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Thursday 23 Nov 2017

फंदा

 बसंत त्रिपाठी

'विदर्भ के किसानों में दूरदर्शिता का अभाव है, जो उन्हें लगातार मृत्यु की ओर ढकेल रहा है। बेहद उपजाऊ जमीन को केवल कपास, दाल और सोयाबीन फसलों तक सीमित करने के देने के कारण फसल की विविधता का लोप हुआ है। इनका उत्पादन आवश्यकता से अधिक होता है, जिससे इनके बाजार मूल्य में लगातार गिरावट आई है। एक बात और देखने में आई है कि उत्पादन अधिकतर सरकारी खरीद पर निर्भर है। निजी पूंजी उत्पादन के हर स्तर पर किसान की सहायता करती है लेकिन उत्पाद की खरीद प्रक्रिया में उसे स्वतंत्र रूप से विचरण करने नहीं दिया जाता। सरकार भी अपनी विशाल मशीनरी के बावजूद भीतरी ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचने में नाकाम रही है। सरकार की सीमाएं स्पष्ट हैं लेकिन कृषि क्षेत्रों ने बाजार के बदलते ट्रेंड के अनुरूप फसल-चक्र और कृषि पद्धति में सुधार नहीं किया।Ó
'अपनी जरूरतों से अलग, फसल चक्र में परिवर्तन के क्रम और उसके वैज्ञानिक परिणामों का अध्ययन किए बगैर छोटे और मंझोले किसान पारम्परिक तरीके से खेती करते हैं। भूमंडलीकृत व्यवस्था में विराट संसाधनों एवं अवसरों का लाभ उठाकर वे अपनी पद्धति को दुरूस्त कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय मानकों एवं अंतरराष्ट्रीय पूंजी को स्वीकार करना होगा। सरकार और संबंधित संस्थाएं यदि इन तथ्यों की महत्ता को सीमांत किसानों तक ले जाएं तो किसान लाभ की स्थिति में आएंगे और आत्महत्या की संख्या में कमी आएगी। किसानों की मृत्यु का एक बड़ा कारण उनके भीतर जीवन-शक्ति का चुक जाना है। यह समस्या कृषि केन्द्रित उतनी नहीं है, जितना मन:स्थिति के भीतर फैलता पराजय बोध।Ó
'आत्महत्या में कमी के लिए सरकार को ऐसी बहुराष्ट्रीय संस्थाओं के निर्माण की दिशा में काम करना होगा जो कर्ज लेने वाले किसानों पर निगरानी रखें। वे देखें कि किसान कृषि के लिए जो कर्ज लेते हैं, उसका उपयोग कृषि संबंधी कार्यों में करते हैं या नहीं। कृषि क्षेत्र में फल-फूल रहे महाजनों और दलालों को समाप्त किए बगैर, फसलों को सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़े बगैर और किसानों के भीतर नैतिकता और जिम्मेदारी का भाव जागृत किए बगैर आत्महत्याओं को रोकना असंभव है।Ó
फुल स्टॉप का बटन दबाकर मैंने अपना चश्मा कम्प्यूटर टेबिल पर रखा और कुर्सी की पीठ से टिक गया। रात के दो बज रहे थे। पूरा वातावरण शांत था। रह-रहकर गुरखे की सीटी सन्नाटे को चीरती हुई दूर-दूर तक निकल जाती थी।
थर्मस फ्लास्क में रखे दूध से कॉफी का एक भरपूर कप बनाकर मैंने ए.सी. ऑफ किया और फ्लैट की टेरिस पर आ गया। मई की जलती गर्मी के घोड़े रातों को अब भी कुचल रहे थे। आसपास केवल कूलर की आवाजें थीं। लग रहा था कि दुनिया की सारी हलचलों ने अपनी आवाज कूलर को सौंप दी है और गहरी नींद में डूब गये हैं।
मैंने मार्लबोरो सिगरेट जला ली। जब से विश्व बैंक का यह प्रोजेक्ट मुझे मिला है, मैं यही सिगरेट पी रहा हूं। सिगरेट के कश और कॉफी के घूंट का मजा लेते हुए मैं अपने प्रोजेक्ट से संबंधत थीसिस के अंतिम हिस्से पर फिर विचार करने लगा। सत्रह लाख के इस मेजर प्रोजेक्ट की आधी रकम यानी साढ़े आठ लाख रुपए मुझे मिले चुके थे और बचे पैसे थीसिस जमा करने के बाद मिलने वाले थे। मैंने थीसिस की भाषा और तर्क पद्धति को बिलकुल अमेरिका की वैश्विक नीति के अनुरूप रखा था ताकि बचे पैसे लेने में कोई दिक्कत न हो।
मैं जान रहा था कि सच्चाई मेरे विश्लेषण के बिल्कुल विपरीत है, लेकिन इस भूत को अपने ऊपर फिलहाल हावी नहीं होने देना चाहता था। बचे पैसे एक बार मिल जाएं, फिर सोचा जाएगा कि डेढ़ साल में घूम-घूमकर बटोरे गए आंकड़ों का कैसे उपयोग हो।
मैं जानता था कि खुद को बहला रहा हूं, लेकिन ऐसा मैं अकेला ही तो नहीं हूं। माना कि दिल्ली विश्वविद्यालय से कृषि अर्थशास्त्र में मैंने पीएचडी की डिग्री ली है और कई सालों तक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ किसान आंदोलन में सक्रिय भी रहा हूं, लेकिन उससे क्या? दरअसल डिग्री ने मुझे इंटेलेक्चुअल की भाषा दी है। इस भाषा को ग्रामीण तथ्यों से जोड़कर मैंने एक अचूक पद्धति विकसित कर ली है। एक ऐसी पद्धति, जिसमें मेरी पक्षधरता पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। मैं जब आंकड़ों की बाजीगरी दिखाते हुए उसके तिलिस्म से खेलते हुए अपनी बात रखता हूं, तो अच्छे से अच्छा समाज-वैज्ञानिक भी चक्कर खा जाता है। मेरी डिग्री ही मेरा केपिटल है और इस केपिटल को मैंने आरंभ में गांव-देहातों में घूमकर इन्वेस्ट ही किया। इन्वेस्टमेंट की इस तरकीब ने मेरे केपिटल की वैल्यू बढ़ा दी। अब मैं अपना स्वतंत्र व्यापार करता हूं, इन्टेलेक्चुअल डिस्कोर्स का व्यापार। वित्तीय पूंजी के दूसरे सिपहसालारों की तरह मैं भी एक सिपहसालार हूं, लेकिन थोड़ा अलग किस्म का।
मैं जानता था कि थीसिस के हिस्से जब इंटरनेशनल जर्नल्स में प्रकाशित होंगे तो धूम मच जाएगी। मैं सोचने लगा कि अंतरराष्ट्रीय सम्मान के अवसर पर मुझे अपनी भाषा कैसी रखनी होगी। थोड़ी देर तक मैं उस संभावित भाषण में खोया रहा, फिर दूसरी सिगरेट जला ली। रात तेजी से भाग रही थी और हवा ठहरी हुई थी। मेरे माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई। सिगरेट की ठूंठ को मसलकर मैं स्टडी रूम में आ गया। मैंने अंतिम चैप्टर के प्रिन्ट लिए, फिर पूरी थीसिस को सी.डी. में सेव करके कम्प्यूटर ऑफ कर दिया।
मैं जब बेडरूम में गया, रात के सवा तीन बज रहे थे। सुनीता बिस्तर में नंग-धड़ंग लेटी थी। उसकी नाइटी जांघ तक उठ गई थी और उस पर जीरो वाट का बल्ब अपनी दूधिया रोशनी फेंक रहा था। बल्ब की उस हल्की दुधिया रोशनी में सुनीता की जांघ मुझे आमंत्रित कर रही थी। मुझे याद नहीं, पिछली बार कब उसे इतनी लालसा के साथ मैंने देखा था। लेकिन मैंने संयम रखा और चुपचाप उसकी बगल में लेट गया। सोते-सोते मैंने सोचा कि सम्मान के अवसर पर सुनीता को जरूर ले जाऊंगा।
सुबह देर से उठा। सुबह मैं देर से ही उठता हूं। मुझे कोई ऑफिस तो जाना नहीं होता, जो हड़बड़ी में उठूं। महकती हुई सुनीता ने जब मुझे जगाया, उसके बाल गीले थे। उसके गीले और सुगंधित  बालों में वही रात वाला आमंत्रण था। चटकती नींद में उसकी मादकता की घुसपैठ ने मेरी नसों में उत्तेजना भर दी।
''अमित उठो भी, ग्यारह बज रहे हैं। आज उठना नहीं है क्या?ÓÓ
''उठकर कौन-सा मुझे पत्थर तोडऩा है...ÓÓ अंगड़ाई लेते हुए मैंने कहा, ''हां यदि अपने शरीर को तोडऩे-मरोडऩे का काम मुझे सौंप दो तो अभी उठकर काम में लग जाऊं।ÓÓ
''धीरे बोलो, बाई दूसरे कमरे में पोंछा लगा रही है...ÓÓ
''उफ् ये बाई भी... इसे भी यही वक्त मिलता है आने का, कल से कहो कि सुबह-सुबह काम करके चली जाया करे।ÓÓ
सुनीता अखबारों का बंडल और चाय का कप बिस्तर पर रखकर चली गई। अखबार मेरे लिए केवल अखबार नहीं थे बल्कि हर शोधजीवी की तरह या तो आंकड़ों के स्रोत थे या फिर नए विषयों के केटलॉग। पिछले दो वर्षों से सबसे पहले मैं अखबारों में किसानों की आत्महत्या की खबरें ढूंढता, फिर अखबार के मुख पृष्ठ पर पेज नंबर लिख दिया करता, जिसे सुनीता बाद में काटकर एक फाइल में लगा देती। मैं आत्महत्या की खबरों की भाषा का अलग से अध्ययन करना चाहता था। यह प्रोजेक्ट मैं साम्राज्यवाद विरोधी छवि वाले एक बड़े संस्थान के अंतर्गत पूरा करना चाहता था, इसलिए सहमति कम और असहमति को अधिक उभारने की आवश्यकता थी।
पिछले दो सालों में ऐसे दिन कम ही रहे होंगे जब आत्महत्या की खबरों से अखबार खाली हों। पिछले छ: महीने में ंतो लगभग रोज ही। वह भी एक नहीं, दो या तीन या अधिक किसानों की आत्महत्या की खबरें। इन खबरों ने मेरी थीसिस की वैल्यू बढ़ा दी थी, ठीक वैसे ही जैसे गर्मी के दिनों में जल-केन्द्रित विमर्श की वैल्यू बढ़ जाती है।
मैं अखबार के पन्ने पलटने लगा। हिन्दी अखबार के एक कोने में पांच किसानों की आत्महत्या की खबरें थीं- वर्धा में दो, अमरावती में दो एवं यवतमाल में एक। मैं खबर पढऩे लगा। लिखा था- 'आज विदर्भ के तीन अलग-अलग जिलों में पांच किसानों ने कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या कर ली। वर्धा जिले के आजनगांव, तहसील हिंगनघाट के सैंतीस वर्षीय युवा किसान भीमा कालबांडे ने आज तड़के अपने खेत में जहर पी लिया। उस पर बैंक और महाजन का कुल चालीस हजार का कर्ज था। वर्धा जिले में ही समुद्रपुर गांव के देवाजी सरोदे ने...Ó
'देवाजी सरोदे...Ó मुझ पर बिजली गिरी। मैं धड़कते दिल के साथ खबर पढऩे लगा- 'वर्धा जिले में ही समुद्रपुर गांव के देवाजी सरोदे ने कल रात फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। उस पर एक राष्ट्रीयकृत बैंक का चालीस हजार और गांव के महाजन का बीस हजार कर्ज था...।Ó
मैंने हर अखबार से खबर की पुष्टि की। दो मराठी, एक हिन्दी और अंग्रेजी अखबार में खबर थी।
हालांकि यह कोई अनोखी खबर नहीं थी लेकिन... फिर भी... ऐसी खबर में देवाजी का नाम कैसे हो सकता है? देवाजी कैसे आत्महत्या कर सकता है? मैं सन्नाटे में था। उसका वाक्य बार-बार मेरे दिमाग की भीतरी दीवारों से टकरा-टकरा गूंज रहा था- 'साब, मेरा नाम तुम दैनिक के कोने में नहीं, बीच में देखोगे। लिखा होगा कि देवाजी गणपतराव सरोदे ने काश्तकारों के जीवन-वास्तव को बदलकर रख दिया।Ó
लहलहाते खेतों के बीच खरपतवार उखाड़ते हुए जब देवाजी ने चिल्लाकर मुझसे यह कहा था, मैं मेड़ में बैठा सिगरेट पी रहा था। ऊपर खुला आसमान था और अक्टूबर की नर्म धूप ने खेतों के रंग को चमकदार बना दिया था। पत्ती-पत्ती देवाजी के वाक्य की ताकत को महसूस कर खुशी से झूम रही थी।
यह आठ महीने पहले की  बात थी। आठ महीने में... इतनी जल्दी...! जीवन इतनी जल्दी कैसे चूक सकता है? नहीं यह कोई और होगा... लेकिन गांव का नाम तो वही है और मराठी अखबार में ंतो पूरा नाम था- देवाजी गणपतराव सरोदे। हां, यह उसी का नाम है, उसी ने आत्महत्या कर ली। लेकिन क्यों? कैसे? मेरा दिमाग झनझनाने लगा।
'अरे, तुमने अभी तक चाय नहीं पी, अब दुबारा गर्म करनी पड़ेगी।Ó सुनीता ने कप उठाते हुए कहा।
'सुनीता, देवाजी ने आत्महत्या कर ली।Ó
'कौन देवाजी?Ó एक ठंडा प्रश्न। 'मैंने बताया नहीं था, पिछले साल मैं उसके साथ तीन दिन रहा था। वो वर्धा के समुद्रपुर का किसान।Ó
'अच्छा वो... उसने आत्महत्या कर ली।Ó सुनीता ने एक ठंडी प्रतिक्रिया दी और चाय का कप उठाकर चली गई। सुनीता की ऐसी प्रतिक्रिया से मुझे बहुत आश्चर्य नहीं हुआ। अखबारों में छपी आत्महत्याओं की खबरों को काटकर चिपकाते-चिपकाते वह इसकी इतनी आदी हो चुकी थी कि अगर उसका कोई नजदीकी रिश्तेदार किसान होता और वह आत्महत्या कर लेता तो भी उसकी प्रतिक्रिया ऐसी ही होती, इतनी ही ठंडी...।
'लेकिन देवाजी...Ó मैं बार-बार इसी 'लेकिनÓ पर आकर ठिठक जाता। तरह-तरह के जाने-पहचाने सवाल मेरे इर्द-गिर्द नाचने लगे। उन सवालों का नृत्य इतना वीभत्स होता गया कि मेरे प्रोजेक्ट के थीसिस की पंक्ति-पंक्ति तड़प-तड़पकर दम तोडऩे लगी। मेरे भीतर भयंकर तूफान के आने के पहले की चुप्पी फैलती गई... फैलती गई... और आंखों में आठ महीने पहले का बीता हुआ काल जीवंत होता गया, सिनेमा के फ्लैश बैक की तरह...
अक्टूबर का पहला सप्ताह था, जब मैं वर्धा के अलग-अलग गांवों में घूमते हुए आंकड़े इकट्ठा कर रहा था। मेरा जोर अधिकतर कृषि उत्पन्न, ऋण की उपलब्धता, बाजार तक किसानों की पहुंच, महाजनों-दलालों की भूमिका और किसानों की जीवन-शैली पर था। इन्हीं प्रश्नों का जखीरा उठाए मैं गांव-गांव भटक रहा था। मुझे चौदह दिन हो गए थे वर्धा जिले में घूमते हुए और अचानक समुद्रपुर में दो किसानों की आत्महत्या की खबर ने मेरी उत्सुकता बढ़ा दी।
जब मैं समुद्रपुर पहुंचा, सुबह के नौ बज रहे थे। लोग अपने-अपने कामों में डूब चुके थे। पुलिस की एक जीप गांव के भीतर खड़ी थी और दो-चार पुलिस वाले कुछ लोगों से बतिया रहे थे। वहां से कोई जानकारी मिल नहीं सकती थी, क्योंकि सरकार ने मानसिक नाकेबंदी कर रखी थी। सोचा कि गांव के आसपास चक्कर लगाता हूं, शायद कुछ हाथ लगे। मैं धाकड़ सूत्रों के शिकार की खोज में निकल गया।
गांव से लगे हुए लहलहाते खेत दूर-दूर तक  फैले थे। सुबह ने खेतों को सबसे सुन्दर रंग में रंग दिया था। ऊपर नीले आसमान में तैरते सफेद बादलों के गुच्छों के नीचे खेतों को देखना अच्छा लग रहा था। खेतों के बीच-बीच में मेड़ अजगर की तरह चुपचाप पड़े थे और वहीं पर कहीं-कहीं एकाध किसान तम्बाकू मलते या बीड़़ी फूंकते दिखाई पड़ जाते। मैं एक ऐसे चेहरे की तलाश करने लगा, जिसमें विश्वास हो, जो बिना डरे-झिझके ठीक-ठीक जानकारी दे सके। शोधजीवी होकर मैंने चेहरों को पहचानने की अद्भुत महारथ हासिल कर ली थी। यही तो फील्ड वर्क का टर्निंग प्वाइंट है। पहले सही आदमी की तलाश, फिर अपने निष्कर्षों के लिए बनाए गए प्रश्नों को चालाकी से पूछना और फिर थीसिस लिखते हुए उत्तरों का संपादन करना। ताकि निष्कर्ष अनुदान देने वाली संस्था की वैचारिकी के अनुरूप हो। इस काम में मैं इतना दक्ष हो चुका था कि संस्था के अनुरूप चेहरों को खोजने में मुझे दिक्कत नहीं होती थी।
काम में डूबे किसानों के चेहरे की रेखाओं से उनके भीतर का अध्याय पढऩे की कोशिश करता हुआ मैं खेतों के बीच से गुजर रहा था कि अचानक खेत के एक अपेक्षाकृत खाली हिस्से में मैंने एक आदमी को लेटे हुए देखा। उसके लेटने का अंदाज ही अजीब और मस्त था। दोनों हाथों और पैरों को उसने फैला रखा था और आंखें मंूदे हुए चुपचाप लेटा था, मानो अपने जिस्म से धूप को पी रहा हो। एक मटमैला पाजामा और बंडी पहना वह आदमी लाश की तरह चुप था। उसके चेहरे की रेखाओं से एक गाढ़ा विश्वास निकलकर पूरे व्यक्तित्व पर फैल गया था। कुल मिलाकर वह एक ऐसा चेहरा था, जिससे बात करके इस गांव का दौरा सार्थक हो सकता था। मैं उसके पास बेआवाज पहुंचा और पांच-सात मीटर की दूरी पर जाकर बैठ गया।
फील्ड वर्क की यही तो खास बात होती है कि आप अपने अभीष्ट पर अचानक हमला नहीं करते हैं। इससे वह अचकचा जाता है। बेहतर है कि उसे आब्जर्व करें। उन बिन्दुओं को तलाशें, जहां से बात शुरू करके आप मनचाही जानकारियां हासिल कर सकते हैं। इसके लिए सही समय तक का इंतजार जरूरी है। इंतजार करना मुझे अच्छी तरह आता था और इंतजार करने का बढिय़ा सामान भी मेरे पास था। मैंने अपनी सिगरेट जला ली।
आधे घंटे उसे देखते हुए बीत गए और तब जाकर उसने अपनी आंखें खोली। उसकी आंखों में आत्मविश्वास का गाढ़ा रंग फैला हुआ था, जिसे मेरे जैसा घाघ पारखी ही नहीं, एक राह चलता साधारण इंसान भी पढ़ सकता था। उसने अपनी विश्वास भरी आंखों से मुझे देखा, फिर करवट बदलकर अपनी फसलें देखने लगा। उसकी ऐसी प्रतिक्रिया मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम न थी। फील्ड वर्क का मुझे अच्छा खासा अनुभव है। आदमी चुनने में मैंने आज तक गलती नहीं की है। लेकिन किसी की ऐसी प्रतिक्रिया से मेरा सामना नहीं हुआ। दिल्ली में बड़े-बड़े सेमीनार तक में मुझे इस तरह खारिज कर देने का जोखिम वरिष्ठ से वरिष्ठ समाज-वैज्ञानिकों और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ नहीं उठाते, फिर भी यह मामूली-सा किसान... लेकिन इसमें कोई बात तो है, जो अब तक मिले लोगों में नहीं थी। मैं उसे ठीक-ठीक समझ नहीं पा रहा था, लेकिन वह मुझे अपनी ओर खींच रहा था।
'यह साधारण शिकार नहीं है, अमित मियां। घने जंगलों की खाक बरसों छानने के बाद किस्मत से ऐसा शिकार हाथ लगता है, इसलिए सबसे पहले तो तुझे ऐसे शिकार का सम्मान करना सीखना होगा। इसका शिकार वैसे  ही नहीं करना, जैसे अब तक करता रहा है। जरा संभल के। यह जान ले कि अनुभवी चिड़ीमार को आज पहली बार सोने का हंस दिखा है। जरा संभल के।Ó मैंने अपने आपको समझाईश दी और खामोश पहल करते हुए उसके करीब जाकर बैठ गया। उसने फिर मुझे देखा, अबकी बार जरा गौर से, लेकिन आंखों का गाढ़ा रंग पिघल ही नहीं रहा था कि मैं शुरूआत कर सकूं। मेरी कश्मकश को उसने ही खत्म किया- 'क्यों साब, गांव के भीतर कोई सुराग नहीं मिल रहा है क्या?Ó
उसके इस अप्रत्याशित प्रश्न ने मुझे चौंका दिया। मैं हड़बड़ा गया- 'सुराग... नहीं.... नहीं... तुम गलत समझ रहे हो। मैं तो बस यूं ही इधर...Ó अपने वाक्य को मैंने अधूरा छोड़ दिया क्योंकि इस वाक्य पर मुझे विश्वास नहीं रह गया था।
वह मुस्कुराने लगा।
जंगली बिल्ली और हिरणी की आंखों के भाव को मिला देने से जो भाव बनेगा, वही उसकी आंखों में था। एक क्रूर किस्म की नरमी, एक खौफनाक किस्म का प्रेम, मानो हिरण चारों ओर से घिरकर अब आक्रमण का निश्चय कर रहा है।
'तो तुम किसी दैनिक के पत्रकार नहीं हो।Ó
'नहीं-नहीं, मैं तो अपने रिसर्च के सिलसिले में घूम रहा हूं।Ó
'अच्छा... तो तुम कांट्रेक्टर हो। तुम्हारी पगार मासिक नहीं, सालाना  बनती है। क्यों साब... कितने में लिया है, यह कांटे्रक्ट...?Ó
प्रोजेक्ट को कांटे्रक्ट कहकर उसने मुझ पर सीधा हमला किया था, अचूक हमला। मेरे पास जवाब नहीं था, मैं चुप लगा गया। उसकी और मेरी चुप्पी के बीच सुबह की नर्म धूप, ठंडी हवा और कामकाजी पंछियों की आवाजें फैलती गई। अचानक मुझे लगने लगा कि एक मेरे अलावा सभी लोग अपने काम में डूबे हैं या डूबने की तैयारी में है। न चाहते हुए भी यह भाव मुझ पर हावी होता गया।  होंठों में दबी दूसरी सिगरेट सुलगाने की मेरी हिम्मत न हुई।
फिर अचानक वह हो-हो करके हंसने लगा। मुझे उसकी हंसी से उतनी चिढ़ नहीं हो रही थी, जितनी अपनी विवशता से। अपने फील्ड वर्क को लेकर मैं अब तक मुगालते में था।
'साब, गांव के भीतर जाओ। वहां पुलिस तुमको आत्महत्या करने वालों के बारे में कुछ बताएगी। उनकी घरवालियों ंसे पूछो, वे भी रोते-रोते कुछ न कुछ बताएंगी ही। बाप तो दोनों में से एक ही का जिन्दा है, वह  भी कर्ज की रकम की कुछ मालूमात देगा। मरने वालों के बच्चों और परिवार का जिकर कर देना...  हो गया तुम्हारा कांटे्रक्ट पूरा। फिर दूसरी आत्महत्याओं का इंतजार करना। वैसे आजकल तुम लोगों को बहुत दौड़-भाग करनी पड़ रही है न। क्या करें साब, कभी-कभी तो तुम लोगों को दौड़ाने का मौका मिलता है, वरना जिन्दगी भर तो हम ही दौड़ते रहते हैं।Ó
मैं अब संभलने लगा था, संयत होने लगा था। मैं इतना कमजोर प्यादा भी नहीं था कि पहली बाजी में ही समर्पण कर दूं। मैंने कहा- 'गलती तुम्हारी नहीं है। तुम लोगों का पाला ऐसे पत्रकारों से  पड़ता रहता होगा क्योंकि इधर विदर्भ के किसान तो विश्व की कृषक नीति के केन्द्र में है। इसलिए तुमने मुझे भी उसी कैटेगरी का समझ लिया। मैं तुमसे कुछ पूछना नहीं चाहता हूं। मैं तुम लोगों के साथ रहकर ऑब्जर्व करना चाहता हूं। तुम्हारी जीवन-शैली की भीतरी परतों की स्टडी करना चाहता हूं, ताकि विदर्भ के किसानों के जीवन, उनकी सफलता और असफलता के बारे में कोई ठोस बात कह सकूं। तुम यदि परमिशन दो तो मैं एक-दो दिन यहीं रहूंगा, तुम्हारे साथ। यकीन जानो, मैं तुम पर बोझ नहीं बनूंगा और न ही तुम्हारे काम में दखल दूंगा। तुम अपना काम करते रहना और मैं देखने का अपना काम करता रहूंगा।Ó
उसकी आंखों का रंग पिघलने लगा और मैंने अपने अदृश्य हाथों से अपनी पीठ थपथपाई। वह गौर से मुझे देखने लगा। कुछ पल बाद 'जैसी तुम्हारी मर्जीÓ कहता हुआ फसल के बीच धंस गया।
समुद्रपुर की फि•ाा में उस दिन अजनबी गाडिय़ों की आवाजें घुलती-मिलती रहीं। दिन में दो  बार आने वाली बस से कुछ अनचीन्हे चेहरे उतरते, फिर अगले घंटे वे बस स्टैंड पर खड़े दिखाई पड़ते। बस स्टॉप पर कुछ नई चीजों की मांग सुनाई पड़ती। फिर वे चेहरे गांव-देहात में चलने वाली टैक्सियों पर सवार होकर चले जाते। पुलिस की गाड़ी, जनप्रतिनिधियों की अकर्मण्य सक्रियता धूल उड़ाती हुई आती और अपने पीछे धुंधली सड़क छोड़कर फरार हो जाती।
लेकिन मैं इन सबसे अलग मेड़ पर बैठकर अपनी रणनीति बनाता रहा। इस बीच उसने खरपतवार के खिलाफ मोर्चा खोल लिया था।
दोपहर हम फिर साथ थे। साथ तो हम सुबह से ही थे लेकिन हमारा साथ होना न होने के बराबर था। वह अपने काम में उलझा रहा और मैं अपनी उधेड़बुन में। उसने अपना एल्यूमिनियम का बड़ा-सा डब्बा खोला। गीला बेसन और ज्वारी की मोटी-मोटी रोटियां। हम दोनों ने खाना खाया। हमारे बीच की चुप्पी अब तक पूरी तरह नहीं टूटी थी। इस बार भी पहल उसी ने की-
'मेरा नाम देवाजी गणपतराव सरोदे है। और तुम्हारा?Ó
'अमित मिश्रा।Ó
'बम्हन हो।Ó एक हल्की व्यंग्य मिश्रित मुस्कुराहट उसके चेहरे पर आई। थोड़ी देर वह चुप रहा, फिर पूछा- 'ये जो आत्महत्याएं हो रही हंै, उसके बारे में ंतुम्हारा क्या ख्याल है? तुम तो संशोधन कर रहे हो। बहुत कुछ जानते होगे।Ó
कुछ भी कहकर मैं उसे बिदकाना नहींचाहता था, सो बड़ी चालाकी से अपने आपको बचाते हुए कहा- 'आत्महत्याएं तो तुम्हारे बीच से हो रही है। तुम मुझसे बेहतर जानते और समझते हो।Ó
'हमारे जानने और न जानने से क्या फर्क पड़ता है। फर्क तो इससे पड़ता है कि सरकार क्या मान रही है।

'सरकार के लिए तो तुम लोग केवल पुतले हो। फसल उगाने वाले चलते-फिरते, हाड़-मांस के पुतले। जब तक तुम लोग क्या चाहते हो, इसकी घोषणा न करो, सरकार मजे से चलती रहेगी।Ó
'सरकार और हमारे बीच दलालों की भी तो कमी नहीं है।Ó
'क्या ये दलाल आज अचानक धरती पर उग आए हैं या इसके पहले भी थे?Ó
वह फिर चुप। थोड़ी देर बाद बोला-
'बात तुम्हारी बरोबर है, साब। दलाल तो पहले भी थे। लेकिन उनके पास की ताकत से ज्यादा ताकत हमारे पास थी, जीने की ताकत। और चीजों पर उनकी पकड़  भी इतनी मजबूत नहीं थी। पहले हम कर्ज उनसे लेते थे और फसल अपनी उगाते थे। कर्ज हम अब भी उनसे ही लेते हैं, बैंकों में भी मुंह मार लिया करते हैं लेकिन फसल अपनी नहीं उगा पाते। अब तो हम उन बीजों को बोते हैं जो बाजार में सरकार भेजती है। हमारी फसल और हमारे बीज दोनों की बाजार में अब कोई कीमत नहीं रह गई  है। ये कपास देख रहे हो न! सफेदी फलों से झांकने लगी है। पहले इसे देखकर हमारे पुरखे नाचने लगते थे। बैल-बंडी दुरुस्त करने लगते थे। लेकिन अब इन्हें देखकर हमको कोई उत्साह नहीं होता। क्या कीमत रह गई है इनकी बाजार में? इस साल का कपास दीवाली तक सरकार की मंडियों में ठूंस दो तो होली तक पैसा मिलेगा, वह भी पहले से बहुत कम। सरकार के हाकिम कहते हैं, पैदावार बढ़ाओ। पैदावार बढ़ाते हैं तो कीमत कम कर देते हैं। आखिर हारा हुआ काश्तकार रोज-रोज मरने से एक बार मरने का रास्ता चुन लेता है। बोलो, क्या गलत करता है?Ó
'तो इन आत्महत्याओं का तुम समर्थन करते हो?Ó मैंने अपना दांव चलाया।
'समर्थन काहे का, साब। गरीब का दुख  है, मरकर छुटकारा मिल जाता है...Ó थोड़ी देर तक वह चुप रहा, कुछ सोचता रहा, फिर बोला- 'संभाजी और मैं साथ में पढ़ते थे, दोनों एक साथ दसवीं फेल हुए, यहीं गांव के स्कूल में। बड़ा साथ रहा उसका। वो बबूल का पेड़ देख रहे हो, उसके बाद का छ: एकड़ उसी का है। बड़ा मजबूत था। पटेल से पन्द्रह हजार का कर्ज लिया था। कहता था, पटेल यदि जोर-जबरदस्ती करेगा तो साले को उसी के घर में पटकी दूंगा। बैंक का पचास हजार का कर्ज था। बैंक वाले आते तो पहले से ही लडऩे को तैयार। कहता, साले पुलिस बुलाओ, पता तो चले लोगों को कि तुम लोग वसूली कैसे करते हो। यहीं परसों रात हमने साथ में महुआ पी। पीने के बाद वो रोने लगा। बोलने लगा कि मैं अब लड़ते-लड़ते हार गया हूं। आखिर कब तक लड़ूंगा। इस फसल को बेचकर धेला भी हाथ न आएगा। उधर बैंक वाले परेशान कर रहे हैं। सोचता हूं, शेती बेच दूं। मैंने पूछा कि काश्तकारी नहीं करेगा तो फिर क्या करेगा? बोलने लगा कि यहीं गांव में मजूरी करूंगा, तेरे खेत में मजूरी करूंगा, काम देगा न...। और कल सुबह जहर पी गया। मैंने सोचा भी नहीं था कि वो ऐसा करेगा। पीकर रोना-हंसना तो चलता है... लेकिन साब, वो भी कमजोर निकला। साला छोड़ के चला गया... अब मैं क्या उसकी मय्यत में रोने जाता... कल से पड़ा हूं यहीं पर। घरवाली भी मुझे जानती है, इसलिए वापिस लौटने की जबरदस्ती नहीं की, बस डब्बा भेज दिया...।Ó
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि देवाजी दुखी है या  गुस्से में है। जब मैंने सिगरेट पीने के लिए पैकेट निकाला तो उसने पैकेट छीन ली और एक सिगरेट निकालकर सुलगाने लगा। सफेद परी-सी सिगरेट को उसने आंख भर देखा, फिर धुआं गिटकने लगा। हां, उसे 'गिटकनाÓ ही कहा जाएगा, क्योंकि जिस तरह वह सिगरेट पी रहा था, कश लेना तो उसे कतई नहीं कहा जाएगा। एक अजीब-सा उज्जड़पन था उसमें, जिस पर प्यार भी आता था और डर भी लगता था।
'लेकिन साब, तुम लोग देखना, काश्तकार जब इससे बाहर आएगा तो बड़े-बड़ों की हवा निकल जाएगी। अभी तो वह जाल में फंसा है, दम तोड़ रहा है... लेकिन मैं कहता हूं, मरना ही क्यों? मरना ही है तो साले दो-चार का गला दबा के मरो। मरने के बाद कौन-सा फांसी पर चढऩे का डर है। सरकार कहती है, कर्ज लो। लो, जी भर के कर्ज लो। सरकार का पैसा लो और वापस करने से मना कर दो। फसल उगाओ और सरकार को मत बेचो। पड़ा रहने दो घर में। सब मिल जाओ। जब सरकार को गन्ना नहीं मिलेगा, कपास नहीं मिलेगा, सोयाबीन और चावल नहीं मिलेगा तो वो बौखला जाएगी। तब देखते हैं कि सरकार क्या करेगी? और करेगी तो साली आर-पार की लड़ाई होगी। तब मर भी जाएंगे तो चिंता नहीं। सरकार कहती है, मोबाइल लो, ट्रेक्टर लो, बीमा कराओ, पेट्रीसाईट वापरो। वापरो, जी भर के वापरो। उसके हाथ में पुलिस है, सेना है, कचेहरी है तो हमारे में हाथ में हल की मूठ है, जमीन से फसल उगाने का नुस्खा है। कचेहरी क्या करेगी, यदि हम मूठ ही न थामें। जब सरकार का बाप बाहर से डंडा करेगा। तब वो तड़पेगी और हम मजा लेंगे...।Ó
देवाजी के नथुने फड़क रहे थे। सरकारी प्रचार-तंत्र में फंसा वह एक आक्रामक किसान था और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उसने अपनी तड़प के स्रोत जान लिए थे। फिर वह अचानक उठा और कपास के पौधों के बीच जाकर उकड़ू बैठ गया।
कपास के फलों से झांकती सफेदी के बीच मटमैले सफेद कपड़े पहने वह भी धूसर कपास की तरह लग रहा था। मैं मेड़ पर ही बैठा रह गया। उसके पास जाने की हिम्मत न हुई।
शाम को सूरज ने अपने धूप के कपड़े उतारकर तपे लोहे के रंग के कपड़े पहन लिए थे और पश्चिम दिशा में रोशनी के कतरे को बचाने की मुहिम में डटा था। फिर धीरे-धीरे अंधेरे का आभास बढऩे लगा तो उसने हथियार डाल दिए। देवाजी मेरे पास आया और कहा कि अब घर चलते हैं।
हम साथ-साथ लौट रहे थे और हमारे आगे-पीछे अंधेरा भी पृथ्वी पर लौट आया था।
समुद्रपुर एक बड़ा गांव था। वर्धा से केवल चालीस किलोमीटर दूर। गलियां सीमेंट की थी और उसके किनारों से गंदला पानी बह रहा था। जगह-जगह हैंडपंप लगे हुए थे। बिजली के खंभे सिर उटाए खड़े थे और पीली रोशनी अंधेरे की जाली से छनकर घरों की खपरैल छतों पर गिर रही थी। गांव के  बीचों-बीच हनुमान का एक मंदिर था, जिसके दालान में बैठे हुए प्रौढ़ बातचीत में डूबे थे। गलियों के थोड़े अंधेरे हिस्से में कैशोर्य और जवानी की सीमा-रेखा पर खड़े नवयुवक दबी-जुबान में हंसी-ठट्ठा कर रहे थे। परसों हुई मौत के चिन्ह अभी गांव के कपाल से पूछे नहीं थे, इसका आभास मुझे गांव की गलियों में धंसते हुए हो रहा था। उच्चारित शब्दों के भीतर की चुप्पी को मैं सुन पा रहा था। घर के भीतर से उठते शोर में भी चुप्पी खामोश नहीं हो गई थी।
देवाजी के पीछे-पीछे चलते हुए मैं उसके घर पहुंचा और मेरा सामना उसकी घरवाली की अजनबी नजरों से हुआ। देवाजी ने उससे कहा कि ये साब बाहर गांव से आए हैं और दो-तीन दिन हमारे साथ रहेंगे। अजनबी नजरों की अजनबीयत तो मिट गई आश्चर्य से लिपटा हुआ प्रश्न उसके चेहरे पर तैरता रहा। घर के आंगन में रस्सी के दो खटिये बिछाकर वह भीतर चली गई। थोड़ी देर बाद उसने चाय के दो कप हमें पकड़ा दिए और कुएं से पानी खींचने लगी।
'संभाजी का घर कौन-सा है?Ó चाय पीते-पीते मैंने पूछा।
'यहीं, इसी गली का आखिरी मकान।Ó
'तुम जाओगे नहीं वहां...?Ó
'नहीं। थोड़ी देर वह चुप रहा फिर बोला- 'जाकर क्या करूंगा?Ó
देवाजी की बातों में कहीं कोई झोल नहीं था, जहां मैं शब्दों को धंसा सकूं। आखिरकार गांव का एक चक्कर लगा आने की बात कहकर मैं उठा।
समुद्रपुर बहुसंख्यक कुनबियों का गांव था। अपने रूप-रंग में बहुत समृद्ध तो नहीं, लेकिन बहुत पिछड़ा हुआ भी नहीं। मैं उसी ओर चलने लगा जिधर संभाजी का घर था।
गली के उस आखिरी मकान के सामने मायूसी थी। उस ओर चलते हुए मेरी चाल सहज ही धीमी हो गई। भीतर जाने की हिम्मत नहीं हुई। मैंने, मानो रेंगते हुए, दरवाजे को पार किया। हल्की आवाजें घर के  भीतर से निकलकर गली में फैल गई थी। घर रो-धोकर शांत हो गया था। मैं गली तो पार कर गया लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि किस ओर चलूं। मैं बस चल रहा था और चलते-चलते गांव की सीमा पर डटे अंतिम बिजली के खंभे को भी पार कर गया।
एक अजीब-सा आतंक वहां पसरा था। पीली रोशनी का एहसास और उसके ठीक बाद चांदनी से धुला हुआ दूर-दूर तक फैला अंधेरा। मैं अंधेरे और उजाले की सीमा रेखा पर खड़ा था। वहां से पलटकर मैंने गांव को देखा। लगा, किसी ने ज्वालामुखी को पॉलीथिन में बंद कर रखा है।
गांव में हुई दूसरी आत्महत्या के दरवाजे से गुजरने का ख्याल मैंने छोड़ दिया। बहुत देर तक इधर-उधर से समुद्रपुर को देखने के बाद जब मैं लौटा, देवाजी परेशान खटिए पर बैठा था। मुझे देखते ही उछलकर खड़ा हो गया- 'कहां। चले गए थे, साब, पूरे गांव के तीन चक्कर लगा आया हूं।Ó
मैंने कलाई में बंधी घड़ी पर नजर डाली। नौ बज रहे ते। सचमुच नौ बज रहे थे। यानी मैं लगभग दो-ढाई घंटे इधर-उधर घूमता रहा था।
'कुछ नहीं, बस इधर-उधर घूम रहा था।Ó मैंने माफी मांगने के लहजे में कहा।
'साब, ये तुम्हारा शेहर नहीं है, चम्-चम् चमचमाता हुआ। यह गांव है, गांव। यहां सांप, बिच्छू घूमते रहते हैं। एकाध ने भी काट लिया तो दवाखाना जाने से पहले ही शांत हो जाओगे या रातभर छटपटाते रहोगे। दिन में जी भर कर घूमना अभी आराम ही करो।Ó उसकी उस उलाहनापूर्ण चिंता में उसकी घरवाली भी शामिल थी। मैं हाथ-मुंह धोकर जब कपड़े बदल रहा था तो तीन लोग पूछकर जा चुके थे कि मैं लौटा या नहीं।
उस दिन मैं खाना खाकर जल्दी ही सो गया।
सुबह •ारा देर से नींद खुली और मैंने देखा कि उसकी चार वर्षीय बेटी मेरे पैताने से दूर खड़ी मुझे आश्चर्य भरी निगाहों से देख रही है। मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट लौटी तो याद आया, पिछले चौबीस घंटे में मैं पहली बार मुस्कुरा रहा हूं। मैंने इसे इशारे से पास बुलाया तो वह बेधड़क चली आई। फूली-फूली फ्राक पहने वह बड़ी प्यारी लग रही थी। उसके मुंह से दूध की गंध उठ रही थी और फ्राक के रंग उडऩे-उडऩे को थे।
'क्या नाम है तुम्हाला?Ó मैंने तोतली जुबान से पूछते हुए उसे उठाकर पेट पर बैठा लिया।
'लछमी और तुम्हारा?Ó उसकी जुबान साफ थी सो मैंने भी साफ जुबान में उत्तर दिया। 'अमितÓ।
'अमित काका, तुम रात में आले ना। मला बाबा बोले कि तुमि इतक्का मोठा-मोठा किताब लिहता। पन कसीला मोठा किताब लिहता? पढऩे में खूबच त्रास होता।Ó हिन्दी और मराठी का एक नमकीन-सा झरना उसके मुंह से फूटा।
'मैं किताब लिखता नहीं, बेटा, पढ़ता हूं, और मुझे भी त्रास होता है।Ó
'अरे साब, अब तक बिस्तर में ही हो। यदि साथ चलना है तो जल्दी तैयार हो जाओ। इस लड़की के मुंह लगोगे तो रात हो जाएगी, लेकिन बात खत्म नहीं होगी।Ó
'बड़ी प्यारी बेटी है देवाजी।Ó
देवाजी मुस्कुराया। मुझे उसकी मुस्कुराहट अच्छी लगी। मुस्कुराते हुए वह सचमुच बहुत अच्छा लग रहा था।
थोड़ी देर बाद मैं उसके साथ फिर खेत में था। वह अपने काम में और मैं अपने काम में। मैं घूम-घूमकर लोगों की बॉडी लेंग्वेज की स्टडी कर रहा था। देवाजी सही था। किसान काम तो कर रहे थे लेकिन उनमें उत्साह नहीं था। दूसरे किसान औसत से भी कम पढ़े-लिखे थे लेकिन उस जहरीली फि•ाा को कहीं भीतर ही  भीतर महसूस कर रहे थे। वे धीरे-धीरे मौत के दलदल में धंस रहे थे। उनमें से कब कोई दूसरा अगले दिन न दिखे, कहना मुश्किल था।

लेकिन देवाजी... देवाजी गुजरी सदी का घिघियाता हुआ किसान नहीं था, जो पाटिल की देहरी पर उकड़ूं बैठा जुहार करे और उसके रहमो-करम पर पले। उसके बाप-दादों ने यही किया था। पारम्परिक तरीके से खेती, भजन-कीर्तन, त्योहार, साहूकारों से कर्ज और फसल बेचकर चुकारा। जिन्दगी एक बंधी-बंधाई पटरी पर दौड़ रही थी। वर्षा अच्छी हुई तो भगवान मेहरबान... सूखा पड़ा, महामारी फैली और गांव के गांव साफ तो शिकायत भगवान से और पाटिल के दरबार में फिर से जी हुजूरी।
फिर अचानक देश विकास के अदृश्य घोड़े पर सवार हो गया। छोटे और मझोले किसानों के भीतर अचानक महत्वपूर्ण होने की लहरें उठने लगीं। उनके सपनों में भागते घोड़े की अयाल हिलने लगी। बड़े जमींदारों-पाटिलों की सरकार-परस्त साझीदारी के बावजूद दुनिया का बाजार समझ चुका था कि इन छोटे और मझोले किसान की जमीन  हड़पना ज्यादा आसान है क्योंकि बड़े किसान और जमींदार अपने सुरक्षित जीवन के कारण ज्यादा घाघ तरीके से खरीद-फरोख्त करते हैं। फिर वे गिनती में इतने थोड़े हैं कि बेहतर ग्राहक होने के बावजूद उनके भरोसे अधिक माल खपाया नहीं जा सकता। कर्ज लेकर अदा न करने के लाख तरीके उन्हें आते हैं। उनकी तुलना में छोटे किसान आसान टारगेट हैं। सबसे बड़ी बात कि बाजार को दोनों ओर से फायदा था। यदि किसान मर जाएं तो उनकी घरवालियां जमीन बेचेंगी ही, जिसका अंतिम खरीदार वही होगा। आखिर कब तक वे बटाई पर खेती करती रहेंगी? और किसानी चल निकली तो बाजार के माल खपेंगे।
बस, फिर क्या था... सरकार और दुनिया के आका अचानक किसानों के प्रति अपनी मुलायम दृष्टि के साथ नमूदार हुए। कर्ज, बीज, खाद, फसल की आसान खरीद, बेहतर जीवन का स्वप्न, बीमा योजनाएं। और मझोले किसानों का युवा ब्रिगेड इस जाल में फंस गया। मध्यवर्ती और पिछड़ी जातियों के ये किसान सरकारी-गैर सरकारी फरमानों को सच मानकर बैंकों-महाजनों के नए चक्रवात में फंसते गए और जब सच्चाई का पता लगा तो बहुत देर हो चुकी थी।
देवाजी के साथ मैं पूरे तीन दिन रहा और ये बातें उसने मुझे टुकड़े-टुकड़े में, ठेठ गावरानी लहजे में बताई। मैं उसकी समझ पर चमत्कृत था। गांव में रहते हुए अपने अनुभवों के आधार पर चीजों को इतनी बारीकी से समझना आसान नहीं था। देवाजी सारी स्थितियों को जानता था और दूसरे किसानों की तरह स्वप्न देखता हुआ एक छोटा किसान था। फर्क केवल इतना कि मरने की जगह मारने की एक उद्धत आकांक्षा उसकी आक्रामकता की तह में सांस लेती रहती थी। उसका तेवर जब चढ़ा होता तो उसकी पत्नी और आठ वर्षीय बड़ा बेटा उससे कतराते थे। बच-बचकर रहते थे। ऐसे क्षणों में केवल लक्ष्मी ही उसके पास आ सकती थी।
हल्के भूरे बाल, गोल बड़ी आंखें, नाक में फुल्ली और फूले हुए गाल.. लक्ष्मी थी ही ऐसी कि अजनबी को भी उस पर प्यार आ जाए। जब 'बाबा-बाबाÓ कहती हुई वह देवाजी की गोद में चढ़ जाती तो उसका भाव बदल जाता। लगता ही नहीं कि यह वही देवाजी है, जिसकी आंखों में अभी-अभी जंगली बिल्ली की-सी हिंसक आकांक्षाएं तैर रही थीं।
देवाजी से मुलाकात की अंतिम रात... आंगन में हम खटिये पर लेटे थे। रात काफी खुली हुई थी, पूरे चांद की रात... लेकिन बिलकुल चुप-चुप। आवाज के नाम पर दूरदर्शन द्वारा प्रसारित कार्यक्रमों की आवाजें उस उजली रात में फैल गई थीं। एड्स, कंडोम, ग्राम-सुधार, पेयजल, सर्वशिक्षा अभियान, टेलीविजन, फ्रिज, कपड़ों-जूतों के नाम और इस्तेमाल की ढेरों उपयोगिताएं... सब मिलकर जैसे एक वस्तु में बदल गए थे और उन्हें खरीदने की विनम्र राजाज्ञाएं बार-बार प्रसारित की जा रही थीं। इन्हीं विज्ञापनों के बीच कोई धार्मिक सीरियल डी.डी. नेशनल से प्रसारित हो रहा था।
लक्ष्मी देवाजी के हाथ को तकिया बनाकर सो गई थी। और वह आसमान को घूरे जा रहा था।
'कांट्रेक्टर बाबू...Ó देवाजी परसों से मुझे यही कह रहा ता और मैंने भी कोई खास आपत्ति नहीं जताई, 'सच-सच बताओ, अपनी बही वगैरा देखकर, क्या तुमको लगता है कि हालात बरोबर हो ेजाएंगे? कर्ज की मियाद खतम होते-होते जिन्दगी खतम हो जाती है। अपने बच्चों को कर्ज की किश्त के अलावा हम कुछ  भी नहीं दे पाते। खेतों में फसल पकनी शुरू हुई कि पाटिल की दौड़-भाग भी शुरू हो जाती है। सरकार को भी शेती में अब कोई मुनाफा नहीं दिख रहा है। शहरी लोग फारम हाऊस के लिए जमीन खरीद रहे हैं। हम काश्तकार हैं लेकिन खेत-मजूरी की राह में ढकेले जा रहे हैं। सरकार अब विदेशों से धान्य मंगाने लगी है। बताओ, एक काश्तकार, काश्तकारी छोड़ के कैसे जिएगा?Ó
अंधेरे के जल में बुलबुलों की तरह देवाजी की आवाज उठती रही। उस निरभ्र आकाश में किसी के पास उसके सवालों का जवाब नहीं था। मैं सोचता रह गया कि दुनिया जिस तेजी से बदल रही है। उसके चक्के में किसानों की सांसें अटकी हैं। जरा-सा बदलाव का नाटक और... और यह पूरा मंजर श्मशान। मुझे देवाजी हताश नहीं लग रहा था। लग रहा था कि तूफान अपनी ताकत तौल रहा है!
आधी रात  बीत चुकी थी। अक्टूबर की हल्की ठंड पृथ्वी पर उतरने लगी थी। हम दोनों चुपचाप खुले आसमान के नीचे पड़े थे। इस बीच टी.वी. की सारी आवाजें बुझ चुकी थीं। केवल उठे  हुए बिजली के खंभे सूने में पीली रोशनी फेंकते हुए खड़े थे। उजली चांदनी में वह रोशनी भी मटमैली हो गई-सी लगती थी। उसकी घरवाली ने लक्ष्मी को अंदर ले जाकर सुला दिया था और हमसे बार-बार भीतर आ जाने का आग्रह कर रही थी, लेकिन नींद न उसकी आंखों में थी और न ही मेरी आंखों में। हमारी न•ारें आकाश में चहल-कदमी करते चांद पर टिकी थी।
आखिरकार मैंने उठते हुए कहा-
'सब ठीक हो जाएगा, देवाजी, चिन्ता मत करो। चलो, अब सोते हैं। सुबह मुझे लौटना है।Ó
देवाजी गहरी उदासी के साथ उठा और चुपचाप भीतर चला गया। मैं थोड़ी देर वहीं खड़ा रहा। इन तीन दिनों में पहली बार मैंने गौर से उसका घर देखा। खपरैल की छत और उस पर बेपरवाह फैली हुई लौकी, तोरई और सेम की बेलें। खुला हुआ बड़ा-सा आंगन, जिसके एक कोने पर कुआं और दूसरा कोना मवेशियों के लिए छप्पर से छाया हुआ। अंदर दो कमरे, रसोई घर अलग, जिसके एक कोने में विठोबा की तस्वीर रखी है और उसके सामने जलता हुआ एक दीया, जो अब बुझने-बुझने को है। कुल मिलाकर जीने के लिए काफी सामान मौजूद है। लेकिन संभाजी के घर में भी तो यही सब कुछ था, फिर उसने क्यों आत्महत्या कर ली? क्या मौत की ये भयानकताएं सपने देखने और टूटने के घर्षण से जन्म ले रही हैं। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। आखिरकार अपने भ्रम और प्रश्न को वहीं, उस खुले और उजले आंगन में ठिठुरने के लिए छोड़कर मैं भीतर आ गया। वह पूरी रात करवटों में गुजर गई। लग रहा था, पूरा गांव जहरीली गैस के चेम्बर में धीरे-धीरे दम तोड़ रहा है। रस्सी की खटिया में संगीन उग आए थे। उन्हीं संगीनों के ऊपर बिलबिलाते हुए मैंने भयंकर सपना देखा- सपने में एक भीड़ थी। सूटेड-बूटेड आला अफसरों की भीड़। उनके हाथों में कोल्डड्रिंक्स और पोटेटो चिप्स के पैकेट थे। भीड़ के बीचों-बीच एक गोलाकर घेरा था, जहां देवाजी जमीन पर पड़ा था। दो भयंकर सांड़ नथूना फुलाए, हुंकारते हुए आते और उसे सींगों से उठाकर आसमान की ओर उछाल देते। वह जितना ऊपर उछलता, लोग पागलों की तरह खुश होकर चिल्लाते। वे अपनी मुठ्ठियां हवा में उछालते और पेप्सी का एक घूंट गिटक लेते। देवाजी छटपटाता हुआ जमीन पर गिरता... यह उठना और गिरना लगातार चलता रहा... और अब देवाजी घिसटते हुए,  भागने की कोशिश कर रहा था... भीड़ ने उसे पकड़कर सीधा खड़ा कर दिया... फिर एक जहीन से दिखने वाले आदमी ने पुचकारते हुए अचानक उसके हलक में हाथ डाला और स्वर-तंत्रियों को खींचकर बाहर निकाल दिया... फिर लोग उसे जूते से कुचलने लगे... कुचलने लगे...।
'कांट्रेक्टर बाबू, उठना नहीं है क्या?Ó देवाजी मुझे कोंच रहा था।
मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा। आंखों के भीतर चल रही फिल्म की बिजली अचानक गुल हो गई थी। वहां एक जीता-जागता घर मुस्कुरा रहा था।
आज मुझे वापस लौटना था। मैं जल्दी-जल्दी तैयार हो गया। देवाजी गांव के बाहर बस-स्टॉप तक मुझे छोडऩे आया। मैंने सिगरेट सुलगाई तो उसने भी एक सिगरेट सुलगाई। फिर धुआं छोड़ते हुए बोला- 'कांट्रेक्टर बाबू, मेरी ओर से चिन्ता मत करो। मुझे अपने बीवी-बच्चों से बहुत प्यार है। कर्ज में मैं भी डूबा हुआ हुआ लेकिन बहुत सख्त जान हूं, बिल्कुल मांगुर मच्छी जैसा...Ó वह फिर हंसने लगा।
मैं उसे बस देखता रहा, देखता रहा। फिर बस आ गई। बस में चढऩे के बाद मैंने खिड़की से हाथ हिलाया, लेकिन देवाजी तब तक मुड़कर खेतों की ओर जा चुका था।
और इन आठ महीनों में, न जाने क्यों, देवाजी के घर देखा हुआ सपना, बराबर मेरी नींद में आता-जाता रहा। मेरी इच्छा और सुविधा का ख्याल किए बगैर, वह जब-तब मेरी नींद में धमक जाता और अपनी पूरी उपस्थिति के बाद अंतर्धान होता। मैं हड़बड़ाकर उठता... फिर वही बेचैनी, वही प्यास, वही छटपटाहट...।
सुबह से सुनीता तीन बार चाय के ठंडे कप ले जा चुकी थी। यह नई बात नहीं थी। मैं जब काम में डूबा होता, वह अक्सर ही ऐसा करती। लेकिन मैं काम में कहां डूबा था। मैं तो चिंता में डूबा हुआ था, स्मृतियों में डूबा हुआ था। सपना आज खुली आंखों में जाग रहा था। मैं खुद उस आदमी का चेहरा देखना चाहता था, जिसने देवाजी को पुचकारते हुए उसके हलक में हाथ डालकर स्वर-तंत्रियों को खींच लिया था। सपने का कैमरा जैसे ही उसके चेहरे की ओर बढ़ता, मेरी नींद उचट जाती, किसी थर्ड क्लास सस्पेंस फिल्म की तरह। लेकिन आज मैं खुली आंखों से सपना देख रहा था, सो नींद उचटने का सवाल ही नहीं था।  ...देवाजी का लहूलुहान उछलता हुआ शरीर बार-बार जमीन पर गिरता... फिर भागने की कोशिश कर रहे देवाजी को लोगों ने जकड़ लिया... फिर उस संभ्रांत से आदमी ने हमेशा की तरह स्वर-तंत्रियों को खींचकर बाहर कर दिया और लोग उसे जूते से कुचलने लगे... नहीं, अब मैं जूतों की ओर नहीं जाऊंगा... यहीं पर गड़बड़ी होती है... सपने का कैमरा जूतों पर फोकस होता है और वह संभ्रांत आदमी बड़ी सफाई के साथ गायब हो जाता  है... लेकिन इस बार मंै सावधान हूं और उस पर अपनी नजरें गड़ाए हुए हूं... कैमरा ऊपर हो रहा है... पूरी तरह उस संभ्रांत चेहरे पर स्थिर...।
और... और... क्या वह... सचमुच... मैं था...?
हां, वह... यकीनन... मैं ही था... मैं ही था!