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Tuesday 21 Nov 2017

एक रास्ता यह भी है

प्रभा प्रसाद
डी-4/13 मॉडल टाऊन-3
दिल्ली-110009
098994-81429
मेरे सभी मित्रों में सबसे प्रिय, सबसे घनिष्ठ और सबसे अधिक अपना कोई था तो दीपक, किन्तु वर्षों से उससे संपर्क छूटा हुआ था। अचानक उसका पत्र आया और मैं आठ वर्ष पहले की यादों में खो गया। दीपक का खत था तो छोटा किन्तु वही प्यार, वही अपनापन और वही आत्मीयता स्नेह से लबालब। मैंने उसके पत्र का उत्तर लिखा।
साकेत, नई दिल्ली
7.4.2014
प्रिय दीपक,
वर्षों बाद तुम्हारा पत्र पाकर सुखद आश्चर्य हुआ। जानकर अच्छा लगा कि आठ वर्ष विदेश प्रवास के उपरान्त तुम अपने देश वापस आ गए हो। तुम्हारे प्रवासी जीवन के अनुभव जाने, घर परिवार के विषय में मालूम हुआ और तुम्हारी कार्य कुशलता तथा उन्नति का अंदाजा लगा। सच कहूं तो यह मातृभूमि का प्यार ही है जो तुम्हें यहां खींच लाया, वरना जो जहां जाता है, वहीं का हो जाता है। अतएव अपने देश में, अपने वतन में तुम्हारा हार्दिक स्वागत।
तुमने मेरे घर परिवार के विषय में जानना चाहा है। इस लंबे अंतराल की कथा कहां से शुरू करूं, कुछ समझ में नहीं आता। मानसिक द्वंद्व व संघर्ष की लम्बी दास्तान है, पिछले आठ वर्ष।
दीपक, तुम तो जानते ही हो कि मेरा विवाह अपनी पसंद से हुआ है। माता-पिता ने विरोध तो नहीं किया पर मन से सहयोग भी नहीं दिया। पत्नी उर्मिला इंडियन एयरलाइंस के ऑफिस में अच्छे पद पर थी, मेरी नौकरी फरीदाबाद में थी। शादी से पहले दिल्ली, फरीदाबाद की दूरी कोई खास नहीं लगती थी, शादी के बाद खलने लगी। रात देर से पहुंचो, सुबह मुंह अंधेरे उठकर भागो। इसी झुंझलाहट से मैं अपने सहकर्मियों से लड़ बैठता। मेरी तुनुकमिजाजी से तो तुम भी भली-भांति परिचित हो। देर से पहुंचने के लिए बॉस ने टोका तो उनसे भी कहा-सुनी हो गई। नतीजा जो होना था वही हुआ। कुछ दिन तो घर में रहकर अच्छा लगा, बाद में घर काटने लगा। नौकरी तलाशी, मिली भी, वह गाजियाबाद में। यह भी दवा बनाने की फैक्ट्री थी। कुछ दिन काम करके ही मुझे पता चल गया कि यहां कितनी धांधली हो रही है। नकली दवाएं बहुतायत से बन रही हैं। सैम्पल कुछ होते हैं। पैकिंग किसी और की होती है। पैसे दे-देकर सैम्पल पास करा लिए जाते हैं, क्वालिटी पैसों से निर्धारित होती है। मैंने विरोध प्रगट किया, लेकिन यहां मेरी सुनने वाला था ही कौन? हां मेरा म•ााक उड़ाने वाले अनेक थे। कोई कहता भाई, रोटी के साथ मक्खन भी चाहिए कि नहीं? कोई कहता ''तुम न खाओ, हमें तो खाने दो!ÓÓ कोई कटाक्ष करता- ''यार! इन्हें हरिश्चन्द्र बनना है तो बने रहने दो। क्या पता कोई अवार्ड मिल जाए, क्या पता भारत रत्न की उपाधि से ही विभूषित हो जाए!ÓÓ उनकी कटूक्तियों पर जब मैंने ध्यान नहीं दिया तो गुमनाम पत्र आने लगे और मेरा पत्ता साफ करने की धमकी दी जाने लगी। मेरे घर चोरी भी करा दी। मैंने वहां से काम छोड़ दिया। बाद में तीन-चार जगह और काम किया पर सिद्धांतों और वास्तविकता में टकराव होता रहा। मैं परास्त हो गया और मान लिया कि नौकरी मेरे बस की नहीं। लेकिन हाथ पर हाथ धरे तो नहीं बैठा जा सकता था। इसलिए सोचा कि छोटा-मोटा धंधा ही शुरू करूं। पर धंधे के लिए रकम कहां से लाता। माता-पिता भी मदद करने की स्थिति में नहीं थे और उर्मि ने भी समझाया कि कोई भी धंधा चलाने के लिए जिस चुस्ती-फुर्ती की, और जिस 'समझदारीÓ की आवश्यकता होती है उसका मुझमें नितांत अभाव है। अत: मन मारे ही विचार सागर में गोते लगाता रहा और बेमन से नौकरी तलाशता रहा।
लंबी दास्तान है दोस्त! पर आज इतना ही। भाभी जी को मेरा सादर नमस्कार कहना और बिटिया को प्यार देना। तुम्हारे पत्र का बेसब्री से इंतजार रहेगा।
-तुम्हारा
राकेश

साकेत नई दिल्ली
12.6.2014
प्रिय दीपक!
पत्र मिला और खुशखबरी भी। तुम्हारे यहां पुत्रागमन पर हमारी ओर से बहुत बहुत बधाई। बेटी घर की शोभा होती है और बेटा घर का गौरव। तुम्हारा परिवार पूरा हुआ अत: फिर से बहुत-बहुत मुबारकबाद। तुमने हमारे परिवार के विषय में जानना चाहा है, तो भाई अपने यहां भी दो बच्चे हैं- बेटा कुणाल और  बेटी नमिता। पत्नी उर्मिला अच्छी, बहुत अच्छी है- शालीन, शिष्ट, सुघड़ एवं मधुरभाषी। मेरे निठल्लेपन ने थोड़ा चिड़चिड़ा बना दिया था किन्तु बड़ी खूबसूरती से उसने परिस्थिति से समझौता कर लिया।
दीपक! बहुत भागदौड़ के बाद मुझे नौकरी मिली और दिल्ली में ही मिली। पर यहां का हाल तो तुम जानते हो। साढ़े नौ बजे आफिस पहुंचने के लिए आठ बजे घर से निकलना होता और घर वापस आते-आते शाम के सात बज जाते। उर्मि का कार्यक्रम भी लगभग ऐसा ही था बल्कि कभी मीटिंग, कभी पार्टी और कभी किसी दूसरे काम में व्यस्त होने के कारण अक्सर आठ नौ भी बज जाते। जब तक हम दो थे, सब निभता रहा पर घर में छोटी बच्ची हो तो व्यवस्था कैसे की जाय, यह बड़ी भारी समस्या थी। सुबह-सुबह बेटी मीता को शिशु सदन छोड़कर दफ्तर भागता और शाम को उसे लेते हुए घर लौटता। बेटी बड़ी हो रही थी तो सोचा, चलो, साल दो साल में समस्या हल हो जाएगी पर कुणाल आ गया। अपने समाज में पुत्रजन्म पर कितनी खुशियां मनाई जाती हैं, थाली बजाते हैं, लड्डू बांटते हैं पर कुणाल के जनम से शायद ही किसी को खुशी हुई हो। सब कहते और शायद ठीक कहते कि जब हम अच्छी तरह स्थापित नहीं तो परिवार बढ़ाने की क्या जरूरत थी? पहले हमारा भी यही खयाल था लेकिन फिर हमें लगा कि माता-पिता किसके हमेशा रहते हैं? नाते रिश्तेदारों की सबकी अपनी-अपनी जिन्दगी। वैसे भी जीवनशैली में कितना अंतर आ गया है। पहले दिलों में अपनापन था, अब दिल सिकुड़ते जा रहे हैं। आपसी संबंधों में भी व्यावसायिक दृष्टि रहती है किससे संबंध रखने में कितना न$फा, क्या नुकसान। इसीलिए लगा कि दुख-सुख बांटने के लिए कोई तो अपना  हो। चाहे भावुकता में ही लिया फैसला हो, खेलते कूदते, लड़ते-झगड़ते दो बच्चे घर में अच्छे लगते हैं। लो, लड़-पड़े न दोनों। जाकर झगड़ा निबटाता हूं इसलिए बंद करता हूं।
भाभी को नमस्कार, बच्चों को प्यार,
                   
तुम्हारा राकेश
साकेत नई दिल्ली
                12.8.2014
प्रिय दीपक!
कई दिन से तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा कर रहा हूं। फोन मैं जानबूझकर नहीं करता। फोन से सब समाचार जान लिए तो फिर न तुम पत्र लिखोगे न मैं। और पत्र में जो बात होती है वो फोन में कहां?
इस समय दोनों बच्चे बाहर खेल रहे हैं और उर्मि अभी लौटी नहीं। उसी की प्रतीक्षा करते-करते यह खत लिख रहा हूं।
तुमने अपने पिछले पत्र में लिखा था कि व्यस्तता के कारण पत्र नहीं लिख पाते। मैं भी व्यस्त रहता हूं पर मेरी व्यस्तता और तुम्हारी व्यस्तता में अंतर है। तुम्हें दफ्तर, फोन, फाइलें, मीटिंग और टूर से फुरसत नहीं, मुझे घर के काम यानी डस्टिंग, झाड़ू, पोंछा, बर्तन, कपड़े खाना बनाना, बच्चे, उनका स्कूल और होमवर्क कराने से। तुम सोच रहे होगे कि मेरा दिमाग खराब हो गया है। नहीं दोस्त। वाकई मेरी दिनचर्या यही है। मैं इन दिनों गृहणी की ही भूमिका निभा रहा हूं। अब तुम जानना चाहोगे कि ऐसा क्यों है? देखो यार! बच्चे तो पालने ही हैं और हम दोनों काम करें यह स्थिति तब नहीं रही थी। घर में कोई बड़ा-बूढ़ा, दादी, नानी है नहीं। जमाने को देखते हुए नौकर के भरोसे बच्चे छोडऩा उचित नहीं लगा। शिशु सदन का सहारा लिया था पर वहां बच्चे बार-बार बीमार हो जाते। तब उतनी भागदौड़ किसके बस की बात थी, और समय ही कहां था? बच्चों को लेकर हम पति-पत्नी में काफी बहस होती और मनमुटाव भी हो जाता। नौकरी न वो छोडऩा चाहती थी न मैं। हम दोनों की व्यस्तता, थकान, मानसिक तनाव तथा आपसी झगड़ों का खामियाजा, मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता। हमारे पास न एक दूसरे के लिए समय था न बच्चों के लिए। छोटी-छोटी बातों पर बच्चों को डांटते खीझते और कभी-कभी मार  भी देते। हमारा धैर्य, सहनशीलता, हिम्मत जवाब देने लगी थी। लड़ते-झगड़ते, परिस्थिति से संघर्ष करते आखिर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हममें से सिर्फ एक ही काम करें, दूसरा घर व बच्चों को देखे। सोच-विचार का लंबा दौर चला और यही तय किया गया कि मैं घर संभालूं और उर्मि दफ्तर। हुई न उल्टी बात। पर उचित यही लगा क्योंकि उर्मि मुझसे पहले से नौकरी कर रही थी। पक्की नौकरी, वेतन ठीक-ठीक, तरक्की की काफी गुंजाइश और तबादले का झंझट नहीं। इसके विपरीत मेरा तो रिकॉर्ड रहा है कि साल डेढ़ साल से ज्यादा कहीं टिका नहीं। ये कोई घमंड की बात नहीं है पर आदत से लाचार। झूठ बोल नहीं पाता, अनीति देख नहीं पाता, नाइंसाफी सह नहीं सकता, न अपने साथ न औरों के साथ। तो भी मन मारकर भुगतता रहता था, इसलिए मैंने ही नौकरी छोडऩा उचित समझा। हमारे इस निर्णय का मेरे माता-पिता ने तो स्वागत किया बल्कि उर्मि की योग्यता की, उसकी सूझबूझ की भूरि-भूरि प्रशंसा की, किन्तु उर्मि के घर वालों को यह योजना कतई न जंची। किसी ने असंतोष प्रगट किया तो किसी ने आक्रोश जताया। किसी ने मेरे निकम्मेपन को धिक्कारा, किसी ने उर्मि की किस्मत का रोना रोया। पर उर्मि ने सा$फ कह दिया कि शादी हमने अपनी पसंद से की है, घर हमारा है, बच्चे हमारे हैं, समस्याएं भी हमारी हैं और उनसे हम अपने ढंग से निबट भी रहे हैं। हमारे मामले में न किसी को चिंता करने की जरूरत है न ही दखल देने की। सच दीपक, मैं तो दंग रह गया। उसके हौसले पर, उसकी समझदारी पर। वैसे कहने वालों ने क्या नहीं कहा- ''बीवी की कमाई खा रहा है, जोरू का गुलाम है, मर्द दिन भर घर में रहे, यह शोभा देता है क्या?ÓÓ और भी अजीब-अजीब बातें सुनने में आती। ''बस टिकुली लगाना और चूडिय़ां पहनना बाकी हैÓÓ, सुनकर दुख तो होगा ही। पर उर्मि मेरा हौसला बढ़ाती। बस थोड़े दिनों की बात है। कल तो बच्चे बड़े हो जाएंगे तो हम भी कुछ उलटवार करने की परिस्थिति में होंगे, तब यही लोग मुंह छिपाते फिरेंगे और हमारी प्रशंसा करेंगे। कभी मैं निराश हो जाता या घबरा जाता तो भी मेरी हिम्मत बढ़ाती- ''मैं हूं न! मेरे रहते तुम्हें काहे की चिन्ता! मैं एक मोर्चा संभाले हूं, तुम दूसरे पर डटे रहो।ÓÓ मेरी कठिनाई में मेरी बीमारी में, मेरे दुख-सुख में भरपूर सहयोग देकर सही मायने में उसने अपने को जीवन संगिनी साबित कर दिया। मेरे कारण कभी उसमें हीनभावना नहीं आई न कभी उसने मेरे बेकार रहने का तिरस्कार किया। सच कहूं तो उसी के  बलबूते पर हमारा परिवार चल रहा है।
उर्मि आ गई है, बच्चे भी खेलकर लौट चुके हैं अत: पत्र समाप्त करता हूं। भाभी को नमस्ते कहना, बच्चों को प्यार।
                तुम्हारा
                राकेश
पुन:
मैं भी कितना पागल हूं, कितना बुद्धू। अपनी रामकहानी सुनाए जाता हूं, तुम्हारे बारे में कुछ नहीं पूछता। अच्छा बताओ बच्चे किस-किस क्लास में पहुंचे? तुम तो फ्लैट खरीदने वाले थे तो मामला कहां तक आगे बढ़ा? छोटी बहिन सुधि की शादी की क्या तिथि तय हुई? जरा पहले से बताना भाई इसी बहाने सही, हम लोग मौके का फायदा उठाकर मिल तो सकेंगे। सब हाल विस्तार से लिखना।
-राकेश

साकेत नई दिल्ली
12.12.2014
प्रिय दीपक,
इतनी जल्दी तुम्हारा पत्र मिल जाएगा, इसकी उम्मीद नहीं थी। लेकिन पहले वाला $खत तो अभी तक नहीं पहुंचा। और, इस पत्र से बहुत से समाचार मिले और ढेर सारी तसल्ली एवं प्रेरणा भी। एक तुम्हीं तो हो दीपक, जो मेरी परिस्थिति समझ रहे हो और मुझे प्रोत्साहित करते तथा दिशा दर्शन देते रहते हो। इसीलिए तुम्हारा पत्र पाने के लिए बेताब रहता हूं और पत्र मिलने पर उसे कई-कई बार पढ़ता हूं।
मुझे इस बार पत्रोत्तर देने में देर हो गई। घर के काम हैं कि $खत्म होने पर ही नहीं आते। अब मैं समझ रहा हूं कि घर में रहने वाली स्त्रियां कितना काम करती हैं जबकि उनके काम को काम गिना ही नहीं जाता। उनकी सुबह सबसे पहले होती है और रात सबसे पीछे। घर की सारी व्यवस्था वो करे, हर सदस्य की जरूरतों का ख्याल वो रखें, हर एक को खुश रखने का प्रयत्न वो करें फिर भी बात-बात पर तिरस्कृत व लांछित भी वो ही हों। •ारा सी चूक हुई नहीं कि अपशब्दों की बौछार, मायके वालों पर छींटाकशी। अरे भाई, जो काम करेगा गलती भी उसी से होगी। जो कुछ करेगा ही नहीं वो क्या गलती करेगा? कोई काम नहीं कर पाई महिला तो उसे सुनना पड़ता है- ''घर में बैठी बैठी करती क्या रहती हो?ÓÓ गृहणी से कोई कामकाजी महिला या कोई भी व्यक्ति पूछ तो ले कि तुम भी कहीं काम करती हो तो बेचारी नहीं कहकर कैसी छुई-मुई सी हो जाती है, गोया दिन भर घर में निठल्ली बैठी रहती हो। मैं तो कहता हूं दीपक, कि कुछ समय के लिए हर पुरुष को गृहणी बनने का अनुभव बटोरना चाहिए। महिला की भूमिका निभाकर ही उनकी कार्यक्षमता, सहनशीलता और उनके उत्तरदायित्व बोध को समझा जा सकता है। घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीडऩ और यौनशोषण जैसे अत्याचारों को महसूस किया जा सकता है। एक और विचार मन में आता है। कहा जाता है कि पुरुष का कार्यक्षेत्र बाहर है और स्त्री का घर और पुरुष इसीलिए श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि वह कमाता है और स्त्री इसीलिए हीनभावना से ग्रस्त रहती है कि वह आर्थिक रूप से पुरुष के आधीन रहती है। थोड़े से गहने कपड़े देकर घर की लक्ष्मी को चौबीस घंटों की अवैतनिक नौकरानी से अधिक कुछ नहीं समझा जाता। महिला मुक्ति के जितने भी कानून बना लो, लेख लिख लो, भाषण दे दो, पढ़ लो, स्त्री की स्थिति तभी समझ में आएगी जब स्वयं को स्त्री की जगह रखकर देखा जाय। संभवत: इस प्रक्रिया में पुरुष की मानसिकता बदले, उसकी सोच में फर्क आए और वह पहले की अपेक्षा अधिक जागरुक, अधिक भावनाप्रण हो जाय, हो सकता है कि सामाजिक चेतना में कुछ परिवर्तन आ जाय और स्त्री को पुरुष की बराबरी का दर्जा मिल जाए।
सामाजिक ढांचे में परिवर्तन के साथ अब बहुत सी स्त्रियों ने घर और बाहर में सामंजस्य स्थापित कर लिया है। पुरुष भी घर के कामों में सहयोग देकर महिलाओं को आगे बढ़ाने लगे हैं। इस तरह सुविधापूर्वक पति-पत्नी नौकरी कर सकें तो अति उत्तम। आखिर स्त्री की शिक्षा और उसकी क्षमता का लाभ भी तो समाज को मिलना चाहिए। मानसिक तृप्ति और भावनात्मक संतुष्टि स्त्री-पुरुष दोनों को मिले। दोनों में से जिसका काम परिस्थिति के अनुकूल हो वो बाहर का क्षेत्र संभाले दूसरा घर को देखे। उपयुक्त काम स्त्री को मिलना है तो वही काम करे किन्तु घर की शांति भंग करके हरगिज नहीं। इस रास्ते को अपनाने में पति-पत्नी में एक-दूसरे पर विश्वास और सहमति जरूरी है। यह सोच जरूरी है कि गृहस्वामिनी यदि हाउस वाइफ बन सकी है तो गृहस्वामी हाउस हसबैंड क्यों नहीं बन सकता? किन्तु कठिनाई यह है कि आदमी का अहं कमाऊ बीवी का रुतबा स्वीकार नहीं कर पाता। अब तुम्हीं बताओ दीपक, ये कहां की अक्लमंदी हुई कि भूखे प्यासे बैठे रहो, रोते, झींकते, कुढ़ते रहो पर पत्नी को काम पर भेजने में हेठी समझो, विशेष रूप से हम मध्यमवर्गीय परिवार को यह विचार भाता ही नहीं। माना कि सदियों से चली आती परंपरा को तोडऩा मुश्किल अवश्य है पर नई परंपरा बनाना, लीक से हटकर काम करना और सामाजिक ढांचे में परिवर्तन लाना भी तो जरूरी होता है। इसी धारणा के अनुसार बहुत सोच समझकर हमने यह कदम उठाया है। तुम अपना अभिमत लिखना। मैंने अतिरिक्त आमदनी के विचार से घर में बेडकवर, बेडशीट, तौलिया, रूमाल आदि बेचने का काम शुरू किया है। बच्चे बड़े हो रहे हैं तो खर्चे भी तो बढ़ रहे हैं।
बंंगलोर का मौसम कैसा है। यहां सुबह शाम हल्की ठंड रहती है, दिन का तापमान ठीक-ठीक रहता है। इन सर्दियों में दिल्ली आओ न घूमने। हम लोग भी बंगलोर धावा बोलने की ताक में है।
अच्छा अब बस करूं न? मेरी उबाऊ बातों का बुरा न मानना। भाभी को नमस्कार कहना व बच्चों को प्यार देना। खत का जवाब जरूर और जल्दी देना।
-तुम्हारा राकेश
बहुत इंतजार किया, कई एक पत्र लिखे पर दीपक का जवाब नहीं आया। शायद घर बदल दिया हो, शायद ट्रांसफर हो गया हो, शायद विदेश ही वापस चला गया हो। संभव है मेरी जीवन-शैली उसे पसंद न आई हो, मेरी विचारधारा से सहमत न  हो और नारा•ा हो गया हो। आखिर पुरुष प्रधान समाज है- स्त्री का वर्चस्व आसानी से कैसे स्वीकार कर सकता है? स्त्री अपनी पहचान बनाए यह उसे क्यों कबूल होगा? लेकिन मैं और उर्मि तो अपना काम मुस्तैदी से कर रहे हैं। कोई भला कहे या बुरा, सहमत हो या असहमत, अपनी-अपनी परिस्थितियां हैं, अपनी-अपनी सीमाएं हैं और अपनी-अपनी समझ है तथा समस्याओं से निबटने का अपना-अपना ढंग है। लड़ाई हमारी है और हम खुद लड़ रहे हैं। हमने हथियार नहीं डाले न ही हाथ उठाए। अन्ततोगत्वा विजयी हम होंगे, यह विश्वास है।