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Tuesday 21 Nov 2017

जला दूध


उसने तो सिफऱ् पचास रूपये ही मांगे थे , वह भी अपने वृद्धा पेंशन के पैसे से। काम वाली बाई की बेटी के जन्मदिन पर चुपके से एक गिफ्ट देना चाहती थी। उसकी इस छोटी सी मांग पर तूफ़ान खड़ा हो गया। इस बात पर इतना बड़ा प्रलय मच जाएगा , उसने सोचा नहीं था। बेटे ने इतनी जली-कटी सुनाई कि मन-मिजाज़ तिक्त हो गया। बहू के सामने भीगी बिल्ली बना रहता है। मां को भेदने के लिए ज़हर बुझे बाण हमेशा तैयार रखता है । और बहू ?....उसे तो बस कोई बहाना मिलना चाहिए कांटें चुभाने का। उस दिन उसने इतने कांटें चुभोए कि उनका हृदय छलनी हो गया। अपमान और घोर प्रताडऩा का कडुआ घूंट पीकर भूखे पेट सारी रात बिस्तर पर करवटें बदलतीं रहीं। जि़न्दगी की शाम इतनी स्याह और भयावह होगा, वह भी अपने घर में, अपने लोगों के बीच, इसका उसे कतई अंदेशा नहीं था। क्या अंतिम सांस लेने तक ऐसी बदतर जि़न्दगी जीना पड़ेगा?
सुबह हुई। उसने एक कड़ा फैसला लिया और मौका देखकर दबे पांव घर से निकल पड़ी।
मां का लापता हो जाना बेटे के लिए कोई खास परेशानी का सबब नहीं था। हां, वृद्धा पेंशन की एकमुश्त रकम हाथ से निकल जाने का अफसोस उसे अवश्य साल रहा था। लोक लाज के मारे उसने इधर-उधर खोजबीन की, लेकिन विशेष तत्परता नहीं दिखाई । एक लंबा समय बीत गया मां को गायब हुए। इस दरम्यान घर के लोग भूल गए कि यहां एक वृद्ध मां भी रहती थी। उनकी वापसी का इंतज़ार किसी को नहीं था। उनके कमरे को स्टोर रूम बना दिया गया था। उस दिन पत्नी घर में नहीं थी। शाम उतरने से पहले चाय बनाने के लिए वह दूध गरम कर रहा था। उसी समय कॉलबेल बजी। दरवाजा खोला तो देखा, सामने पोस्टमैन खड़ा था। उसने उसे एक रजिस्टर्ड लिफ़ाफा सौंप गया। लिफ़ाफा शहर के संत विंसेंट वृद्धा आश्रम की सुपरियर की ओर से भेजा गया था। फ़ौरन उसने लिफाफा खोला। टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा पत्र पढऩा शुरू किया। लिखा था , 'बेटा, जिंदा हूं, लेकिन मौत के बहुत करीब हूं.....पत्र के साथ रकम निकासी स्लिप भेज रही हूं...लगभग ढाई साल की पेंशन की रकम है ....लाइव सर्टिफिकेट दे चुकी हूं...पत्र मिलते ही फ़ौरन बैंक चले जाना ......छोटू की ऊंची पढ़ाई में लगा देना। सदा खुश रहो । -तुम्हारी मां ।Ó अचानक किचन से जलने की बू उसके नथूनों में समाई । दौड़कर किचन गया। ओवन का नॉब ऑफ़ किया । तब तक सारा दूध जलकर ख़ाक हो गया था। कमरे में जलने की बू बुरी तरह समा गई थी ।