Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

भड़ास

कमल चोपड़ा
1600/14, त्रिनगर
दिल्ली-110035
बहुत बेचैन सी आवाज में पुकारा था बहू ने बाबू जी को। अभी वे लेटे ही थे। थोड़ी देर आराम कर लेने की इच्छा को मारते हुए उठे वे- 'क्या हुआ?Ó टी.वी. चला रखा है। भक्ति रस का कोई गीत आ रहा होगा टीवी पर। सोचा होगा बाबूजी को दिखा दूं।
कुछ पूछने से पहले ही बोलने लगी बहू- देखो न बाबूजी टीनू को... इतने दिनों बाद टी.वी. पर मेरी फेवरिट मूवी आ रही है। इंतजार था मुझे इस फिल्म का और टीनू है कि आराम से देखने ही नहीं दे रहा। शरारत करे जा रहा है। कभी टी.वी. बंद कर देता है कभी पंखा बंद करता है। कभी कुछ छेड़ता है कभी कुछ...। ये नहीं कि टिक के बैठ जाय। फिल्म का सारा मजा किरकिरा किये जा रहा है... आप तो फिल्म देख नहीं रहे हैं। आप इसे थोड़ी देर जरा बाहर पार्क में घुमा लाइए।
एक शब्द भी बोले बिना चुपचाप वे टीनू को लेकर घर से निकल आए। घर की छांह-छत से निकालकर एकाएक यों कड़कती धूप में धकेल दिए जाने से एक भड़ास सी उनके दिलोदिमाग पर छा रही थी- गये गुजरे नौकर की तरह मुझे आर्डर कर दिया, 'जा बच्चे को घुमा लाÓ... पता नहीं क्या समझ रखा है इन्होंने?
पार्क पहुंचकर उन्होंने टीनू को घास पर खेलने के लिए छोड़ दिया और खुद बेंच पर बैठ गए। दोपहर का वक्त था। पार्क में इक्का-दुक्का लोग ही थे। टीनू नरम हरी घास पर कलाबाजियां खाने लगा था। और दिन तो वे टीनू की शरारतें देखकर पुलकित और गदगद हो जाते थे पर आज उन्हें टीनू की मासूम हरकतें अच्छी नहीं लग रही थीं। उनकी आंखें और कनपटियां जैसे जल रही थीं- यहां उमस और तपिश में हम सिकें ताकि वो लाट साब की बच्ची आराम से फिल्म देख सके...? मैं उस घर का मालिक हूं कि कोई गुलाम! कोई मुफ्त की खाता हूं मैं? दो हजार पेंशन मिलती है जिसमें से डेढ़ हजार रुपए हर महीने बहू के हाथ पर रख देता हूं। रिटायर्ड आदमी हूं। घर के काम में थोड़ा बहुत हाथ बंटा देता हूं इसका ये मतलब तो नहीं कि अगला हर ऐरे-गैरे काम के लिए आर्डर ही करने लगे। कुछ तो सोचना चाहिए था बहू को मुझे आर्डर करने से पहले कि दोपहर का वक्त है। बाबूजी थके-हारे होंगे। बूढ़ा आदमी जल्दी थक जाता है। थोड़ी देर आराम करना चाहते होंगे... बस बुलाया और कर दिया आर्डर और मैं चला आया। हद हो गई- मेरी अपनी तो जैसे कोई जिन्दगी ही नहीं? सारी उम्र पहले अपने बच्चे पाले अब इनके पालो। और वो नामुराद मोहन... उसी ने तो सिर चढ़ा रखा है अपनी बीवी को? जैसा वो कहेगी वैसा ही करेगा। गुलाम कहीं का। ढाई-तीन घंटे की फिल्म होगी। पांच-साढ़े बजे जाकर कहीं खत्म होगी ये फिल्म। अब उतनी देर यहां बैठकर सजा काटनी होगी। गलती मेरी ही है जो मैं इस तरह चुपचाप चला आया। साफ मना कर देता बहू को, तो क्या कर लेती? पर हां और कुछ नहीं तो मेरे खिलाफ मोहन के कान भरती और वो क्लेश मचाता...
तभी बैंच के पीछे से चढ़कर टीनू बाबूजी के कंधों पर चढऩे की कोशिश करने लगा। खीझ उठे बाबूजी। उसको बांह पकड़कर सामने किया और डांटकर बोले- यहां भी शरारत? टिक के नहीं बैठ सकता? तू घर में मम्मी के पास टिककर मजे से फिल्म देखता तो मुझे यहां तो न मरना पड़ता।
हैरान होकर बाबूजी की तरफ देख रहा था टीनू। घोड़ा बनकर उसे सवारी करवाने और उसकेसाथ बच्चा बनकर खेलने वाले बाबूजी को आज एकाएक क्या हो गया है? बाबूजी से किसी तरह बांह छुड़वाकर भाग गया टीनू।
इधर कलप रहे थे बाबूजी- समझते क्या हैं अपने आपको, अभी तो मकान वगैरह-वगैरह कई कुछ मेरे नाम से है, वरना ये तो मुझे घर से क्या दुनिया से ही निकाल दें, पर मकान मेरा है मैं आज उन्हें कान पकड़कर बाहर निकाल दूं तो दो दिन में अक्ल ठिकाने आ जाए। पर निकालूं कैसे? औलादा जो ठहरी। पैदा करने का अपराध जो किया  है। दंड तो भुगतना ही पड़ेगा। पर वही अपराध इन्होंने भी किया है। तुम्हारे भी बच्चा है- अपने आपसे संभालो।
धुंधुआती हुई अंगीठी पर पड़ी पतीली में उफनती हुई दाल की तरह उनके दिलोदिमाग में अगली पिछली बातें जैसे रिझने लगी थीं- उस दिन मोहन कह रहा था बाबूजी आप दिन भर करते ही क्या हैं? सुबह उठकर दूध लाना, बच्चे को स्कूल छोड़कर आना, स्कूल से लाना, बाजार से सौदा-सब्जी लाना, बिजली-पानी के बिल जमा करवाना, सैकड़ों छोटे-छोटे काम तो उनके लिए काम ही नहीं है। घर मेरा है और काम भी मेरे अपने ही हैं पर ये लोग मुझे जो नौकर की तरह समझकर आर्डर करते हैं उस तरह कोई नौकर भी न करे... आजकल के नौकर कहां बर्दाश्त करते हैं। एक मिनट में नौकरी को लात मारकर यह जा वह जा। पर मैं तो इनका खरीदा हुआ हूं न... हुंह बड़ा अफसर बना फिरता है। अरे तुझे पढ़ा-लिखाया किसने? नौकरी किसने लगवाई? पाई-पाई जोड़ के किसने रिश्वतें भरीं? लेकिन इसमें उनका क्या कसूर, युग ही ऐसा है। मां-बाप को फूटी आंख नहीं देख सकती, आजकल की औलाद।
जाने पहले कब कब की बेटे और बहू की ज्यादतियां गुबार बनकर उनके दिलोदिमाग में घुमड़ रही थीं, उस दिन मोहन ने अपने साढ़ू-साली के सामने कैसे मेरी बेइज्जती करके रख दी थी और उस दिन बहू ने अपनी मां और भाभी के सामने कहा- बाबूजी आज खीर बनाई है आप मत खाना आपको शुगर है। खीर को छूना तो दूर मुझे पता भी नहीं था कि खीर बनी है। मैंने तो मांगी नहीं थी और मैं तो खुद इतना परहेज करता हूं.... और कैसे हंस दिये थे उसके मायके वाले। कोई बात नहीं, कर ले बेइज्जती। मेरी किस्मत में ही यह कुत्ताखानी भी लिखी हुई होगी। अच्छा हुआ मोहन की मां जल्दी ही मर गई। आज जिन्दा होती तो उसे भी जाने क्या-क्या देखना-सहना पड़ता, ऐसी नालायक औलाद से तो... अपने साले सालियां को तो रोज अपने घर में बुला-बुलाकर 'डिनरÓ करवाता रहता है। सगी बहनों को बुलाना तो दूर पूछता तक नहीं... बड़ी वाली छह महीने से बीमार चल रही है और ये नामुराद मोहन सगा भाई होने के बावजूद पूछने तक नहीं गया और वो बेचारी उस दिन मैं पूछने गया तो भाई-भाभी का नाम आते ही रोने ही लग पड़ी थी।
मन ही मन सुलगते-सुलगते उनकी आंखें लाल हो आई थी। उनका मन हुआ कि वे अभी घर लौट चलें और रखकर बहू के एक तमाचा जड़ दें कि तुझे अपने मनोरंजन में विघ्न की तो सूझती है पर बूढ़े ससुर के आराम की जरा सी परवाह नहीं है। और ड्यूटी से लौट चुका हो तो मोहन के भी तमाचा जड़ दे जिसने अपनी बीवी को इतना सिर चढ़ा रखा है कि वो बाप को नौकर से भी गया गुजरा समझती है।
उन्होंने सोचा अगर मैं अभी लौटकर कह दूं कि टीनू पार्क पहुंचकर रोने और जिद करने लगा कि 'मम्मी पास जाऊंगाÓ और मैं इसे वापिस ले आया हूं तो क्या कर लेगी बहू। लेकिन इस झूठ को उनका मन नहीं माना और बैंच पर अधलेटे से होकर बैठ गए।
एकाएक उन्हें ख्याल आया कि वे यहां पार्क में अपने पोते को खिलाने लाए हैं। कहां गया वो? कहीं वो गुम न हो जाए। कहीं कोई चोट वोट लग गई तो... घबराकर उठे वे और टीनू को इधर-उधर ढूंढने लगे। क्षणभर में ही जाने क्या  बीत गया उन पर। तभी उनकी नजर टीनू पर पड़ी। बेंच पर पैर रखकर पेड़ पर चढऩे की कोशिश कर रहा था वह। पूछने पर बोला कि वह चिडिय़ा को पकडऩे की कोशिश कर रहा था। उस पर गुस्साने की बजाय जाने क्यों नरमा गये वे, नहीं बेटे अगर कोई तुम्हें इस तरह पकडऩे की कोशिश करे तो? चिडिय़ा को पकड़ते नहीं उसे दाना खिलाते हैं और चिडिय़ा बदले में हवा में फुर्र-फुर्र चीं-चीं करके नाच-गा के दिखाती है... आ मेरे पास बैठ...
तभी उन्होंने देखा उन्हीं के इलाके में रहने वाले माथुर साहब चले आ रहे हैं। पास आते ही उन्होंने कहा- तो यहां बैठकर वक्त काट रहे हैं आप?
-आओ भाई, अब हम तुम जैसे बूढ़ों की बस यही वक्त काटने की ड्यूटी रह गई है।
- मैं तुम्हें मिलने तुम्हारे घर गया था तो बहू ने बताया कि तुम पार्क गये हो तो मैं यहां चला आया।
इस बीच टीनू दोनों बुजुर्गों की नजर बचाकर फिर से खिसक गया था। बाबूजी को खीझा-खीझा और निराश सा देखकर माथुर साहब ने पूछा- आज तुम्हारा मूड कुछ खराब लग रहा है?
सेफ्टी वाल्व के एकाएक कट जाने से जैसे प्रेशर पूरी स्पीड से बाहर आने लगा। सब कह सुनाया उन्होंने। काफी देर तक वे अपने दिल की भड़ास माथुर साहब के आगे निकालते रहे।
-तुम तो खुशकिस्मत हो यार तुम्हारे पोता है। मुझ अभागे को देखो, मेरी बहुत ख्वाहिश है कि मेरे भी पोता हो और मैं उसे पार्क घुमाने लाऊं और हां यार वाकई आज टी.वी. पर फिल्म तो बहुत बढिय़ा आ रही है। मैंने भी देखी है। और एक बात बताऊं अभी जब मैं तुम्हारे घर गया न तो तुम्हारी बहू ने दरवाजा खोला, देखा उसकी आंखों में मोटे-मोटे आंसू थे। मैं तो घबरा गया। मैंने पूछा- क्या हुआ बेटे तुम्हारी आंखों में आंसू? वो बोली- कुछ नहीं अंकल, वो फिल्म देख रही थी उसमें दृश्य ही कुछ ऐसा था कि मेरे आंसू निकल आए। मैंने भी जब ये फिल्म देखी थी तो मेरे भी आंसू आ गये थे। उसमें दिखाते हैं कि कैसे बेटे और बहू बूढ़े बाप को गलत समझते हैं और उनके साथ बदसलूक करते हैं फिर जब असलियत खुलती है और बाप द्वारा किए गए कैसे-कैसे एहसानों का पता चलता है तो आंखें खुलती हैं उनकी। कैसे-कैसे त्याग करते हैं वे एक-दूसरे के लिए।
-बहू रो रही थी? इसका मतलब बहू का दिल पत्थर का नहीं है। उसमें भी कहीं कोमलता है। संवेदनाएं और भावनाएं हैं।
सारा गुबार जाने कहां से होकर एकाएक निकल गया था। बहुत हल्का महसूस होने लगा था उन्हें।
-अरे पौने छ: बज गए। फिल्म खत्म हो गई होगी। चलता हूं मुझे दूध भी लेकर जाना है।
एकदम धुले-पुंछे मन से टीनू को लेकर वापिस घर लौटते हुए वे सोच रहे थे- एकदम भोली है बहू भी। अरे फिल्मों में जो दिखाते हैं वो सच थोड़ा ही होता है। थोड़ा बहुत सच होता भी है तो भी क्या, ड्रामा तो वो होता ही है फिर रोने की क्या जरूरत? बहू भी एकदम नरम दिल की है। एकदम भावुक। अरे वो मुझे अपना समझकर ही तो 'आर्डरÓ करती है। बच्चों का बाप पर यह हक तो होता ही है।
पहली दस्तक में ही दरवाजा खुल गया था जैसे उन्हीं की प्रतीक्षा हो रही हो।
- लो बहू संभालो अपने लाडले को। ये तो बहुत शरारती है भई। वहां पार्क में एक मिनट भी टिककर नहीं बैठा। लो रास्ते में से दूध भी लेता आया हूं...
दूध की थैली बहू को पकड़ाकर वह अपने कमरे की ओर मुड़ गये। अभी वे कमरे के दरवाजे तक ही पहुंचे थे कि बहू की आवाज आई- हाय राम, बाबूजी, ये टीनू के चोट कैसे लग गई?
-पता नहीं मेरे सामने तो नहीं लगी...
-आपके साथ पार्क जाने से पहले तो कुछ नहीं था। देखो तो कितना छिल गया है। खून भी निकल रहा है।
पिंडली पर लगी खरोंच का मुआयना करके बाबूजी ने कहा- खून जमा हुआ है... पहले की लगी हुई कोई चोट है...
-खून तो पांच मिनट में जम जाता है। सुबह मैंने नहलाया था तो कोई चोट नहीं थी। स्कूल से आया तब भी कोई चोट नहीं थी। होती तो नजर पड़ ही जाती। जरूर ये पार्क में ही लगी है...
बहू ने ऐसे कहा जैसे कह रही हो टीनू को आपकी लापरवाही से ही चोट लगी है। चोट लगने का जिम्मा आप पर है। उन्हें लगा जैसे उन्हें किसी ने जलती हुई भट्ठी में धकेल दिया हो। वे बिना कुछ जवाब दिये अपने कमरे में आकर बैठ गए। दिलोदिमाग पर फिर अंगारे ही अंगारे दहकने लगे थे- समझते क्या हैं अपने आपको? मैंने चोट मारी है टीनू को? स्कूल से लगवाकर आया होगा। लौटने पर ध्यान नहीं दिया होगा। बच्चा है, खेले, कूदे तो चोट भी लगेगी। कहीं कुछ हो जाए तो कसूर मेरा। पता नहीं क्या दुश्मनी है मुझसे? मैं तो इन्हें फूटी आंख नहीं सुहाता? मुझे तो अब मर ही जाना चाहिए। बात-बात में बेइज्जती करवाने से तो मौत ही अच्छी... एक दिन की नहीं अब तो ये रोज की बात हो गई है। बात कुछ होती नहीं और बात बना लेते हैं...
हुंह फिल्मों में दूसरों पर हो रही ज्यादती के सीन देखकर आंसू आ जाते हैं और असली जिन्दगी में क्या खुद दूसरों पर ज्यादती करते हैं उसका इन्हें अहसास तक नहीं होता... अभी तो बहू घर में अकेली है और मैं बर्दाश्त करके इधर चला आया। मोहन घर में होता तो पता नहीं कितना क्लेश मचाता? इनकी आंखों में तो शर्म लिहाज है नहीं। बाप हूं इनका। पर इन्हें कौन समझाए... ऐसा कब तक चलेगा। कोई कब तक बर्दाश्त करेगा? आने दो आज मोहन को। आज ही फैसला करके रहूंगा- समझ क्या रखा है?
गुस्से के मारे उनके हाथ-पांव कांपने लगे थे।
उनका मन हुआ दीवार पर जोर-जोर से मुक्के मारें या मुंह पर कपड़ा अड़ाकर जोर-जोर से शोर मचाए या छत पर जाकर अकेले में बहू-बेटे को डांटे और खरी-खोटी सब कह डालें। अपने मन की भड़ास निकाल लें पर मन नहीं माना। कोई देखेगा सुनेगा तो क्या कहेगा?
तभी हाथ में प्लेट लेकर बहू उनके कमरे में आई- लीजिए बाबूजी...
-क्या है?
- दाल... दालमोठ
मनपसंद अंकुरित दाल की प्लेट सामने पाकर स्नेह के अंकुर फूट पड़े उनके मन में। हैरान थे वे- बहू को याद रहा मेरा कहना। मुझे तो याद भी नहीं था। कुछ दिन पहले मैंने ही तो बहू को कहा था कि अंकुरित दालें खिलाया करो घर में सबको। बहुत प्रोटीन होता है उसमें। मेरे कहने की कुछ वैल्यू तो समझी बहू ने... मैं तो खामखाह ही सुलगता रहता हूं। मेरे बहू-बेटा तो फिर भी बहुत नेक हैं। शुक्र है ऊपर वाले का.. कितने स्वादिष्ट बनाए हैं दालमोठ। मेरी बहू ने बनाए हैं अच्छे क्यों नहीं बनेंगे।
छोटे से बच्चे की तरह पुलक रहा था उनका मन। एकदम हल्का-फुल्का सा महसूस होने लगा था उन्हें अपने आप। खा चुकने के बाद उन्होंने सोचा जूठी प्लेट रसोई में रख आऊं। वो उठे और प्लेट को लेकर रसोई की ओर चल दिए। मोहन ड्यूटी से लौट चुका था, इसका पता रसोई के साथ वाले कमरे से आ रही बहू और मोहन की आवाजों से लग रहा था।
-पता है आज मैंने नई डिश बनाई है?
-क्या बनाया है?
-नये तरीके की दालमोठ... दो तीन दिन पहले टी.वी. पर अंकुरित दालों के महत्व पर प्रोग्राम आ रहा था। बता रहे थे कि इनमें बहुत प्रोटीन होता है। मैंने सोचा क्यों न मैं भी अंकुरित दाल चना बना के देखूं... हा... हा...
प्लेट हाथ से छूटते-छूटते बची। उनके कहने से नहीं बल्कि टी.वी. में देखे प्रोग्राम से प्रेरित होकर ही बहू ने दाल-मोठ बनाए हैं यह समझने में बाबूजी को एक क्षण भी नहीं लगा था- ''मेरे कहने की कुछ वैल्यू होती है तो रोना ही किस बात का था?ÓÓ
उनके दिलोदिमाग पर फिर से एक भारी पत्थर आ पड़ा था। बेहद बोझिल कदमों से उनका वापिस अपने कमरे तक पहुंचना मुश्किल हो रहा था। तभी टीनू ने आकर उनका हाथ पकड़ लिया था। अंदर जमा दर्द आंखों के रास्ते पानी बनकर बह निकला था।