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Saturday 18 Nov 2017

कला जगत और वास्तविक दुनिया की भीषण मुठभेड़-नटसम्राट

 सत्यदेव त्रिपाठी
मातरम 26, गोकुल नगर, कंचनपुर, डीएलड्ब्ल्यू, वाराणसी 221004 उप्र
कलामाध्यमों में वास्तविक दुनिया (बाह्य जीवन)के साथ कला-संसार (अंतस् के भाव जगत) की मुठभेड़ सनातन है। दुनिया की निगाहों में भला क्या है, बुरा क्या? ये बोझ अगर दिल से उतर जाये तो अच्छा.. से लेकर बाजीचा ए अत्फाल (बच्चों का खेल) है दुनिया मेरे आगे, आदि आदि तक।
लेकिन इसका जितना ज्वलंत और हृदय द्रावक रूप मराठी फिल्म नटसम्राट में आया है, अन्यत्र दुर्लभ है। यह फिल्म स्व. वि.वा. शिरवाडकर कुसुमाग्रज की ज्ञानपीठ सम्मान से नवाजी गयी इसी नाम की नाट्यकृति (1971) पर आधारित है, जिसके गुजराती अनुवाद का नाम ही है अमारी दुनिया,  तमारी दुनिया। और नटसम्राट की यही थीम है, मकसद है, हृदय-विदारक दंश है, भीषण त्रासदी है।
दोनों की इस मुठभेड़ में हमेशा की तरह वास्तविक दुनिया उस नटसम्राट के कला संचालित व कला संकल्पित जीवन को विदीर्ण कर देती है, निजी जीवन को भी तहस-नहस कर देती है, लेकिन वह महान नाट्य अभिनेता अपनी जानलेवा बर्बादी की कीमत चुकाते हुए भी मूल्यवत्ता के निकष पर कला से मिली गहन मानवीय चेतना व विराट स्वत्त्व को जीवन में उतारते हुए कलामूल्य व जीवनमूल्य को एक कर देता है। आज सर चढ़कर बोलती भौतिकता भरी दुनिया को तो अंत में जीतना ही था, किंतु नटसम्राट के जलजले के समक्ष यह दुनिया अपनी विजय पर शर्मसार होती, मुंह नोचती रह जाती है। वैसे प्रचलित ढर्रे पर देखने वालों के लिए यह फिल्म नये युग के साथ तालमेल न बिठा पाने वाले बूढ़े के मिस पीढिय़ों के द्वन्द्व का मसला लगे, तो कुछ अजीब नहीं, पर यह व्याख्या इस व्यापक फलक एवं गहरी अनुभूति वाली क्लासिक थीम को पर्याप्त संकुचित व उथला तो करेगी ही, मुकम्मल रचना के साथ चल भी न पायेगी। बहरहाल, नटसम्राट हैं गणपतराव रामचन्द्र बेलवलकर उर्फ अप्पा साहेब, जिन्होंने 40 सालों तक नाट्यदर्शक समाज के दिलों पर एकछत्र राज किया है। उन्हीं के समक्ष प्रेक्षागृह में नटसम्राट के रिटायरमेंट लेने से कथा शुरू होती है। और उसी शाम बीज पड़ जाता है उस त्रासदी का, जब अप्पा साहेब अपनी सारी सम्पत्ति अचानक अपने बेटे व बेटी के नाम कर देते हैं, जिस पर उनकी पत्नी कावेरी, जिन्हें वे सरकार कहते हैं और उनके दो जिस्म एक जान दोस्त राम्या, की टिप्पणी आती है- जल्दबाजी में लिया फैसला। मराठी का सरनाम मुहावरा भी सरकार बोलती हैं - खाने की थाली दी जाती है, बैठने की चौकी नहीं। किंतु यह अप्पा साहेब की कलाचेतना ही थी, जो ऐसा करा सकी, वरना कोई दुनियावी व्यक्ति इतना गैर दुनियादार याने इतना मानवीय नहीं हो सकता। उनकी मनुष्यता यह जानती थी कि ये मुहावरे गैरों के लिए हैं, पिता वै जायते कही जाने वाली संतानों के लिए नहीं। और सारी सम्पत्ति देकर यह मानवोपम कलाकार बच्चों से कहता है-जो कुछ हमारा था, सब तुम्हारा हो गया। हम दोनों (पति-पत्नी) भी। सब कुछ तुम्हारा। अब कुछ-कुछ दिन बेटे व बेटी के पास रहा करेंगे।
शुरुआत बेटे से होती है। साथ ही टकराहट भी शुरू हो जाती है इस रस्मों-रवाजों की दुनिया से।
सब देते हुए नटसम्राट ने दोनों बच्चों से एक ही माँग की थी, दो-दो नाती-पोतों की और पहली पोती पाकर अप्पा साहेब फुल टाइम आजोबा (वही अपना आजा, जो बोलने में बाबा था, आज दादा हो गया है) हो जाते हैं। तब नाटक में निमग्न थे, अब पोती में रम गये हैं- कला का जीवन में संतरण। पोती-प्रेम-प्रवाह में नटसम्राट को दुनियादारी की परवाह नहीं।
कब की है सच्ची कला ने दुनिया की परवाह? उसका तो नारा ही है-जला दो इसे फूंक डालो ये दुनिया, मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया। लेकिन कब सहा है दुनिया ने कला को?
सो, जब खाँटी लोक कला का नृत्य (लावणी) सिखाकर पोती को स्कूल के वार्षिकोत्सव में ले जाते हैं, तो उसके हाव-भाव-अदा पर खुद आजोबा तो मंच-पाश्र्व में खड़े थपोडिय़ां बजा व कहकहे लगा रहे होते हैं, उसे सर्वोत्तम का पुरस्कार भी मिलता है। पर हॉल में बाकी मां-पिताओं की नजरों के बीच अप्पा की बहू उसे देख तक नहीं पाती, भाग खड़ी होती है। कला की अवहेलना दुनियादारी की जानिब से।
हाथ में पोती के पुरस्कार का स्मृति-चिह्न लिये घर आते ही नटसम्राट की पेशी शुरू हो जाती है। बहू-बेटे की घरू अदालत में। ऐसी कई छोटी-मोटी पेशियां और अपनी सरकार (पत्नी) के बरजने के बावजूद अप्पा द्वारा मुआफियां पहले भी मांगी जा चुकी हैं, क्योंकि ऐसे ढेरों खाँटी, पर गैरदुनियावी काम निद्र्वन्द्व भाव से करते रहते हैं अप्पा, जिसमें शामिल होता है-किसी भूखे की मदद के लिए वाचमैन से उधार ले लेना, बहू की सहेली के ऊलजलूल कपडे पर फब्ती कस देना और दोस्तों की गालियों से त्रस्त पोती को गालियां सिखाना आदि।
लेकिन उस दिन बेटे-बहू के धैर्य की सीमा समाप्त हो जाती है और वे अप्पा का दिया घर छोड़कर कहीं भाड़े पर रहने का फैसला सुनाते हैं, लेकिन पोती के हित (स्कूल से दूरी) में अप्पा ही घर छोड़ जाते हैं, स्नेह का, मनुष्य का मानक। शायद बहू-बेटे चाहते भी यही थे, क्योंकि इनके जाते ही बहू की मां घर आ जाती है। दुनियादारी ने कला को घर से निकाला या मनुष्यता (पोती) के लिए कलासम्राट ने घर छोड़ा!! अब दूसरी पारी बेटी के घर, किंतु कलाकार ने नहीं सीखी दुनियादारी। वहां पोती का स्कूल था, तो यहाँ दामाद की बहुराष्ट्रीय कम्पनी वाला बॉस है। उसकी सतही बातों से बिदकते हैं अप्पा। लावा फूटता है बेटी की शादी की सालगिरह पर, जो देसी दारू के सुरूर के साथ हद दर्जे का कलात्मक भी है। उसे तो जैसे-तैसे चला लिया जाता है, क्योंकि दामाद काफी समझदार (काँसीडरेट) है। वह रात को नशे में बोली गयी कविता की तारीफ  और माँग भी करता है, पर कमरे में जाने के बाद सरकार के कथन- तुम्हीं नाटक सोड्ला नाहीं, घरी आनला (तुमने नाटक छोड़ा नहीं, घर लेके आ गये) में वह वृत्ति भी व्यक्त हो गयी कि ऐसी जेहनी कलाएं छूटतीं नहीं, रूप बदल लेती हैं, रेणु के मिरदंगिया की तरह। और कलाकार तथा दुनियादार वाली समक्षता के क्रिया-व्यापार से कथन में भी उतर आती है। खैर, यहाँ तो यह द्वन्द्व रुक जाता है, किंतु जब बॉस के विदेश से आये नाट्यलती बेटे का किया शेक्सपीयर का नाटक देखते हुए उसके घटियापने पर बिफर पड़ते हैं अप्पा, तो उन्हें घर छोड़कर आउटहाउस में जाना ही पड़ता है। दामाद यहाँ भी सहमत नहीं। दुखी भी है। पत्नी (अप्पा की बेटी) को बूढ़ा बालक एक समान के मुहावरे में समझाता भी है, पर वृद्ध बालक के लिए मैं माँ कहां से लाऊँ!! कहकर वह पति को चुप और बात को खत्म कर देती है, लेकिन इसका सच अपनी दुनियादारी में लिप्त व्यक्ति का कहा फिल्मी जुमला भर ही है, वरना वृद्ध के लिए बच्चों को ही मां बनना होता है और यहाँ तो सरकार हैं ही अप्पा को झिड़कने-दुलारने के लिए। लेकिन हाई पैकेज वाले पति के स्टेटस (हाई लेवेल की दुनियादारी) से अभिभूत पत्नी प्रतीक रूप में आज की पीढ़ी को समझाना खासा मुश्किल है। फलत: अप्पा व सरकार आउटहाउस में। कला चेतना ने दुबारा मानव मूल्य के लिए अवहेलना झेली। बेटी के प्रति प्रेम की मनुष्यता, जिसे पुन: नटसम्राट ही समझ सकता है, से समझौता करके कलाकार पुन: मौन रह गया। मसलहत का जब्र ऐसा था कि चुप रहना पड़ा वरना उस्लू ए जमाने पर तरस आया बहुत।
किंतु दुनियादारी के साथ समझौता नहीं किया। लेकिन जब गलतफहमी में ही सही, पैसा-चोरी का खुला इल्जाम लगा देती है बेटी, तो पिता के अन्दर बसा कलाकार हुंकार उठता है- तुम्हारा बाप चोर है? तुम्हारी मां चोर है? मराठी रंगभूमि का यह सार्वभौम राजा, नटसम्राट गणपतराव बेलवलकर, गणपतराव जोशी का पटु शिष्य, जिसकी पीठ पर खाडिकर, गडकरी जैसे देवतुल्य लोगों का हाथ हो, ऐसा कलावंत, लाखों रसिकों के आशीर्वादों के बल बना कुबेर से भी बड़ा धनवान और इन्द्र से भी बड़ा भाग्यवान, रंगदेवता का यह पुजारी, इसकी तू ऐसी विडम्बना करती है? उस पर तू ऐसा लांछन लगाती है, क्योंकि वह तेरा बाप है, क्योंकि आज उसके पास पैसे नहीं रहे, क्योंकि आज वह असहाय हो गया है? तब सिद्ध हो जाता है कि मनुष्य व रिश्ते के नाते कलाकार चुप रह सकता है, कुछ भी सह सकता है, पर झूठा-बेईमान कहकर जब उसके स्वत्त्व पर प्रहार होगा और तब, जब वह अपनी सही इयत्ता पर उतरेगा, तो कोई दुनियादारी उसके समक्ष टिक नहीं सकती। उसके प्रतिकार के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है, बिना अपनी परवाह किये सारी दुनियादारी को त्याग सकता है।
पैसे मिल जाने पर धार-धार रोती, माफी माँगती, अपने चिमणी (चिरय्या) होने का वास्ता देती बेटी से सर्द मारक अन्दाज में कहते हैं अप्पा साहेब - देर हो गयी बच्ची, चिमणी तो थी मेरी, पर फुर्र हो गयी। और सोती रात में वह नटसम्राट अपनी सरकार, जो यह सब देखकर कब से चले जाने पर आमादा थीं, के साथ खिड़की से निकल लेता है। कलाकार का दुर्धर्ष आत्मसम्मान। यह महाभिनिष्क्रमण ही तो है, जिसके मर्म को समझने वाला विदूषकीय शैली में नाट्यकला का दीवाना नौकर विठोबा उन्हें जाते देखता है, पर रोकता नहीं, बस हाथ जोड़ लेता है, समुझहिं खग खग ही कै भाषा।
यह भी काबिले गौर है कि अब इनका ठिकाना बचा है वही अपना मूल गांव, मोरवाडी, जिसका भोजपुरी अर्थ होगा अपनी शरण। समूची कमाई और सारे प्यार की शेल्टर छूटने के बाद अब हाथ में बचा है एक छाता और दूसरे हाथ के बक्से में उस चन्द्रहार के बेचने से मिला पैसा, जो धनसंचय (दुनियादारी) की नजऱ से नहीं, अपने रिटायरमेंट की रात सरकार के लिए अप्पा साहेब की प्रेमभेंट था। बारिश की रात और मँगनी की लिफ्ट से माल ढोने वाली गाड़ी में बैठा अपनी प्रिय सरकार के साथ नटसम्राट का त्रासदी के चरम की ओर प्रयाण। पर इन सबसे निरपेक्ष, बल्कि प्रसन्न, सरकार की आंखों में मोरवाडी के पुश्तैनी घर को सजाने, बच्चों के बदले आंगन में तुलसी-वृन्दावन बसाने का सपना। क्या त्रासदी से मुक्ति का आखिरी रास्ता या कलाकार की अपौरुषेय क्षमता!!
क्यों तभी अप्पा के मन में आता है अपनी सरकार को यह बताना कि तुम मुझे बहुत, बहुत अच्छी लगती हो, मैं तुमसे खूब-खूब प्यार करता हूँ। और मोरवाडी जाने वाली बस के इंतजार में बस अड्डे के छपरे में एक दूसरे को सहलाते-सांत्वना देते सो जाते हैं दोनों। गहन त्रासदी में सुख की नींद!! अप्पा तो उठते हैं, पर उनकी सरकार चिरनिद्रा में। नाटक में घर में ही मर जाती हैं सरकार और बेटी के यहां आते से ही बीमार दिखायी जाती हैं, पर फिल्म का यह नवाचार (इनोवेशन) सिनेसुलभता के साथ आकर निर्वासित मौत की वह त्रासदी बन सका है, जिसे गालिब ने यूँ समझा- मुझको दयारे गैर में मारा वतन से दूर, रख ली मेरे खुदा ने मेरी बेबसी की शर्म!!  अपरिचित गांव वाले दाह करते हैं-त्रासदी और गहराती है। फिर इसके बाद तो वह नटसम्राट सड़क पर, फुटपाथ पर, पुल के नीचे, कहीं भी वडापाव वगैरह जैसा कुछ भी खाकर रह लेता है-कलाकार की त्रासदी का मर्मांतक सोपान।
लेकिन यह कलाकार का अपरिमित स्वाभिमान है, जो बेटे-बेटी या किसी और के पास शेल्टर मांगने नहीं जाता। आम आदमी भी कदाचित ऐसा भले कर ले, पर यह कलाकार ही है, जो बेटी के यहां दुनियादारी के समक्ष कलाकार की जानिब से जीवन की अंतिम सचाई कह आया है- किसी का कोई नहीं। अधर में भटकती कोई आत्मा हमारी वासना की सीढ़ी से धरती की माटी पर उतरती है और हमें लगता है कि हम बाप बन गये हैं, माँ बन गये हैं। पर झूठ, सब झूठ। हम केवल सीढ़ी हैं, केवल सीढ़ी।     
और फिल्म यहीं फुटपाथ से शुरू होती है, जब वडापाव वाले अखबारी टुकड़े पर उस नाट्य सभागार, जहाँ से वे नटसम्राट बने थे, के जलने की खबर देखते ही वड़ा-बड़ा छोडकर कर अप्पा साहेब भागते हुए थियेटर पहुँच जाते हैं। यहीं थियेटर के साथ नटसम्राट की ऐसी ही संवेदन-संगतियों से उभरती कई-कई पूर्वदीप्तियों (फ्लैशबैक्स) में चलती है उक्त फिल्म -नटसम्राटकथा, जिस दौरान हर संवेदनशील मौके पर नाटककार द्वारा नियोजित आत्मालापों व प्रखर संवादों के नितांत सधे उपयोग फिल्म की भी जान बने हैं। साथ ही कथ्य व कला की आवश्यकतानुसार बेहद सटीक सृजनात्मक जोड़ फिल्म की पटकथा में चार चाँद लगा देते हैं। इस विरल प्रतिभा के लिए किरन यज्ञोपवीत की जितनी तारीफ  की जाए, कम है।
इस रचना प्रक्रिया में उक्त उद्धृत की तरह अप्पा के खाँटी मनुष्य व जहीन कलाकार की निजता तब-तब फूट पड़ती है, जब-जब उनके समक्ष मूल्य तोड़े जाते हैं, मनुष्यता अवहेलित होती है, दुनियादारी का नंगा नाच होता है और नटसम्राट की कलाचेतना आहत होती है। ये आत्मालाप व संवाद ही फिल्म में बाहरी दुनिया से टकराने के धारदार औजार बने हैं, दृश्य व कथा तो स्थिति व मूड भर बनाते हैं।     
इन सबका श्रोता-द्रष्टा-साक्षी बनता है विदेश से आया युवक सिद्धार्थ, जो पुन: फिल्म में जोड़ा हुआ चरित्र है। अपने देश में नहीं हैं ऐसे कलाकार को पहचानने वाले लोग, का एक संकेत बनता है। उसी के मिस चलते हैं फ्लैशबैक, पर उसे सूत्रधारत्व नहीं दिया गया है, फ्लैशबैक शैली ही फिल्म की सूत्रधार है।
लेकिन फुटपाथी साथी नहीं जानते अप्पा के साहेबत्त्व व नटसम्राटत्त्व को। अप्पा भी कभी बताते नहीं। और सड़क के वे बेघर व अजनवी लोग महज एक आदमी के रूप में अप्पा की ऐसी संभाल करते हैं कि हाई लेवेल के बेटे-बेटियों के बरक्स इन्सानियत जी उठती है- जिन्हें प्यार के अर्थ ही व्यर्थ निकले, वो इन्सानियत के खरीदार निकले, वहीं एक मासूम सी रहगुजर पर, फटेहाल मुफलिस वफादार निकले। और जब एक दिन उनकी यह फुटपाथ की शरण भी पुलिस वालों की बेरहम तोडफ़ोड़ का शिकार होकर उजड़ जाती है, तो अपना महल जैसा घर एक मिनट में दे देने तथा अपमानित होने पर दूसरे मिनट सबको व सबकुछ को त्याग देने वाले अप्पा साहेब भोंकर कर बिलख-बिलख उठते हंै, जिसमें त्रासदी का सामाजिक-मानवीय विस्फोट होता है- कोई घर देगा क्या? एक तूफान के लिए? कोई घर देगा क्या? एक तूफान भीत के बिना, छप्पर के बिना? मानुष की माया के बिना? देव की दया के बिना? जंगल-जंगल भटक रहा है। जहाँ से कोई हटा न सके। ऐसी जगह ढूँढ रहा है। कोई घर देगा क्या, घर?
फुटपाथ के अपनों में मुख्य है- एक बूटपॉलिश वाला लड़का राजा, जिसे जब पुलिस पकड़कर ले जा रही होती है, वह वैन में से चिल्लाकर अप्पा के खाने का इंतजाम बताते जाता है। ध्यातव्य है कि आजीवन नाट्यमय अप्पा को जानने वाले बेटे-बेटी कभी उन्हें नाटक दिखाने-देखने का जिक्र तक नहीं करते और यह लड़का एक दिन नाट्य सभागार की तरफ देखते हुए अप्पा को देखता है और थियेटर मालिक के 30 जोड़ी जूते पॉलिश करने की कीमत पर दो टिकट ले आता है। वही नाटक अप्पा साहेब की विवश आत्मस्वीकृति की गुमनामी से बाहर लाने और दुनिया के साथ उनकी आखिरी टकराहट होने का सबब बनता है। नाटक पूरा होते ही ऐसा कलात्मक उन्माद तारी होता है कि अप्पा साहेब हॉल में ही खड़े होकर - टु बी ऑर नॉट टु बी, दैट इज़ द क्वेश्चन से शुरू किये अपने थोड़े लम्बे आत्मालाप के अंत में वो उद्गार व्यक्त करते हैं- विधाता, तू इतना कठोर क्यों हो गया? एक तरफ  जिन्हें हमने जन्माया, वे हमें भूल जाते हैं, तो दूसरी तरफ  जिसने हमें पैदा किया, ऐसा तू भी हमें बिसरा देता है। ऐसे में इस विदीर्ण अस्थिपिंजर को लिये, हे करुणानिधान, हम किसके चरणों पर अपना माथा पटकें.. किसके चरणों पर.. किसके..?
नाटक लिखे जाने से अब तक मराठी के विद्वत्समाज में नटसम्राट एक सशक्त शोकांतिका (पॉवरफुल ट्रेजेडी) के रूप में विख्यात है, है भी निस्सन्देह। पर यहाँ त्रासदी से नाम न जुडऩे के बावजूद गिरीश कर्नाड के तुगलक को याद करना इसलिए मौजूँ है, क्योंकि जैसे नटक्षेत्र के सम्राट रहे अप्पा घर से बेघर हुए, अकेले-असहाय रह गये, एकछत्र बादशाह तुगलक भी दुनिया से लड़ते-लड़ते बादशाहत के रहते एक दिन अकेला हो गया। अजनबी, आउटसाइडर। क्या दुनिया के समक्ष यह भी एक भयंकर त्रासदी नहीं है? सामाजिक व राष्ट्रीय सन्दर्भों की होने से इसका दायरा ज्यादा व्यापक भी है। भूमिका में कुसुमाग्रजजी ने किंग लियर के अनुवाद के दौरान नटसम्राट के अंकुर फूटने का जिक्र किया है। इस तरह दो बादशाहों के बीच खड़ा है नटसम्राट। मैंने सुना कि भूमिका के उक्त स्वीकार के चलते कुछ लोग इस नाटक को किंगलियर का रूपान्तर भी मानते हैं। शायद इसकी हेठी दिखाना चाहते हैं। पर निस्सन्देह यह स्वतंत्र व मुकम्मल कृति है, प्रेरणा अवश्य किंगलियर से मिली होगी, जो मिलती ही है कहीं न कहीं से।           
मराठी रंगभूमि पर आलम यह रहा कि जिसने भी नटसम्राट की भूमिका की, स्वस्थ नहीं रहा। प्राय: सभी हृदयरोग से ग्रस्त हुए। हर शो में दो-ढाई घण्टे इसे झेलने वाले अभिनेता को तोड़ देती है यह त्रासदी। फिर भी हर अभिनेता इसे करने की तमन्ना रखता रहा। फिल्म में यह किरदार निभाने वाले नाना पाटेकर के शब्दों में डंक मारती है यह भूमिका। फिल्म के लिए रिहर्सल तो नाना ने भी काफी किये, पर फिल्म के नाते ही बार-बार इससे न गुजरने और इसकी तीव्रता के मद्देनजर रीटेक भी कम होने दिये। सो, उस डंक से राहतज़दा होंगे नानाजी। लेकिन गहन त्रासदी तो है ही यह, जिसे लेकर यह त्रासदी एक वृद्ध की या एक कलाकार की, जैसी बहसों में भी नाटक को लेकर उलझे रहे लोग। आज भी उबर नहीं पा रहे। फिर समन्वयवाद की तरह - वृद्ध कलाकार की ट्रेजेडी, भी चलती है, जिन सबकी कोई दरकार नहीं। खासकर फिल्म आ जाने और मास तक सीधे पहुंच जाने के बाद।
अब तो सिनेमा हॉल में आहें, हिचकियां, सिसकियां गूंज रहीं, जिसमें यह त्रासदी कलाकार से विस्तारित होकर जन-जन की हो जाती है। क्या इसलिए भी तो नहीं, कि निपट दुनियादारी का जलजला इतना बढ़ गया है कि आज घर-घर में एक अप्पा बेलवलकर निष्कासित हो रहे हैं। घर के अन्दर रखकर या बाहर निकालकर। न सही नटसम्राट, वे मामूली कर्मचारी हैं, किसान हैं, कामगार हैं, अध्यापक हैं, ऑफिसर हैं, कुछ भी हैं, इन्सान तो हैं। जीवन देने के अर्थ में किस कलाकार से कम हैं ये? फिर हमारी संस्कृति तो जीवन भर हल में चले बैल को भी अशक्त हो जाने पर कसाई के हाथों बेच देने की नहीं, मृत्यु पर्यंत सँभालने की है। लेकिन आज तकनीक, पैकेज और प्राइवेसी पर आधारित नयी सभ्यता में वे मिसफिट करार दे दिये गये हैं। उनकी लियाकत को पहचानने वाले 1950-60 के दशक वाले चीफ  की दावत (भीष्म साहनी) के चीफ  जैसों की प्रजाति लुप्त हो गयी है। फलत: रिश्ते मर रहे हैं बेमौत। मनुष्यता दम तोड़ रही है बेवजह। हर वृद्ध के अंतस में आबाद हो रहा है-एक फुटपाथ, जो एकाकीपन में तड़प रहा है, समय की है यह दारुण त्रासदी !
इस तरह आज तक के समय ने यदि सिद्ध किया है कि तमाम साहित्यिक-कलात्मक प्रयत्नों के बावजूद दुनिया की विद्रूपताएं कम नहीं हुईं, बढ़ गयी हैं, तो फिल्म नटसम्राट की अद्यतन गवाही में कला की दुनिया भी हारी नहीं। बकौल कैफी साहेब -अभी इश्क ने हार मानी नहीं है, अभी इश्क को आजमाना न छोड़। और कहना होगा कि नटसम्राट ने क्या ही आजमाया है!! बहरहाल, नाटक देखने के बाद नाट्यगृह के उक्त उद्गार के दौरान अप्पा साहेब को उस नाटक का एक सीनियर कलाकार पहचान लेता है- हे महतरा नाहीं, मोठा नट आहे (यह कोई बूढ़ा नहीं, महान अभिनेता है) और जाकर उनके बेटे को बताता है। गुमशुदा की रिपोर्ट पहले से ही दर्ज थी। सो, पुलिस के साथ बेटे-बेटी का पूरा परिवार उसी थियेटर में पहुंचता है। यहीं कलाकार की महनीय इयत्ता की अडिग स्थापना होती है।
अप्पा को घर ले जाने के लिए मनाते लगता है परिवार। उन्हें इन पर विश्वास न करने के लिए सजग करने को बोल पड़ता है राजा। इस पर उसे पीटने लगता है पुलिस इंस्पेक्टर, तभी अचानक दहाड़ पड़ते हैं अप्पा- बस, एकदम बन्द इंस्पेक्टर साहेब, ये थियेटर है, मेरा राज्य। मैं, अप्पा साहेब बेलवलकर, नटसम्राट, तुम्हें हुक्म देता हूँ- तुम निकल जाओ यहाँ से। इस थियेटर की दुनिया में सब कुछ झूठा है और इसीलिए अच्छा है। तुम उधर उस दुनिया में जाओ, जहाँ सचमुच का शर्विलक सच ही चोरियां करता है, सचमुच का वृन्दावन सच ही वसुन्धरा पर बलात्कार करता है, सचमुच का मैकबेथ अपने मित्र का सच में खून करता है, वहाँ जरूरत है तुम्हारी। जा..जा।
यह नाट्यकृति अपने सृजन काल से ही नाट्यसंसार को ललकारती रही और ढेरों निर्देशकों ने इस चुनौती को स्वीकारा, इसे मंच पर साधा। लेकिन फिल्म पहली बार बनी है। विधा अलग है और फिल्म अपनी संसाधन क्षमता और फॉर्मेट की बहुआयामिता की समृद्धि से लबरेज है। सो, स्थल, क्रम व कथानक बदल-विकस गये हैं, जिनके यथोचित उल्लेख ऊपर होते आये हैं, लेकिन कथाक्रम से हटकर एक अलग ही और सबसे प्रमुख व महत्त्वपूर्ण बदलाव अप्पा साहेब के दोस्त राम्या नामक चरित्र को जोडऩा है, जो विचारणीय भी है। विक्रम गोखले का इसके लिए चयन भी क्या लाजवाब!! स्वत: विक्रमजी ने इस पात्रत्त्व को विदूषक से जोड़ा है, जो नाट्य-साहित्य की पुरानी परम्परा है। लेकिन यहाँ उस परम्परा का उन्नयन हुआ है, जिसमें राम्या का किरदार विदूषक नहीं, मस्तमौला है। काम तो वही करता है, मुख्य चरित्र के कुछ गुह्य पक्षों को खोलने का, लेकिन अप्पा साहेब के नितांत अंतरंग मित्र के रूप में इस प्रक्रिया का भी ऐसा उन्नयन हुआ है कि यह मुख्य चरित्र का आईना बन गया है। तभी वह अप्पा साहेब को थप्पड़ मार सकता है और कह सकता है- अभिनेता के रूप में तो तू घटिया है ही, आदमी के रूप में भी तू निपट नीच है। अभिनय इतना जोरदार है विक्रमजी का कि कुछ लोग उन्हें ही नटसम्राट के रूप में देखना चाहने लगते हैं। और उसकी मृत्यु के दृश्य में नाना-विक्रम के बीच कृष्ण-कर्ण का फैण्टेसिकल सीन अपनी उदात्तता में फिल्म की जान बन पड़ा है- एक अविस्मरणीय कला-मानक।    
कैमरे, लोकेशन, विस्तारित ध्वनि व गीत-संगीत आदि के कुशल-कलात्मक संयोजन से सधी-सजी फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर के सिनेमा को मात दे रही है। नाट्यकृति से फिल्म के माध्यमांतर में मूल की रक्षा और सिने-सृजन के कलामय संयोजन का मानक पेश हुआ है। कुसुमाग्रज के काव्यमय गीत सधे संगीत-सुर-स्वर पाकर और उन्हीं के संवाद सटीक अदा-ओ-अन्दाज पाकर अनुपमेय हो गये हैं। कुल मिलाकर फिल्म इतनी शिद्दत से बनी है कि सिर्फ  इसके आधार पर सिनेमा का व्याकरण लिखा जा सकता है, उसकी संहिता बनायी जा सकती है। कृतियों से फिल्मांकन की विधा (माध्यमांतर) के कई मानक स्थापित कर रही है फिल्म। और इन सबके लिए निर्देशक महेश मांजरेकर को साधुवाद व सलाम।     
 सो, अभिनय में भी तुलना उतनी सही न होगी। इसके बावजूद चूंकि कृति व भूमिका एक ही है, अत:तुलना बनती तो है। इस मरणांतक त्रासदी को साकार करना हर अभिनेता का सपना रहा। करने वालों में मंच का सबसे मकबूल नाम रहा डॉ.श्रीराम लागू का। बल्कि कहें कि लागूजी और नटसम्राट एक दूसरे के पर्याय बने रहे। लेकिन उस पर्याय को अब महेश मांजरेकर-नाना पाटेकर की युति मंच तक ही महदूद कर देगी और निस्सन्देह वृहत्तर कला-जगत एवं आमजन के बीच नाना पाटेकर व नटसम्राट एक दूसरे के पर्याय बनेंगे। लागूजी मंच के लीजेंड बन चुके हैं, फिल्म के नाना अपनी अन्य फिल्मों से किंचित् अलग एक बादशाहत लिये अवतरित हुए हैं। को बड छोट कहत अपराधू के बीच लागू साहेब की स्टाइलिश वाचिकता व सांचे ढली आंगिकता के साथ सुनियोजित विन्यास हैं, तो नाना के सहज-उच्छ्वल क्रिया-व्यापारों के बीच भाव-विगलित दयनीयता-विवशता ऐसी करुणा उपजाती है कि क्रन्दन रोके नहीं रुकता और तभी अचानक विस्फोटक अन्दाज में बिफर पडऩा रोंगटे खड़े कर देने वाला भय-आह्लाद, लागूजी की सधी-संयत आवाज के समक्ष नाना की बेफाम व बुलन्द आवाज निर्णायक साबित होती है। बार-बार देखने से भी तृप्ति आती नहीं, प्यास बढ़ती जाती है। लागूजी दर्शक को ऐसे बुलाते हैं कि वह जा नहीं सकता, पर नाना उसके सर चढ़कर बोलते हैं कि वह छन भर भी छूट नहीं पाता।     
और अब पुन:आएं उस अंतिम दृश्य पर, जब पुलिस-इंस्पेक्टर को फटकारने के बाद जब परिवार वाले मनाने चलते हैं, तब दुनिया के समक्ष कलाकार की पुरजोर इयत्ता स्थापित होती है। दृश्य का विधान ऐसा बनाया गया है कि परिवार को ही नहीं, गोया पूरी दुनिया पर ही दहाड़ पड़ा है नटसम्राट।
दूर हटो नालायको, मैं कहता हूँ, दूर हटो। दया पाने के लिए यह जूलियस सीजर किसी की प्रार्थना करता नहीं और किसी ने प्रार्थना की, तो उस पर दया करता नहीं। दुनिया में असंख्य लोगों को देखा, पर मेरी समझ में ऐसा एक ही है, जो अपनी जगह पर अटल खड़ा है और वो मैं हूँ। वो मैं हूँ जूलियस सीजर, मैं हूँ ओथेलो, मैं हूँ प्रतापराव, मैं ही हूँ सुधाकर और हैम्लेट और मैं हूँ गणपत राव बेलवलकर, नटसम्राट। ये सभी महापुरुष बसते हैं मुझमें, इस देह में। और महापुरुषों की छाती याने हिंसक (समाज) के लिए कायम का आह्वान (सभी को इंगित करते हुए) देखो, देखो, वो हिंसकों ने अपनी कटारें निकाल ली हैं, मुझे, जूलियस सीजर को मारने के लिए। मुझे चारों तरफ  से घेर लिया है सबने। चिल्ला रहे हैं सब मारो-मारो! चलाओ कटार (लडख़ड़ाते हुए आगे बढ़ता है)ओह (कटार लगने का अभिनय करता है)..कौन-कौन? ब्रूटस तू भी!! मर-मर सीजर, मर। सब चिल्लाते हुए दौड़ते (रह जाते) हैं।
पर किसी को प्रायश्चित का भी मौका नहीं देता नटसम्राट। और मूल्यहीनता के इस बेशर्म युग को आज ऐसे ही नटसम्राट की जरूरत है।