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Sunday 19 Nov 2017

इन बातों का है भला कोई सबूत!

 

शैलेंद्र शांत
द्वारा आरती श्रीवास्तव
जीवनदीप अपार्टमेंट
तीसरी मंजिल, फ्लैट 8
36, सबुज पल्ली, देशप्रियनगर, बेलघरिया, कोलकाता 700056
मो.0990314699
इन बातों का है भला कोई सबूत!
धर्म न तो किसी को सूली पर चढ़ाता है
न किसी को करता है जहर पीने पर मजबूर
वह न किसी को चाकू घोंपने को कहता है
न किसी शरीफ  को देश निकाला देने को
धर्म आदमी के काम आता है वक्त जरूरत
आदमी को और बेहतर आदमी बनाता है
वह जन-जन में करूणा का भाव जगाता है
मनुष्य को खूब-खूब प्रेम करना सिखाता है
आपस में मेल-मुहब्बत को बढ़ाता जाता है
दंगे-फसाद, खून-खराबा कभी नहीं कराता है
अफीम की भूमिका तो भूले से नहीं निभाता है
किसी को न हैवान बनाता है न किसी को शैतान
वोट की फसल तो वह काटने ही नहीं देता
न चर्च जलाने देता है, न मंदिर-मस्जिद ढहाने
इंसान का रक्त तो हर्गिज नहीं देता बहाने
इतिहास में इन बातों का है भला कोई सबूत!

तोड़े कौन मौन

दिल दुखी ही नहीं होता
दहल-दहल जाता है
याद बहुत कुछ आता है
किसी शहर का नाम क्या लेना
कहां सुरक्षित रह पाया अब कोई कोना
याद आता है कभी ईरान
कभी फिलस्तीन, कभी अफगानिस्तान
इराक का किसने किया काम तमाम
जेहन में चीख-पुकार मच जाती है
कौन है अपराधी, कौन है मानवता का शत्रु
किसने पाला, किसने पोसा, किसने मुकुट में
अपने खोंसा, बहुत से जानते हैं, चेहरे पहचानते हैं
बोले कौन, मुंह खोले कौन, तोड़े कौन मौन

हमारी विकास की पटरी पर!

आओ विदेशियो, आओ
सौ फीसद की गारंटी है
जेबें भर-भर ले जाओ
बांहें फैलाए खड़े हैं, हम

तुम दौड़े-दौड़े आओ
मौके को मत गंवाओ
हम लुटने को तैयार हैं
तुम जरा भी मत घबराओ
हे लंदन तुम आओ
हे वाशिंगटन, तुम भी आओ
मर्जी जिसकी-जिसकी हो
भागे-दौड़े आओ
हम बहुत बड़े बाजार हैं
हम उम्दा खरीदार हैं
सच मानो, हम दिल से बड़े उदार हैं
आओ रे गोरे आओ, श्यामल तुम भी चले आओ!
हमारी विकास की पटरी पर तुम अपनी ट्रेनें दौड़ाओ!

शब्दों से दुश्मनी!

तो वे कालिख ही नहीं पोतते
स्याही ही नहीं उड़ेलते
हमले ही नहीं करते
हंगामा ही नहीं करते
हत्या ही नहीं करते
किताबें भी जलाते हैं
याद कीजिए किन-किन ने
तवारीख में शब्दों से निभाई दुश्मनी!

तुम क्यों चली आती हो!

चाहता हूं
कामना करता हूं
कोशिश भी
कि तुम
मुझसे दूर रहो
चली आती हो
फिर भी ख्यालों में
चुपके-चुपके
दिल दुखाने
चेतना तुम क्यों
लौट-लौट आती हो
मेरे चैन को उड़ाने!