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Tuesday 21 Nov 2017

अपने गांव का आदमी

कुन्दन सिंह परिहार
59, नव-आदर्श कॉलोनी
गढ़ा रोड,
जबलपुर-482002
मो. 9926660392
सेमीनार बुंदेलखंड के एक प्रमुख नगर में दो दिन से चल रहा था। बहुत सारे भागीदार थे इसलिए अच्छा मजमा लगा था। कार्यक्रम सरकारी था इसलिए 'माले मुफ्त, दिले बेरहमÓ वाला माहौल था। बाहर से आए वक्ता आरामदेह होटलों में रुके थे। कार्यक्रम-स्थल पर नाश्ते, भोजन, चाय का उत्तम इंतजाम था।
सेमीनार का विषय था 'बुंदेलखंड की समस्याएं-कारण और समाधानÓ। विद्वान वक्ता बुंदेलखंड की दुर्दशा पर बड़े जज़्बाती भाषण दे रहे थे। बोलते-बोलते ऐसे भावुक हो जाते जैसे अभी-अभी कागज पर इंकलाब ले आएंगे। नए लड़के भक्तिभाव से उनका भाषण सुनते थे। कार्यक्रम और लंच से मुक्त होते ही विद्वान वक्ता अपना टी.ए. और दैनिक भत्ते का बिल बनवाने में लग जाते थे ताकि रवानगी से पहले मुद्रा हाथ में आ जाए। कुछ ऐसे थे जो रेलवे की सामान्य द्वितीय श्रेणी में आए थे लेकिन ए.सी. के किराए का दावा कर रहे थे। बिल में उन्होंने टिकट नंबर लिख दिया था लेकिन टिकट मांगे जाने पर उनका जवाब था, वह तो स्टेशन के गेट पर देना पड़ा। 'बिलीव मी, मैं सच बोल रहा हूं।Ó बहुत से ऐसे थे जो अपने भाषण के अलावा पूरे कार्यक्रम में ऊंघते रहते थे क्योंकि वे अनेक क्षेत्रों की दुर्दशा पर भाषण दे चुके थे और आगे भी देने को हमेशा तैयार थे। वे सभी क्षेत्रों की दुर्दशा से दुखी होकर भाषण देते घूमते रहते थे।
सेमीनार के दूसरे दिन कुछ युवा भागीदार अपने पर्चे पढ़ रहे थे। श्रोताओं में स्थानीय लोग अच्छी संख्या में थे। अपना पर्चा पढ़ते-पढ़ते एक युवक रुककर बीच में बोला, 'मैं सदन को  बताना चाहता हूं कि मैं खुद बुंदेलखंड के छतरपुर जिले का रहने वाला हूं, इसलिए इन सभी स्थितियों से व्यक्तिगत रूप से वाकिफ हूं।Ó
युवक अपना पर्चा पढ़कर वापस अपनी सीट पर बैठ गया। तभी कुछ दूर बैठी एक युवती अपनी सीट से उठी और युवक के ठीक पीछे खाली कुर्सी पर आकर बैठ गई। युवती स्पष्टतया शादीशुदा थी, यह बताना जरूरी है ताकि पाठक इस प्रसंग में रोमांस की संभावनाएं न तलाशने लगें। बैठने के बाद युवती ने युवक की तरफ झुककर पूछा, 'भाई साहब, आपका नाम जान सकती हूं?Ó
युवक ने पीछे मुड़कर उसकी तरफ देखा। उसे लगा युवती उसके पर्चे से प्रभावित हुई है। कहा, 'मैं राजीव खरे।Ó
युवती ने फिर पूछा, 'आप छतरपुर जिले में किस जगह के रहने वाले हैं?Ó
युवक ने सहज भाव से जवाब दिया, 'छतरपुर से झांसी रोड पर एक गांव है अलीपुरा। वहीं मेरा जन्म हुआ।Ó
युवती के चेहरे पर अचानक रक्त दौड़ गया। मुंह पर दोनों हथेलियां रखकर वह खुशी से चीखी- 'अरे, वही तो मेरा भी गांव है।Ó आसपास बैठे लोग युवती की तरफ देखने लगे। उसके चेहरे पर अपार आनंद तैर रहा था।
फिर झुककर बोली, 'वहां पर एक रमेश खरे का परिवार हुआ करता था। आप क्या उसी परिवार से हैं?Ó
युवक  बोला, 'हां, वे ही मेरे पिता हैं। आप क्या यहीं हैं?Ó
युवती ने जवाब दिया, 'हां, शादी के बाद यहीं हूं। समाजशास्त्र में पीएचडी कर रही हूं। मेरा नाम रंजना है।Ó
युवक ने  पूछा- 'आप वहां के किस परिवार से हैं?Ó
युवती बोली- 'मेरे पिता वहां वैद्यराज हैं। नाम शायद जानते हों- राजाराम वैद्यराज।Ó
युवक ने अपना माथा ठोंका, कहा- 'उन्हें कौन नहीं जानता। गांव में इने-गिने तो चिकित्सक होते हैं। मेरे पिताजी तो उनकी खूब तारीफ करते हैं।Ó
युवती सुनकर गद्गद हो गई, बोली- 'लेकिन आपको वहां मैंने देखा नहीं।Ó
युवक बोला- 'मैं दस  ग्यारह साल की उम्र में पढ़ाई के लिए नौगांव आ गया था। वहां से फिर छतरपुर आ गया। इसी चक्कर में गांव जाना कभी-कभी ही हुआ। अभी भोपाल में पत्रकार हूं।Ó
साफ था कि युवक से बातें करते युवती का मन नहीं भर रहा था, लेकिन वहां ज्यादा बात करना संभव नहीं था।
युवती उठ खड़ी हुई, फिर बोली- 'आप यहां कब तक रहेंगे?Ó
युवक ने जवाब दिया- 'कल सेमीनार का आखिरी दिन है। कल रात को निकलूंगा। मुझे यहां से इंदौर जाना है।Ó
'ठीक हैÓ कहकर युवती अपनी सीट पर लौट गई।
अगले दिन राजीव कार्यक्रम में बैठा था कि उसे रंजना आती दिखी। कुर्सियों के बीच चलती वह सीधे उसके पास आई और झुककर धीरे से बोली, 'नमस्ते भैया।Ó
राजीव को सुनकर अच्छा लगा। हंसकर 'नमस्तेÓ कहा।
रंजना बोली- 'इस सत्र के बाद मेरे साथ घर चलिएगा। लंच वही होगा।Ó
राजीव ने जवाब दिया, 'लेकिन यहां तो सब इंत•ााम है। क्यों तकलीफ करती हैं?Ó
रंजना बोली, 'सरकारी अन्न बहुत खा लिया। अब अपने गांव वालों का अन्न ग्रहण कीजिए। सत्र खत्म होते ही हम चलेंगे।Ó
सत्र खत्म होते ही वह आकर खड़ी हो गई, बोली- 'चलिएÓ। राजीव बोला, 'मेरे साथ मेरा और एक साथी है शैलेन्द्र। वह भी पत्रकार है। राजनगर का रहने वाला है। उसे भी ले चलूं?Ó
रंजना हंसकर बोली, 'उनका  भी स्वागत है। अपने क्षेत्र के जितने भी हों, सबका स्वागत है।Ó
उसने बाहर निकलकर ऑटो बुला लिया। खुद स्कूटी पर थी। पन्द्रह बीस मिनट में घर पहुंच गये। ऑटो का भाड़ा रंजना ने ही चुकाया।
घर पर उस वक्त सिर्फ एक बाई थी जो किचिन में खाना बनाने में मसरुफ थी। रंजना ने बताया- 'पतिदेव ऑफिस गए हैं। यहां विकास प्राधिकरण में है। लंच ब्रेक में आ जाएंगे। टाइम हो रहा है। सात साल की बेटी स्कूल गई है। आप आराम से बैठिए।Ó
शैलेन्द्र इस नये सत्कार में कुछ सकुच रहा था। रंजना बोली- 'संकोच मत करिए। राजीव जी मेरे ही गांव के हैं, इसलिए मेरे भाई हुए। आप भी तो इस क्षेत्र के हैं। मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।Ó
थोड़ी देर में चाय आ गई, साथ में खाने की ची•ों। राजीव बोला, 'फिर खाना क्या होगा?Ó
रंजना बोली- 'कुछ नहीं है। आप लोग नई उम्र के हैं। खाना तैयार ही है। आप लोग चाय पीकर हाथ मुंह धो लीजिए।Ó
खाना लगते-लगते रंजना के  पतिदेव आ गए। सुदर्शन, हंसमुख पुरुष थे। प्रेम से मिले। राजीव से  बोले- 'मेरी पत्नी आपसे मिलकर बहुत खुश हैं। कहती हैं बहुत दिन बाद कोई गांव का मिला।Ó
भोजन हुआ और भोजन पर बहुत सारी बातें हुईं। रंजना ने राजीव के जीवन की बहुत सी जानकारी ले ली और अपने परिवार के बारे में जो बता सकती थी, बताया।
भोजन के बाद कमरा बता दिया, कहा- 'एक दो घंटे आराम कर लीजिए।Ó
राजीव बोला- 'मुझे थोड़ी देर में वहां जाना पड़ेगा। हिसाब-किताब करना है।Ó
रंजना बोली- 'चले जाइएगा। ये कार से आपको ले जाएंगे, हिसाब-किताब करके सामान लेकर वापस आ जाइएगा।Ó
राजीव बोला, 'अरे, मुझे रात को निकलना है। दस बजे की गाड़ी है। रिजर्वेशन है।Ó
रंजना बोली, 'ठीक है न। रात का खाना खाकर निकलिएगा। ये आपको स्टेशन छोड़ देंगे।Ó
थोड़ी देर के आराम के बाद पतिदेव राजीव और शैलेन्द्र को लेकर चले गए। घंटे-डेढ़ घंटे में वापस आ गए। रंजना ने दोनों को ड्राइंग रूम में बैठा लिया। फिर चाय पर गांव के बहुत से पन्ने खोले गए। राजाओं की गढ़ी और उसके पास पहाड़ी पर पुरानी परित्यक्त गढ़ी, गांव का तालाब और उसमें नहाने का आनंद, गांव की रामलीला और उसके म•ोदार पात्र, गांव का मीठे पानी का एकमात्र कुआं जहां नल लगने से पहले पूरा गांव पानी भरने आता था, गांव के लोकगायक और लोकनर्तक, गांव के अनेक बेपढ़े, सीधे-सादे, बेआवा•ा लोग, गांव में खुलते टेलीफोन-बूथ और टेंट हाउस- सब रंजना की बातों में उभरते डूबते रहे। लगता था उसकी बातें खत्म ही नहीं होंगी। पतिदेव बीच-बीच में ऊब से खांसते थे लेकिन रंजना के उत्साह और उसकी उमंग में कोई असर दिखाई नहीं देता था।
बातों का सिलसिला रात के खाने तक चला। खाने के बाद राजीव और शैलेन्द्र ने विदा ली। रंजना पति और बेटी के साथ उन्हें छोडऩे गई। स्टेशन पर चलते समय राजीव से बोली- 'अब कभी यहां आएं तो हमारे साथ ही टिकिएगा। मुझे अच्छा लगेगा। संकोच मत करिएगा।Ó फिर शैलेन्द्र से बोली, 'आप भी।Ó
अतिथियों को विदा करके वे घर वापस आ गए। सोने लेटे तो पतिदेव रंजना से बोले, 'तुम अपने गांव के प्रेम में लोगों को ले तो आती हो, लेकिन मुझे डर लगने लगता है कि तुम कभी धोखा न खा जाओ। दुनिया उतनी भली नहीं है जितना तुम समझती हो।Ó
रंजना झूठा गुस्सा दिखाकर बोली, 'अपने गांव का आदमी मुझे धोखा क्यों देगा जी? आपके दिमाग में पता नहीं कहां की बातें आती हैं! अब ये फालतू बातें छोड़कर सो जाइए।Ó
और वह आंखें मूंदकर फिर अपने गांव के सपनों में डूब गई।