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Saturday 18 Nov 2017

गल्प साहित्य का यथार्थ (कहानी को कहानी रहने दें। दूभर पहेली न बनाएं)

हरदर्शन सहगल
5 म् 9 'संवाद'
डुप्लेक्स कॉलोनी
बीकानेर 334003
फोन न. 0151-2529067
इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं कि आज़ादी मिलने के फौरन बाद ही से सामाजिक, खास तौर से राजनैतिक मूल्यों का हस होना शुरू हो  गया था। राजनैतिक हलकों में कहीं गहरे तक स्वार्थपरता बड़े सूक्ष्म रूप से दुबकी बैठी थी जो सत्ता की बागडोर संभालते ही अपना विकृत मुखड़ा दिखलाने लगी। सब को अपने-अपने घर भरने की होड़ सी लग गई। घर भरने की यह लालसा, पूंजीपतियों, बड़े-छोटे अफसरों, सामाजिक कार्यकत्र्ताओं, राजनीतिज्ञों में धीरे-धीरे इतनी अधिक बढ़ती गई, जिस का अति विकराल चेहरा आज के युग में बहुत ही स्पष्ट रूप से हमें दीखने लगा है। यह सब कल्पनातीत था जिसे हम आज, साहित्य में 'यथार्थÓ कहते हंै।
    सोचना होगा, यह राजनीति से होता हुआ सामाजिकता का पतन है या यथार्थ। तब क्या हम इसे 'साहित्य का यथार्थÓ भी मान लें? सोचना यह भी होगा कि जो यथार्थ हमें प्रत्यक्ष रूप से आज दिखलाई दे रहा है, क्या मात्र यही यथार्थ है?
    यदि हम अपनी दृष्टि में थोड़ा पैनापन, लचीलापन, उदात्तवृत्ति ला कर देखें तो हम पाएंगे कि यह पूर्वोक्त दिखने वाला 'यथार्थÓ, यथार्थ नहीं है। जीवन का वास्तविक यथार्थ है: सत्य, हमारे नैतिक, शाश्वत, आदर्श मूल्य। इन्हें आत्मसात करने के लिए नीतिशास्त्र हमारा, हमारे साहित्य का मार्गदर्शक, सहायक बन सकता है। वह इन्हीं मूल्यों यथा, करूणा, परोपकार, अपरिग्रह, अहिंसा, दया, का पक्षधर है। नीतिशास्त्र में इन्हें सद्वृत्ति कहा गया है। नीतिशास्त्र 'हैÓ की बजाए 'चाहिएÓ पर ही केन्द्रित है। मेरे ख्याल से साहित्य, विशेष रूप से कहानी, साहित्य का रूपांतरण है। हमारे आज के थोड़ा सा नाम कमाए हुए, कई समीक्षक/आलोचक यह क्यों भूल जाते हैं कि कहानी को गल्प भी कहा जाता है। बेशक यह उस तरह की परिपाटी वाली गल्प नहीं हैं, पर कहानी में तो प्रचुर मात्रा में लेखकीय कल्पना परिकल्पना फैंटेसी, किसी लेखक के निजी विचार अनुभव, बेशक वह अनुभव संसार दूसरों को पता न हो- का भी समावेश होता है। मेरे हिसाब से तो यही कथा साहित्य के प्राण हैं जो पाठक को उद्वेलित करते हैं। उसे कुछ नया सोचने की साम्रगी भी प्रदान करते हैं।
    हम बार बार क्यों भूल जाते हैं कि 'हितÓ साहित्य का सर्वाधिक अनिवार्य और अभीष्ट मूल्य है। अंग है। साहित्य में हितकारी भावोंं की अभिव्यक्ति ही उसे सार्थकता प्रदान करती है। हमारे लक्ष्य की प्राप्ति हेतु शुचिता मंगल कामना हो; इसी कसौटी पर ही साहित्य का मूल्यांकन हो सकता है। तभी आसानी से समझ में आ जाना चाहिए कि यह सब मनुष्य की समग्र संवेदना के बिना हासिल नहीं हो सकता। इसी कारण से कहा जाता है कि संवेदना (और भावुकता भी) साहित्य में बसते हैं। संवेदना ही से साहित्य के प्रयोजन जुड़े हैं।
    श्री लालबहादुर शास्त्री ने एक दुर्घटना हो जाने पर रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। आगे के तमाम रेल मंत्रियों ने ऐसी मिसाल कायम नहींकी (अप्रत्यक्ष रूप से, उन्हें, यथार्थवादी करार दिया गया) अपनी सत्ता लिप्सा के कारण अपने पद से चिपटे रहे। सोचना होगा वास्तविक यथार्थ क्या है/था जो शास्त्री जी को, आदर्श, न भूल सकने वाला, अमर, रेल मंत्री बना गया।
    यही अपवाद मनुष्य को 'मनुष्यÓ बने रहने की प्रेरणा देते हैं। तो यह अपवाद साहित्य में खुल कर उजागर क्यों न हों। लेकिन नहीं। यह सब आज के तथाकथित बुद्धिजीवियों/आलोचकों और आधुनिक, खुश्क लिखने वाले, कला शैली शिल्प का चातुर्य दिखलाने वाले हमारे लेखकों को नहीं सुहाता। वह तो सिर्फ  यथार्थ, यथार्थ की रट लगाए बैठे हैं, भले ही साधारण पाठक, साहित्य से दूर होता चला जाए। लेकिन यथार्थवादियों के लिए-'अश्कों का ज़माने में कोई काम नहीं हैÓ। और पाठक सोचता रहे-हमें उनसे है वफा की उम्मीद। जो नहीं जानते, वफा क्या है।
    तब वफा की आस लिये, अश्क बहाने वालों के आंसू पोंछने वाला यथार्थवादी लेखक क्यों कर आगे आएगा। वह यह भी सोचने की जहमत नहीं उठाएगा कि क्यों आज भी पुराने लेखकों को ही ज़्यादा पढ़ा जाता है।
    ऐसा नहीं है, कि पूरी दुनिया के प्रारम्भ से लेकर आज तक हमें असंगतियां, विसंगतियां धूर्तताएं, असमानताएं, अत्याचार शोषण, विश्वासघात आदि दिखलाई नहीं देते। आधुनिकतावादियों के मुुताबिक, यही है जो दिखलाई देता है। यही यथार्थ है। यही सब कुछ सहना असहाय, गऱीब की नियति है। यह अत्याचार, अन्याय उसे सहने ही पड़ेंंगे। क्यों? इसलिए कि यही यथार्थ है। तब यह सब देखते, समझते हुए, लेखक भी यही सब लिखेगा, यह सोचकर कि कालांतर में इनका परोक्ष रूप से असर होगा। वह कुछ स्पष्ट रूप से लिख देगा तो कला का हृास होगा।
    इस चालाकी को समाज का बड़ा तबका कब तक सहन करेगा। वह लेखक से जवाब मांगेगा कि फिर आखिर तुम किसलिए हो? तुम्हारी क्या भूमिका है। यह भी क्या इसलिए कि साहित्य समाज का दर्पण है। जैसा हम देखेंगे जस का तस परोसेंगे।
    परन्तु जो 'लेखकÓ होता है, उसे दर्पण में उल्टा भी तो दिखलाई देता है। यदि आप नाई की, या कपड़े की दुकान में बड़े शीशे के सामने बैठे हैं तो दाएं ओर से आता व्यक्ति, पशु, गाड़ी आप को बांयींओर से दिखलाई देगा। यानी गलत। इसी भ्रम को लेखक दूर करता है कि दायीं आंख बांयीं नहीं हो गई। वह अपनी जगह अटल है। अत: करूणा, नि:सहाय की सहायता, क्षमा, आदि ही अटल सत्य है। शाश्वत यथार्थ भी।
    बस यहीं पर वास्तविक लेखक की भूमिका होती है। लेखक के मन-संसार में एक दुनिया बसती है। वहां पर अच्छे, संघर्षशील, दूसरों के दु:ख दर्द बांटने वाले लोग (कहानी के पात्र) हुआ करते हैं। अन्याय के विरूद्ध हिम्मत, प्रतिरोध करने वाले। ऐसी कई कहानियां हमारे सोए हुए तंतुओं को जगाती हैं। उन्हें झंकृत करती है। आम पाठक को ऐसी कहानियां सुहाती हैं। तो यही उन का यथार्थ बनती हैं। 'हंसÓ में विपिन बिहारी की कहानी 'अपना मकानÓ याद आ रही है। इसमें लड़की बलात्कारी का हाथ काट कर हिसाब चुकता कर देती है। 'सद्बुद्धिÓ का मामूली चौकीदार, ज़मींदार को धता बताकर, एक असहाय की जान बचाता है। गम्भीर सिंह पालनी का बस ड्राइवर रूट नियमों का उल्लंघन कर बच्ची को समय पर परीक्षा हेतु स्कूल पहुंचाता है। और भी बहुत सी कहानियां हैं जो साधारण श्रेणी मेें गिने जाने वाले लेखकों ने बड़े (साधारण या असाधारण) ढंग से लिखीं, लेकिन उन का पाठकों ने खूब खूब स्वागत किया। एक वकील लड़की ने झूठे मुकदमे न लडऩे, किसी को अनावश्यक न फंसाने की शपथ ली।
    मेरी स्वयं की कहानियों पर उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाएं, आशीष भी मिले। पाठक, कहानी साहित्य में सुखांत चाहता है। लेकिन हमारे, कुछ लेखक पाठक को रूला कर ही अपनी कथा को स्थायित्व प्रदान करने पर तुले हुए हैं। पूछा जा सकता है, आपने पाठकों को क्या दिया। निराशा हताशा पराजय। यदि पहले ही से तय है, तब कोई रिवोल्ट क्योंकर करेगा।
    हां आज का, आलोचक (?) मात्र यथार्थ का डंका पीटे चला जा रहा है। उसे लेखक की परिकल्पना, नए, मुहावरों, रचना-विधान में छिपी व्यंजना फैंटेसी से कोई सरोकार नहीं। रचना में जो स्पंदन रिद्म होता है उसे वह भी सुनाई नहीं देता। क्रूरताएं, चालबाजिय़ां, विश्वासघात मात्र ही यथार्थ लगती हैं। ऐसे में हम अच्छे लोगों को हाईलाइट क्यों न करें। नालियों को जितना कुरेदते रहो उतनी ही बदबू आती चली जाएगी। जज हो या वकील, डाक्टर हो, बेशक गुंडा भी। आखिर है तो इंसान ही। उन के अंतर में भी अचानक ही सही, कहीं मानवता के अंकुर फूट निकलते हैं। और बरबस देखने पढऩे वालों को वशीभूत कर लेते हैं। मेरे मित्र जज मुरलीधर वैष्णव जी ने मुझे कोर्ट में पेश हुए, ऐसे ऐसे लाचार, भोले, दीन दुनिया से बेखबर लोगों के विषय में बताया जिन्हें देख सुन कर वे स्वयं द्रवित हो उठे।
    एक नदी के दो किनारे। एक किनारे पर हमारे प्रबुद्ध आलोचक हैं, दूसरी ओर विशाल पाठक वर्ग, जो आज भी ऐसी आदर्शों, नैतिकता वाली कहानियों की प्रशंसा करते नहीं थकता। उसे वीराने में भी कहीं हरी घास, पानी का कतरा दिखलाई दे जाता है, संबल मिल जाता है। उसी के सहारे वह जिंदा है। मेरी माता जी कहा करती थीं कि इन्हीं भले लोगों की वजह से धरती टिकी हुई है।
    यदि कहानीकार भी, आदर्शों, नैतिकता का निर्वाह करने वाले लोगों का, हमसफर बनता है तो क्या गुनाह करता है। सच तो यह है कि लेखक पाठकों को हांकता नहीं, उनके पीछे चलता है  हमारे ऐसे विद्वान, यह क्यों भूल जाते हैं कि जो हमारा यथार्थ है, जरूरी नहीं कि वही दूसरों का भी यथार्थ हो। कितना बड़ा ब्रह्यांड है जो विविधताओं से भरा पड़ा है। लाख जन्म लें तो भी सब कुछ नहीं जान सकते। अत: हमारा स्वयं का ज्ञान, अनुभव-क्षेत्र सीमित होता है। यदि इस बात को हमारे यथार्थवादी आलोचक समझ सकें तो यही पाठकों के तथा एक बेहतर समाज के हित में होगा। और साहित्य निर्धारण के भी।
    और अंत में।  
    एक छात्र को मैडम सज़ा देती है। आगे जा कर वह डाक्टर बन जाता है। सेवानिवृत्ति पश्चात मैडम अस्पताल पहुंचती है डाक्टर झट से आगे बढ़ कर मैडम के पांव छूता है - मैडम आपने मेरा जीवन संवार दिया। एक दूसरा छात्र है उसे भी मैडम सज़ा देती है। आगे चलकर वह भी डाक्टर बन जाता है। मैडम को देखते ही उपेक्षा से मुंह फेर लेता है।
    दोनों ही यथार्थवादी कहानियां हैं। कौन सी अच्छी लगी?