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Thursday 23 Nov 2017

सीता का परित्याग: विभिन्न रामायणों के संदर्भ से

 

 डॉ. शोभा निगम
मुखर्जी कंपाऊंड
फौवारा चौक
बैरन बाजार, रायपुर
मो. 09826947776
राम के साथ राजनंदिनी सीता का वनगमन नारी को सीख देता है कि पति के कष्ट और दु:ख में भी वह बराबर की भागीदारी बने। राम ने सीता को बहुत समझाया था कि वन में अत्यंत कष्टों का सामना करना पड़ेगा किंतु फिर भी राजसी वैभव में पली हुई जनकदुलारी पति के साथ हर बाधा का सामना करने तत्पर हो राम के पीछे-पीछे वन जाती है। लगभग 13 वर्ष वह बिना किसी शिकायत के पति और देवर के साथ वन में सुख से रहती हैं किंतु अंतिम वर्ष परीक्षा की घड़ी आती है जब दशमुख द्वारा धोखे से उनका अपहरण होता है। अपने तेज के कारण वह लंका में रावण के हर अतिचार का सामना करती हुई राम के आगमन की राह देखते हुए उनके वियोग में उद्विग्न हो दिन बिताती हैं। बहुत कठिन थे ये दिन वैदेही के लिये। ऐसे में पवनपुत्र आकर उन्हें ढांढस बंधाते हैं। उनका दु:ख देख उन्हें अपने साथ अपनी पीठ पर बैठकर चलने भी कहते हैं, किंतु जानकी उनका प्रस्ताव यह कहकर ठुकराती हैं कि इससे उनका परपुरुष से स्पर्श होगा, साथ ही राम यदि रावण का वध कर उन्हें ले जाएं तो इससे उनका प्रताप भी बढ़ेगा।
       दशमुख का वध कर सचमुच राम का प्रताप बढ़ता है। अब तक अजेय रावण का राम वध करते हैं और अंतत: सारी बाधाओं को पार कर, अग्निपरीक्षा से गुजर कर, आग में तपी कुंदन सी सीता अपने पति व देवर के साथ प्रसन्नता-पूर्वक अयोध्या पहुंचती हैं जहंा अयोध्यावासी उनका भव्य स्वागत करते हैं। किंतु धीरे-धीरे रावण द्वारा बलात् हरी गई...लंबे समय तक रावण की लंका में रह चुकी सीता की पवित्रता पर वे संदेह करने लगते हैं।...और वे ही अयोध्यावासी, जिन्होंने चौदह वर्ष पूर्व सीता को रो-रो कर वन में जाने से रोका था, जो राम से भी अधिक जनकनंदिनी के वनगमन से दु:खी थे, थोड़े ही समय बाद उनके चरित्र को लेकर कानाफूसी प्रारंभ कर देते हैं।
इन सबसे बेखबर राम और सीता लंबी अवधि के बाद मिले बिछड़े परिंदों के समान अपने प्रेमालाप में मगन थे। उनका यह सुख द्विगुणित हो गया जब सीता के गर्भवती होने के लक्षण दिखे। तब राम ने अतिशय आनंदित हो सीता से उनकी दौहद इच्छा पूछी तो मानो नियति ही उनके मुख से कहला गई कि मैं गंगातट के पवित्र तपोवनों को देखना चाहती हूं। वहां रहने वाले तपस्वियों के समीप एक दिन व्यतीत करने की मेरी हार्दिक अभिलाषा है। तब राम ने, 'कल ही तुम्हारी इच्छा पूरी करूंगा Ó कहते हुए जनकनंदिनी को आश्वस्त किया।
किंतु कल का दिन दोनों के जीवन में भूचाल लाने वाला था। अचानक उसी दिन अपने मित्रों के साथ बैठे राम ने एक मित्र भद्र से जब पूछा कि पुरवासी मेेरे विषय में जो-जो शुभ और अशुभ बातें कहते हैं वह सब यथार्थ रूप से बताओ...जिन्हें वे शुभ कहते हैं मैं वैसा आचरण करूंगा और जिन्हें अशुभ कहते हैं उनका परित्याग करूंगा। तब भद्र द्वारा राम की प्रशंसा में कितनी ही शुभ बातें कही गई। किंतु राम द्वारा अशुभ बात पूछने के आग्रह पर भद्र ने बड़े संकोच से एक बड़ी अशुभ बात कही कि पुरवासी कहते हैं कि जिस सीता को रावण अपनी गोद में उठाकर ले गया था, जिसे उसने अपने अंत:पुर के क्रीड़ाकानन में रखा, उस सीता के साथ राम को कीदृशं हृदये तस्य सीता संभोगजं सुखम् अर्थात् सहवास-जनित सुख कैसे लगता होगा? उनसे उन्हें घृणा क्यों नहीं होती? अब तो हम लोगों को भी अपनी स्त्रियों की बातें सहन करनी पड़ेगी क्योंकि जैसा राजा करता है, प्रजा भी उसका अनुकरण करती है।...भद्र के ये वचन राम के लिये तीक्ष्ण बाण के समान थे। अत्यंत पीडि़त होकर उन्होंने अन्य मित्रों से उनकी राय पूछी। इस पर उन्होंने माथा टेक कर अत्यंत दीन होकर कहा ,'प्रभो! भद्र का कथन ठीक है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है(वा.रा.उ.कां.43.13-23)।Ó
और तब राम अत्यंत दु:खी मन से तत्काल एक कठोर निर्णय लेते हैं...जिसका दर्द शायद सीता से भी अधिक उन्हें सालता है। अचानक ही वे तीनों भाइयों को अपने कक्ष में बुलाकर अश्रुमुख से भ्रद की कही बात बताते हैं। राम भाइयों से यह भी कहते हैं कि यद्यपि मेरी अंतरात्मा सीता को पवित्र समझती है किंतु यह लोक-निंदा मेरे लिये असह्य है। इसके भय से तो मैं प्राणों का और तुम सबका भी त्याग कर सकता हूं, फिर सीता का त्याग कौन सी बड़ी बात है?...किंतु राम के लिये यह सचमुच बहुत बड़ी बात थी...तभी तो भाइयों का विषादग्रस्त चेहरा देख वे अगले ही क्षण कह उठते हैं-तुम लोग मेरी ओर देखो। मैं शोक के समुद्र में गिर गया हूं। इससे बढ़कर कभी कोई दु:ख मुझे उठाना पड़ा हो, यह मुझे याद नहीं है।
       फिर राम लक्ष्मण को बड़ी दारुण आज्ञा देते हैं-सीता को कल प्रात: राज्य की सीमा के बाहर तमसा नदी के तट पर वाल्मीकि के आश्रम में छोड़ आओ। इस विषय में तुम किसी प्रकार का सोच-विचार मत करो। यदि तुममें से किसी ने इसमें अड़चन डाली तो मुझे महान कष्ट होगा। (वही,44.22)। अब इस स्थिति में कोई क्या कर सकता था? दिल पर पत्थर रखकर लक्ष्मण सीता को वन ले गये। पिछली बार वन जाते समय प्रियतम साथ थे। इस बार उनके बिना जा रही थीं वे। पर उसका मलाल नहीं था सिया को क्योंकि इस बार तो वे अपनी इच्छा से केवल एक दिन के लिये ही जा रही थीं, वह भी प्रियतम उनकी दौहद इच्छा पूरी करने हेतु उन्हें भेज रहे थे। किंतु पता नहीं कैसे, रथ में बैठते ही उन्हें लगा कि कुछ ठीक नहीं है। कहा भी सौमित्र से-ये मेरी दाहिनी आंख आज क्यों फड़क रही है सौमित्र! मेरा हृदय अस्वस्थ क्यों हो रहा है? मुझे पृथ्वी सूनी-सूनी क्यों लग रही है?.फिर पति और पूरे परिवार की मंगलकामना कर सीता चुप हो गई। इस पर लक्ष्मण केवल यह कह पाये कि सबका कल्याण हो (वही, 46.18)।
आगे का बड़ा करुण चित्र खींचा है वाल्मीकि ने। अब तक अपने आपको किसी तरह संयमित कर रखने वाले लक्ष्मण सीता को गंगा पार पहुंचा कर फूट-फूट कर रो पड़े। उन्हें रोते देख सब बातों से अनजान जानकी परेशान हो उठी। व्याकुल हो उन्होंने पूछा-देवरजी! क्या भाई से दो दिन अलग रहने के कारण तुम इस तरह से रो रहे हो? देखो, मुझे भी तो श्रीराम प्राणों से बढ़कर प्रिय है किंतु मैं तो ऐसे शोक नहीं कर रही हूं (वही,46.27-28)। इससे सौमित्र का रुदन और भी बढ़ गया। अंतत: वैदही को राम की शपथ देकर सौमित्र से उनके संताप का कारण पूछना पड़ा। तब हृदय को कड़ा कर सौमित्र ने सब कुछ बताया। करबद्ध हो उन्होंने कहा- वैदेही! मेरे हृदय में सबसे बड़ा कांटा यही खटक रहा है कि आज अग्रज ने बुद्धिमान होकर भी मुझे यह काम सौंपा है जिसके कारण लोक में मेरी बड़ी निंदा होगी। इस दशा में मुझे मृत्यु आ जाती तो मेरा परम कल्याण होता। मैं आपके सामने उस अपवाद को अपने मुख पर नहीं ला सकता जो अयोध्या में फैला हुआ है और जिससे संतप्त होकर राजा राम ने आपका त्याग किया है तथा मुझे आपको वाल्मीकि के आश्रम में छोड़कर आने की कठोर आज्ञा दी है (वही, 47.4-13)।
लक्ष्मण के ये कठोर वचन सुन वैदेही मूर्छित हो गिर पड़ी, फिर होश में आने पर वे पहला वाक्य कहती हैं-मामिकेयं तनुर्नूनं सृष्टा दु:खाय लक्ष्मण। धात्रा यस्यास्तथा मेऽद्य दु:खमूर्ति: प्रदृश्यते।।(वही,48.3) निश्चय ही विधाता ने मेरे शरीर को केवल दु:ख भोगने के लिये ही रचा है। इसीलिये आज सारे दु:खों का समूह मूर्तिमान होकर मुझे दर्शन दे रहा है। आगे जानकी पूछती हैं- मैंने अपने पूर्वजन्म में ऐसा कौन सा पाप किया था जो शुद्ध आचरण होने पर भी महाराज ने मुझे त्याग दिया? मैंने राम का अनुसरण करते हुए वनवास के दु:खों को सहकर भी उनके साथ रहना पसंद किया था किंतु अब मैं अकेले वन में कैसे रहूंगी? दु:ख पडऩे पर किसे मैं अपना दु:ख कहूंगी? मुनि जब मुझसे पूछेंगे कि श्रीराम ने किस अपराध पर तुम्हारा त्याग किया तो मैं उन्हें अपना कौन सा अपराध बताऊंगी? मैं हतभाग्य अपना जीवन भी विसर्जित नहीं कर सकती क्योंकि ऐसी स्थिति में मेरे भीतर पल रहा मेरे पति का राजवंश नष्ट हो जायेगा। यहां सीता की महानता देखिये कि वह अभी भी अपनी अपेक्षा पति की हानि पर अधिक ध्यान दे रही हैं।
अंतत: थक कर वैदेही लक्ष्मण को विदा करती हैं...पति को यह संदेश भेजते हुए कि आप अपने पुरवासियों के साथ वैसा ही बर्ताव करें जैसा अपने भाइयों के साथ करते हैं...यही आपका धर्म है(वही, 48.14-15)। यहां लक्ष्मण अपने आपको पाप का भागी मान कर बारम्बार कोसते हैं। वाल्मीकि आश्रम का मार्ग बताकर वे सीता को प्रणाम कर कहते हैं-भाई की आज्ञा से मुझ पराधीन द्वारा की गई रुखाई को क्षमा कीजिये (वही,14.58)।
अन्य रामायणकारों ने भी इस अवसर का बड़ा कारुणिक चित्रण किया है। सीता के त्याग के कारण भी अलग-अलग बताये गये हैं। आगे हम यथास्थान इनका उल्लेख करेंगे। पहले देखें कि लक्ष्मण द्वारा वन में त्याग के बाद सीता का क्या हुआ।
वाल्मीकीय रामायण के अनुसार लक्ष्मण के जाने के बाद जानकी उनके रथ को आंखों से ओझल होते तक देखते रही, उसके बाद अचानक भूमि पर लोटकर अपने दुर्भाग्य पर उच्चस्वर में विलाप करने लगी। शायद माता पृथ्वी ही उन्हें कुछ सांत्वना दे! इसी समय सीता का रुदन सुनकर वहां से गुजर रहे वाल्मीकि के कुछ शिष्य वहां पहुंचे और एक राजरानी को इस तरह रोते देख कुछ समझ नहीं पाये...दौड़ते हुए वे वाल्मीकि के पास पहुंचे...और फिर वाल्मीकि जनकदुलारी को सांत्वना देते हुए अपने आश्रम लेकर आये। रघुवंश अनुसार सीता के रुदन स्वर का पीछा करते हुए वाल्मीकि स्वयं ही वहां पहुंच गये और सीता को अपने आश्रम चलने कहते हुए बोले कि मैंने समाधि से जान लिया है कि तुम्हारे स्वामी ने झूठी निंदा से क्षुब्ध होकर तुम्हें त्याग दिया है। राम के इस अनुचित व्यवहार के कारण मैं उनपर रुष्ट हूं किंतु तुम शांत हो जाओ। तुम समझो कि तुम दूसरे स्थान पर स्थित अपने पितृगृह ही पहुंची हो (14.72-73)। बंगला कृत्तिवास रामायण के अनुसार वाल्मीकि वस्तुत: सीता के इस तरह आने की प्रतीक्षा में ही थे क्योंकि उन्होंने पहले ही अपनी रामायण में सीता के त्याग का यह प्रसंग रच रखा था। फिर ऋषि वाल्मीकि आश्रम में सीता दो यमजों कुश और लव को जन्म देती हैं...ये दोनों वाल्मीकि से अनेकानेक विद्याओं के साथ-साथ उनके द्वारा रचित रामायण को वीणा की लय पर गाना सीखते हैं।
किंतु राम का क्या हुआ? सीता को छोड़कर रोते हुए सौमित्र जब राम के पास पहुंचे तो उनकी क्या अवस्था थी, यह तो हमने देखा ही नहीं? चलिये अयोध्या में देखते हैं। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार सौमित्र को समझ नहीं आ रहा था कि राम के पास जाकर क्या कहें। उन्होंने देखा, आंसुओं से भरी आंखें लिये अत्यंत विषादग्रस्त अग्रज एक सिंहासन पर बैठे थे। भाई को ऐसे दु:खी देख लक्ष्मण ने उनके चरण पकड़ लिये और दीन वाणी में बोले- महाराज की आज्ञा शिरोधार्य कर मैं शुभ आचरण वाली यशस्विनी जनककिशोरी को गंगातट पर वाल्मीकि के आश्रम के निकट छोड़ कर पुन: आपकी सेवा में आया हूं। आप जैसे बुद्धिमान और मनस्वी पुरुष शोक नहीं करते। संसार में जितने संचय है सबका अंत निश्चित है। उत्थान का अंत पतन है, संयोग का वियोग और जीवन का अंत मरण है। स्त्री, पुत्र, मित्र और धन में विशेष आसक्ति नहीं रखनी चाहिये क्योंकि उनसे वियोग होना निश्चित है। आप जैसे श्रेष्ठ पुरुष इस तरह के प्रसंग पर मोहित नहीं होते। (उ.कां.52.10-16)। लक्ष्मण के इन शब्दों ने राम को अत्यंत सांत्वना दी और फिर उन्होंने अपना कत्र्तव्य समझते हुए पुन: राजकाज करना प्रारंभ किया।
धीरे-धीरे समय आदतन सरकता गया। फिर वह समय भी आया जब भाइयों से विचार-विमर्श कर राम ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन नैमिषारण्य में किया। ...और इस यज्ञ में ही उनपर यह रहस्य खुला कि वाल्मीकि के प्रतिभावान शिष्य लव-कुश उनके अपने ही पुत्र हैं।
उल्लेखनीय है कि अनेक रामकथाओं में लव-कुश का राम के अश्वमेध यज्ञ हेतु छोड़े गये अश्व को पकडऩे के कारण भीषण युद्ध का वर्णन मिलता है जिसमें राम-पक्ष के सभी सेनानायक, भरत आदि पराजित होते हैं। यहां तक कि राम को भी दोनों भाई अचेत कर देते हैं। किंतु ऐसा कोई वर्णन वाल्मीकि-रामायण में नहीं है। यहां यज्ञस्थल पर दोनों यमजों से वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण का पाठ सुनकर राम को पता चलता है कि ये दोनों सीता के पुत्र हैं। तब वे ऋषि के पास संदेश भिजवाते हैं कि यदि सीता का चरित्र शुद्ध है तो वे कल भरी सभा में आकर अपने चरित्र की शुद्धता प्रमाणित करने के लिये शपथ लें। निश्चय ही यह सीता के लिये कठिन रहा होगा। किंतु वाल्मीकि-रामायण में यह सुनकर सीता की मनोदशा का कोई वर्णन नहीं है। राम के दूतों से उनका संदेश सुनकर वाल्मीकि बिना सीता से चर्चा किये स्वयं ही अपनी ओर से दूतों से कहते हैं कि ऐसा ही होगा। रघुनाथ की आज्ञा का पालन सीता अवश्य करेंगी क्योंकि स्त्री के लिये पति ही देवता है (वही, 95.10)।
और फिर दूसरे दिन नाना भांति के लोगों से भरी हुई यज्ञशाला में अश्रुमुखी तपस्विनी जनकनंदिनी वाल्मीकि के पीछे-पीछे हाथ जोड़े ऐसे आईं मानों ब्रह्मा का अनुगमन करती हुई श्रुति हो! उनकी पवित्रता का साक्ष्य स्वयं वाल्मीकि मुनि ने दिया...मैं प्रचेता का दसवां पुत्र हूं, मेरे मुख से कभी कोई झूठी बात नहीं निकली है। मैं सत्य कहता हूं ,ये दोनों पुत्र कुश और लव राम के ही पुत्र हैं। मैंने कई सहस्र वर्ष तक तपस्या की है...यदि सीता में कोई दोष हो तो मुझे उसका फल न मिले! (वाल्मीकि की यह शपथ किसी भी सहृदय की आंखों में समंदर लाने वाली है। क्या थे वाल्मीकि सीता के? कोई तो नहीं। फिर भी जनक से भी बढ़कर उनकी पीड़ा थी इस जनकात्मजा के लिये। इन वर्षों में पता नहीं कभी जनक ने अपनी दुलारी की खोज की भी थी या नहीं, पर सीता के चरित्र की प्रामाणिकता के लिये प्रचेता का यह पुत्र अपनी सारी तपस्या न्योछावर करने को तैयार था! धन्य हैं ऋषिवर!)
पर शायद इतना पर्याप्त नहीं था। राम स्वयं कहते हैं कि मुझे आपकी बातों में पूर्ण विश्वास है किंतु जनसमुदाय के बीच यदि वैदेही अपनी शुद्धता प्रमाणित करें, तो मुझे अधिक प्रसन्नता होगी। तब वैदेही एक शपथ लेती है, एक ऐसी शपथ जो दिल दहलाने वाली तो थी ही, साथ ही परम कारुणिक भी थी। दोनों हाथ जोड़कर वसुधा की वह पुत्री कहती हैं-यदि मन, वाणी और क्रिया से मैं केवल श्रीराम की आराधना करती रही हूं तो भगवती पृथ्वी मुझे अपनी गोद में स्थान दें। श्रीराम को छोड़कर मैं किसी अन्य पुरुष को नहीं जानती, यदि यह सत्य है तो भगवती पृथ्वी मुझे अपनी गोद में स्थान दें।
इसी क्षण अचानक वहां एक चमत्कार हुआ। सीता के यह शपथ लेते ही धरती में हलचल होने लगी...और सबके देखते ही देखते धरती के भीतर से एक दिव्य सिंहासन पर बैठी देवी वसुन्धरा प्रगट हुईं और फिर बड़े आदर और प्रेम से अपनी पुत्री को सिंहासन पर बिठाकर वे रसातल में समा गईं। इस चमत्कार को देख अयोध्यावासी साध्वी सीता का जयकार करने लगे...सीता की शुचिता सबने अश्रुमुख से स्वीकार की। किंतु इस घटना ने राम को भीतर तक हिला कर रख दिया। पृथ्वी देवी से उन्होंने प्रार्थना की कि या तो मेरी सीता को मुझे लौटा दो या मुझे भी अपनी गोद में स्थान दो। मैं अपनी सीता के साथ ही रहूंगा...नहीं तो मैं समस्त पर्वतों व वनों सहित आपको समूल नष्ट कर दूंगा! अंतत: देवताओं के समझाने पर श्रीराम किसी तरह शांत हुए...और इस तरह परमपवित्र देवी सीता की करुण-गाथा समाप्त हुई (वही, सर्ग 97-98)।
अस्तु, सीता का यह अंत सुखद तो नहीं कहा जाएगा किंतु मुझे लगता है कि वाल्मीकि ने उन्हें राजा राम को न लौटा कर पृथ्वी के गर्भ में भेज कर एक अच्छा अंत किया है...अवध के जिस पुरुष-समाज ने सीता के चरित्र पर संदेह किया उसे पश्चाताप की अग्नि में जलना ही चाहिये था ना?
वैसे कुछ रामायणकारों ने वाल्मीकि से हट कर सीता को राम के पास पहुंचाया है और इस तरह इस कथा का सुखांत किया है। वस्तुत: रामकथा के इस संवेदनशील प्रसंग पर विभिन्न लेखकों ने अपने-अपने तरीके से कलम चलाई है। कुछ ने वाल्मीकि का अनुकरण किया तो कुछ ने उसमें पर्याप्त परिवर्तन किया। सीता की भावनाओं पर भी अलग-अलग ढंग से चित्रण देखने मिलता है। कहीं वाल्मीकि की सीता के समान मौन भाव से वह सब कुछ सहती है तो कहीं मुखर होकर रोष प्रकट करती है। कहीं राम का पश्चाताप है और कहीं राम की माताओं और गुरुजनों की पीड़ा भी चित्रित है। कहीं-कहीं अग्नि-परीक्षा के समान यह प्रसंग भी राम और सीता के अवतारत्व के अनुकूल उन दोनों की सहमति से किया गया बताया गया है जिसका दोनों में से किसी को मलाल नहीं है।
चलिये विभिन्न रामायणों के पन्नों में अंकित इस सारे प्रसंग को एक के बाद एक देखें। हां, जिन रामकथागायकों को यह प्रसंग पसंद नहीं आया उनका भी उल्लेख करेंगे, तभी तो उन्होंने यह रामकहानी अपनी रामायण में वहीं समाप्त कर दी जहां राम-सिया अवध लौट कर राजा-रानी बन कर सुख से रहते हैं।
अन्य रामायणों में सीता का त्याग-जैसा कि हमने प्रारंभ में देखा, वाल्मीकि-रामायण में लोक में फैली सीता-विषयक निंदा को सीता के त्याग का कारण बताया गया है। यहां किसी धोबी का उल्लेख नहीं है जिसने घर से एक रात बाहर रही अपनी पत्नी को यह कहते हुए पुन: रखने इंकार कर दिया था कि मैं कोई राम नहीं हूं जिन्होंने पराये घर में रह चुकी सीता को रख लिया है किंतु लोक में सीतात्याग का यही कारण सर्वाधिक जाना जाता है तथा कुछ रामकथाओं में इसका उल्लेख भी है। सीता-त्याग का एक और कारण स्वयं सीता द्वारा रावण का धोखे से चित्र बनाना भी किसी-किसी रामकथा में बताया गया है। बंगला कृत्तिवास रामायण में तीनों कारणों का एक साथ उल्लेख है। कृत्तिवास लिखते हैं-दुर्मुख जब राम को लोक में फैली सीता विषयक निंदा बताता है, तब अभिमाने श्रीरामेर चक्षे झरे पानी अर्थात् अभिमान से उनकी आंखों से अश्रुनिकलने लगते हैं और वे अकेले ही स्नान हेतु सरोवर की ओर चल देते हैं। वहां वे घाट पर दो धोबियों, जो ससुर-दामाद थे, के मध्य वार्तालाप सुनते हैं जिसमें दामाद अपने ससुर की पुत्री को अपनाने से इंकार करता है, यह कहते हुए कि तुम्हारी पुत्री तुम्हारे ही घर में रहे क्योंकि वो मुझे बताये बिना रात में घर से निकल गई थी। पता नहीं वह रात में कहां रही? मैं कोई राजा राम नहीं हूं जिसने रावण की लंका में रह चुकी सीता को अपना लिया है। यह सुनकर राम सन्न रह जाते हैं। अत्यंत दु:खी हो वे महल में लौटते हैं। उस समय सीता पांचवे माह की गर्भवती थी। महल में उसकी सखियां उनका मनोरंजन करती बैठी थीं। किसी ने पूछा, रावण कैसे दिखता है? आप उसका चित्र बनाये ताकि हम उसपर पाद-प्रहार कर सकेें। तब सीता ने खडिया से भूमि पर चित्र बनाया। इसी समय गर्भवती होने के कारण उन्हें नींद आ गई और वे वहीं सो गईं। इधर राम को आया देखकर सखियां चली गईं। तब सीता द्वारा बनाये रावण के चित्र को देखकर राम सीता के त्याग का मन बना लेते हैं और इस हेतु लक्ष्मण को आदेश देते हैं। यहां लक्ष्मण राम का मुखर विरोध करते हैं कि रघुवंश नष्ट हबे सीता दिले शाप सीता छाड़ा हैले हबे हत अर्थात् निर्दोष सीता का त्याग करने से उसका शाप रघुवंश को नष्ट कर देगा। इससे अच्छा है कि उन्हें अपने से अलग महल में रख दो। पर राम तैयार नहीं होते (कृ.रा.उ.कां.सीता का अपयश)। अंतत: लक्ष्मण को मजबूर होकर सीता को लेकर वन जाना पड़ता है। कवि ने यहां सीता और सौमित्र का सुंदर वार्तालाप डाला है। लक्ष्मण जब सीता के महल यह कहने पहुंचते हैं कि कल प्रात: वनभ्रमण के लिये चलने तैयार रहना तब सीता उनसे परिहास करती हैं कि राज्यलक्ष्मी पाकर तुम मुझे भूल गये हो। हमने चौदह वर्ष वन में साथ-साथ बिताये हैं। मैंने कितनी ही बुरी बातें तब तुमसे उदंडता में कही थी। लगता है, इसी से देवर तुम निर्मम हो गये हो। इस पर लक्ष्मण उदास हो कहते है , 'आप महारानी हैं, अंत:पुर में रहती हैं, सेवक क्या यहां बिना आदेश के आ सकता है?Ó इस समय लक्ष्मण का उदास चेहरा देख सीता परेशान होती हैं और उनसे इस उदासी का कारण भी पूछती हैं किंतु लक्ष्मण कुछ नहीं कहते, बस 'कल प्रात: महाराज के आदेशानुसार आपकी इच्छा पूरी करने वन ले जाना है, आप तैयार रहनाÓ, इतना कहते हैं।
 दूसरे दिन जनकनंदिनी प्रसन्नमन से रथ पर बैठकर वन की ओर जाती है। अचानक राह में असगुन देख सीता भयभीत हो जाती है। सौमित्र से वे कहती भी हैं कि यह असगुन क्यों हो रहे हैं? लगता है मैं अब अयोध्या नहीं लौटूंगी! बेचारे सौमित्र! क्या कहते। चुपचाप सिर झुकाये चलते रहे। और फिर वाल्मीकि के आश्रम में पहुंच कर, दिल पर पत्थर रख, सौमित्र जनकदुलारी को महाराज का आदेश सुनाते हैं। आश्चर्य-विदग्ध सीता दु:खी हो कह उठती है ,'इतनी दूर लाने के बाद तुम मुझे यह कह रहे हो! तुम मुझे कपटपूर्वक यहां लाये! राम ने मेरा अपमान किया है। यदि मुझे देश में नहीं रखना था तो अग्निपरीक्षा लेकर मेरा अपमान क्यों किया? बिना अपराधे त्याग करिला आमाय स्वामी अर्थात प्रभु ने बिना अपराध के ही मेरा त्याग किया है। मैं अभी तुम्हारे सामने ही यमुना में कूदकर प्राण तज देती पर देखो मुझे पांच माह का गर्भ है। मेरे मर जाने पर राम की संतान भी मर जायेगी।Ó सौमित्र बेचारे क्या कहते...नयननीर लिये चुपचाप लौट गये। आगे सीता को छोड़कर लौटे लक्ष्मण का राम से संवाद बड़ा भावुक है। कवि लिखते हैं, सीता को वन में छोड़कर लौटे लक्ष्मण को अकेले देख राम सीता के लिये दु:खी होते हैं। सीता वन में कैसे रहेंगी यह प्रश्न तो था ही उनके सामने, पर यह चिंता भी थी कि वे राजा जनक का क्या उत्तर देगें? इस पर लक्ष्मण कहते हैं-आपने ही तो उन्हें वन में छोडऩे का आदेश दिया था। आप कहें तो मैं तुरंत जाकर रात उन्हें वापस ले आऊं?...पर इससे तो और निंदा होगी, कहते हुए राम कातर हो रोने लगते हैं। फिर वे तभी शांत होते हैं जब लक्ष्मण सीता की स्वर्णप्रतिमा बनवाकर राम के सामने रखते हैं।
अस्तु, कृत्तिवास रामायण में भी फिर 12 वर्ष बाद सीता की पुन: परीक्षा की बात उठती है। यहां नई बात यह है कि राम की तीनों माताएं इसके लिये उन्हें मना करती हैं क्योंकि राम पहले ही लंका में सीता की परीक्षा ले चुके थे। वे यह भी कहती हैं कि सीता का कोई पाप नहीं है। उसे तुम लेकर अपने ही महल में रखो। इससे जनक भी संतुष्ट हो जाएंगे। किंतु राम लोक-संतुष्टि के लिये सीता की परीक्षा आवश्यक बताते हैं। (उ.कां.सीता का पाताल प्रवेश) यहां यज्ञशाला में पुन: परीक्षा की बात सुनकर अपमानित सीता बोल पड़ती हैं-लंका में अग्नि की परीक्षा लेकर भी आप मेरा अपमान करते हैं? आपके कारण पटरानी होते हुए भी मुझे वनवासी का जीवन जीना पड़ा। मुझे न पतिकुल में न पितृकुल में स्थान मिला। पर अब मैं और परीक्षा नहीं दूंगी। अब मैं सदा के लिये आपकी आंखों से ओझल हो जाऊंगी ताकि आपकी सारी लज्जा और दु:ख मिट जाये। सीता यह भी कहती है कि जन्म-जन्म में आप ही मेरे पति हो किंतु किसी और जन्म में मेरी ऐसी दुर्गति न करें..और फिर सीता धरती की स्तुति कर उसमें समा जाती हैं (वही)।
असमिया रामायण माधवकंदली में भी सीता अपेक्षाकृत मुखर है, तेज है और राम के इस कृत्य से अत्यंत दुख और अपमान का अनुभव करते हुए जी खोलकर उनकी निंदा करती हैं। राम के यज्ञ में रामकथा का गायन करते हुए लव-कुश  जब यह बताते हैं कि गर्भवती सीता पर राम के द्वारा त्यागे जाने पर क्या बीती तब राम अचेत हो जाते हैं...और जब उन्हें यह ज्ञात होता हैं कि ये दोनों सीता के ही पुत्र हैं, तब उन्हें गले लगाकर सिंहासन पर बैठाते हैं तथा पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए सीता को लाने हनुमान, शत्रुघ्न, सुषेण और सुग्रीव, ये चार दूत भेजते हैं। सीता को तपस्विनी के वेश में देख चारों रोने लगते हैं तथा राम की दुखद मनोदशा का वर्णन करते हुए उनसे कहते हैं कि आपके जाने के बाद से आपके वियोग में राम के नेत्रों से बहने वाली आंसुओं की धारा टूटती ही नहीं है। राम तो सोचते थे कि आप जीवित नहीं है। महल में भी वे वनवास से कम कष्ट नहीं भोग रहे हैं। यह जानकर कि लव और कुश उनके ही पुत्र हैं तथा आप जीवित हैं, वे स्वयं आपको लेने सारे परिजनों के साथ आ रहे थे किंतु वशिष्ठ मुनि ने उन्हें यह कहकर रोक दिया कि सीता का तुम्हारे प्रति विराग हो गया है, अत: वह तुमसे भेंट नहीं करेंगी, अच्छा यह होगा कि तुम ऐसे लोगों को सीता को लाने भेजो जो अनुनय-विनय कर उन्हें ला सके...अत: राम ने हमें भेजा है। चारों ने राम का यह संदेश भी कहा है कि यदि सीता नहीं आई तो मैं भी उसके साथ आश्रम में ही रहूंगा...सीता के वियोग में मेरे प्राण छाती फाड़कर निकले जा रहे हैं। सीता को देखने पर पुन: उनके द्वारा मुझे जीवनदान मिलेगा...और फिर चारों हाथ जोड़कर वैदेही से यह भी कहते हैं कि राम ने आपके लिये पालकी भेजी है, आप हमारे साथ चलिये। किंतु जानकी के लिये राम का यह निमंत्रण तीक्ष्ण बाण से कम पीड़ादायक नहीं था। उनकी आंखों से अश्रुबहने लगे, अपमान से शरीर जलने लगा। चारों को संबोधित कर वे कह उठीं-मुझे अब क्यों तंग कर रहे हो? मैं तो सब कुछ भूल चुकी थी, फिर से शरीर में अग्नि क्यों जला रहे हो? पुन: अयोध्या जाकर राजसुख भोगूं, राघव की गृहिणी कहलाऊं, तब तो मेरी जैसी निर्लज्ज नारी और कोई नहीं होगी...नाइ तेवे निलाजिनी नारी मोत परे। राम को अब मेरे लिये कुछ करना शेष नहीं रहा। उन्होंने तो मुझे गर्भ-सहित मार डालने की व्यवस्था कर दी थी। मैं तो अपने बच्चों के कारण अब तक जीवित हूं। आगे जानकी हनुमान से कहती हैं- दुखर सहाय शुना हनुमान बाप...हे मेरे दुखों में सहायक पिता हनुमान ! अब मेरे लिये दु:ख करना छोड़ दो। समझ लो कि राम का और मेरा संबंध कट चुका है। मैं अपने मन में समझ गई हूं कि स्वामी ही मेरे लिये यम-काल है। यदि अब मैं उनके सामने गई तो वे अवश्य ही खड्ग से मुझे मार डालेंगे। यदि मैं जानती कि राम ऐसे निर्दयी हैं तो लंका में ही प्राण तज देती। आगे सीता सबसे विनती करती हैं, उन्हें शपथ देती हैं कि आगे कभी राम का नाम उनके सामने न लेना। बेचारे दूतगण! किस मुख से अब वे सीता को चलने कहते।
तब सीता के द्वार से खाली हाथ लौटते समय अत्यंत निराशा की घड़ी में उनकी वाल्मीकि से भेंट होती है। वाल्मीकि उन्हें आश्वस्त कर विदा करते हैं कि कल प्रात: मैं सीता को लेकर राज्यसभा में आऊंगा। अब वाल्मीकि की बात तो सीता टाल नहीं सकती थी अत: उन्हें राम के समक्ष राजसभा में जाना पड़ा। उस समय सीता की स्थिति का ,और फिर सीता के पृथ्वी-प्रवेश का, बहुत सुंदर वर्णन कवि माधवदेव ने किया है। हर्रे के रंग में रंगी साड़ी पहने सीता भरी सभा में वाल्मीकि के पीछे-पीछे अपमान और लज्जा से संकुचित हो आ रही थी। उनके पैर आगे बढ़ ही नहीं रहे थे। बलात जैसे वह उन्हें घसीटे जा रही थी। उनके चरणों से मानों रक्त बह रहा था। कौशल्या आदि रानियां और अन्य स्त्रियां सीता की दुर्दशा देख रो रहीं थीं किंतु अब सीता आ गई है यह सोच प्रसन्न भी हो रही थीं। सब सीता को देखने लालायित थे किंतु सीता किसी की ओर न देख अश्रु प्रवाहित करते हुए अधोमुखी ही बढ़ती गईं। सभा में वाल्मीकि सीता की पवित्रता की शपथ लेते हैं। यहां राम वाल्मीकि की बातों को स्वीकार कर बार-बार अपने वस्त्रों से आंखों को पोंछते हुए भरत की ओर इशारा करते हैं। तब तीनों भाइयों ने सीता को रत्नजडि़त सिंहासन पर बैठने का अनुरोध किया पर सीता अश्रुमुखी खड़ी ही रहीं। माता कौशल्या ने भी प्रेम से सीता को सिंहासन पर बैठने कहा किंतु सीता के नयन बरसते ही रहे। वस्तुत: क्रोध के कारण उनका चित्त अत्यंत अशांत था। बार-बार वे कटाक्ष से राम को देखने लगीं। राम तो उन्हें स्नेह से देख रहे थे किंतु सीता की नजरों में कहीं स्नेह नहीं था। सीता तो मानो अग्निशिखा के समान जल रही थीं (मा.कं.7075)। सीता का क्रोध इतना प्रचंड था मानो शाप देकर वह राम को भस्म कर डालेगी। राम, सारे सभासद तथा देवगण भी सीता का चेहरा देखकर भयभीत हो गये। तब लज्जा छोड़ कोप और अपमान से रक्तिम अंाखों वाली सीता सभासदों से बोल पड़ी-हे सभासदों! मेरी बात सुनो। सब जानते हैं कि ये मेरे स्वामी है। इनके पीछे मैं वन को गई थी। ये मेरी रखवाली नहीं कर सके और रावण मुझे हर कर ले गया। लंका में मैं मर जाना चाहती थी किंतु हनुमान ने मुझे रोका। रावण को मारकर स्वामी मुझे ले आये। लंका में अग्नि डालकर इन्होंने मेरी परीक्षा भी ली, तब भी इनका चित्त शांत नहीं हुआ (वही, 7080)! कुछ दुष्टों ने अपयश लगाया और इन्होंने मुझे छल से वन में निर्वासित कर दिया...स्वामी की यह कैसी मर्यादा है? इन्होंने मुझे गर्भ में ही मेरे दोनों पुत्रों सहित मार डाला चाहा। इन स्वामी के गुणों को कहने में मेरा शरीर जलने लगता है। सब लोग ऐसे राम को उत्तम-उत्तम कहते हैं पर मैं जानती हूं कि राम ही मेरे लिये यमकाल हैं। अब क्या सोचकर मैं इनका मुख देखूं (वही,2086)? अंतत: यहां भी जानकी भूमि में समा जाती हेै।
कवि प्रकाशराम की कश्मीरी रामायण रामावतार में भी सीता की यह गाथा बड़ी हृदयविदारक है। यहां सीता के त्याग का कारण उनकी एक ननद बनती है। कवि लिखते हैं-वनवास से लौटने के बाद सीता के जीवन में खुशियां आईं। दिन बहार के थे और जमीन जाफरानी केसरिया रंग की हो गई थी। इधर अभ्र (बादल) से निकलकर अमृत की एक बूंद अपने तन को सीपी में ढालकर मोती का स्वरूप धारण करने लगी। अन्य सीपियां उस सीपी को देखकर ईष्र्या करने लगी। सीता की एक छोटी ननद ने उसकी दुपहरी को शाम में बदल दिया। सीता को भोग करते देख उसके घुटने जैसे टूट गये। एक दिन उसने पूछा दशानन कैसे दिखता है? जिद कर वह सीता से उसका चित्र बनाने कहती है। फिर चुपचाप उसको दिखाकर झूठ कहती है कि सीता इसे देखकर विलाप करती है। जब से मैंने उसे चुराया है वह छाती पीटती रहती है। इधर धोबी का उलाहना भी था ही सो राम ने सीता का त्याग कर दिया तब न चाहते हुए भी लक्ष्मण को राम की आज्ञा से सीता को वन में छोडऩा पड़ा। ...आगे की कथा यहां वाल्मीकि के समान ही है। किसी तरह वाल्मीकि के आश्रम में सीता यमजों को जन्म देकर उनकी परवरिश करते हुए वहां रहती हैं। किंतु वर्षों बाद राम से जब उनकी मुलाकात होती है तो उस अभिमानिनी का वर्षों से संचित छाती में समाया लावा मानो फूट पड़ता है। यहां लव-कुश से युद्ध के बाद राम स्वयं वाल्मीकि-आश्रम में सीता को लेने जाते हैं। उन्हें देखकर वह कुटिया का द्वार बंद कर लेती हैं। राम सारी रात सीता को द्वार पर खड़े-खड़े मनाते हैं। बार-बार क्षमा मंागते हैं। घर चलने की मनुहार करते हैं। अपनी गृहस्थी संभालने कहते हैं। पर सीता किसी भी तरह द्वार खोलने तैयार नहीं हुई। यहां सिया के राम से संवाद अत्यंत हृदयस्पर्शी है। वे कहती हैं-अब यही कुटिया मेरा मायका है। आप चले जाइये। मेरा जिगर जल रहा है। मैं असहाय एकाकी और बेकस ही ठीक हूं। मैं अब मासूम नहीं कि आपकी बातों से बहक जाऊं। मुझे डर है कि वह लक्ष्मण मुझे किसी अन्य वन में न छोड़ आये। मेरी जवानी सूख गई है। अब भला आपका भार मैं कैसे उठा सकूंगी? अब मुझमें ताकत नहीं रही। आपने मुझ महकती माधवी को समूल उखाड़ डाला है, मैं कोई ऐसी वैसी नहीं बल्कि सीता थी जिसे आपने एक बार आजमा कर फिर आजमाना चाहा। आपने मुझे चीलों और कौवों को खाने के लिये छोड़ दिया। मैंने आपको बहुत आवाजें दी पर आपने जवाब नहीं दिया। जिसने आपके लिये प्रेम से पुष्पों के गुलदस्ते बनाए उसका आपने तिरस्कार किया है...इसीलिये संबंध न बढ़ाने का मुझे प्रण लेना पड़ रहा है।...और सीता द्वार नहीं खोलती। तब महर्षि  राम से कहते हैं कि आपने मैथिली को त्यागकर उसकी प्रीति को भुला दिया है। पर वे वायदा भी करते हैं कि आप घर जाइये, यज्ञ की तैयारी कीजिये, मैं किसी तरह इसे समझा कर ले आऊंगा।...दूसरे दिन मुनि कहीं शाप न दे दे, इस भय से सीता उनके साथ अयोध्या बेमन से जाती है। पर यहां राम द्वारा पुन: सतीत्व की परीक्षा देने की बात सुन वह भड़क जाती है और पृथ्वी की गोद में चली जाती है। यहां कवि कहते हैं कि वह स्थान जहां सीता पृथ्वी में समाई थी, कश्मीर में शंकरपुर नामक गंाव में है जो कवि के जन्मस्थान कुर्यग्राम से एक कोस दूर है।
सीता-त्याग, वाल्मीकि रामायण का प्रक्षिप्त अंश-गर्भवती सीता के त्याग एवं फिर ़िद्वतीय परीक्षा की कथा राम के चरित्र को निश्चय ही कमजोर करती है विशेषरूप से वाल्मीकि द्वारा उन्हें पुरुषोत्तम राम के रूप में चित्रित करने का उद्देश्य कमजोर होता है। विद्वानों का कहना कि यह वाल्मीकि रामायण का प्रक्षिप्त अंश है अर्थात् स्वयं वाल्मीकि ने इसे नहीं रचा है, सही ही है। वस्तुत: वाल्मीकि-रामायण का पूरा उत्तरकांड ही स्पष्ट रूप से प्रक्षिप्त अंश लगता है। कामिल बुल्के के अनुसार इनमें निहित त्रुटियां तथा इसकी कमजोर भाषा से सिद्ध होता है कि इसकी रचना वाल्मीकि ने नहीं की है। भिन्न-भिन्न कवियों के द्वारा यह रचित हुआ है। इसके अतिरिक्त भी सीतात्याग को प्रक्षिप्त कहने हेतु कुछ तर्क दिये जा सकते हैं। पहली बात तो सीता का सतीत्व लंका में हो चुका था जिसके गवाह स्वयं देवतागण बने थे। पिता दशरथ ने भी सादर राम को स्वीकार करने कहा था। फिर साक्षात् अग्निदेव ने राम से कहा था...मैथिली से आप कोई कठोर बात कभी मत कहना..यह मैं आपको सौंपता हूं...तब राम ने भी कहा था, मैं इसे कभी छोड़ नहीं सकता। तो इसके बाद राम द्वारा किसी व्यक्ति के कहने से सीता का त्याग उनके चरित्र के अनुकूल प्रतीत नहीं होता।
फिर जो राम सीता के वियोग में इतने व्याकुल थे, जो क्रौंच-वध से दुखी क्रौंची के समान दिन-रात प्रिया के लिए विलाप करते थे...जिन्होंने एक क्षण के लिए भी यह विचार मन में नहीं लाया था कि सीता कहीं अब तब अपवित्र तो नहीं हो चुकी होगी, या अब ऐसी स्थिति में उसे खोजने का क्या लाभ...वे सीता के साथ ऐसा व्यवहार कैसे कर सकते थे? अवश्य वे सौमित्र को शक्ति लगने पर उन्हें मरणासन्न देख विलाप करते हुए कहते हैं कि मैंने स्त्री के लिये सहोदर भ्राता को खो दिया किंतु युद्ध के अवसर पर भी उनका सीता-प्रेम कम नहीं था। रामायण के युद्धकांड में वर्णन है कि इन्द्रजित राम का मनोबल तोडऩे के लिये माया की सीता बनाता है और उसे रथ पर बैठाकर युद्धभूमि में लाता है तथा हनुमान आदि के सामने उन्हें मार डालता है। तब यह समाचार सुन श्रीराम जड़ से कटे वृक्ष के समान तत्काल पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। उन्हें मुश्किल से होश में लाया जाता है। लक्ष्मण की गोद में मूर्छित पड़े राम तभी स्वस्थ होते हैं जब विभीषण उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि रावण सीता का वध कभी नहीं होने दे सकता, वह अवश्य ही माया की सीता रही होगी(यु.कां.84.13)।...तो ऐसे राम कैसे सीता का त्याग कर सकते थे?
एक और बात, जिस राम ने गौतमपत्नी अहल्या (जिसने इन्द्र की वास्तविकता जानकर भी उससे समागम किया था) का न केवल उद्धार किया था, वरन् सादर चरणवंदन कर गौतममुनि को सौंपा था, जिस राम ने यह जानते हुए भी कि बाली सुग्रीव की पत्नी का उपभोग कर रहा है, बाली का वध कर सुग्रीव से उसे मिलाया था, वह भला हर तरह से जांची-परखी गई अपनी प्राणसखी पर यह जुल्म, वह भी गर्भावस्था में, कैसे कर सकते थे? आश्चर्य तो उन कवियों पर होता है जिन्होंने बढ़चढ़ कर सीता-त्याग का वर्णन किया है...भले ही इससे उनके रामभद्र का चरित्र अत्यंत कमजोर दिखता हो।
यहां एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी है कि जिन अयोध्यावासियों ने सीता के अयोनिजा होने की बात को सहज स्वीकार कर लिया था, वे रावण की लंका में अशोकवाटिका में रही सीता पर कैसे संदेह कर सकते थे?
कथा के पक्षधर यहां राम के चरित्र का एक उज्ज्वल पक्ष यह बताते हैं कि राम ने राजधर्म को स्वयं की हानि से बढ़कर समझा। सीता के बिना जीवन उनके लिये व्यर्थ था किंतु राम ने फिर भी राजधर्म का कठोरतापूर्वक पालन किया, व्यक्तिगत हानि-लाभ से इसे ऊपर स्थान दिया। राजा को ऐसा होना भी चाहिये था। किंतु बात फिर निकलती है कि किसी भी राज्य में एक पर भी अन्याय क्या अन्याय नहीं है? क्या सीता राम की प्रजा में नहीं आती थी? क्या उन्हें अपना पक्ष रखने का अधिकार नहीं था? राजा हरिशचन्द्र से हम यहां तुलना कर सकते हैं जिन्होंने पत्नी का आधा वस्त्र लेकर ही उसे उसके पुत्र का अंतिम संस्कार करने दिया था किंतु वह वहां एक कत्र्तव्य का पालन कर रहे थे। जो नियम अन्यों के लिये लागू था, वह उनकी पत्नी और पुत्र के लिये भी था। किंतु यहां तो राम ने सीता की पहले ही अग्निपरीक्षा लेकर उनकी शुचिता का प्रमाण ले लिया था। वैसे भी एक अबला नारी का अपहरण उसका दोष नहीं है। हर अपहृत नारी किसी की मां, किसी की पुत्री तो किसी की पत्नी होती है। मानवीय दृष्टि से सोचे तो बिना किसी अपराध के दंड देकर पुरुषसमाज पहले से ही जुल्म की शिकार बनी अपनी ही मां, बहन, पत्नी पर एक और जुल्म कर अमानवीय परम्परा का सृजन करता है। सीता का निष्कासन ऐसी ही परम्परा का समर्थन कहा जायेगा।
ऐसा लगता है कि कथा को ज्यादा कारुणिक बनाने के लिये या कहिये कि उपरोक्त परम्परा को पुष्ट करने के लिये यह बात कवियों ने बाद में गढ़ी जिसे रामायण में जोड़ा गया। साथ ही लोक में स्त्री की पवित्रता पर बल देने के लिये तथा उन्हें यह सबक सिखाने के लिये भी यह कथा जोड़ी गई। वस्तुत: यह पुरुष समाज की मानसिकता का प्रतीक है जो स्वयं के लिये तो बहुपत्नीत्व को शान समझते रहा है किंतु अपनी पत्नी के लिए परपुरुष का बलात् हुआ स्पर्श भी उसे गंवारा नहीं। इसीलिये हमारे देश में स्त्री की पवित्रता का गुणगान किया गया। उसे यही सिखाया गया कि परपुरुष के साथ रहने से वह अपवित्र हो जाती है, अत: त्याज्य हो जाती है। इसलिये हर कीमत पर वह अपनी पवित्रता की रक्षा करें, चाहे इसके लिये उसे आत्मघात ही क्यों न करना पड़े। भारत में सतीप्रथा के चलन के पीछे स्त्री की पवित्रता की रक्षा भी एक कारण रहा है।
पवित्रता बुरी चीज नहीं है। पुरुष स्त्री दोनों के लिये परस्त्री या परपुरुष से संबंध बनाना कई तरह की विकृतियों को जन्म देता है किंतु जनकदुलारी तो पूरी तरह निर्दोष थीं। अत: उनकी अग्नि-परीक्षा और वनवास किसी भी तरह उचित नहीं कहे जा सकते। हां, एक बात इस संदर्भ में अच्छी हुई, अग्नि-परीक्षा का उल्लेख तो प्राय: सभी रामकथाकारों ने किया किंतु सीता के त्याग एवं पुनर्परीक्षा को या फिर सीता के भूमिप्रवेश को अनेक रामकथाकारों ने विलोपित किया है। कुछ ने इसका सुखांत किया है। कुछ भक्तिपरक रामायणों ने अग्नि-परीक्षा के समान इसमें भी राम और सीता दोनों की सहमति बनाते हुए भक्ति-भावना को सुरक्षित रखा है। इस धारणा के चलते कि किसी भी परिणाम के पीछे कोई न कोई अच्छा या बुरा कर्म कारक होता है, कहीं-कहीं राम या सीता को मिले शाप का उल्लेख भी किया गया है। आगे हम एक-एक कर इस कारुणिक प्रसंग की स्थिति को विभिन्न रामकथाओं में देखेंगे।
 सीता-त्याग का विलोपन-जिन रामायणों से सीतात्याग का विलोपन किया है उनमें तमिल कंबरामायण, तेलुगु रंगनाथरामायण, ओडिय़ा वैदेही विलास, ओडिय़ा जगमोहनरामायण, तेलुगू मोल्लरामायण, मराठी भावार्थ रामायण, संस्कृत भट्टिकाव्य एवं रामचरितमानस आदि प्रमुख हैं। इनमें रामकथा वहीं समाप्त हो जाती है जहां लंका-जय के बाद राम सीता को लेकर अयोध्या आते हैं।  
दक्षिण भारतीय रामायणों में तमिल कवि कंबर की कंबरामायण सर्वाधिक ख्यात है। इसमें सीता का परित्याग नहीं है। यहां रामराज्य की प्रशंसा करते हुए राम कथा का अंत है जहां सब सुखी हंै। ओडि़य़ा रामायण वैदेही विलास में रामराज्य की प्रशंसा करते हुए रामकथा का अंत है जहां सब सुखी हंै, सब स्वस्थ हैं। इसमें राम के अयोध्या लौटने एवं अयोध्या में राज्याभिषेक तक का वर्णन 52 छंदों में किया गया है। शेषकथा याने वैदही का त्याग तथा उनकी पुन: परीक्षा आदि के विषय में कवि कहते हैं कि उन्होंने यह नहीं लिखा है क्योंकि यह विषय विभंग-रसाश्रित है अर्थात् इससे रसभंग होता है (वै.वि. 52.41-46)।
 कन्नड़ कवियत्री मोल्ल ने अपनी मोल्लरामायण में संभवत: स्त्री होने के कारण सीता की पीड़ा को समझते  हुए सीतात्याग को अपनी रामायण से विलोपित किया है। कन्नड़ कौषिकरामायण में उत्तरकंाड नहीं है। युद्धकांड के बाद रामकथा समाप्त हो जाती है जब राम-सीता अयोध्या लौटते हैं और राम अयोध्या के राजसिंहासन पर विराजमान होते हैं। इस तरह यहां भी सीता का त्याग नहीं है। मराठी भावार्थरामायण में भी सीता का त्याग नहीं है। इस रामायण के युद्धकांड के 44वां अध्याय लिखने के बाद इसके रचयिता संत एकनाथ ने महासमाधि ले ली थी। शेष अध्याय उनके शिष्य गावबा ने लिखे है किंतु यहां भी सीता के अयोध्या लौटने के बाद रामायण समाप्त हो गई है। महाभारत के रामोपाख्यान में तथा प्राचीन पुराणों, जैसे- हरिवंश, वायु, विष्णु, नृसिंह में भी सीतात्याग का उल्लेख नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण योगदान मुझे तुलसीदास का लगता है जिन्होंने अपने रामचरितमानस में सीता-त्याग नहीं लिखा है। मानस में लवकुश के जन्म के समय के संबंध में उल्लेख है कि अवध के लोग सुरदुर्लभ भोगों का भोगते हुए हर्षित थे। सभी राम के चरणों में प्रेम चाहते थे श्रीरघुबीर चरन रति चहहि। अगली पंक्तियों में तुलसी लिखते हैं-
         दुइ सुत सुंदर सीता जाए। लव कुस वेद पुरानन्ह गाये।
          दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुं अति सुंदर।। (मानस,उ.कां. 25.3-4)
उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध उपन्यासकार अमृतलाल नागर ने तुलसीदास के जीवनचरित्र को लेकर एक उपन्यास लिखा है ,'मानस का हंसÓ । उपरोक्त संदर्भ में लेखक ने तुलसीदास के मनोभावों को सुंदर ढंग से दर्शाया है। यहां तुलसीदास की पत्नी रत्नावली उनसे पूछती है कि महर्षि वाल्मीकि ने उत्तरकांड में धोबी की निंदा सुनकर श्रीराम के द्वारा सीता के त्याग का करवाया है। आपने मानस में वह प्रसंग क्यों नहीं उठाया? इस पर तुलसी कहते हैं कि जो अन्याय मैं तुम्हारे प्रति कर सका, वह मेरे राम जगदंबा के प्रति नहीं कर सकते थे (पृ.411)।
इस संदर्भ में मुरारी बापू हरियाणवी भावार्थ रामायण में कहते हैं- तुलसी ने सोचा अब दु:ख की हद हो गई है। अब जंगल में सीताजी को भेजकर जंगल की कुटिया में पुत्रों का जन्म हो ,यह तुलसीदास को अरुचिकर लगा। अत: उनकी सीता राजमहल में ही दो पुत्रों की जननी बनी। तुलसी की दृष्टि है कि एक बार मानव-हृदय-सिंहासन पर रामसीता बैठ जाएं तो फिर उन्हें अलग नहीं करना है (पृ.716)।
वैसे मानस के कुछ संस्करणों में 'लवकुशकंाडÓ मिलता है जिसमें सीता के त्याग और वाल्मीकि आश्रम में लवकुश के जन्म की कथा है किंतु यह स्पष्टत: प्रक्षिप्त अंश है।
पर हां, लगता है तुलसी बाबा को भी अन्य रामकथाओं से सीतात्याग की बात सुनकर कहीं न कहीं इनकी सीता के मन की कसक पीड़ा दे रही थी। शायद इसलिये उन्होंने अपनी दो अन्य लघु रचनाओं, 'रामाज्ञा प्रश्नÓ और 'गीतावलीÓ में  इसका संक्षिप्त उल्लेख किया है। गीतावली में राम, लक्ष्मण को सीता को वाल्मीकि के आश्रम में छोड़कर आने का आदेश देते हैं। राजा का आदेश था अत: पालन करना आवश्यक था। एक सेवक के समान लक्ष्मण सीता को लेकर वाल्मीकि के आश्रम में पहुंचते हैं। तब सीता को सौंपते समय लक्ष्मण की व्याकुलता और ग्लानि देखकर मुनिवर विधाता को वाम जानकर उनसे कुछ नहीं पूछते । सीता भी बिना कहे सब समझ जाती हैं। तुलसी ने कम शब्दों में इस प्रसंग के अत्यंत कारुणिक जीवंत बिंब खींचे हैं। लक्ष्मण को वापस जाते देख सीता बड़ी दीन वाणी में कहती हैं- तौलों बलि आपुही कीबी विनय समुझि सुधारि। जौलों हौं सिखि लेउं बन ऋषि-रीति बसि दिन चारि।। (उ.कां.29) अर्थात् जब तक मैं तपस्वियों की रीति सीख लूं तब तक चार दिन आप यहीं रहें। यदि प्रभु का भय हो तो उन्हें विनय से समझा कर सब बात बना लेना।
आगे वह साध्वी जो कहती है उससे लखन का कलेजा तो चाक होता ही है, आज भी सहृदय पाठक का होता है। लखणलाल कृपाल निपटहिं डारिबी न बिसारि। पालबी सब तापसनि ज्यों राजधरम बिचारि।( उ.कंा.29) अर्थात् हे लखन लाला! मुझे एकदम भूल न जाना। राजधर्म विचार कर जैसे अन्य तपस्वियों को पालते हो, वैसे मुझे भी पालना। सीता के ये वचन सुनकर लखन व्याकुल हो गये। वहां उपस्थित सबके नेत्रों से आंसू बहने लगे। स्वयं वाल्मीकि भी अपने अश्रु नहीं रोक सके। लखन बेचारे! क्या उत्तर देते! समझ गये कि आज विधि वाम है। ब्रह्मा ने भारी दंड दिया है।...घोर हृदय कठोर करतब सृज्यो हौं बिधि बांय। शायद वाम विधाता ने कठोर करनी करने के लिये ही मुझे बनाया है...मेरे हृदय की कठोरता देखकर तो प्रीति भी लज्जित हो गई! बार-बार सीता के चरणों में सिर नवाते हुए सोचते हैं...आज ऐसे समय भी प्राण बने हुए हैं ! फिर मन ही मन सोचते हैं कि उन्होंने ऐसा क्या पाप किया जो इतना कठोर दंड मिला है ?...और तभी उन्हें अपना एक पाप याद आता है-प्रेमनिधि पितु को कहे मैं परुष-बचन-अघाइ। पाप तेहि परिताप तुलसी उचित सहे सिराइ।। (उ.कंा.30) मैंने अपने प्रेमी पिता को जो कठोर वचन कहे थे, लगता है विधि मुझे उसी का उचित दंड दे रही है।
सुखांत रामकथाएं- कुछ रामकथाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने सीता के त्याग के बाद उनका पुन: राम से मिलन कराया है। इनमें आनंद रामायण प्रमुख है। यहां सीता शपथ लेने के बाद जब धरती की गोद में जाने लगी तब राम भूमि से कहते हैं, 'देवि! आप सीता की माता होने के कारण मेरी सास हैं। विवाह के समय आप कन्यादान में सम्मिलित नहीं हुई थीं, इस बार आप मुझे अपने हाथों से सीता को दें। आप क्षमा-रूपा हैं। आप तरह-तरह की धातु निकालकर संसारी लोगों को प्रदान करती हैं। मेरी सीता मुझे लौटा दीजिये।Ó किंतु धरतीदेवी ने तनिक भी राम की बातों पर ध्यान नहीं दिया। तब राम सहसा क्रोधित हो उठे और धनुष पर बाण चढ़ा लिया...इसी क्षण समुद्र में लहरें बढऩे लगी, भयानक आंधी चलने लगी तब भयभीत पृथ्वी सीता को ले प्रगट हुई और उन्हें स्वर्णमय सिंहासन सहित राम को सौंप दिया...इस तरह यहां सुखांत हुआ (जन्मकंाड,8.61-73)। मराठी रामायण रामविजय में राम द्वारा सीता को वापस अयोध्या लाने के पीछे एक दूसरा ही सुंदर कारण बताया गया है। यहां सीता के जाने के बाद अयोध्या में बारह वर्षों से सूखा पड़ रहा था। राम ने वशिष्ठ को पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है, तब वे कारण बताते हैं -आपने बिना किसी अपराध के पतिव्रता-शिरोमणि सीता को बाहर निकाल दिया है, इसीलिये अवर्षण हो रहा है। इसके निराकरण हेतु वे अश्वमेध यज्ञ करने कहते हैं(37.175-179)। यहां वाल्मीकि के कहने पर राम उन्हें सादर स्वीकार करते हैं (39.76-80)। संस्कृत नाटकों में सीता की अग्निपरीक्षा तो है पर प्राय: सीता के त्याग का विलोपन है। कहीं सीता का त्याग है भी तो अंत में राम सीता को पुन: ग्रहण करते हैं, जैसे भवभूति के नाटक उत्तररामचरित तथा भास के नाटक कुंदमाला में।
सीता की सहमति से त्याग- कुछ रामायणों में सीता का त्याग राम और सीता दोनों की सहमति से बताया है। अध्यात्मरामायण में सीता राम से कहती हैं कि देवताओं ने मुझसे आकर कहा है कि आप चित्शक्ति से युक्त हैं। राम सदा आपके ही साथ रहते हैं। इसीलिये हम सबको और बैकुंठ को छोड़कर वे पृथ्वीतल पर ठहरे हुए हैं। यदि आप पहले बैकुंठ को चली आएं तो राम भी यहां आकर हमें सनाथ कर देंगे। आगे सीता कहती हैैं, अब आप जैसा उचित समझे करें (उ.कंा. 4-38-39)। तब राम कहते हैं- मैं लोकापवाद के बहाने तुम्हें त्याग दूंगा। अभी तुम्हारे शरीर में गर्भावस्था के चिह्न दिख रहे हैं। बालकों के उत्पन्न होने के बाद तुम मेरे पास फिर आओगी और लोगों की प्रतीति के लिये आदरपूर्वक शपथ लेकर बैकुंठ चली जाओगी। पीछे से मैं भी तुम्हारे पीछे बैकुंठ आऊंगा (वही,4.40-44)। भानुभक्त की नेपाली रामायण तथा मलयालम अध्यात्मरामायण में भी ऐसी ही कथा है। आनंद रामायण में भी सीता का त्याग उनकी सहमति से राम करते हैं। कलिका पुराण के अनुसार राम द्वारा सीता का त्याग और उनका पृथ्वी में समाना पूर्व निर्धारित था। हल जोतते समय जनक ने पृथ्वी के भीतर से सीता को प्राप्त किया था तभी पृथ्वी ने कहा था कि रावण-वध के पश्चात मैं सीता को वापस ले लूंगी।  
सीतात्याग का कारण शाप- कहीं-कहीं राम और सीता को मिले शाप भी सीता के त्याग का कारण बताये गये है। यह शाप अनेक प्रकार के हैं। जैसे माधवकंदली और वैदेही विलास में बाली-वध से दु:खी तारा राम को शाप देती है कि पत्नी को पाने के बाद भी तुम उससे बिछड़ जाओगे। वाल्मीकि रामायण में भृगु ऋषि के शाप को भी सीता के त्याग का कारण बताया गया है। एक बार एक ऋषि-पत्नी द्वारा दैत्यों को आश्रय देने पर कुपित विष्णु ने सुदर्शन से उनका सिर काट लिया था जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें शाप दिया कि आपको भूतल पर मनुष्य रूप में जन्म लेना होगा जहां आपका भी अपनी पत्नी से वियोग होगा।
गुजराती गिरधर रामायण में सीतात्याग का रोचक कारण बताया गया है। यहां कवि बचपन में हुई सीता की एक भूल का उल्लेख करते हैं। बाल्यावस्था में जनक के उद्यान में बैठी अविवाहित सीता एक बार एक शुक द्वारा शुकी को रामकथा कहते हुए सुनती हैं। राम के जन्म, सीता से धनुर्भंग के बाद विवाह, कैकेयी के वर के कारण राज्याभिषेक के स्थान पर 14 वर्षों का वनवास, पंचवटी में निवास, शूर्पणखा का विरूपण और रावण द्वारा सीता के अपहरण तक की कथा सुनाकर शुक मौन हो गया। आगे क्या हुआ तथा ये राम और सीता कौन हैं, यह जानने की जिज्ञासा सीता के मन में होना स्वाभाविक था, अत: वह अपने अनुचरों से जाल डलवा कर उस शुक एवं शुकी को पकड़वाती हैं...और शुक से आगे की कथा पूछती हैं किंतु शुक बार-बार कहता है कि उसे इतनी ही कथा मालूम है।...वाल्मीकि के आश्रम में मैंने उन्हें अपने शिष्यों को यह कथा सुनाते हुए सुना था। हम पक्षियों की बुद्धि अल्प है, मुझे इतनी ही कथा का स्मरण है, शेष मैं भूल गया। किंतु सीता कहती हैं कि तुम पूरी कथा बताओ तभी जाने दूंगी ...और वह एक पिंजरा मंगवा कर दोनों को बंद करने का आदेश देती है। अनुचर शुकी को तो बंद कर देते हैं किंतु शुक किसी तरह उनके हाथ से निकल कर भाग जाता है। तब शुकी सात माह की गर्भवती थी। वह पति का वियोग सह नहीं सकी और पिंजड़े में ही मर गई। यह देख उस शुक ने सीता को शाप देते हुए कि तुम भी गर्भावस्था में पति से अलग रहने का दु:ख भोगोगी, स्वयं भी प्राण त्याग दिये। यही शुक अगले जन्म में धोबी हुआ जिसने सिया को राम से अलग किया (गि.रा.उ.कां.29)।
क्या सीतात्याग षड्यंत्र है?- सीता परित्याग को ऊपर हमने वाल्मीकि रामायण का प्रक्षिप्त अंश कहा है। यहां प्रश्न उठता है कि आखिर किसने और क्यों यह अंश रामायण में डाला क्योंकि इससे निश्चित ही राम का मर्यादापुरुषोत्तम रूप बाधित हुआ है, उनकी न्यायप्रियता कम हुई है। मुझे तो लगता है कि इससे रामराज्य का विचार भी धूमिल हुआ है। कुछ आधुनिक विचारक इसे षड्यंत्र के तहत भी देखते हैं। जैसे रामकुमार वर्मा उत्तरायण नामक ग्रंथ में महाकवि वाल्मीकि की ओर से लिखते हैं-
कालान्तर में मेरी रचना में जोड़े कुछ प्रक्षेप भ्रष्ट।
 जिससे सीता-निर्वासन हो, हो राम-चरित का रूप नष्ट।
अपनी संस्कृति का ले स्वरूप मैंने रचना की साभिमान।  
मैं क्या जानूं? विषम स्वर भर कर कु-कवि करेंगे विकृत गान। (सर्ग 9, पृ115)
इसी ग्रंथ की भूमिका में कवि सीता-परित्याग की इस विगर्हित घटना को अनैतिहासिक मानते हैं तथा उनका विचार है कि बौद्ध और जैन लेखकों तथा कवियों ने अपने धर्मों की श्रेष्ठता प्रतिपादित करने के लिये वैदिक धर्म के महान चरितनायक राम और उनकी पत्नी सीता को गर्हित करने की चेष्टा की है। किंतु यदि ऐसा था तो परवर्ती अनेक रामायणों ने इसे प्रश्रय क्यों दिया? नहीं देना चाहिए था।     
अस्तु, विभिन्न रामकथाओं में सीता के त्याग को देखने के बाद अंत में हम एक बात अवश्य कहेंगे कि भारतीय जनमानस ने सीता की पवित्रता पर कभी संदेह नहीं किया वरन् सीता की अग्निपरीक्षा और उनका त्याग उसे सीता के प्रति करुणा-विगलित ही करते रहे हैं। वाल्मीकि के अनुसरण जिन रामायणों ने सीता का त्याग लिखा हेै उन्होंने सीता को अत्यंत तेजस्वीरूप में प्रस्तुत किया है। सीता को हर भारतीय मन ने पवित्रता की मूर्ति ही कहा है। इस संदर्भ में सबसे सुंदर शब्द शाहजहां के पुत्र दाराशिकोह के हैं जो वे सीता को संबोधित एक फारसी कविता में कहते हैं-     
तनेश रा पेरेहन उरियां न दीदम ।
चूं जन अंदर तनरा तन जाय न दीदा।
अर्थात् तू इतनी पाक और साफ है कि तूने जो वस्त्र पहन रखा है, वह भी तेरे शरीर को नहीं देख सकता, जैसे शरीर के भीतर आत्मा है, पर शरीर आत्मा को नहीं देख पाता।
(लेखिका सेवानिवृत प्राचार्य हैं एवं वर्तमान में भारत सरकार के संस्कृति विभाग के सीनियर फैलोशिप के अंतर्गत रामायण पर शोधकार्य कर रही हैं।