Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

हुडुकचुल्लू

विजय रंजन
संपादक- 'अवध रचनाÓ/अधिवक्ता
19, अशफाक उल्लाह कॉलानी, फैजाबाद (उ.प्र.)
अच्छा है, कॉलोनी में ही ट्रांसपोर्ट-सुविधा भी उपलब्ध हो रही है।ÓÓ मि. चड्ढा ने व्यंग्य में कहा था।
मेरे घर की सीधी में 11वें फ्लैट के सामने जहां कल एक थी, आज दो ट्रकें खड़ी थीं; उन्हीं को लेकर व्यंग्य कस रहा था। 4-5 दिन पहले ही आया था उस फ्लैट में नया परिवार।
कहां तो निकला था मैं 'मार्निंग-वाकÓ पर और कहां मि. चड्ढा का यह व्यंग्य! मन अनमना-सा हो गया।
''व्यंग्य क्यों कस रहे हैं आप? ठीक है कि 'कॉलोनी वेलफेयर कमेटीÓ का सचिव हूं मगर इसका अर्थ यह नहीं कि यहां कहीं कुछ गड़बड़ हो तो मझे सूली पर लटका दिया जाए। आइए चलें; बात कर लेते हैं उन सज्जन से।ÓÓ मैंने किंचित रोष से कहा।
''नहीं;  मुझे दूसरे जरूरी काम हैं; मैं नहीं जा पाऊंगा। आप सेक्रेटरी हैं; चाहे तो फिर कभी बात कर लीजिएगा कि इस तरह कॉलोनी का आवागमन अवरुद्ध हो सकता है।ÓÓ
प्रकट था कि मि. चड्ढा कन्नी काट रहे थे।
शायद नवांगतुक को बिना ठीक से जाने समझे उससे उलझाव करने से स्वयं को बचाना चाह रहे थे वे।
चड्ढा जी तो चले गए मगर, बात तो करनी ही होगी मुझे, नहीं तो अगली बैठक में बड़ी टांग खिंचाई करेगा ये चड्ढा। तो फिर बाद में कभी क्यों? क्यों न आज ही देख लिया जाए कि कौन सज्जन हैं जो आवासीय कॉलोनी को ट्रांसपोर्टनगर बना रहे हैं, मैंने सोचा।
कुछ  ही क्षणों में मैं जा पहुंचा उस फ्लैट के सामने।
गेट के सामने वाले दरवाजे के बगल में दीवार पर गोल्डन नेमप्लेट चमक रही थी। नेमप्लेट पर कलात्मक अक्षरों में पहली पंक्ति में लिखा था- 'एच.सी. यादवÓ और दूसरी पंक्ति में केवल एक शब्द 'ट्रांसपोर्टरÓ।
मैंने कॉलबेल बजा दी थी।
'डिंग-डांगÓ की स्वरलहरी समाप्त होती उससे पूर्व ही दरवाजा खुला।
दरवाजा खुलते ही एक 18-20 वर्षीय नौजवान ने 'नमस्तेÓ की और तुरन्त प्रश्न दाग दिया- 'किससे मिलना है?Ó
'यादव जी से।Ó मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया था।
'साहब अभी पूजा कर रहे हैं। जैसे ही पूजा से उठेंगे, बता दूंगा। आपके बारे में क्या बता दूं उन्हें?Ó उसने एक और प्रश्न दाग दिया था जिसमें मुझे लगा कि यह प्रश्न भी अन्तर्निहित था कि आप हैं कौन जो इतनी सुबह-सुबह आ गए?
'बता दो कि कॉलोनी वेलफेयर कमेटी के सेक्रेट्री आर.पी. सिन्हा आए हैं।Ó मैंने कुछ रुखाई से कहा था।
'जी अच्छा!Ó कहकर नौजवान अंदर चला गया। शायद वह यादव जी का नौकर था।
नौकर के अंदर जाते ही दो मिनट के अंदर ही यादव जी दौड़ते-हांफते प्रकट हो गए थे।
न्यूरान्स में हलचल बढ़ गई थी। स्मृतियों की लहरें लहरा उठी थीं।
अरे, इन यादव जी की शक्ल-सूरत तो हुडुकचुल्लू से मिलती-जुलती है!
नहींऽऽ! ये हुडुकचुल्लू नहीं हो सकते। मन ने वितर्क किया।
कहां वो आवारा, अडिय़ल, फक्कड़, फुस्कट, बेवकूफ-सा दिखने वाला गंवई छोकरा हुडुकचुल्लू और..., कहां से संभ्रांत नागर ट्रांसपोर्टर यादव जी!
उहापोह में अभिवादन भी नहीं कर सका था मैं यादव जी को!
''अरे! आऽऽ प!! मेरे मालिक!!!ÓÓ लपककर मेरे पैर छू लिए थे यादव जी ने।
''पूजा करते समय मेरी दायीं आंख फड़क रही थी। तभी लगा था कि कुछ शुभ होने वाला है। पूजा करके उठा तो नौकर ने आपके बारे में बताया। नाम सुनते ही लगा कि ये आर.पी. सिन्हा हो न हो मेरे मालिक ही होंगे।ÓÓ
12-13 बरस हो गए आपसे भेंट हुए। मन तड़प रहा था आपसे मिलने के लिए लेकिन आपने घर ही बदल लिया था। आपका नया पता मुझे मालूम नहीं हो सका लाख प्रयास करने पर भी। लेकिन आज 'जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू, सो तेहिं मिलहिं न कछु सन्देहूÓ को सार्थक कर दिया ईश्वर ने। ईश्वर को धन्यवाद कि उसने आज की पूजा का फल तो दे ही दिया मुझे।Ó
यादव जी आल्हाद से सराबोर दिख रहे थे। अनवरत बोले चले जा रहे थे वे।
उनकी खुशी इतनी उच्छल थी कि खुशी के आवेग में वहीं से आवाज दी थी उन्होंने-
''अजी सुनती हो! मेरे मालिक आए हैं। यहां आओ और आशीर्वाद लो। रूपा और शंकर को भी साथ ले आना।ÓÓ गद्गद हो रहा था मैं भी।
उनकी पत्नी, बेटी-बेटे सभी बाहर आए। सभी ने बारी-बारी से मेरे पैर छुए थे।
''ये मेरे मालिक हैं। इतना ही नहीं कि इन्हीं के आशीर्वाद से हमारी शादी हुई बल्कि ये कहो कि आज मैं जो कुछ भी हूं इन्हीं के मंतर के बल पर हूं।ÓÓ पत्नी से कहा था उन्होंने।
''ये मेरी बेटी है रूपा; तीसरे में है और ये है मेरा बेटा शंकर; चौथे में है और ये है मेरी पत्नी उमा जिसे शायद आप पहचान नहीं पा रहे होंगे।ÓÓ उन्होंने उल्लासित स्वर में परिचय कराया था।
''जाओ जल्दी से चाय कॉफी कुछ भी ले आओ; साथ में कुछ खाने को भी ले आना।ÓÓ अपनी पत्नी से बोले थे वे।
''और, हां, बेटा शंकर, चाय तुम स्वयं लेकर आना, नौकर के हाथ मत भेजना।ÓÓ
आदेश सा दिया था उन्होंने अपने बेटे को जिसके पीछे भाव शायद यह था कि मेरे आगे वे अपनी शान नहीं दिखाना चाहते थे।
इतना विनम्र हो गया हुडुकचुल्लू!
उसकी पत्नी व बच्चे घर के अंदर चले गए थे।
थोड़ी ही देर में शंकर कॉफी ले आया था और उसके पीछे-पीछे प्लेटों में वेफर्स, दालमोठ, फल आदि से 'ट्रेÓ सजाए उसकी पत्नी चली आ रही थी गजगामिनी चाल में। बेटी पानी भरा गिलास ला रही थी।
''अरे, इतना कुछ! सुबह-सुबह नाश्ता होगा कि लंच?ÓÓ अनायास कह बैठा था मैं।
''थोड़ा सा ही सही कुछ ले लीजिए।ÓÓ उसकी पत्नी ने याचना सी की थी।
सब कुछ अप्रत्याशित सा था मगर प्रत्यक्ष।
फिर भी, न जाने क्यों इतनी देर में भी सहज न हो पाया था मैं; जैसे विश्वास नहीं हो पा रहा था मुझे इस प्रत्यक्ष पर भी।
बार-बार मन की आंखों को दिखने लगता था हुडुकचुल्लू।
15-16 वर्ष पूर्व का गोल निस्तेज चेहरे, छोटे माथे, बिखरे बाल, धंसी हुई आंखों वाले अक्खड़-फक्कड़, गंवई हरिश्चन्दर उर्फ हरिसवा को गांववालों की कौन कहे स्वयं उसके पिता ही नाराज होकर 'हुडुकचुल्लूÓ पुकारते थे। 'हरिसवाÓ या 'हरिश्चन्दरÓ नाम था उसका, यह लोग भूल ही गए थे।
आज वही हुडुकचुल्लू 'एच.सी. यादव, ट्रांसपोर्टरÓ के रूप में मेरे सामने था।
कितना परिवर्तन आ गया था उसके व्यक्तित्व के पांचों 'वÓकार में। वेश, वस्त्र, वाणी, विचार और व्यवहार-सभी कुछ तो बदल गया था हुडुकचुल्लू का। मेरे मन में उमडऩे-घुमडऩे लगा था 15-16 वर्षों पूर्व का उसका इतिहास।
दिन भर निठल्ला घूमना; न पढऩा न लिखना, न ही घर-बाहर का कोई काम करना, न खूंटे से बंधी गाय-भैंस का सानी-पानी करना और न ही खेती-खलिहानी से कोई मतलब रखना। आठवें में दो बार फेल होने के बाद पढ़ाई बंद।
सुनते थे कि तीसरी बार भी स्कूल में उसका नाम लिखवाया था उसके पिता ने लेकिन स्कूल में किसी शिक्षक से हाथापाई कर ली थी उसने, क्योंकि 'होमवर्कÓ न करके लाने पर शिक्षक ने मुर्गा बनने के लिए कह दिया था 'हुडुकचुल्लूÓ को। इसी तरह की बातें सुनने को मिल रही थीं उन दिनों 'हुडुकचुल्लूÓ के बारे में।
काफी के प्याले में तैरता सा दिखा मुझे हुडुकचुल्लू से अपनी पहली भेंट का दृश्य भी।
पिता के मरने के बाद तेरहवीं के दिन ही बड़े भाई ने साफ शब्दों में मना कर दिया था हुडुकचुल्लू को घर में घुसने से।
मगर, हुडुकचुल्लू पैतृक सम्पत्ति पर अपना अधिकार क्यों छोड़ देता। विवाद वहीं उत्पन्न हो गया था।
गांव का सरपंच होने के नाते विवाद मेरे समक्ष आया था। गांव की पंचायत में दोनों पक्षों को सुनने के बाद मैंने निर्णय दिया था-
''कोई कितना भी निठल्ला हो उसे पैतृक मकान, संपत्ति आदि से बेदखल नहीं किया जा सकता। हां, उसे खाना खिलाने का दायित्व नहीं होगा उसके भाई भौजाई पर। वो स्वयं कमाएगा-खाएगा।ÓÓ
इस तरह हुडुकचुल्लू को पैतृक सम्पत्ति में अपना अंश मिल गया था। याद आ रहा था मुझे।
जनमत की उपेक्षा करके न्याय किया था मैंने इसलिए या कि उसके सिर से छिनती हुई घर की छत उसे वापस मिल गई थी इसलिए... कारण कुछ भी हो बाद में वह मेरा बहुत सम्मान करने लगा था।
अब वह हर तीसरी-चौथी शाम को नियमित रूप से आने लगा था मेरे पास उसके अपने शब्दों में 'मुझे नमस्ते करने।Ó
उसी ने बताया था मुझे कि अब वह मेहनत-मजूरी करने लगा है दो जून की रोटी की जुगाड़ करने के लिए।
जाने कैसे... मेरी भाव-सरणि हुडुकचुल्लू के जीवन-इतिहास के साथ-साथ स्वयं अपने इतिहास के साथ भी जुड़ गई। हां, उन्हीं दिनों की ही तो बात है।
समय का फेर कहें इसे या कि अपनी आजीविका का दबाव कि गांव का निश्चिंत सुख-वितान छोड़कर उन्हीं दिनों शहर आना पड़ा था मुझे भी।
और, तब हुडुकचुल्लू ही क्या, अपने गांव से ही संपर्क धीरे-धीरे छूटता-सा गया था मेरा।
पहले सप्ताह में, फिर महीने में, फिर 3-4 महीनों में और अब वर्ष में एकाध बार, शाम को गांव पहुंचना, रातभर ठहर कर दूसरी सुबह या दोपहर तक वापसी की आपाधापी में हुडुकचुल्लू से भेंट करने का अवकाश ही कहां था?
शायद उसे भी मेरे आने की सूचना समय से नहीं मिलती होगी।
मैं यदा-कदा आसपास के लोगों से उसका हालचाल पूछ लेता था।
तभी एक बार ज्ञात हुआ था कि किसी ईंट-भट्ठे पर नौकरी करने लगा था हुडुकचुल्लू।
''क्या सोच रहे हैं आप? कॉफी ठंडी हो रही हैÓÓ यादव जी ने ही ध्यान भंग किया था मेरा।
''कुछ विशेष नहीं।ÓÓ कहा था मैंने और चुपचाप कॉफी पीने लगा था।
एकाध सिप के बाद न जाने कैसे विचारवीथी फिर जुड़ गई अतीत से। याद आया, 12-13 वर्ष पूर्व जब मैं दिलकुशा में था, वह आया था मेरे पास।
हाल-हवाल के बाद सीधे 'मकसदÓ पर आ गया था वह।
''आप तो जानते हैं कि गांव-घर में कोई शुभचिंतक नहीं है मेरा। भट्ठे पर चौकीदारी करके रोटी का जुगाड़ तो हो जाता है, लेकिन रोटी बनाने वाली न होने से मेरा ढेर सारा टैम रोटी बनाने और दूसरे घरेलू कामों में बीत जाता है; गिरहस्ती फिर भी बदहाल रहती है, सच पूछो तो गिरहस्ती तो बसी ही नहीं; सोचता हूं कि गिरहस्ती बसा लूं यदि आपकी किरपा हो जाए।ÓÓ
''मैंऽऽ, क्या कृपा कर सकता हूं?ÓÓ चौंक कर पूछा था मैंने।
''बहुत कुछ मैंने तय कर लिया है। आपको बस इतना करना होगा कि मेरे ब्याह में मेरे पिता की जगह उनकी जिम्मेदारी निभाकर लड़की वालों से बातचीत करनी हो या द्वारचार की रस्म अदायगी निभाकर यही जिम्मेदारी आप निभा दें।ÓÓ
''बस इतने से ही तुम्हारी गृहस्थी बस जाए तो उससे बढ़कर खुशी क्या हो सकती है मेरे लिए।ÓÓ मैंने सहर्ष सहमति दे दी थी।
फूला नहीं समाया था हुडुकचुल्लू।
मगर समस्या दूसरी थी।
उसकी भावी पत्नी इंटर पास थी और वह आठवां फेल। लड़की वालों की यही हिचक थी।
हुडुकचुल्लू को मैंने समझाया था कि या तो इस शादी के बारे में भूल जाए या वायदा करे कि वह चाहे जैसे पढ़ाई करके बी.ए. पास कर लेगा।
मैंने उससे यह भी कहा था कि ''मजदूरी करो या नौकरी या अपना व्यवसाय जीवन में सफलता पाने का एक ही मंत्र है : श्रम, कौशल, लगन और ईमानदारी जिसमें मंत्र में बताए गए 'कौशलÓ को निखारने के लिए साथ ही 'श्रमÓ,  'लगनÓ और 'ईमानदारीÓ के प्रति 'निष्ठाÓ बढ़ाने के लिए 'शिक्षितÓ होना आवश्यक है।ÓÓ
उसने वायदा किया था कि वह पढ़ाई तुरंत आरंभ कर देगा और एक दिन बी.ए. पास करके जरूर दिखाएगा।
मुझे भरोसा था कि हुडुकचुल्लू जैसा अडिय़ल जो वायदा करेगा उसे निभाएगा भी।
इसी विश्वास के सम्बल से लड़की वालों को मैंने आश्वस्त कर दिया था।
विवाह नियत समय पर सम्पन्न हो गया था।
तब से आज 12-13 वर्ष बाद भेंट हुई थी उससे।
इस बीच दिलकुशा से मैं इस नई कॉलोनी में आ गया था।
''कहीं फिर खो गए आप?ÓÓ मेरे मन में उमड़-घुमड़ को भांप कर यादव जी बोले थे।
''हां! यूं ही। आपके बारे में ही सोच रहा था।ÓÓ मैंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
''कम से कम आप तो मुझे 'आपÓ न कहें!ÓÓ
मैं स्वयं चाहता हूं कि हुडुकचुल्लू से 'एच.सी. यादवÓ बनने की पूरी कहानी आपको सुनाऊं। मुझे विश्वास है कि मेरी सफलता और आपके द्वारा दिए गए गुरुमंत्र की सफलता देखकर खुश होंगे आप। कृतज्ञ भाव से कहा था उन्होंने।
''लेकिन कल्पना सहजता से नहीं कर पा रहे होंगे कि 'हुडुकचुल्लूÓ 'एच.सी. यादवÓ कैसे बन गया? यही न!ÓÓ कहकर खुलकर हंसे थे यादव जी।
''तो सुनिए मेरी राम कहानी-
मेरा विवाह तो आपने ही कराया था इस शर्त के साथ कि बी.ए. पास करना ही होगा मुझे...ÓÓ
यादव जी अपनी रामकहानी सुनाने के मूड में आ गए थे शायद।
''हां! याद है मुझे।ÓÓ
''उसके बाद पास के कस्बे के कॉलेज गया था मैं; कई लोगों से मिला वहां; बहुतों ने अनुत्साहित किया लेकिन संस्कृत-शिक्षक श्री आर.सी. त्रिपाठी ने मेरा हौसला बढ़ाया था; वही ले गए थे मुझे प्रधानाचार्य डॉ. पी.पी. जैन के पास। डॉ. जैन ने भी मुझे उत्साहित किया। उन्होंने कहा कि प्रौढ़ शिक्षा वालों के लिए शासन की विशेष योजना का लाभ उठाया जा सकता है। सीधे हाईस्कूल का फार्म भर दो।ÓÓ
उनके निर्देशन में मैंने हाईस्कूल का फार्म भर दिया था। जमकर पढ़ाई भी की थी मैंने।
संयोग से पहले प्रयास में ही सेकण्ड डिवीजन उत्तीर्ण भी हो गया मैं।
मेरी पत्नी ने 'रामचरित मानसÓ का गुटका उपहार में दिया था मुझे तभी।
पत्नी ने आग्रह भी किया मानस पढऩे का। एक बार मानस पढऩे के बाद मुझे उसमें कई प्रसंग प्रेरणादायी प्रतीत हुए। मानस में राम-रावण-युद्ध के समय युद्ध क्षेत्र में हुए 'राम-विभीषण-संवादÓ संघर्ष में विजयी होने के अमोघ मंत्र प्रतीत हुए मुझे। उसके पश्चात् तो मेरी जीवनशैली ही बदल गई। अपना काम और भी अधिक श्रम व ईमानदारी से करने लगा था मैं।
संयोग से उन्हीं दिनों मैंने भट्ठे से ईंट सरकशी से लादते हुए दो लोगों का मुकाबला किया और जान पर खेल करके उन्हें पकड़कर मैं थाने तक ले गया था; भट्ठा-मालिक बहुत खुश हुए थे; एक साइकिल इनाम में दी थी उन्होंने मुझे।
इतना ही नहीं, मेरी आमदनी बढ़ सके इसके लिए कहा था उन्होंने कि ड्राइवरी सीख लो और रात की ड्यूटी के बाद सुबह-सुबह ट्रॉली से एकाध जगह ईंटें पहुंचा दिया करो, प्रति फेरा 25 रुपए मिल जाएंगे तुम्हें। अपने ट्रैक्टर पर ड्राइवरी सीखने की अनुमति भी दी थी। इस तरह ड्राइवरी सीख लेने पर मेरी आमदनी बढ़ गई। मेरा काम मजे से चलने लगा था।
यादव जी अपनी आपबीती सुना रहे थे और सुनने में मुझे अच्छा भी लग रहा था।
अतीत के पन्ने पलटते हुए थोड़ा ठहरकर फिर चालू हो गए थे वे-
''गांव वाले रामप्रसाद बढ़ई को भूले नहीं होंगे आप। उन्हीं का लड़का हरप्रसाद विश्वकर्मा बहुत शराब पीने लगा था। पिता ने जो ट्रैक्टर लोन से लिया था उसकी किश्तें हरप्रसाद अदा नहीं कर रहा था। अंतत: कर्जे के एवज में ट्रैक्टर मय ट्रॉली के नीलामी पर चढ़ गया। कुछ अपनी जमा-पूंजी और कुछ भट्ठा-मालिक से उधार लेकर मैंने वह ट्रॉली व ट्रैक्टर खरीद लिया। मैंने तय किया था कि दूसरे ट्रैक्टरों की जगह अपने ट्रैक्टर से कम भाड़ा लेकर पहले मैं भट्ठा-मालिक का ऋण अदा कर दूंगा। वही किया भी मैंने। और तब, ट्रैक्टर व ट्रॉली का पूर्ण मालिक बन गया मैं।
हां, तब रात्रि-जागरण वाली नौकरी छोड़ दी मैंने। स्वतंत्र रूप से दिन भर फेरा पर ईंटों की ढुलाई करने लगा था मैं। गांव वालों के खेतों की जुताई भी कर देता था मैं और भट्टे पर काम न होने के दिनों में कस्बे के सेठ के माल की ढुलाई भी करता था। इस तरह 250-300 रुपए प्रतिदिन की बचत होने लगी थी मेरी।
इस बीच इंटर पास कर लिया था मैंने उसी कॉलेज से।ÓÓ वे अतीत में डूबे हुए थे।
''तब तो गांव में तुम्हारा मान-सम्मान बढ़ गया होगा?ÓÓ मैंने पूछा।
''वह तो मैं नहीं बता सकता हां, इतना अवश्य कहूंगा कि तब कोई मुझे 'हुडुकचुल्लूÓ नहीं पुकारता था।  भइया-दादा-चाचा कहने लगे थे लोग। बड़े भाई भी सामने पड़ते तो झेंप से जाते थे। इतना बहुत था मेरे लिए। अब तो बस बी.ए. की डिग्री तैर रही थी आंखों के सामने।ÓÓ
मैंने देखा कि निस्तेज चेहरे वाले हुडुकचुल्लू के बजाय आत्मविश्वास से दिपदिपाते चेहरे वाले यादव जी की आंखों से उल्लास फूट पड़ रहा था। बिना किसी अतिरिक्त  भूमिका के पुन: चालू हो गए थे यादव जी।
''मैंने बी.ए. का प्राइवेट फार्म भी भर दिया। किसी तरह से प्रथम वर्ष की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली मैंने यद्यपि 'माक्र्सÓ अच्छे नहीं आए। दूसरे वर्ष चिन्ता हुई कि बी.ए. फाइनल की परीक्षा में अच्छे अंक कैसे आएं। परीक्षा के दिन पास आने पर परेशानी अधिक महसूस हुई। उन दिनों पढ़ाई करता या ट्रैक्टर-ड्राइवरी। न करने पर आमदनी ठप्प! तब घर का खर्च कैसे चलता? इसका हल भी शीघ्र निकाल लिया मैंने।
मेरे बड़े भाई अपने लड़के की पढ़ाई नहीं करा पा रहे थेे रुपयों के अभाव में। एक दिन मैंने अपने भतीजे को बुलाया और अपना उदाहरण देते हुए उसे मैंने अपने बल पर पढ़ाई करने की सलाह दी और आपका दिया गुरु-मंत्र भी। अपनी ट्रैक्टर व ट्राली मैंने उसे 200 रुपए प्रतिदिन के किराए पर देने की पेशकश भी कर दी कि अतिरिक्त बचत करके वह अपना खर्च निकाल ले। वह मान गया था।
इस तरह मुझे पढऩे का भरपूर समय मिल गया था और उसे आय का साधन। इस बार परीक्षा समाप्त होने पर भी मैंने ट्रैक्टर व ट्राली उससे वापस नहीं लिया क्योंकि तब उसकी आय का स्रोत बंद हो जाता। अब मेरे सामने प्रश्न था कि अपने खाली समय का मैं क्या करूं? निठल्ले घूमने की आदत मैं वर्षों पूर्व छोड़ चुका था।ÓÓ
यादव जी थोड़ी देर के लिए ठहरे।
''जिस भाई ने तुम्हें पीडि़त किया था उसी के लड़के के प्रति उदारता दिखाकर तुमने अपनी महानता का ही परिचय दिया।ÓÓ मैंने कहा।
''नहीं! इसे मैं अपनी महानता नहीं बल्कि अपने संकल्पों की कसौटी ही कहूंगा जिसकी प्रेरणा मुझे कवि मनीषी महामहिम राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री जी से मिली थी।ÓÓ एक नया रहस्य प्रकट करने के अंदाज में कहा था यादव जी ने।
''उन्हीं दिनों मेरे डिग्री कॉलेज के दीक्षांत समारोह में शास्त्री जी आए थे; कौतूहलवश मैं भी गया था समारोह में; 'बड़ा लक्ष्यÓ, 'बड़ी तपस्याÓ, 'बड़ा हृदयÓ, 'मृदुवाणीÓ, 'छोटा अहम्Ó और 'कल्याणी प्रवृत्तिÓ साथ ही 'अपने दोष-स्वीकार की भावनाÓ तथा 'ईश्वर के प्रति समर्पणÓ का भक्ति-भावÓ आवश्यक है। इसी कविता के सम्बल से मैंने कुछ संकल्प किए थे।
और, तमाम अच्छाइयां होने के बावजूद चूंकि गांव के सीमित 'कैनवासÓ में बड़ा लक्ष्य साबित करना मेरे लिए सहज संभव नहीं था; इसलिए शहर आ गया मैं।Ó
''थोड़ी-सी और शेष रह गई है मेरी कहानी।ÓÓ वे बोले थे।
''मैं रुचि से सुन रहा हूं; रोमांचक तो है ही, प्रेरणास्पद भी है यह।ÓÓ मैंने कहा तो और उत्साहित होकर पुन: मुखर हो गए थे वे।
''4 वर्ष हो रहे हैं मुझे यहां आए हुए। यहां आकर सबसे पहले मैंने एक ट्रक बैंक से फाइनेंस कराने का जुगाड़ बनाया जिससे आय का स्रोत बना रहे। इस तरह मैं यहां  बन गया एच.सी. यादव, ट्रांसपोर्टर।
उसके बाद जन-कल्याण के निमित्त एक एन.जी.ओ. 'ज्वाइनÓ कर लिया मैंने जो पर्यावरण के प्रति बहुत जागरुक हैं; जिसने 3 वर्षों से देश के विभिन्न नगरों में नि:शुल्क वृक्षारोपण का अभियान चला रखा है। इस अभियान में तन-मन-धन से जुटा हूं फिलहाल।
इस कॉलोनी में सपरिवार पिछले सप्ताह ही आया। इसके पूर्व गांव में ही था मेरा परिवार। दूसरी ट्रक कल खरीदी है।ÓÓ
कल तक की अपनी गति-प्रगति का लेखा-जोखा प्रकट कर दिया था उन्होंने।
घड़ी ने टनटनाकर 9 घंटे बजाए।
''अरे! 9 बज गया। बड़ी देर हो गई; चलना चाहिए।ÓÓ मैंने कहा। मैं उठ खड़ा हुआ।
''चले जाइएगा; जल्दी क्या है? इतने दिनों बाद तो भेंट...ÓÓ
उनकी बात बीच में ही काट दी मैंने- ''कॉलोनी में हैं तो भेंट होती ही रहेगी; मुझे ऑफिस जाना है और यादव जी आपको भी तो...ÓÓ
''फिर 'आपÓ?ÓÓ मेरी बात भी बीच में ही काट दी थी उन्होंने।
''मेरा यह अनुरोध नहीं मानेंगे? अगर 'हुडुकचुल्लूÓ या 'हरिसवाÓ नहीं कहना चाहते तो भी 'हरिश्चन्द्रÓ तो चलेगा ही।ÓÓ
''अरे हां, यह तो बताया ही नहीं आपने कि कैसे आए थे आप?ÓÓ पूछा था उन्होंने। जैसे कुछ याद आ रहा था उन्हें अचानक।
''आया तो था एच.सी. यादव ट्रांसपोर्टर की तलाश में मगर, जो व्यक्ति श्रम, कौशल, लगन और ईमानदारी के मंत्र को साकार करे 'हुडुकचुल्लूÓ से 'एच.सी. यादव ट्रांसपोर्टरÓ बन चुका हो और जिसे तुलसी से लेकर विष्णुकांत शास्त्री तक की सीखें याद हों उससे कुछ कहना उचित नहीं लगता मुझे; ऐसा कोई काम, नागर कॉलोनी को ट्रांसपोर्टनगर बनाने का काम, ट्रकें खड़ी करके कॉलोनी के बीच सड़क को अवरुद्ध करने का काम करेगा ही नहीं, जो किसी को अकारण कष्टप्रद हो।ÓÓ मैंने निर्विकार शब्दों में उत्तर दिया था।
''देखिए! ट्रकें यदि यहां खड़ी रहेंगी तो मेरा काम कैसे चलेगा? कल ही दूसरी ट्रक भी ट्रांसपोर्ट पर लग जाएगी। परसों तक पहली ट्रक का ड्राइवर भी वापस लौट आएगा; घर गया है तीन दिन के लिए।ÓÓ उन्होंने सफाई दी थी।
''मैंने कहा न कि उस संबंध में तुमसे कुछ कहने का औचित्य प्रतीत नहीं होता मुझे। मैं कॉलोनीवासियों को समझा दूंगा।ÓÓ यह कहकर और पुन: शीघ्र आने का वायदा करके वापस चला आया मैं।
हां, उसे सपरिवार अपने घर आने का निमंत्रण देना नहीं भूला था मैं।