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Saturday 18 Nov 2017

फिनिक्स

 

करिश्मा अय्युब पठाण
शोध-छात्रा, हिन्दी विभाग
डॉ. बा.आं.म.वि. औरंगाबाद
मो. 9764071913
फिनिक्स

महकना था उसे फूलों की तरह
पर क्यों वह मुरझा गई कच्ची
कली की  तरह
चहकना था उसे चिडिय़ों की तरह
पर क्यों उसके पंख काट दिए उड़ते जटायु की तरह
बरसना था उसे बारिश की तरह
पर क्यों वह लग रही है सूखे रेगिस्तान की तरह
चमकना था उसे चांद-सितारों की तरह
पर क्यों वह लग रही है अमावस के काले अंधेरे की तरह
हंसना था उसे बच्चों की तरह
पर क्यों वह लग रही है असमय ही
बूढ़ों की तरह
सजना था उसे सावन की तरह
पर क्यों वह लग रही है सूखे
पतझड़ की तरह
नाचना था उसे मोर की तरह
पर क्यों चल रही है अपाहिज की तरह
गीत-गाना था उसे कोयल की तरह
पर क्यों वह गुमसुम सी लग रही है गूंगी गुडिय़ा की तरह
समाज ने उसके सपने और अस्तित्व को जला दिया है लाश की तरह
पर उडऩा होगा उसे फिनिक्स
पंछी की तरह

विकल्प

छला जाता है
कभी मजहब के नाम पर
कभी जाति-पाति के नाम पर
कभी वर्ण-वर्ग के नाम पर
कभी शक्ल सूरत के नाम पर
तो कभी ऊंच-नीच के नाम पर
कभी लिंग भेद के नाम पर
बौद्धिकता
कुशलता
लगन मेहनत
ईमानदारी-वफादारी
तो जैसे बेमानी हो गए हैं शब्द
युवा पीढ़ी को किया जाता है
गुमराह...
जेहाद के नाम पर
जिसे अल्लाह तालाह की भी
नहीं है रजामंदी
कुबूल नहीं कर सकते परवरदीगार भी
'इस्लामÓ का मानव निर्मित
यह खूंखार हलफनामा
'पाक कुरानÓ की आयतों को पढ़कर
'गीताÓ जैसे ग्रंथ मुंह जबानी याद कर भी
व्यवहार में क्यों है विरोधाभास...
विश्व प्रसिद्ध भारतीय
'संविधानÓ जैसे महान ग्रंथों का
अनादर करते हुए
क्यों ढूंढे जाते हैं
धर्मांध विकल्प...

मस्त मौला

शहर के बीच हायवे से सटी हुई
झुग्गी-झोपडिय़ों में
गरीब मेहनतकशों की
बस्ती में...
लगा कैसी बीतती होगी
जिंदगी की लंबी यात्राएं
कैसे कटती होंगी रातें
कैसे ढलता होगा दिन
पर जब नजदीक से
पहचानने का मौका मिला
तब जाना कि झुग्गी-झोपडिय़ों
के फटे-पुराने पर्दे के पीछे
फ्रिज, कूलर, रंगीन टीवी को
करीने से सजाकर रखा गया है
और औरतों का जमघट
बैठा है सास-बहू के
सीरियल देखते हुए
ठहाके मार-मार कर
अठखेलियां करती हुई
नई-नई दुनिया के साज
श्रृंगार की
तारीफ करती हुई
मस्त-मौला फक्कड़
जिंदगी...

कर्मशील सहेली

लड़कों के भांति यूनिवर्सिटी हॉस्टेल में
सुध-बुध खोकर कम्प्यूटर साइंस की
मेरी प्रिय कर्मशील सहेली
रहती है बिंदास...
कमरे का हुलिया बनाती है अस्त-व्यस्त
अपने मन की मालकिन
कब सोऊं, कब जागूं
देर-सबेर-उठ जाऊं
ना कोई नियंत्रण ना कोई समय सारणी
सबसे अलग सबसे जुदा
नहीं किसी का डर खौफ
नहाना-धोना-सजना-संवरना
साजो श्रृंगार से न रहा नाता
चाहे कोई ताना कसे
चाहे कोई चुगली करे
कहती है ऊपर से
'हाथी चलता है तो कुत्ते भूंकते हैंÓ
या फिर कह देती है- लिव लाइफ किंग साइज
पर अपने काम के प्रति रहती है हमेशा सजग...
रात को दिन और दिन को रात करते हुए
कर देती है प्रोजेक्ट्स पूरे...
नाम है उसका दीपाली
अपने नाम के मुताबिक
करती है सदा रोशन मेरी कर्मशील सहेली...