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Tuesday 21 Nov 2017

अब सात पैंतीस नहीं बजते

सुभाष रस्तोगी
फ्लैट नं. 14 ए, डिवाईन अपार्टमेंट्स
विकास नगर, वार्ड
नं. 12, बलटाना, जीरकपुर-140604
रात आधी से अधिक बीतने को है। शिखा कमर सीधी करने के लिए बिस्तर पर क्या लेटी कि उसकी आंख लग गई। आंखें तो मेरी भी नींद से बोझिल हैं। लेकिन मैं उठूंगा तो मेरी पदचाप से शिखा जाग जाएगी और यही तो मैं नहीं चाहता। दिनभर तो घर में लोगों की आवाजाही लगी रहती है। कभी किसी अखबार का नुमाइंदा आ रहा है तो कभी किसी राष्ट्रीय चैनल का स्थानीय प्रतिनिधि अपने पूरे लाव लश्कर के साथ और रातें रतजगे में बीतती हैं। शिखा कुनमुनाई है, कुनमुनाई नहीं, कुछ बड़बड़ाई है, बड़बड़ाई नहीं, शायद किसी अजाने भय से चीखी है। हे राम! इतनी तो कृपा करो कि कम से कम तीन चार घंटे तो दु:स्वप्न उसका पीछा छोड़ दें। जब पूरा जीवन ही एक दु:स्वप्न में तब्दील हो गया हो तो रात-विरात के दु:स्वप्न से कैसा भय। मैं भी कितना अहमक हूं। शांतचित्त बैठ भी नहीं सकता। यदि कहीं बेसाख्ता कुर्सी की कोई आहट हुई तो शिखा जाग जाएगी और जागते ही फिर वही उसका अनर्गल प्रलाप... अरे, अब तो जीवन का हासिल ही है... बैठे-बैठे रोना... हंसना... फिर रोना... और अब पूरी उम्र का हासिल यही तो है।
गला सूखने लगा है। तो क्या करूं, तिपाई पर पड़े जग से पानी गिलास में डालूं और गटागट पी जाऊं या फिर फ्रिज में से पानी की बोतल निकालकर गले में उड़ेल लूं। शायद इससे भीतर जो ज्वाला धधक रही है, वह शांत हो जाए। लेकिन नहीं... मैंने उठना नहीं है... उठने का उपक्रम भी नहीं करना है... मुद्रा भी नहीं बदलनी है। जानता हूं कि थोड़ी-सी आहट हुई तो शिखा जाग जाएगी। यही तो मैं नहीं चाहता। सच बताऊं, उसका दु:ख, उसके आंसू अब मुझसे सहे नहीं जाते, लेकिन करूं क्या? कोई रास्ता भी तो नहीं है। उसे चुप कराते-कराते मैं भी फफक कर रो पड़ता हूं।
आज सुबह की ही तो बात है। यही कोई दस ग्यारह बजे होंगे। शिखा रोते-रोते अचानक खिलखिलाकर हंस पड़ी। मेरे पांवों के नीचे से •ामीन निकलना स्वाभाविक था। मैंने सवालिया न•ारों से उसे देखा तो उसने मेरी तरफ सवाल दाग दिया।
आज सुबह की ही तो बात है। यही कोई दस ग्यारह बजे होंगे। शिखा रोते-रोते अचानक खिलखिलाकर हंस पड़ी। मेरे पांवों के नीचे से •ामीन निकलना स्वाभाविक था। मैंने सवालिया न•ारों से उसे देखा तो उसने मेरी तरफ सवाल दाग दिया।
-भूल गए परसों नौ अप्रैल है। शिखा ने मुझे झकझोरते हुए कहा।
-नहीं, याद है।
- मेरे पास कोई चारा नहीं था शिखा की हां में हां मिलने के अलावा जबकि मुझे मालूम था कि परसों मई की नौ तारीख है।
-हां... हां, कैसे भूल सकता हूं, परसों नौ अप्रैल ही तो है।
-नहीं भूले कि परसों नौ अप्रैल है, तो यह भी नहीं भूले होंगे कि परसों सौम्या का जन्मदिन है... हैप्पी बर्थडे। समीर हम इस दफा सौम्या का जन्मदिन इतनी धूमधाम से मनाएंगे कि  बस... चहकते हुए बोली थी।
-हां... हां... क्यों नहीं?
-तो फिर कल मार्किट जाएंगे सौम्या की ड्रेस लेने और हां उसके लिए बार्बी डॉल भी लाएंगे। वहीं बार्बी डॉल जिसे लेने के लिए वह कई दिनों से जिद्द कर रही है।
- हां... हां... जरूर।
यही खराब आदत है... बात पूरी सुनते नहीं है, समीर और बीच में ही बोल पड़ते हैं... और हां, सौम्या को कुछ बताएंगे नहीं। जब वह कल सुबह स्कूल चली जाएगी तो चुपचाप मार्किट जाएंगे और ड्रेस और बार्बी डॉल गुपचुप ले आएंगे। ऐसा करना तुम दफ्तर से आधे दिन की छुट्टी ले लेना... सरप्राइ•ा देंगे सौम्या को। सच सौम्या कितनी खुश होगी अपनी मनपसंद ड्रेस और बार्बी डाल पाकर।
तभी किसी राष्ट्रीय अखबार का स्थानीय प्रतिनिधि आ धमका था, लेकिन मैंने आंखों ही आंखों में, उससे उल्टे पांव लौटने की मिन्नत की थी। वह शायद मेरी आंखों की भाषा समझ गया था कि शिखा जिस स्वप्नलोक में डूबी हुई है, उसकी एक तानता में कोई खलल न पड़े।
शिखा नींद में फिर चौंकी है। शायद उसने फिर कोई दु:स्वप्न देखा है। उसने करवट भी बदली है। यह क्या चेहरा पसीने से लथपथ है, लेकिन वह बेसुध सो रही है। सात रातों का रतजगा कम तो नहीं होता और फिर घर में लोगों की आमदरफ्त.. सवाल... कभी न खत्म होने वाले सवाल... लोगों का हुजूम... सड़कों पर लोगों का खौलता गुस्सा... निरीह भीड़ पर पुलिस का लाठीचार्ज, लेकिन भीड़ का जैसे सब कुछ तहस-नहस करने के लिए आमादा होना... गुस्सा... और गुस्सा... बरदाश्त  की भी एक सीमा होती है।
आखिर मैं कुर्सी पर बिना हिले-डुले एक मुद्रा में कब तक बैठ सकता था? लेकिन इसके अलावा और विकल्प भी क्या था क्योंकि किसी भी कीमत पर मैं शिखा की नींद में खलल नहीं चाहता था।
उस दिन शायद सोमवार था। सोमवार हो या बुधवार क्या फर्क पड़ता है। अखबार में खबर छपी थी कि राष्ट्रीय राजधानी में बस में लिफ्ट देने के बहाने सात लोगों ने मेडिकल की एक छात्रा का अपहरण कर चलती बस में ही बारी-बारी से उसके साथ बलात्कार किया और फिर उसे मरा हुआ समझकर चलती बस से उसे खिड़की के बाहर फेंक दिया। अ$खबार में खबर पढ़कर शिखा भीतर तक हिल गई थी। उसने लगभग पसीन होते होते हुए कहा- समीर तुमने आज का अ$खबार देखा है?
-देखा है।
-यह खबर भी देखी  है।
मैंने खबर देखकर भी न देखने का जैसे अभिनय करते हुए कहा- कौन-सी?
-कैसे आदमी हैं! देखो... यह खबर देखो। लोग कैसे जानवर हो गए हैं। जानवरों का भी कोई धर्म होता होगा, लेकिन लगता है कि इन लोगों में तो जैसे इंसानियत है ही नहीं। कैसा वक़्त आ गया है। हम कैसे दौर से गुजर रहे हैं। जब राष्ट्रीय राजधानी का यह हाल है तो दूरदरा•ा के शहरों, कस्बों में क्या होता होगा?
-हां, वाकई लगता है कि आदमी एकदम जानवर हो गया हैा। दरअसल अंधेर नगरी चौपट राजा का नि•ााम है। किसी को डर ही नहीं- न सरकार का, न कानून का। एक आम आदमी ही है जिसकी जान हर वक़्त सांसत में पड़ी रहती है जो सरकार से भी डरता है और कानून से भी।
-मुझे तो बहुत डर लगता है।
-क्यों?
-हमारी भी तो एक बेटी सौम्या  है। वह भी तो अब स्कूल जाने लगी है।
-तो इसमें डरने की क्या बात है। सौम्या आज स्कूल जा रही है, तो कल कॉलेज भी जाएगी।
-नहीं, यह बात नहीं है। तुम्हीं ने तो अभी कहा है कि आदमी जानवर हो गया है। उसका कोई दीन-ईमान रहा ही नहीं है। सुनो जी... हमारी सौम्या बस से स्कूल जाती है, मुझे डर लगता है।
जब तक स्कूल से लौटकर नहीं आती, जान सूली पर टंगी रहती है।
-मुहल्ले में और भी तो हमारे जैसे माता-पिता हैं जिनकी बच्चियां बसों में ही स्कूल जाती हैं।
-तुम्हें कुछ पता भी है समीर। हमारे पड़ोस में जो मि. मेहरा रहते हैं, उनकी बच्ची के साथ क्या हुआ?
-क्या हुआ?
-मिस्टर मेहरा का घर आखिर में पड़ता है। इसलिए ड्राइवर जब उसे घर के बाहर छोड़ता है तब वह बस में अकेली ही होती है। क्या तो उम्र है उस बच्ची की। अभी पांचवीं ही तो पास किया है। परसों ड्राइवर ने टॉफी देने के  बहाने उस बच्ची से अभी छेड़छाड़ की ही थी, यह तो शुक्र है ईश्वर का तभी मिस्टर मेहरा की गाड़ी सामने से आती हुई उसे दिखाई दे गई और बचाव हो गया। बच्ची ने रोते-रोते बाद में जब सारी बात अपनी मम्मी को बताई तो मिसेज मेहरा तो कांप उठीं। अगली सुबह जब मिस्टर मेहरा ड्राइवर की शिकायत लेकर प्रिंसिपल के पास पहुंचे तो प्रिंसिपल ने यह कहकर पल्ला झाड़ दिया कि मैं कैसे आपकी बात पर यकीन करूं? स्कूल की और भी तो लड़कियां छुट्टी होने पर इसी बस से अपने घर जाती हैं, परन्तु उनके पैरेन्ट्स ने तो कभी कोई शिकायत नहीं की। आप तो नाहक पैनिक क्रिएट कर रहे हैं। मिस्टर मेहरा, ज्यादा ही चिंता है तो आप खुद स्कूल से अपनी बच्ची को छुट्टी होने पर ले जाया करें और सुबह छोड़ भी जाया करें।
-तो यह बात है। है तो यह वाकई चिंता की बात।
-सुनो, हम सौम्या को स्कूल बस से नहीं भेजेंगे।
-यह तो कोई बात नहीं। शिखा पांचों उंगलियां एक जैसी नहीं होतीं। सौम्या की स्कूल बस का ड्राइवर नत्था सिंह भला आदमी है। पोते-पोतियों वाला है। देखती नहीं तो सभी बच्चों का बस में कितना ध्यान रखता है।
शिखा ने फिर करवट बदली है। चेहरा कैसा •ार्द हो गया है- मानो खून की एक बूंद भी भीतर शेष न हो। सोये हुए शिखा की आंखें खुली हुई-सी लग रही हैं। मन हुआ कि उठूं और आहिस्ता से उसकी पलकें मूंद दूं। लेकिन हिम्मत नहीं हुई। वैसे तो लगता है बाहर काफी उजाला फैल गया है। मगर कमरे में अभी भी अंधेरा है। सोचता हूं जब तक उजाला पूरी तरह से कमरे के भीतर दाखिल न हो जाए, तब तक शिखा को सोने दूं। दिमाग न सही, शरीर को तो कुछ राहत मिल सके। सुबह होते ही घर में लोगों की आवाजाही शुरू हो जाएगी। लोग आएंगे, तरह-तरह के सवाल पूछेंगे और फिर वही सब कुछ सिलसिलेवार दोहराना पड़ेगा जो पिछले सात दिनों से दोहरा रहा हूं। यह सब कुछ सूखे हुए जख्म में अंगुली डालकर उसे हरा करने जैसा ही तो है। जानता हूं कि ज्यादातर आने वाले लोगों की आंखों में तरस का ही भाव होता है, मानो उनकी आंखें कह रही हों इन बेचारों के साथ ही यह सब कुछ होना था। कइयों की आंखों से कोई अज्ञात भय भी झांक रहा होता है कि उनके भी अबोध बच्चियां हैं घरों में, कल उनके साथ भी कुछ अमंगल घट गया तो क्या होगा?
हॉकर ने बालकनी में अखबार डाला है जिसकी आहट से हड़बड़ाकर शिखा आंखें मलती हुई उठकर बैठ गई है। कमरे में उजाला भी फैल गया है। सीधे उसकी निगाह घड़ी पर गई है, सुबह के छ: बजने को हैं। शिखा एकदम साड़ी की ठीक करती हुई बिस्तर से उठी और मुझे अपने सामने कुर्सी पर बैठा हुआ देखकर गुस्से से बोली- सुबह के छ: बजने को हैं। तुम्हारी आंख अगर पहले खुल गई थी तो मुझे जगाया क्यों नहीं? मालूम है सात पैंतीस पर सौम्या की स्कूल बस आ जाती है। उसका स्कूल बैग भी अभी लगाना है, उसे नहलाना भी है और उसका ब्रेकफ्रास्ट भी तैयार करना है। तुम इस तरह से मेरी तरफ क्यों देख रहे हो? उठो, तुम जल्दी से सौम्या का स्कूल बैग लगा दो। ध्यान से सारी किताबें बैग में रख देना और हां, गीजर भी ऑन कर देना। तब तक मैं चीज ब्रेड तैयार करती हूं। देर बहुत हो गई है। आंख खुली ही नहीं। अब सारे काम तुरत-फुरत करने होंगे।
मैं शिखा की तरफ देखता रह गया। समझा नहीं, मैं प्रत्युत्तर में क्या कहूं। मैं चुपचाप उठा। बाथरूम में जाकर गीजर ऑन कर दिया। फिर सौम्या का स्कूल बैग लगाने का उपक्रम करने लगा। तभी शिखा भागती हुई किचन से भीतर आई और मुझसे संबंधित हो बोली- ओफ्फोह तुम अभी तक सौम्या का स्कूल बैग ही ढंग से नहीं लगा पाए और घड़ी की सुइयां देखी हैं कितनी ते•ाी से भाग रही हैं। लो चाय पी लो और जाकर सौम्या को जगाओ। सौम्या तो बड़े सबेरे ही उठकर बैठ जाती है। आज पता नहीं क्यों नहीं जागी। ओफ्फोह!  वह दूध के बिना कहां जागती है। मैं पहले उसका दूध बनाकर लाती हूं। सुनो, आज मार्किट जाएंगे तो बोर्नविटा भी लेकर आएंगे। बोर्नविटा भी खत्म हो रहा है। शिखा पता नहीं किस उन्माद में थी और वह बेरोकटोक बोले चली जा रही थी। सहसा फिर बोली- तुम अभी तक बैठे हो समीर कुछ तो मेरी हैल्प किया करो। जाकर सौम्या को जगाओ। मैं तब तक उसका दूध बनाकर लाती हूं।
मैं जड़, किंकर्तव्यविमूढ़ जस का तस बैठा रहा और अपलक शिखा को निहारता रहा। बड़ी बेचारगी की हालात थी मेरी। शिखा बेख्याली में पता नहीं क्या-क्या बोले जा रही थी। और अब वह सौम्या का ब्रेकफास्ट बनाने की तैयारी में थी। फ्रिज से ब्रेड और ची•ा निकालकर मेरे पास आ बैठी तथा मुझे अपनी ओर देखता हुआ पाकर एक तरह से चीखते हुए बोली- इस तरह से मुझे क्यों घूर रहे हो समीर। ओह बाबा, तुमने अभी तक सौम्या को जगाया ही नहीं। सुनो, स्कूल बस आकर चली गई तो तुम्हें खुद जाकर सौम्या को स्कूल छोड़कर आना पड़ेगा।
अब जो भी हो मुझे शिखा को इस स्थिति से बाहर लाना ही होगा। मैं हिम्मत करके उठा और शिखा को अपने सामने कुर्सी पर बिठा दिया और लगातार उसकी आंखों में झांकने लगा, जहां पता नहीं कितने सतरंगी सपने तैर रहे थे। मैं उसकी इस बेख्याली को तोडऩा नहीं चाहता था। लेकिन और कोई रास्ता भी मेरे सामने नहीं था।
मैंने शिखा को कंधों से झकझोरते हुए कहा- शिखा यह भागदौड़ किसलिए? यह ब्रेकफास्ट किसके लिए तैयार कर रही हो। सौम्या अब नहीं है। अब वह कभी स्कूल नहीं जाएगी। यह कहते ही मैं फफक कर रो उठा। शिखा भी दहाड़ मारकर रो उठी। मैं चाहता था वह रोए, खूब रोए ताकि हालात का सामना करने की शक्ति वह जुटा सके। इसलिए मैंने उसे चुप करने या दिलासा देने की कोशिश कतई नहीं की। और दिलासा देता भी कैसे? दिलासा देने को अब शेष ही क्या था। पिछले सात दिनों से मैं उसे दिलासा ही तो देता आया था। उम्मीद थी कि सौम्या राजधानी के मशहूर अस्पताल के आई.सी.यू. में है और शीघ्र ही ठीक होकर घर आ जाएगी और जैसे-तैसे  जिंदगी पटरी पर आ जाएगी। लेकिन कल यह उम्मीद भी टूट गई। डॉक्टरों ने अपने मेडिकल बुलेटिन में कहा- हमने सौम्या को बचाने की हरसंभव कोशिश की। सौम्या ने भी बड़ी बहादुरी से जिंदगी की लड़ाई लड़ी। लेकिन अफसोस, हम उसे नहीं बचा पाए।
शिखा का गला रोते-रोते रुंध गया। कंठ मेरा भी अवरुद्ध हो गया था। लेकिन मैं हिम्मत से काम नहीं लूंगा और शिखा को अब कौन संभालेगा। मैं उठा और पानी का गिलास उसके होठों से लगाते हुए बोला- शिखा अपने आपको संभालो। वास्तविकता को स्वीकार करो। रोना तो अब उम्र भर का है। सौम्या अब कभी नहीं लौटेगी। कैसा मनहूस दिन था वह। मेरी अकल पर भी जैसे पत्थर पड़ गए थे। मैंने उसे शाम को होमवर्क करने के बाद बाहर खेलने भेजा ही क्यों था। शिखा के मन में जैसे अपराध बोध जाग रहा था।
-शिखा इसमें तुम्हारा क्या कसूर है, रोज ही तो सौम्या होमवर्क करने के बाद बाहर पार्क में खेलने जाती थी और उस शाम को घर के सामने पार्क में भी खेलने नहीं गई थी। घर के बाहर ही खेल रही थी।
सौम्या की एक अच्छी आदत थी। वह ज्यादा देर लगातार बाहर नहीं खेलती थी। थोड़ी-थोड़ी देर बाद वह घर आ जाती थी। पूछती थी, मम्मी! आप क्या कर रहे हो? मम्मी मुझे प्यास लगी है। मुझे पानी दो। लेकिन वह दिन ही मनहूस था। सुबह से ही मेरा मन पता नहीं क्यों बेहद उदास था। किसी भी काम में मन लग ही नहीं रहा था। मन होता था बस रो लूं। फिर सोचती थी मुझे क्या हो गया है। सब कुछ ठीक-ठाक तो है। लेकिन मुझे क्या पता था... शिखा ने बात अधूरी ही छोड़ दी।
-कि शाम को सौम्या जब खेलने जाएगी तो फिर कभी नहीं लौटेगी- शिखा की अधूरी बात को पूरा करते हुए मेरा गला भी रुंध गया था।
-और जब मिली भी सौम्या तो किस हालत में मिली। पांच वर्ष की मासूम सौम्या की जालिमों ने क्या दुर्गत की थी। शिखा बेबस-सी मेरे कंधे पर सिर टिकाकर बिलख-बिलख कर रो उठी थी।
-शिखा रोओ मत। अपने आपको संभालो। तुम्हारे रोने से कुछ नहीं होगा। देखा नहीं तुमने सौम्या के बलात्कारियों के खिलाफ राजधानी के युवाओं का गुस्सा... जैसे लावा धधक उठा था... लेकिन हुआ क्या? सब कुछ टांय-टांय फिस्स। जो हुआ वह यह कि खबरिया चैनलों को एक और गर्मागर्म $खबर मिल गई बहस के लिए पैनल पर पैनल बिठाए गए। हमें भी कई जगह बुलाया गया। सरकार ने भी कहा कि अब और सहन नहीं होगा। सख्त कानून बनाए जाएंगे, लेकिन सख्त कानून बनाएगा कौन?... सभी तो हमाम में नंगे हैं। फिर बलात्कारियों को पकड़ा गया तो पुलिस से लेकर सरकार तक ने अपनी कारगुजारी के लिए अपनी पीठ थपथपाई... यह भी बखान करते नहीं थके मंत्री महोदय कि सौम्या को सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा उपलब्ध कराई जा रही है। लेकिन हुआ क्या... सौम्या ने जैसे ही आंखें मंूदी कि नाटक का पटाक्षेप हो गया। अब दो चार दिन बेचारे युवाओं का गुस्सा और उबलेगा। लेकिन होगा कुछ नहीं। ...इतने में कोई और सौम्या बलात्कारियों के हत्थे चढ़ेगी और सरकार भूल जाएगी हमारी बच्ची सौम्या के तिल-तिल मरने को।
तभी घंटी बजी थी... ट्रिंग-ट्रिंग... दरवाजा खोलकर देखा तो स्थानीय अखबार का कोई प्रतिनिधि था। इससे पहले कि वह कुछ कहता मैंने उससे संबोधित होते, हाथ जोड़ते हुए कहा- नहीं हमें कोई बात नहीं करनी है। हमें मेहरबानी करके हमारे हाल पर छोड़ दो। और मैंने फटाक से दरवाजा बंद कर दिया। आज दसवां दिन है। अब तो रोने के लिए आंखों में आंसू भी शेष नहीं है। इन दस दिनों में ढंग से एक निवाला भी मुंह में नहीं गया है। शिखा को बार-बार मूच्र्छा के दौरे पड़ते हैं। बीच-बीच में सुध लौटती हैं तो पूछ बैठती हैं- समीर तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं। सुबह के छ: बजने को है। सात पैंतीस पर सौम्या स्कूल की बस आ जाएगी तो सौम्या स्कूल कैसे जा पाएगी। हे प्रभु! तुम देख रहे हो न सब कुछ अब इतनी कृपा तो करो कि शिखा इस सच्चाई को स्वीकार कर ले कि सौम्या अब इस दुनिया में नहीं है। वह अब कभी स्कूल नहीं जाएगी... अब सात पैंतीस नहीं  बजते... अब सात पैंतीस नहीं बजेंगे।