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Tuesday 21 Nov 2017

कर्ज, कर्ज में फर्क

अश्विनी कु मार दुबे
525, आर, महालक्ष्मी नगर, इंदौर-10
मो. 9425167003
मित्रो, कर्ज कई तरह के होते हैं। एक कर्ज वह होता है, जिसे किसान लेते हैं और रोते हैं। दूसरा वह होता है, जिसे शराब ठेकेदार, बिल्डर और पूंजीपति टाइप लोग लेते हैं और हंसते हैं। या यूं कहें मजे करते हैं। कुछ मध्यवर्गीय टाइप मास्टर, लड़के और बेरोजगार युवक, अपना कोई छोटा-मोटा धंधा शुरू  करने के लिए कर्ज ले डालते हैं, फि र लंबे समय तक रोते रहते हैं।
अपने यहां कहा गया है, 'ऋण कृत्वां घृतम् पीवेतÓ अर्थात् ऋण लेकर घी पियो। ऋण लेकर जो लोग घी नहीं पीते, वे ही दु:खी होते हैं और उस दिन को कोसते रहते हैं जिस दिन उन्होंने ऋण लिया था। यह सब महान परंपरा से कट जाने का परिणाम है। जो नहीं मानते हमारी पुरातन सूक्तियों और सिद्धांतों को वे इसी प्रकार दु:खी रहते हैं। चार्वाक जिसने यह सूक्ति बनाई वह बहुत समझदार था। साफ -साफ तो कह दिया उसने कि जब घी पियोगे तो शरीर मजबूत होगा। शरीर मजबूत होगा, पहलवानों जैसा फिर किसकी हिम्मत है कि वह आपके पास ऋण वसूल करने आएगा? सर फुड़वाना है क्या उसको? वह मजबूत शरीर के स्वामी को देखकर मिमियाएगा-'पहलवानजी हमारी उधारी...।Ó
'हां, हां दे देंगे कहीं भागे थोड़े ही जा रहे हैं और भाग भी जाएंगे तो तुम क्या कर लोगे?Ó पहलवान जी प्रतिप्रश्न दागकर पूछने वाले को निरु त्तर कर देते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि ऋण लेकर दादा बनो, गुंडे बनो और कभी ऋण लिया था, इसे सहजता से भूल जाओ। यदि आप पहले से गुंडा टाइप हो तो फि र क्या कहना! मान लो कि सारी ऋण योजनाएं आपके लिए ही बनाई गई हैं। ऋण अवश्य लो और तुरंत भूल जाओ। आपके  लेखा सलाहकार और वकील हैं तो मामला सुलटाने के लिए।
किसान ने कर्ज लिया। उससे खाद खरीदा। बीज खरीदा। घी नहीं खरीदा। घी पीकर ताकतवर नहीं हो पाया वह। मजबूत होकर उसे ऋण पचाना था। बेचारा नहीं पचा पाया। ऋण ने उसे ही पचा लिया।
अब लिया था कोई पच्चीस-पचास हजार रुपयों का कर्ज रामदीन ने। नहीं चुका पाया और चला गया इस दुनिया से। बड़ा कर्ज लेना चाहिए था, म$जे करता। तुमने सुना कभी जिन्होंने बैंकों से पच्चीस-पचास हजार करोड़ रु पयों के  ऋण लिए, उनमें से कभी किसी ने आत्महत्या की? नहीं की न। एक तो पिद्दी-सा ऋण लेने के  चक्कर में पहले ही किसान की एडिय़ां घिस जाती हैं। बमुश्किल मूल ऋण की रकम में कुछ  काट करके  ही उसे ऋण मिल पाता है, यह सनातन नियम है, ऋण लिए जाने का। हालांकि चुकाना उसे वह भी है, जो काट लिया गया। अब बाढ़ आए या सूखा पड़े। कर्ज की किस्तों से उसका क्या संबंध? किस्तें तो चालू रहेंगी। बरसात आए या न आए। बैंक का नोटिस जरू र आएगा।
यहां तो कर्ज लेने की प्रक्रिया में ही किसान की 'चींÓ निकल जाती है। रो-धोकर छोटी-सी रकम कर्ज के रू प में ले आए किसान भाई। मैंने उनसे पूछा- ये कर्ज क्यों लिया था आपने? उन्होंने अपनी विवशता बताई- बीज नहीं। खाद नहींं। और घर में लुगाई बीमार। मोड़ा नोएडा में मजूरी करने घर से भाग गयो। का करें अब? सो कर्ज ले आए। जमीन के कागज जमाकर आए बैंक में। साल दर साल सूखा। कभी बाढ़, कभी ओले। लुगाईलग गई खटिया से। डॉक्टर ने बताओ, पेट में ट्यूमर है। नहीं चुका पाए आज तक बैंक को कर्ज। ब्याज-पे -ब्याज। नोटिस-पे-नोटिस। कुड़की की धमकी। सो हमने एक रात सोची, फु र्सत पाओ झंझट से। बहुत लटक गए फांसी में चलो हम भी....।
नहीं नहीं ऐसा नहीं सोचते। हिम्मत न हारो। सरकार है। नेता हैं। सब तुम्हारे लिए खूब चिंता कर रहे हैं। चल रही है, बहस संसद में इस मुद्दे पर। जब तक उस बहस का निर्णय न आ जाए, तुम्हें जीना होगा देश के अन्नदाता।
बैंक का नोटिस देखकर किसान के चेहरे पर हवाइयां उडऩे लगती हैं। प्राण निकलने लगते हैं बैंक के अदना से बाबू को देखकर। बैंक के  चपरासी को देखकर वह पेड़ के  पीछे छिप जाता है। उसका सामना नहीं कर सकता, यह अन्नदाता। आखिर कब तक वह अपने ग्रामीण लटके-झटकों से बैंक कर्मियों को भरमाएगा। बढ़ता ही जा रहा है उस का ब्याज। खेती में सार-सपट्ट नहीं। कभी सूखा, कभी बाढ़ और कभी बेमौसम ओले। अंत में उसने निर्णय ले लिया- चल उड़ जा रे पंछी....। वह लटक गया फांसी पर पच्चीस-पचास हजार रूपयों के ऋण के लिए।
पच्चीस-पचास हजार करोड़ रु पयों का कर्ज लेने में  कोई झंझट नहीं। फटाफट सब काम हो जाता है। एक नहीं कई-कई बैंक आपको पलक-पावड़े बिछाए कर्ज देने को तैयार। अब आपकी बड़ी-बड़ी योजनाएं कागज पर। धरती पर स्वर्ग बनाने का आपका प्रोजेक्ट। यहां से ये सामान। वहां से वो सामान। बेरोजगारों को बेहिसाब नौकरियां। उत्पादन ढेर सारा। व्यापार के  क्षेत्र में क्रांति। सरकार को भरपूर टैक्स। सबको लाभ ही लाभ। अब भला ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों के  लिए लोन क्यों न दें। जरूर दें। देना ही चाहिए। और दिया गया। भरपूर। सालों साल हो गए, हजारों करोड़ रु पयों का लोन लिए हुए। प्रोजेक्ट कागजों पर दौड़ रहा है, यहां से वहां, वहां से यहां। हवा-हवाई। कर्ज लेने वाले के चेहरे पर कोई शिकन नहीं। बल्कि एक अजीब किस्म की मुस्कुराहट। शरीर स्वस्थ और सुंदर। कपड़े लकदक। कार नई और महंगी। सब कर्ज का कमाल है। दिमाग में एकमात्र चिंतन यह चल रहा है कि कैसे भी ये कर्ज न चुकाना पड़े। डुबो दें कंपनी को, जो कभी बनी ही नहीं। दिवालिया घोषित करा दें अपने आप को। बुलाओ रे भई बुलाओ वकीलों को। टैक्स सलाहकारों को। चार्टर्ड एकाउंटेंटों को। सभी मिल कर मंथन कर रहे हैं कि कैसे भी करके  इस कर्ज को डुबो दिया जाए। देना न पड़े कभी। कई लेखा सलाहकार, इसी बात की तो मोटी फीस लेते हैं। अब तक उन्होंने न जाने कितनी कंपनियों का दिवाला निकलवा दिया। बचा लिया उनके मालिकों को कर्ज के  दलदल में डूबने से। पचा गए वे मूल कर्ज की रकम और उसका पूरा ब्याज।
फिर जो इतना बड़ा कर्ज लेगा और बेचेगा सपना हमारे देश में स्वर्ग बनाने का, जरू र उसने विदेशों में अपने ठौर-ठिकाने बना रखे होंगे। जब देखा उन्होंने कि नहीं बच पाएंगे इस कर्ज से। न्यायपालिका का शिकंजा कसता जा रहा है। तब अंतिम उपाय है पलायन। 'चल उड़ जा रहे पंछी। अब ये देश हुआ बेगाना...Ó उनके लिए तो पहले से ही देश बेगाना था। उन्हें यहां कोई स्वर्ग नहीं बनाना था। उन्हें विदेशी स्वर्गों में रहने की व्यवस्था करनी थी, यहां रहते हुए। वह उन्होंने कर ली। उन्हें कोई मलाल नहीं कर्ज लेने का। कर्ज उनके लिए आत्महत्या का कारण कभी नहीं हो सकता। होगा किसी अदना किसान के  लिए, जिसने मात्र पच्चीस-पचास हजार रु पये का कर्ज लिया है। बस!
सरकार जब ऋण लेती है, तब खुशी मनाती है। लेना पड़ता है विश्व बैंक से ऋण, अपनी योजनाओं के  लिए। ऋण जब वल्र्ड बैंक से मंजूर हो जाता है, तब अफ सर प्रसन्न हो जाते हैं। उनके चेहरे गोभी के फूल की तरह खिल जाते हैं। अब दिल खोलकर खर्च करो, निर्दयतापूर्वक। ऋण चुकाने की चिंता बिल्कुल नहीं। न सरकार को, न नौकरशाही को। जब भी सरकारें बलदती हैं, यही कहा जाता है कि पुरानी सरकार राज्य को कर्जों में लाद गई। खजाना खाली कर दिया उसने। बावजूद नई सरकार चलती रहती है और नए ऋण लेती है विदेशी बैंकों से। हमारी परंपरा है कि हम सरकारी खातों में ऋण लेते हैं और निजी खातों में किस्तें जमा करते हैं। ऋण लेने का विवरण गौरवशाली ढंग से बताया जाता है। निजी खातों का विवरण खोजते रहने पर भी कभी मालूम नहीं होता। इधर विश्व बैंक के कर्जों का भार देश की गरीब जनता पर आता है, उधर स्विस बैंक के  निजी खाते मोटे होते चले जाते हैं।
मित्रो यही फ र्क है, कर्ज-कर्ज में। इधर सरकारें कर्ज लेती हैं, उधर निजी खाते भरते चले जाते हैं। बड़े उद्योग स्थापित करने का झांसा देकर समझदार लोग देशी बैकों से कर्ज लेकर विदेशों में जाकर म$जे करते हैं। और किसान... अन्नदाता कर्ज लेकर आत्महत्या के  लिए विवश हो जाता है।