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Saturday 25 Nov 2017

आग का विकल्प

गणेशचन्द्र राही
ग्राम डुमर,
पो. जगन्नाथधाम,
हजारीबाग 825317
झारखंड
मो. 9939707851
आग का विकल्प

मेरी मासूम जिंदगी के
विकास के साथ-साथ
आग ने जन्म दिया है- मेरे प्रेम, करुणा
संघर्ष, न्याय और स्वप्न को
उसका ऐेतिहासिक मंगल विधान
जहां तक देखता हूं- मुझे शक्तिशाली बनाता है
मेरे आत्मिक एवं सामाजिक संबंधों को
भूख, रोटी और जल के बीच
सांसों की तरह युगों से थाम रखा है।

आग के बारे में जरा तुम ठीक से सोचो
वह सृजनधर्मी आत्मा है
अपने जन्म से लेकर आज तक
मेरी जिन्दगी का साथ माता-पिता की तरह
निभाती चली आ रही है
कहीं वह विचार बनती है/कहीं प्रेम
कहीं शक्ति बनती है/कहीं उध्र्वगामी चेतना
और कहीं शत्रुओं का संहारक
पृथ्वी को भव्य प्रकाश से
आलोकित कर नई सभ्यता और
युग को जन्म दिया है आग ने।

मुझे आग से है प्रेम
मेरा तन, मन और विचार आग के बिना
जिंदा नहीं रह सकते
यह मेरी सुन्दर आकृति को गढऩे में अहम्
सुख, शांति और संवेदना की
आग कभी खत्म नहीं होने देती
जिन्दगी को करीब लाती है आग
अपने रंग रूप और ताकत का एहसास
कराती है जब/एक तपा हुआ विचार
शिशु की तरह जन्म लेता है मेरे मन में
इस जीवन, जगत और सृजन को
बचाए रखने के लिए- धूप, जल, हवा
मिट्टी, अन्न और मेहनत की तरह
आग भी अनिवार्य है मेरे लिए
क्योंकि जब मैं एकांत क्षणों में
उसकी गहराई और व्यापकता में उतरा
तो खुद को उसका अभिन्न अंग पाया।

जब मेरी चेतना को
दुनिया में बढ़ते अन्याय, अत्याचार, जुल्म
और आततायी शासकों का नृशंस आतंक
चारों ओर से घेरता है तो वह पहले
बेचैन होकर खूब छटपटाती है
फिर खोजने लगती है नये मानव-हृदय को
एक नई सोच, विचार और विकल्प
स्वतंत्रता और शांति की खुशबू के लिए
इंसानियत की पवित्र आत्मा में रंगे
विश्व के खूबसूरत रूप को देखकर
मेरा मन जा पहुंचता है- आग के पास
जो झाड़-झंखाड़ की तरह हर बुराई को
जलाकर स्वच्छ निर्मल मन की
मेरे सामने हिमालय की उज्जवल
चोटियों की तरह
साक्षात करा देती है
आग मां की तरह स्नेह, प्रेम
और वात्सल्य का स्पर्श देकर कहती- बेटा
तुम बहुत कमजोर हो
तुम्हारे रक्त, बुद्धि, विवेक, ज्ञान और सत्य को
तब तक वह संसार उपलब्ध नहीं हो सकता
वह आदिम राग, विचार, संवेदना, प्रेम
संघर्ष और सोच की ऊंचाई को छू नहीं सकता
जब तक मेरी व्यापकता और उष्मा का तेज
तुम्हारी जिंदगी की आदिशक्ति नहीं बनेगा
सृजन और विचार का
जीवन में प्रकाश भरने जागेगा नहीं
तुम आग को सिर्फ पत्ते, घास, लकड़ी के बीच
उठते धुएं में दहकना ही समझोगे
जबकि यह तुम्हारे छोटे-छोटे कार्यों के साथ
महान कार्यों, संकल्पों एवं उद्देश्यों तक
यहां तक लाने की वाहिका बनी है
तुम्हारी जिंदगी की चमक, तुम्हारे विवेक की सुगंध
तुम्हारी अनंत संवेदनाओं का स्नेह
आग के तेज से निर्मित है
इसका विकल्प सिर्फ सृजन हो सकता है
इसके खिलाफ कभी नहीं सोचो
धन्यवाद दो।

आग मेरी रग-रग में लहू बनकर दौड़ती है
अन्न में आग/पानी में आग/विचार, कल्पना
विवेक, भ्रांति, प्रेम, क्रांति पूरी संचेतना में बिखरी है
मेरे अस्तित्व की बुनियाद इसी आग पर टिकी है
पक्षियों, पशुओं को प्रकृति ने दिया है
सुंदर, श्रेष्ठ, सुलभ आहार
और मुझे उनसे अधिक शक्तिशाली
और बलशाही बनाया
अधिक सृजनात्मक
कि आग का इस्तेमाल कब, कहां और
कैसे किया जाय
मैं मनुष्य के खिलाफ नहीं चाहता
गुस्सा और नफरत को बढ़ाना
मुझे तो हर कीमत पर चाहिए जीवन
उसके भीतर छुपे ज्ञान, प्रेम का आनंद

धरती, आकाश और आत्मा का सुख
बेरोकटोक हो नये विश्व की रचना
विवेक, चेतना और विज्ञान
आग का विकल्प बने आज।

लौट आता है बसंत

कभी स्वयं से तंग आकर
कभी पत्नी की बातों पर झल्लाकर
और कभी बेटे की जिद से
क्रोधित होता हूं
घर-बार छोड़कर
कहीं बाहर निकल जाने का मन करता
जैसे हर शब्द आग का गोला हो
और मुझे जला डालेगा
नफरत और हिंसा के भाव
नृत्य करने लगते हैं मेरे अंदर
इनमें आपसी होड़ मच जाती
खतरनाक मोड़ तक पहुंच जाना चाहते।

बाढ़ के जल की तरह
अपने कमरे में स्थिर होता हूं
मन के सुलगते कोने को
गौर से देखता हूं
सोचता-पत्नी बेटे और मैं
एक ही जिंदगी की कड़ी हैं
आक्रोश फिर इतना क्यों?

दरवाजे पर आकर
खड़ी पत्नी कहती है- चाय बनाई हूं/ला दूं
गुस्सा भाप बनकर उड़ जाता कहता- ला दो
बेटा सामने खड़ा है, पर बोलता नहीं
हृदय के टुकड़े से इतनी दूरी क्यों
कहता- आओ बेटा बैठो
प्यार और स्नेह उमड़ता उसकी ओर।
कुछ ही देर में
जीवन प्रलय होने से  बच जाता
पतझड़ होती दुनिया में
लौट आता है बसंत।
घर-परिवार
मां-बाप, पत्नी, बच्चे
इन्हें साथ लेकर तुम्हें चलना होगा
रिश्तों-नातों का यह कटु-मधु स्वाद
चखना होगा
चिंता, तंगहाली, गुस्सा और नफरत
तुम्हारे साथ रहेंगे ही
क्योंकि तुम जिन्दगी को
बहुत प्यार करते हो।

अस्सी चुटकी नब्बे ताल...

राष्ट्र की एकता को
प्रेम की डोर को
किस तरह वर्षों से संभाल रही है
भैया चुटकी भर खैनी!

जाति-धर्म की बात नहीं
हिन्दू-मुसलिम, सिख-ईसाई
बामन, राजपूत बनिया
सब कोई हाथ फैलाते
थोड़ी-सी खैनी में
कितने हृदय के तार जुड़ जाते।

अजीब सा रिश्ता बनाती है खैनी
पैदल चल रहा है आदमी
या हो रेल-बस-ट्राम में यात्रा करते
दूसरों को हथेली पर मलते खैनी देखकर
आंखें टिक जाती है उस पर
नहीं मानता मन
हाथ खैनी के लिए उसकी ओर बढ़ जाता
अपरिचित भी परिचित हो जाता
गांव-जिला, बोली-भाषा
एक-दूसरे के करीब आते
बांटने वाला भी इनकार नहीं करता
किसी को खैनी देने से।

खैनी खाने वालों ने इस देश के
समाज को बचाया है- अपने प्रेम, सहयोग और मित्रता से
कभी बुरा नहीं माना किसी का
जहां कोई मिला दुआ-सलाम के बाद
खैनी की डिबिया हाजिर
बनी नहीं है खैनी तो चूना डालकर बना लेते
ठोंक-ठाक कर चुटकी से
घुसेड़ लेते गाल के अंदर दांतों के पास।

खैनी खाने वालों ने
कभी परवाह नहीं की अपने मोती से दांतों की
रोज-रोज खैनी खाकर सड़ा दिया दांत
असाध्य रोग के शिकार हुए
खुले में मांग कर खाने वाले हों
या अपने बाप, भाई, चाचा, बहन से
छुपकर खाने वाले
जीवन भर लोगों के बीच प्रिय बनी रही
बाबुओं, साहबों को- मजदूरों से
चपरासियों से देखा खैनी मांगते
छोटे-बड़े का भेद खत्म करती
जाति, धर्म, नस्ल की दीवारें
चुटकी भर खैनी में ध्वस्त।
खैनी के अंदर क्या है- थोड़ा सा नशा
फिर भी काम करने वाले/रिक्शा चलाने वाले
मछुआरे, बढ़ई/इंजीनियर/डॉक्टर की आदत बनी है
शिक्षक कहता- बचपन की लत है
कितनी ही कोशिश करता हूं- छूटती नहीं
किसी के खैनी ढोंकने की आवाज सुनकर
उस ओर मेरे कान खड़े हो जाते
बिना मांगें रहा नहीं जाता।
एक छात्र कहता है- स्कूल के एक
सहपाठी ने खैनी खाने की आदत पैदा कर दी
अब छूटती नहीं
खैनी के बदले पान-गुटखा खाता हूं
फिर भी आदत से जाती नहीं
यही हाल पूरे देश के खैनी खाने वालों का है।

खैनी के दीवाने तो
खाने के  पहले खैनी की तारीफ में
थोड़ा हंसी-मजाक, चुटकुला, सुनाते हैं
जो नहीं खाता खैनी उसके सामने
खूब देर तक हथेली पर खैनी ठोंकते
और सगर्व कहते- 'अस्सी चुटकी नब्बे ताल,
तब जानो बबुआ खैनी का हाल।Ó
और कभी खैनी नहीं खाने वाले आदमी को
गदहा भी बनना पड़ता
इसके लिए अकबर-बीरबल के संवाद को सुना देते।

खैनी गुजरात के सूरत स्थित गोदाम में
अंग्रेजों के जमाने में रखी गई थी
उसका एक नाम सूरती भी पड़ा
तो स्वामी विवेकानंद जी ने दार्शनिक नाम दिया
बुद्धिवर्धक चूर्ण।

भैया, खैनी में बसा है मेरा गांव,
शहर, महानगर अमेरिका, इंग्लैंड
वर्षों से जिन्दगी का साथ निभा रही है
अकेलेपन का साथी है
घर में/बाजार में/खेत में/कारखाने में
देश में, विदेश में सब जगह होती है खैनी
और आदमी के पास जब रहती खैनी
कहता- पूरा दिन कट जाएगा
सफर में आत्मविश्वास से भरा होता है।

यह भी सच है कि इसके खिलाफ
शराबबंदी की तरह
देश का कोई नेता आंदोलन नहीं चलाया
कोई आदमी खैनी खाने के जुर्म में
जेल नहीं गया/कोई पुलिसिया कार्रवाई नहीं हुई
राजा सम्राट, शासक-प्रशासक नेता मंत्री
उद्योगपति सभी ने खैनी को धर्म की तरह
निजी मामला बताया।
इसका मजा लिया
खैनी के बारे में उनका दृष्टिकोण लोकतांत्रिक रहा
स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व को
व्यावहारिक रूप देने में
कभी पीछे नहीं रही राष्ट्र में खैनी।

दोस्त ने कहा- मेरे देश में खैनी
खान-पान की संस्कृति का अभिन्न अंग है
जिसकी आदत में शामिल हो गई है
वह चाहकर भी नहीं छोड़ सकता
हवा में भी बसी है खैनी की गंध
लोगों ने दुनिया में खैनी खाने में इतिहास रचा है
छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे लोग
एक विशाल कड़ी बन जाते हैं
सबसे अधिक मुझे
इसका औघड़दानी रूप आता है
फकीर की तरह बांटों और
प्रेम और भाईचारे को मजबूत करो
समाज की जिन्दगी में प्यारी हो गई है खैनी
कई पीढिय़ों की हथेलियों पर
अपनी नशीली गंध छोड़ती आ रही है
लोक-स्मृति में/कथा-कहानियों/कहावतों में
लोकगीत की तरह रची-बसी है खैनी
जैसे इंसान की भाषा समझती है
एक दुर्लभ जड़ी-बूटी हाथ लगी है
थूकने की आजादी पर थोड़ी पाबंदी है
फिर भी नहीं डरते खैनी खाने वाले भाई!