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Friday 24 Nov 2017

शब्द सक्रिय रहेंगे

सुशील कुमार
 हंस निवास, कालीमंडा, हरनाकुंडी रोड पोस्ट, पुराना दुमका, झारखंड  814 110
मो. 09431310216
शब्द सक्रिय रहेंगे

धरती जितनी बची है कविता में
उतनी ही कविता भी साबुत है
धरती के प्रांतरों में कहीं न कहीं

यानी कोई बीज अभी अंखुआ रहा होगा नम-प्रस्तरों के भीतर फूटने को
कोई गीत आकार ले रहा होगा गँवार गड़ेरिये के कंठ में
कोई बच्चा अभी बन रहा होगा माता के गर्भ में
कोई नवजात पत्ता गहरी नींद कोपलों के भीतर सो रहा होगा
कोई रंग, कोई दृश्य, चित्रकार की कल्पना में अभी जाग रहा होगा
धरती इस तरह सिरज रही होगी कुछ-न-कुछ कहीं-न-कहीं चुपचाप   

इतनी आशा बची है जब धरती पर
फिर भला कवि-मन हमारा कैसे निराश होगा?

समय चाहे बर्फ  बनकर जितना भी जम जाए दिमाग की शातिर नसों में
हृदय का कोई कोना तो बचा ही रहेगा धरती-गीत की सराहना के लिये

आँखें दुनिया की कौंध में चाहे जितनी चौंधिया जाय
कोई आँख फिर भी ऊध्र्व टिकी रहेंगी  
अपनी प्रेयसी या प्रेमी के दीदार की प्रतीक्षा में

सभ्यता चाहे कितनी भी क्रूर हो जाय
कोई हाथ तो टटोलने को तरसेंगे उस हाथ को
जिसमें रिश्तों की गर्माहट अभी शेष है!

शब्द भी कहीं न कहीं सक्रिय रहेंगे कवि की आत्मा में  
और वह बीज, वह गीत, वह बच्चा, वह पत्ता
वह रंग, वह आशा, वह आँख, वह हाथ जैसी चीजें कवि के शब्द बनकर
कहीं-न-कहीं जीवित रहेंगी कविता में

कहां से लाऊं
कैसे देखूं  
दृश्य तो है
आँख भी है
दृष्टि कहाँ से लाऊँ
कैसे उडूँ़
आकाश तो है
पंख भी है
इच्छा कहां से लाऊं
कैसे गाऊं
गीत तो हैं
स्वर भी है
राग कहाँ से लाऊँ?