्मा ‘‘व्यंकटेश कीर्ति‘‘,
11, सौम्या एन्क्लेव एक्सटेंशन,
चूना भट्टी, राजा भोज मार्ग, भोपाल- 462016
      दूरभाष-0755-2428750
पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक गोष्ठियों के बहाने गीत के साथ लगभग पांच दशक के विचरण के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि गीत लिखे या रचे नहीं जाते, अपितु प्रथमत: गीतकार के अंतर्मन में अवतरित होते हैं, फिर कलम अथवा वाणी को माध्यम बनाकर लोक तक पहुंचते हैं। सायास अर्थात प्रयत्नपूर्वक छांदिक अनुशासन में लिखी गई पद्य-रचना कुछ और तो हो सकती है, किन्तु नैसर्गिक गीत नहीं। आदि कवि वाल्मिकी के मुख से निसृृत पहली रचना इसका प्रमाण है। दरअसल गीत तो सरिता के उस प्रवाह की तरह होता है जो अपनी ही प्रकृति और अपने ही अनुशासन से प्रवहमान होता है। उसे न मोड़ा जा सकता है और रोका जा सकता है। किसी तरह यदि सरिता को मोडऩे-रोकने के प्रयास  किये जाते हैं तो उसका मूल स्वरूप स्वत: समाप्त हो जाता है, क्योंकि सरिता अपने कायदे कानून से ही जलीय स्वरूप धारण करती है और उसीके अनुसार सागर में समाने के लिए कल-कल करती क्षण-प्रतिक्षण तेजी से आगे बढ़ती है। उसके प्रवाह में एक रिदम, एक संगीतात्मकता और प्राण-शक्ति होती है।
यह भूमिका मैंने राष्ट्रीयस्तर पर जानी-पहचानी जा रहीं उज्ज्वल संभावनाओं से परिपूर्ण गीतकार मधु शुक्ला के प्रथम गीत संग्रह ‘आहटें बदले समय की’ के संबंध में कुछ कहने के लिए बांधी है। संग्रह में कुल 61 गीत शामिल हैं। कुछ को उनके फार्मेट के आधार पर गजल अथवा गीतिका भी कह सकते हैं। ‘आहट बदले समय की’ संग्रह में जो गीत शामिल हैं, वे मधुजी की गीत-यात्रा के चश्मदीद गवाह हैं।  
जब हम मधु जी के गीतों के भीतर प्रवेश करते हैं, तो उनमें माधुर्य के साथ-साथ अर्थ का वैविध्य एवं बात को कहने का एक सर्वथा मौलिक सलीका भी सहज ही मिल जाता है। मधुजी हिन्दी और संस्कृत के शब्द-भंडार और ग्राम्यांचल की व्यवहार की भाषा की सामथ्र्य की जमीन पर खड़ी हैं, इस कारण अपने गीतों में भावों के अनुरूप भाषा भी आसानी से जुटा लेती है। जहां जरुरत प्रतीत होती है- वहां भावों के अनुरूप भाषा गढ़ भी लेती हैं। उनके गीतों की भाषा स्वभावत: ऐसी सहज, सरल और प्रवहमान है कि शब्द कोश के पन्ने पलटने की जरुरत ही नहीं पड़ती। भाव और भाषा के बीच ऐसी नैसर्गिक जुगलबंदी कम ही देखने को मिलती है। न तो भाषा के लिए भावों को प्रतीक्षा करना पड़ती है और न भाषा भावों से स्वयं को समृद्ध एवं रससिक्त बनाने के लिए अधिक ठहरती है। उनके गीतों में शब्दों के साथ-साथ अनुभूतियों का कारवां चलता रहता है। गीतकार ने अपने गीतों में देशज और ग्राम्य जीवन में रचे-बसे उन पारंपरिक शब्दों जैसे ‘‘सिराये’’ ‘‘तिराये’’ आदि का प्रचुरता से प्रयोग किया है जिनका प्रयोग करने से वरिष्ठ गीतकार भी प्राय: संकोच करते हैं। मेरा निष्कर्ष है कि हमारी परंपराओं के आंगन में जो शब्द उमगते-थिरकते रहते हैं गीत में उनके यथोचित प्रयोग से गीत का सौंदर्य और माधुर्य कई गुना बढ़ जाता है।
वैसे तो संग्रह के गीतों की मूलभूत विशेषताओं को लेकर उदाहरणों के साथ बहुत सारी बातें कही जा सकती हैं, लेकिन मैं मुख्य रूप से उन बातों को ही रेखांकित करना चाहूंगा जो इन गीतों को अलहदा किस्म के गीत साबित कर रही हैं। पहली बात तो यह कि महानगरीय परिवेश के साथ तीन दशक से अधिक के संपर्क के बाद भी मधु शुक्ला के गीतकार ने ग्राम्य और कस्बाई लगाव से स्वयं को विलग नहीं किया है। संग्रह के गीतों के विषय, उनकी भाषा और शैली एकदम स्वाभाविक है। ऊपरी रंग-रोगन का आग्रह कहीं भी दिखाई नहीं देता। गीत की हर पंक्ति सायास नहीं, बल्कि नैसर्गिक रूप से अस्तित्व में आती है और गीत में पिरोये भाव स्वयं ध्वनित, मुखरित होते चलते हैं। गीतकार ने अपने गीतों के बिम्ब और उपमान जीवन से उठाए हैं तथा उनके माध्यम से बहुधा समष्टि की बात की है। जन-मन ही में जो पीड़ाएं गहरे पैठी हुई हैं, उनको शिद्दत के साथ अभिव्यक्ति प्रदान करने का काम मधुजी के गीतों में हुआ है। इन्हीं विशेषताओं के कारण संग्रह के कुछ गीत तो जैसे मंत्र ही बन गए हैं। उदाहरण के बतौर: ‘‘कोंपले आशाओं की हरदम घनी रखना/ इस तिमिर में दिये की रोशनी रखना/ कीच में खिलते हुए ज्यों रूप के शतदल, सदा तुम याद रखना।’’
मधुजी ने संग्रह के गीतों में पावस, ग्रीष्म और बसंत ऋतु का चित्रात्मक मनोहारी चित्रण किया है, जो मन को खूब सरसाता है, प्रकृति के निकट ले जाकर हमें पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा भी देता है। इसी प्रसंग में गौरैया लौट-लौटकर बार-बार गीतों में आकर अस्तित्व रक्षा की गुहार लगाती है। नदियों, पर्वतों और पशु-पक्षियों से गांव ही नहीं समूची धरा की शोभा है, इस सत्य को प्रतिपादित करते हुए गीतकार इनकी रक्षा की प्रबल पैरवी भी अपने कई गीतों में करती हैं- ‘‘कथा-कहानी वाले सारे जंगल लुप्त हुए/ जाने कहां उड़ गए कौवे, गिद्ध विलुप्त हुए।’’ ऐसे गीत उनको समसामायिक चुनौतियों और चिंताओं के साथ जोडक़र प्रकृति के वरदानों को बचाने की दिशा में आह्वान करते दर्शाते हैं।
21वीं सदी में पहुंचते-पहुंचते रिश्तों की ऊष्मा और ऊर्जा दम तोड़तीे सी दिखाई दे रही है। समाज और व्यक्ति के स्तर पर रिश्तों की पकड़ दिनोंदिन कमजोर पड़ती जा रही है। रिश्तों को नकारने के इस शुष्क दौर में मधु शुक्ला अपने गीतों को साथ लिए उनके निकट और निकट जाती हुई परिलक्षित होती हैं। आत्म अनुशासन, आत्म संयम, संस्कारों, परंपराओं और आस्थाओं, मन की पवित्रता और विनम्रता की पूंजी के बल पर वे अपने गीतों के माध्यम से रिश्तों की टूटन को थापने का अनुकरणीय उपक्रम करती हैं। वह नारी स्वतंत्रता में विश्वास तो करती हैं, लेकिन मर्यादाओं और संस्कारों की लक्ष्मण रेखाओं पर उनकी निगाहें बराबर टिकी रहती हैं और वे तय कर लेती हैं कि कुछ भी हो जाए वे इन रेखाओं को किसी भी कीमत पर लांघेगी नहीं, फिर चाहे कितने ही मारीची आकर्षण, लाभ और लालच उनको अपनी ओर क्यों न खींचें। गीतकार की यह संकल्पित दृढ़ता संग्रह के अनेक गीतों में साफ-साफ  झलकती है। ‘दादी मां’ शीर्षक गीत में नई पीढ़ी को सीख दी गई है कि वह पुरानी पीढ़ी को नकारने की भूल न करे। यही तो वह पीढ़ी है, जिससे स्नेह, संबल और आशीषों को पाकर वह प्रगति के पथ पर आसानी से अग्रसर हो सकती है। अपने गीतों में रिश्ते-नातों की बात करते हुए मधुजी ने भारतीय नारी के मांगलिक स्वरूप को अपने दृष्टिपटल से ओझल नहीं होने दिया है। ‘फुलवारियों की हंसती खुशियां’ शीर्षक गीत में मधुजी कहती हैं- ‘‘नेह-प्रेम, विश्वास-आस के नव उजियार भरे/ अलग-अलग भावों के मैंने अनगिन दीप धरे।’’
आजादी के बाद के छह दशकों में देश में कुछ ऐसे हालात पैदा हुए हैं कि सुुख-समृद्धि की संभावनाओं के झरनों के सूखते जाने से हमारे गांववाले तेजी से शहरों की तरफ  दौड़ रहे हैं। गांवों का ‘‘गांवपन’’ शनै: शनै: नष्ट होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में गांव की माटी की सोंधी गंध को अपनी सांसों में समोये रखने वाली और महानगर में बसी गीतकर व्यथित होकर यही तो कहेगी- ‘‘सब कुछ पाकर भी जैसे कुछ खोया-खोया है/ मन में भाव अधूरेपन का सदा पिरोया है/ गोकुल के आगे मथुरा का हर सुख थोड़ा है/ छोड़ गांव की गोद शहर से रिश्ता जोड़ा है।’’ इस उद्वेलन और संशय के माहौल में भी मधु शुक्ला का गीतकार हताश नहीं है। वे विश्वास की डोर को छोडऩा नहीं चाहतीं और ‘‘तनिक सद्भावना दो’’ गीत में कह उठती हैं- ‘‘ढह रहा है टूटकर विश्वास मन का, फिर इसे उम्मीद दो, संभावना दो/ डूबते मन को तनिक सद्भावना दो।’’ वे अपनी कर्म-तपस्या की उपलब्धि से अवगत कराने से स्वयं को रोक नहीं पातीं- ‘‘रोशनी के दीप सारे सांझ को ही बुझ चुके थे/ चांद-तारे तो कभी के बदलियों में छुप चुके थे/ भोर तक मैं ही तिमिर में दीप बन तिल-तिल जली हूं।’’
‘‘आहटें बदले समय की’’ संग्रह के गीत पवित्र और परंपरा पगे जीवन की पैरवी करते हैं। उनमें अद्वैत का सुख अंतर्निहित है। रसास्वादन की अंत:क्रिया में गीत और पाठक अथवा श्रोता के बीच कोई तीसरा नहीं है। जो भी कहना है, गीत स्वयं कहते हैं।