Monthly Magzine
Friday 24 Nov 2017

पुरानी डायरी

ममता शर्मा
57, मानसरोवर, पोस्ट हटिया
राँची-834003
मो. 9430734424
डायरी पिछले कई सालों से बेडरूम की छत्ती पर रखी हुई थी, जहाँ रोज नहीं, हफ्तों नहीं, महीनों नहीं और सालों नहीं पहुँचा जाता था। डायरी वहाँ अकेली नहीं थी, बल्कि आठ-दस किताबों के बीच महफूज थी, मगर घर के बाकी हिस्से से सालों कटी हुई रह गई थी। उसे किताबें खरीदने की आदत थी और घर में जगह कम थी, इसलिए हर बार जब वह किताबें खरीदता तो नई किताबों की जगह बनाने के सिलसिले में पहले की किताबों को नई जगह भेजना होता था और इसी सिलसिले में कुछ किताबें और उनके साथ वह अकेली सी डायरी भी बेडरूम की छत्ती पर जा पहुँची थी। जहाँ रोज नहीं, हफ्तों नहीं, महीनों और सालों नहीं पहुँचा जाता था। वैसे सुधा को, सुधा यानी उसकी पत्नी, घर का कोना-कोना साफ  करने की आदत थी और वह जानती थी कि कुछ किताबें छत्ती पर लंबे अरसे से अलग-थलग पड़ी हुई है। उसने सोचा भी था कि कम से कम उन पर जमी गर्द तो हटाई ही जानी चाहिए। मगर घर का यह एक सोचा-समझा ऊसूल था, जिसके तहत एक दूसरे की कुछ बातों से कोई वास्ता नहीं रखना था और किताबों का रखा जाना भी ऐसी ही बातों का एक हिस्सा था। डायरी थी काफी पुरानी मगर उसमें वैसी कोई बात या कोई विचार नहीं था जिसे चिंतन कहा जा सके। दरअसल डायरी लिखना उसे अफलातूनी किस्म का काम लगता था। इसलिए डायरी लिखने जैसा काम उससे कभी न हुआ। डायरी में वह बेहद मामूली किस्म की बातें दर्ज किया करता। मसलन कोई जरूरी बात जिसे याद रखना होता था या फिर कुछ जरूरी पते जिनकी उसको गाहे बगाहे जरूरत पड़ सकती थी, कुछ फोन नम्बर, उन ट्रेनों के नाम, नम्बर, खुलने और पहुंचने के समय जिनमें आए दिन वह सफर किया करता था इत्यादि इत्यादि। उस दिन जाने क्या हुआ उसे ख्याल आया कि कुछ किताबें काफी दिनों से अलग-थलग पड़ी हुई है और इन्हें उतार कर इनकी झाड़ पोंछ की जाए और फिर उसने गुल्लू को छत्ती पर चढ़ाने का फैसला लिया। वैसे चढऩे को वह खुद भी चढ़ सकता था; मगर इन छोटे-मोटे कामों के लिए वह अब गुल्लू पर आश्रित रहने लग गया था। गुल्लू ने पहले तो थोड़ी नानुकुर की, लेकिन फिर तैयार भी हो गया और ऊपर चढ़कर उसने ऊपर का जो खाका खींचा तो वह भी सोच में पड़ गया
 'तो फिर रहने दे आ जा नीचे .......Ó उसने कह दिया।
अगर उसके चेहरे के अधूरे से भाव को गुल्लू ताड़ न गया होता और एक-एक करके धूल में लिपटी किताबें पकड़ाने न लगा होता तो किताबें और वह पुरानी डायरी फिर अगले न जाने कितने वर्षों तक घर के बाकी हिस्से से बेखबर छत्ती पर पड़ी रह गई होती और किताबें इस तरह नीचे आ गई। बस फिर क्या था उसके लिए अतीत के दरवाजे खुल गए। हर किताब के पहले पन्ने के ऊपरी कोने में उस का नाम और नीचे खरीद की तारीख थी। फिर किताबों के बीच से निकली वह पुरानी डायरी जिसे देखकर उसे महसूस हुआ कि वक्त तो किसी बुलेट ट्रेन की तरह भागा है, डायरी लेकर वह मुड़ा तो गुल्लू ऊपर से चिल्लाया
'अब मैं क्या करूँ ....... उतरूँ?
'हाँ-हाँ उतर जाÓ
वह एक पुरानी डायरी थी, काफी पुरानी और किताबों के बीच बरसों सैंडविच होकर रह गई थी। डायरी भले ही अपना यथार्थ रूप खो बैठी थी। लेकिन उसके पन्ने पीले नहीं हुए थे, हां जर्जर जरूर हो गए थे, ऐसा लगता था कि जरा सी बेरहमी या बेपरवाही दिखाई गई तो डायरी से कुछ भी हासिल न हो सकेगा। बहरहाल डायरी इतने दिनों बाद मिली थी कि उसकी उम्मीदें जग गई थी बल्कि वह नॉस्टेलजिक हो उठा था। डायरी को उसने दो दिन पहले ही खरीदी गई एक नए नकोर साफी से पोंछ डाला और साफी पर लगी धूल इस बात का सबूत थी कि वह धूल कितने दिनों, हफ्तों और सालों पुरानी थी। डायरी को उसने सीधा किया तो उसमें से ब्लैक एंड वाइट पासपोर्ट साइज एक तस्वीर नीचे जा गिरी। तस्वीर ने किसी पुरानी फिल्म की याद ताजा कर दी; यह तस्वीर थी बिन्नी की। बिन्नी भी तस्वीर में पुरानी ब्लैक एंड वाइट फिल्मों की हिरोइन जैसी ही लग रही थी। तस्वीर का दानेदार और चमकदार कागज तस्वीर की और साथ ही बिन्नी की सुंदरता में चार चाँद लगा रहा था। बिन्नी सिर्फ  तस्वीर में ही खूबसूरत नहीं थी, असल जिंदगी में भी वह खूबसूरत थी। कहने का मतलब यह है कि ऐसा नहीं था कि वह तस्वीर में अलग थी और असल जिंदगी में अलग। उसकी भौंहे नैचरल रूप से मोटी-मोटी थी और भौहों का अगला सिरा माथे के बीचों-बीच लगभग एक दूसरे को छू-सा जाता था। उसकी भौहों का रंग इतना काला था कि कभी-कभी उसके सर के बालों का रंग उनके सामने हल्का पड़ जाता था। उसे लगता था कि बिन्नी मीना कुमारी बनने की कोशिश करती थी। वह मीना कुमारी की तरह ही माथे के बीचों बीच बिंदी लगाया करती थी। जब बिन्नी कम उम्र की थी और असल में वह भी कम उम्र था तो जमाना इतना भी पुराना नहीं रह गया था कि हर कुछ ब्लैक एंड वाइट हो। आसपास भरपूर रंगीनियाँ थी मगर बिन्नी को काला रंग पसंद था और अक्सर जब वह घर आती तो काली कमीज पहने हुए या काला दुपट्टा ओढ़े हुए आती। उसे बिन्नी में मीना कुमारी का अक्स नजर आता था। मजे की बात तो यह थी कि बिन्नी की आवाज में भी वही सोज था जो मीना कुमारी की आवाज में था। बाद में तो वह यह भी सोचने लग गया था कि पता नहीं कौन सी बात सच है, वह मीना कुमारी को चाहता है या मीना कुमारी के बहाने बिन्नी को। मीना कुमारी की एक लाइफ साइज तस्वीर उसके दस बाई बारह के एक कमरे की दीवार पर छाई हुई थी लेकिन बिन्नी के तो वह पास भी फटक नहीं सकता था उसे तो जी भर देख भी नहीं सकता था क्योंकि उसे बहन की आँखों से डर लगता था। दरअसल बिन्नी उसकी बहन की मित्र थी और बहन की नजर बिन्नी पर कम उस पर ज्यादा रहती थी। बहरहाल वह कभी अपने ख्यालों का इजहार नहीं कर पाया और एक दिन बिन्नी सीन से गायब हो गई, उसके पास बस बहन के सामान से चुराई गई बिन्नी की ये पासपोर्ट साइज फोटो रह गई। उसे लगा अब कभी बिन्नी मिल जाए तो वह बिन्नी से खुलकर बातें कर सकता है। क्या बिन्नी का ब्याह हो गया होगा? क्या बिन्नी अपने जीवन में खुश होगी? क्या वह अब भी वैसी ही सुन्दर दिखती होगी या सुन्दरता का कोई नया पैमाना गढ़ लिया होगा उसने, शायद बिन्नी के मन में भी उसके लिए कुछ...........
    डायरी के पन्ने कुछ फीके हो गए थे, कुछ लिखावटों की स्याही भी जा चुकी थी। लेकिन बावजूद इसके डायरी का सामान पढ़ा जा सकता था। डायरी में एक पता था। बी/10 पुलस्कर सोसाइटी अंधेरी ईस्ट । कितनी बार गुजरा था वह उन सड़कों से जो स्टेशन से पुलस्कर सोसाइटी तक जाती थी। 515 नम्बर बस में बैठकर सुबह-शाम दफ्तर से लौटते हुए बस के ऊपरी हिस्से में ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर बैठकर वह तैरती हुई भीड़ को देखा करता। उन दिनों वह बेबे के घर पर रहा करता था। वह उन्हें बेबे ही कहा करता था ; वह उसकी  बहन थी। घर वैसे उसने नौकरी लगते ही तलाश कर लिया था क्योंकि उसका ऊसूल था साथ रहने से रिश्तों के बीच दूरियाँ कम हो जाती हैं और वे सांस नहीं ले पाते और धीरे-धीरे उनका दम घुटने लग जाता हैं लेकिन बेबे को इतना सब कुछ समझाना मुमकिन नहीं था, और एक दिन वह जाने के लिए चुपचाप सामान बांधने लग गया फिर बेबे रोने लग गई और पुराने रिश्तों और पुराने समय की दुहाई देने लग गई तो उसने सामान खोलकर वापिस लगा दिया। वह तब तक बेबे के पास रहा जब तक उसका तबादला नहीं हो गया। उसे यह सोचकर सुकून मिलता था कि एक ऐसे दौर में जब इर्द-गिर्द लोग रिश्तों के छीजने से परेशान है उसके पास एक ऐसा भी रिश्ता है जो समय की मार से कोसों दूर अपने ही खाद-पानी से और अपनी ही शर्तों पर जिंदा है। उसे लगा कि वह सचमुच कृतध्न है बम्बई छोड़े इतने बरस हुए और उसने कभी बेबे की कोई खबर ही नहीं ली। वह भी एक के बाद एक दुनियावी कारोबार में उलझता चला गया। दिमाग पर जोर डाला तो याद आया बम्बई छोडऩे के चार साल बाद एक दिन उनका उलाहनों से भरा एक खत मिला था जिसमें वैसे ही पुराने रिश्तों की दुहाइयां दी गई थी, सांझे चूल्हे याद किए गए थे जिनकी वजह से वह एक दिन अपना सामान खोलकर वापिस बेबे के साथ रहने पर आमादा हो गया था। बेबे की लिखावट बच्चों की तरह थी और वह लिखती तो लगता सामने खड़े होकर बातें कर रही हो। चिट्ठी के शुरू और आखिर में फूल बने होते। उसे बेबे के रूई के फाहों से सफेद बाल याद आए जिन्हें देखकर लगता था बालों की सफेदी भी खूबसूरत लगने की वजह हो सकती है। वह पतों के साथ अक्सर फोन नम्बर लिख लिया करता था। बी/10 पुलस्कर सोसाइटी के नीचे दो नम्बर लिखे हुए थे, उसे इतना तो समझ आ गया था कि एक नम्बर बेबे का था और दूसरा नम्बर बी/11 यानी बेबे के जेठजी का नम्बर था लेकिन यह समझना मुश्किल था कि कौन सा नम्बर किस का हैं। उसने पहले ऊपर वाला नम्बर लगाया और दूसरी तरफ से एक मशीनी आवाज आई जिसका आशय यह या कि नम्बर बदला जा चुका है। पता नहीं लोग नम्बर क्यों बदल देते हैं जवाहिर लाहौरी कहा करते थे कि आनेवाली सदी नम्बरों की होगी। फिर माँ-बाप को नाम तलाशने की जद्दोजहद नहीं करनी होगी।
हमने नामों अहमियत खो दी है अब यह अहमियत नम्बरों में तलाश की जाएगी। जवाहिर लाहौरी फलसफे में बातें किया करते और उसे उनकी बातें बेहद पसंद थी लेकिन उनका जिक्र आगे।
उसने दूसरा नम्बर डायल किया तो दूसरी तरफ  से एक कमजोर सा 'हैलोÓ सुनाई दिया।
 'क्या यह नम्बर बंबई का है?Ó
'जीÓ
'क्या ये ओमप्रकाश बक्शी का नम्बर है।'
'जी मैं ओम ही बोल रहा हूँ ............. ये मेरा पसर्नल नम्बर है।Ó
आवाज में ढलती उमर का असर था और पहचानने की ताकत नदारद थी।
'जी मैं ............... बोल रहा हूँ ......... पहचाना आपने ....Ó
'ठीक से सुनाई नहीं देता .. दूसरी आवाज बुदबुदाई
उसने ऊंची आवाज में बेबे का नाम ले लिया।
'जी वो तो गुजर गई .......... और मेरी वाइफ भी गुजर गई ........ अब मैं यहाँ अकेला ही रहता हूँ ..Ó
'ओह ...Ó
'मेरी तबीयत भी ठीक नहीं रहती ...Ó। अब दूसरी आवाज में दु:ख शेयर करने की ख्वाहिशें थी। उसे महसूस हुआ जैसे कम्यूनिकेशन का एक बेमिसाल साधन होने के बावजूद भावों को शेयर करने के लिए फोन एक मुकम्मल चीज नहीं हो सकती क्योंकि वहाँ पेशानी पर उभरी लकीरें नहीं दिखाई देती।
आपका बेटा . वो कहाँ है ...Ó
'वो तो बाहर रहता है ...Ó
    यह एक अजीबोगरीब वार्तालाप था जिसमें एक दूसरे को पहचानने की जरूरत नहीं थी बस ख्वाहिशों का मेल था एक को जानने की ख्वाहिश थी और दूसरे को कहने की।
इतना सब कुछ वे बोलते रहे मगर उसे पहचान नहीं पाए। उसे महसूस हुआ, वे बहुत सी बातें करना चाहते थे जो उनके पास वक्त के साथ जमा हो गई थी जैसे आसपास के सारे लोग अपनी-अपनी यादें उनके पास छोड़कर तितर-बितर हो गए थे और वे उनके साये में जिंदगी गुजार रहे थे शायद!
 रिसीवर रखने के बाद उसे महसूस हुआ कि उसकी कनपट्टियों पर सफेदी उग गई है और वह कई दिनों से आइने के सामने ठीक से खड़ा ही नहीं हुआ है।
उसे यह भी लगा कि ओमप्रकाश बक्शी अपने आसपास के लोगों के होने या न होने के असर से अरसा पहले मुक्त हो चुके हैं। वह इतनी मौतों की खबर के लिए तो कतई तैयार नहीं था। अधखुली डायरी के उस हिस्से को जिसमें बेबे का पता लिखा था, उसने ऊंगलियों में दबाया और कुर्सी पर सिर टिकाकर छत की तरफ खाली आँखों से देखने लगा। उस शाम वह झील तक टहलने गया। अमूमन शाम के वक्त झील की तरफ  कम लोग जाते थे। कोई परेशान बंदा जो किसी उलझन में हो और उसे घर के किसी हिस्से में कोई अकेली जगह नहीं मिल पाई हो या फिर रिटायरमेंट की जिन्दगी जी रहे कुछ ऐसे जोड़े जो दिन भर घरों में बंद रहा करते और जिनके लिए शाम को निकलना बेहद जरूरी होता था।
लेकिन उसे शाम और झील का संयोग पसंद नहीं था।
    झील पर और दरअसल पानी पर ही शाम का उतरना उसे अवसाद से भर देता था, इसलिए वह झील की तरफ शाम को जाना बिल्कुल पसंद नहीं करता था। वह जब-जब सागर तट पर जाता उसे रात बेचैन कर देती। उजास में सुनाई देने वाला सागर का कल्लोल रात को वीभत्स लगने लग जाता था और अब तो वह जब भी सागर तट पर जाता कोई ऐसा होटल बुक करता जो तट से भरपूर दूरी पर हो ताकि सागर का शोर उसे डरा न सके।
    झील के किनारे सीमेंट के चबूतरे बने हुए थे। जिन्हें मवालियों ने जगह-जगह से तोड़ दिया था। कुछ लोग पता नहीं ऐसा क्यों करते है। चीजों को साबुत नहीं रहने देना चाहते। वह उस शाम देर तक एक टूटे हुए चबूतरे पर बैठा रहा और धीमे से करवट बदलती लहरों को देखकर बहुत छोटी-छोटी बातें सोचता रहा मसलन अगर ये झील सागर होती तो इसमें अथाह शोर होता दिल के अंदर उतर जाने वाला शोर! और यह कि झील जो अंग्रेजों के जमाने की थी क्या उस वक्त भी ऐसी ही गंदी और मटमैली रही होगी और यह कि अगर हमने अपनी गुलामी के लिए अंग्रेजों को जिम्मेवार ठहराना छोड़ दिया होता तो उनसे कुछ अच्छी बातें भी सीख सकते थे और उसमें सफाई पहली चीज होती।
    डायरी में एक और पता था जिसने अतीत के दरवाजे खोलकर रख दिए थे और वह था 210 मौलश्री कीर्ति नगर।
इस घर में वह पहली दफे अपने बॉस भट्ट साहब के संग गया था और फिर कुछ ऐसा हुआ कि भट्ट साहब ने तो वहाँ जाना छोड़ दिया और वह तब तक 210 मौलश्री के सम्मोहन में बंधा रहा जब तक बम्बई से उसका तबादला नहीं हो गया। सम्मोहन ही था वह, और भट्ट साहब को जानने वाले कई लोग यह कह भी चुके थे कि 210 मौलश्री का मालिक यानी गौरांग प्रभु .... यही नाम था उनका ....सम्मोहन करते थे और इसीलिए लोग उनसे दूर रहा करते थे। लेकिन गौरांग असल में दुनिया की तमाम फितरतों और इल्मों से दूर से थे और उन्होंने अपने लिए एक ऐसी दुनिया खड़ी कर ली थी जो लोगों की समझ से बाहिर की चीज थी और इसीलिए लोगों ने उनके बारे में अलग-अलग किस्से निकाल रखे थे, जिनमें से एक यह थी कि वे औरतों को नहीं बल्कि मर्दों को अपना शिकार बनाते थे। शिकार ऐसे बनाते थे कि मर्दों को ज्यादा सम्मोहित करते थे और मर्दों से ही प्रेम करते थे, अब इस 'प्रेमÓ को अर्थ कुछ भी लगाया जा सकता था और 'प्रेमÓ की बदलती परिभाषाओं में और बदलते दायरे में उसे भी कुछ दिनों के लिए ऐसा ही डर समा भी गया था जिसे उसने किसी के सामने जाहिर नहीं होने दिया था। यह तो बाद में, उसने अपने अनुभव से जाना था कि दरअसल एक सिंगल आदमी अपनी शर्तों पर एक सुकून भरी जिंदगी कैसे जी सकता है। यह एक सोचने वाली बात थी इसी शंका के मदद्ेनजर लोग प्रभु गौरांग के बारे में तरह-तरह की अफवाहें फैलाया करते थे। मजेदार बात यह थी कि अफवाहें गैर नहीं बल्कि उनके अपने ही फैलाते थे और यह भी उसके लिए जिंदगी में एक सीखनेवाली चीज थी। दरअसल प्रभु भट्ट साहब के रिश्तेदार थे यानी उनके साले थे और पाया था कि भट्ट साहब उनके घोर निंदक थे। शुरू-शुरू में भट्ट साहब वहाँ रिश्तेदारी निभाने जाते और उन दिनों ही कुछ ऐसा हुआ कि वे उसे भी अपने साथ ले जाने लग गए थे। लेकिन जब रिश्तेदारी निभाने की मजबूरी किसी वजह से खत्म हो गई तो धीरे-धीरे निंदा नफरत में बदलने लगी और एक दिन ऐसा भी आया कि दोनों के बीच आना-जाना बंद हो गया बल्कि दोनों का क्या कहें भट्ट साहब ने प्रभु के घर जाना छोड़ दिया क्योंकि प्रभु तो किसी के घर जाते न थे। मगर वह तो जैसे उनका मुरीद हो गया था। दरअसल आप जिन्हें पसंद करते हैं उन्हें आप टोटैलिटी में पसंद करते हैं और वह भी प्रभु को टोटैलिटी में पसंद करने लग गया था। प्रभु अविवाहित थे और शादी उनकी जिंदगी का कभी भी एजेंडा नहीं रहा था यह न तो उनकी मजबूरी थी और न ही कोई सोची समझी साजिश। दरअसल यही एक ऐसी चीज थी जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था और यही सब उसे अच्छा लगता था। बाकी लोग जिन चीजों को अहमियत देते थे उनके बारे में प्रभु के कोई ख्याल नहीं थे न अच्छे न बुरे, न पक्ष न विपक्ष। उन्हें साज इकटठे् करने का शौक था और संगीत की एक वृहद् लाइब्रेरी थी उनके पास। उनकी दिनचर्या बड़ी ही सुलझी हुई थी। उनके आसपास कोई कुंठा, कोई अवसाद नहीं फटकता था वह जिंदगी को इतना जीते थे कि जिन्दगी छलक-छलक आती थी। उन्हें देखकर लोग रश्क करते थे और वह तो एक मामूली आदमी था उसे तो यह सब अनूठा लगता था और अच्छा भी लगता था। उनके आसपास जाकर उसे सुकून महसूस होता था। अब उन्हें याद करते हुए वह सोचता है कि जिंदगी इतनी आसान क्यों नहीं हो सकती? वह सोचता है कि क्या सब कुछ हमारे चाहने से हो सकता है! वह सोचता है कि क्या हम शरीर के गुलाम है या मन के या फिर हालात के। उसे लगता है कुछ सवाल उसके लिए बहुत बड़े हो जाते हैं।
    उन दिनों वह दफ्तर से कई बार सीधे 210 मौलश्री चला जाता, खास तौर से जब प्रभु किसी संगीत की महफिल में जाते और कभी-कभी रात-रात भर वह घर से गायब रहता जिसके लिए बेबे उसे उलाहने जरूर दे दिया करती। तब वह सोचता कितना अच्छा हो बेबे उसकी ऐसी हरकतों से तंग आकर उसे कह देती 'अब तू अलग ही रहÓ।
डायरी में 210, मौलश्री के नीचे कोई फोन नम्बर नहीं था क्योंकि गौरांग प्रभु के पास कोई फोन था ही नहीं और यह भी अद्भुत ही था, उसने एक मोटा सा हिसाब लगाया कि अगर उसकी और गौरांग की आयु में 10 से 12 बरस का फासला होगा तो अब वे कितने बड़े हो चुके होंगे। उस जमाने में उसकी दिली ख्वाहिश थी कि वह भी एक दिन 210 मौलश्री जैसा ही एक घर बनाकर उसमें जिंदगी गुजारेगा मगर क्या पता था कि उसकी माली हालत उसे ढाई कमरों के इस फ्लैट में लाकर छोड़ेगी जहाँ घर का सामान भी सांस लेने को तरसेगा।
डायरी में सिर्फ  पते और नम्बर नहीं थे, बल्कि डायरी उन तमाम दुनियावी ब्यौरों से लैस थी, जिन्हें रखने में इंसान अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा लगाता और कुछ हद तक गंवाता है। उदाहरण के तौर पर उसे मिलनेवाली तनख्वाह का माह दर माह ब्यौरा। उसने गौर किया कि महज दो हजार पाँच सौ माहवार तनख्वाह में कितनी जरूरतें पूरी कर ली गई थीं, रसोई की जरूरतों से लेकर बिजली का बिल, टेलीफोन का बिल और मकान का किराया भी। लेकिन अपने जीवन में वित्तीय अनुशासन वह कभी भी ठीक से लागू नहीं कर पाया इसका उसे हमेशा मलाल रहा और डायरी इस बात को बड़े ही अच्छे ढंग से बयां करती थी। एक माह के खर्चे का विवरण दिखता था तो दूसरे और तीसरे माह वह नदारद रहता था। दरअसल वित्तीय अनुशासन उसे जरूरी इसलिए भी लगता था क्योंकि उसके अनुसार वह अपनी जरूरतों में कुछ कतरव्यौंत करके अपनी माली हालत को ठीक ठाक रख सकता था हालांकि वह ऐसा कुछ कभी नहीं कर पाया और उसके वित्तीय विवरण ऐसे ही टुकड़ों में यहां-वहां बिखरे रह गए।
डायरी में कुछ पन्ने ट्रेनों के पीएनआर नम्बरों की स्क्रिबलिंग में भरे पड़े थे, लेकिन ट्रेनों के नामों की एक और फेहरिस्त बड़े ही तरतीब से बनी हुई थी जिसमें कुछ खास ट्रेनों के नाम, नम्बर, उनके आने-जाने के समयों का तरतीबवार विवरण था, कानपुर, लखनऊ, इलाहबाद, अलीगढ़, दिल्ली, अम्बाला, पठान कोट... ये सारे स्टेशन उसके लिए दूसरे घर के समान थे, और किस स्टेशन पर कहां चाय और कहां खाने का कौन सा सामान बेहतर है, किसका बेकार, उसके पास सारी खबर रहा करती। उसकी आधी से ज्यादा बल्कि करीब-करीब सारी किताबें ए.एच.व्हीलर के स्टॉल से खरीदी गई थीं। उसे याद आया कि उन दिनों वह रेल के दूसरे दर्जे का सफर मजबूरी में किया करता था जबकि अब वही सफर वह शौक से किया करता है। वह हवाई सफर और एसी कोच के सफर के बारे में इन दिनों लालसा से कभी कभार सोच लिया करता था और दूसरे दर्जे का सफर उसे परेशानी का सबब लगता था। लेकिन जब वह ऊँचे दर्जे में सफर के लायक हुआ तो उसने महसूस किया कि जिंदगी से जुड़े रहने के लिए दूसरे दर्जे का सफर करना जरूरी है। वह उन आवाजों को मिस करने लग गया था जो दूसरे दर्जे के सफर का एक अहम हिस्सा थीं ,वह उस साइलेंस से घबराने लग गया था जो एसी कोच और हवाई सफर में आसपास किसी धुंध की तरह जम जाया करता थी और फिर उसने दूसरे दर्जे में ही सफर करना शुरू कर दिया था वह सबसे ऊपर वाली बर्थ पर बैठता और यह सोचा करता था कि नीचे बैठे लोग किताबें या अखबार कैसे पढ़ लेते थे और  अक्षरों पर अपनी फिसलती नजरों को कैसे कंट्रोल करते थे।
 डायरी का सफर तब तक अधूरा रहेगा जब तक जवाहिर लाहौरी का जिक्र न किया जाए। उसने जवाहिर लाहौरी से लिए कर्ज का पूरा विवरण उसमें लिखा था और साथ ही कर्ज को चुकाए जाने की एक-एक तिथि रकम के साथ दर्ज की थी। उसने अपनी मां से एक मंत्र लिया था और वह था कि लेने वाली अमानत को भले ही बिसार दो लेकिन लौटाई जाने वाली अमानत को कभी न भुलाना। .... उसने लौटाई जाने रकम का बड़ा ही पुख्ता ब्यौरा डायरी में दर्ज किया था। वह जवाहिर लाहौरी से कहाँ मिला, कैसे मिला और क्यूं मिला इस बयानबाजी में जाने से बात कुछ लंबी खिंच जाने का डर है। इसलिए सीधे-सीधे बात पर जाना लाजिमी है। जवाहिर लाहौरी के पुरखे लाहौर के रहने वाले थे और वक्त की करवट उन्हें हिंदुस्तान ले आई थी। वे यानी लाहौरी, रहते थे हिंदुस्तान में ..नहीं नहीं यह बात थोड़ी गलत हो गई, असल में लाहौरी के लिए सरहद जैसी कोई चीज थी ही नहीं, वह हिन्दुस्तान और पाकिस्तान को एक मुकम्मल चीज समझते थे, उनकी रग-रग में लाहौर बसता था और उन्होंने एक दिन अपना नाम बदल कर लाहौरी कर दिया था और अखबार में इसकी इत्तला दे दी थी। उन्हें फ्रांस, इटली, ब्रिटेन और स्विट्जरलैंड नहीं पसंद था। उन्हें तो बस लाहौर पसंद था। अखबार में वे चुन-चुन कर लाहौर की अच्छी-बुरी खबरें निकालते। उनके लिए हालातों की ऊँच-नीच और राजनीति के दांव पेंच, मुश्किलें हवाई बातें थी उन्हें तो नक्शे पर लाहौर बड़ा ही साफ  दिखता था। वे अपनी अंतिम सांसें लाहौर में ही लेना चाहते थे। उसके लिए जवाहिर लाहौरी संकटमोचक थे। उसने जब-जब मुश्किलें देखी लाहौरी ने हाथ बढ़ाया और उसे थाम लिया। उसकी डायरी में यह बात साफ  तौर पर लिखी हुई थी कि उसने एक बार नहीं दो बार नहीं बार-बार कर्ज दिया था। लाहौरी की दरियादिली की अहमियत उससे बढ़कर और कौन समझ सकता था। पता नहीं लाहौरी कहाँ गए? पता नहीं इस जहाँ में हैं या उस जहाँ में। उसे फिर लगा कि वह बेहद अहसानफरामोश है और इन रिश्तों को इस तरह भुलाया नहीं जाना था।
डायरी में मुड़ी-तुड़ी फिलिप्स रेडियो सेंटर की रसीद थी जो दोहरे फोल्ड में और पुरानी होने की वजह से दो टुकड़ों में बंट चुकी थी। रसीद बाउजी के नाम की थी और रेडियो खरीदने क ी थी। रेडियो जिस पर जोर-जोर से हवामहल के प्रोग्राम लगाए जाते थे और जिस पर जसदेव सिंह की हॉकी कमेंट्री पूरे जोश के साथ सुनी जाती थी, और जिस पर बीबीसी हिंदी सेवा के पुरूषोत्तम लाल पाहवा, कैलाश बुधवार और ओंकारनाथ श्रीवास्तव को सुना जाता था।
डायरी में एचएमटी की घड़ी की एक रसीद भी थी। जो बाउजी ने उसे किसी परीक्षा में अच्छे नम्बरों से पास हो जाने के एवज में खरीद कर दी थी। घडिय़ों के एक खानदानी व्यवसायी थे जिनकी दुकान शहर के बीचोंबीच हुआ करती थीं चटर्जी एंड सन्स जो अब बंद हो चुकी थी बल्कि काफी पहले ही बंद हो चुकी थी। उसने सोचा कि वह पता लगाएगा कि इतना बड़ा व्यवसाय करने वाले वे लोग अचानक से कहाँ चले गए। उसे महसूस हुआ इस तरह अचानक कहीं चले जाने वाले या सीन से गायब हो जाने वालों की एक लंबी लिस्ट पिछले कुछ ही सालों में बन गई है। उसे महसूस हुआ कि जब वह छोटा था तो चीजें इस तरह गायब नहीं हुआ करती थी और बरसों बरस अपनी जगह पर टिकी रहती थी। दुनिया तेजी से बदल रही थी। उसे यह भी महसूस हुआ कि अगर डायरी छत्ती पर नहीं डाल दी गई होती तो शायद सिनारियो कुछ और ही होता। उसे लगा कि जैसे डायरी के साथ-साथ तमाम पुराने रिश्ते, बातें, यादें और बल्कि एक पूरा का पूरा कालखंड ऊपर छत्ती पर डाल दिया गया हो और धूल पडऩे को छोड़ दिया गया हो। उसने डायरी पर पड़ी धूल को साफ  किया लेकिन उसे महसूस हुआ कि डायरी पर धूल तो कम थी मगर उसका कवर थोड़ा बदरंग जरूर हो गया था जिसका अब कुछ नहीं किया जा सकता था।