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Saturday 18 Nov 2017

सतपुड़ा बुलाए फिर आना, नर्मदा बुलाए फिर आना


सारंग उपाध्याय
साधना सेमी गवर्नमेंट हाई स्कूल , हरदा
मति का धीर : प्रेमशंकर रघुवंशी
कवि और गीतकार प्रेमशंकर रघुवंशी (8 जनवरी 1936- 21 फरवरी 2016) की स्मृतियों और उनकी कविताओं से बुना गया यह शोक-आलेख व्यक्ति और साहित्यकार के रूप में प्रेमशंकर रघुवंशी को प्रत्यक्ष करता है। आकार लेती यात्राएं, पहाड़ों के बीच, देखो सांप : तक्षक नाग, तुम पूरी पृथ्वी हो कविता, पकी फसल के बीच, नर्मदा की लहरों से, मांजती धुलती पतीली (सभी कविता-संग्रह), अंजुरी भर घाम, मुक्ति के शंख, सतपुड़ा के शिखरों से (गीत-संग्रह) आदि उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। नई पीढ़ी से उनका आत्मीय रिश्ता सारंग की इन स्मृतियों में बखूबी दजऱ् हुआ है।
सतपुड़ा बुलाए फिर आना, नर्मदा बुलाए फिर आना
21फरवरी सुबह तकरीबन 6.30 वॉट्सएप के एक मैसेज को देख दिल धक्क से रह गया। संदेश नवगीतकार, कवि और साहित्यकार प्रो. प्रेमशंकर रघुवंशी जी के निधन का था। उस अप्रत्याशित सूचना ने भीतर तक हिला दिया। पिछले 15 सालों का आत्मीयता, प्रेम और स्नेह का नाता रघुवंशी जी के साथ अचानक छूट गया। बहुत दिन नहीं हुए, जब उनसे अपने गृहनगर हरदा में रहते हुए लगातार मिलना हुआ। 8 जनवरी को ही उनका जन्मदिन मनाया था। वे पिछले 3 सालों से बीमार थे हालांकि बातचीत और चलना-फिरना हो रहा था। लेकिन मन में जीवन की उमंग देखते ही बनती और बीमारी के बावजूद अंतिम समय में भी रचनात्मक बने रहने की उनकी गजब की इच्छा थी।
मेरे गृहनगर हरदा में रघवुंशी जी इकलौते दोस्त रहे, बाकी कोई नहीं। हालांकि उसी शहर में स्कूलिंग हुई, कॉलेज के दो साल भी वहीं गुजरे, जान पहचान और भी यार दोस्त रहे, लेकिन इस इस बूढ़े आदमी से गजब का दिल लगा। वे जितने बूढ़े हो रहे थे, उतनी ही मेरे युवा होने के साथ-साथ दोस्ती परवान चढ़ती जा रही थी। हमने साथ-साथ तफरीह भी की, घूमे भी, बैठक भी जमाई और गाहे-बगाहे लंबी आवारगी भी की, जो ढलती शाम से लेकर देर रात तक खत्म होती रही। लेकिन जैसे-जैसे शहर छूटने की स्थितियां बनीं, उनसे दोस्ताना तो बढ़ता गया, लेकिन मिलना कम होता गया। हां उनकी नजर मेरे बदलते शहरों पर लगी रहीं, और इसी के साथ फोन पर बातें भी लंबी और ज्यादा होने लगी।
एक बात कहूं। यार 15 साल का समय बहुत होता है किसी व्यक्ति को जानने, समझने और पहचानने के लिए।
मेरी अपनी जिंदगी के 32 सालों में से 15 सालों का अधिकांश समय उन्हीं के साथ बीता।
फिर एक दिन एक सुबह एक संदेश आया कि वे अब नहीं रहे।
ऐसे संबंधों वाला दोस्त एक दिन आपको छोड़कर इस तरह चला जाए, तो कैसा लगता है, इसे साझा नहीं कर सकता, खासकर बेहद करीबी दोस्त का इस तरह बिना मिले, बताए हमेशा के लिए चले जाने पर। फिलहाल तो उनके अंतिम समय में पास नहीं होने के मलाल में हूं तो, लिखने की लय भी कहां बन पा रही है।
वे दैहिक रूप से मेरे साथ नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनात्मकता नर्मदा के जल की तरह निरंतर अब भी प्रवाहित हो रही है।
तो सर।।! (मैं उन्हें सर ही कहता था) नर्मदा आपकी मां है और सतपुड़ा कौन है!
वे बोले-
मुझको अब भी सपनों में सतपुड़ा बुलाता है।
सघन वनों, शिखरों से ऊंची टेर लगाता है।
कहता है जब तुम आते थे, उत्सव लगता था
तुम्हें देख गौरव से मेरा, भाल चमकता था
उसका मेरा पिता-पुत्र-सा, गहरा नाता है।
कभी नाम लेकर पुकारता, कभी इशारों से
कभी ढेर संदेश पठाता, मुखर कछारों से
मेरी पदचापें सुनने को, कान लगाता है।
तो सतपुड़ा उनके पिता जैसे थे। लेकिन आपको पता है, नर्मदा से उनका और मेरा संबंध कैसा रहा है?
ठहरिये मैं बताता हूं, दरअसल ये संबंध कुछ ऐसा जो उन्होंने मुझे बताया था, ठीक वैसे ही जैसा कि सतपुड़ा से बताया था।
बिन्नू गिलास-भर नर्मदा लाई
और दे गई जीवन मुझे
अब प्याला-भर चाय लाएगी
और महंगाई का राग अलापेगी।
जो मैंने उनका और नर्मदा का संबंध समझा वह कुछ ऐसा था।
नर्मदा यदि मध्यभारत के लोक की जीवन रेखा है, तो इसके किनारे रहने वाले नर्मदा के कवि प्रेमशंकर रघुवंशी के लिए यह सृजन का सौंदर्य रचती आस्था की नदी ही रही। उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा नर्मदा किनारे ही गुजरा। इस रूप में कि यदि उन्हें नर्मदा पर सर्वाधिक कविताएं लिखने वाला कवि कहा जाए तो गलत तो बिल्कुल भी न होगा। वैसे भी वरिष्ठ कवि, पत्रकार और लेखक विष्णु खरे ने उनकी एक किताब में उन्हें यही कहा है।
मेरा, रघुवंशी जी का और
नर्मदा का संबंध
मेरा अपना संबंध भी नर्मदा के कवि से नर्मदा की तरह ही रहा। नर्मदा उन्हें जीवन से भरा-पूरा रखती रही और वे मुझे सृजन से हरा-भरा। उनसे हर मुलाकात नर्मदा की हर धार की तरह नई होती रही और मैं नये प्रवाह के साथ जीवन में आगे बढ़ता रहा। एक ही शहर में बेहद नजदीक रहने का यही सुख मिला।
नर्मदा को देखते ही उनके भीतर का बच्चा वैसे ही दौड़ पड़ता है, जैसे मां से मिलने के लिए आतुर कोई छोटा बच्चा। अपने गृहनगर हरदा से लगे नेमावर में नर्मदा किनारे की दो साल पुरानी तस्वीरें इसी बात की साक्षी हैं और इनके बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प।
हुआ कुछ यूं कि एक दिन हमेशा की तरह मुंबई से मेरे आने पर मिलने के लिए बेसब्री से इंतजार में बैठे वे मेरे घर में आते ही बिना किसी भूमिका के झोला उठाकर नेमावर जाने के लिए जिद कर पड़े। यह उनके लिए जिद थी और मेरे लिए आदेश। साथ में रखा अपना नया कविता संग्रह नहीं रहने के बाद भी और कुछ नई कविताओं से भरी डायरी। कमाल था कि चलने को हुआ तो बोले- भैया बस से चलना है। मैं कुछ देर के लिए चौंक गया। अब मुंबई की धक्के खाती लोकल में यात्रा करना मेरी तो दिनचर्या है, लेकिन 78 साल के वरिष्ठ, वह भी बायपास और महज दो साल पहले आंतों की गंभीर समस्या से जूझकर लगभग मौत के मुंह से लौटे एक वृद्ध के लिए ऐसी यात्रा आसान नहीं। फिर उनकी उस भीड़ भरी बस में खड़े होकर एक घंटे की यात्रा करने की कल्पना ही चौंका देने वाली थी। मना किया। बार-बार मना किया। प्रताप टॉकिज के पास एक बस में चढ़े तो भीड़ ने गेट से ही बाहर कर दिया। मैंने कहा रहने दीजिए सर, कभी कार से चल देंगे। वे नहीं माने। लेकिन दूसरी बस आखिरकार पकड़ ही ली। जैसे-तैसे गेट के पास खड़े होने को मिला। कोई इधर से धक्का मारता तो कोई उधर से। मन कर रहा था कि रहने देते हैं, उतर जाते हैं, लेकिन वे बोले, हां हो जाएगी जगह, थोड़ी ही देर का तो रस्ता है।
नर्मदा ने नेमावर तक की बस में उनके लिए खड़े रहने की जगह बना दी। मेरे लिए भरी बस की यात्रा उनके उत्साह की नई बानगी थी। खड़े-खड़े एक घंटे तक बहुत कुछ बतियाते रहे, लगा ही नहीं कि मेरे दादा जी के उम्र के किसी व्यक्ति के साथ जा रहा हूं। जब हंडिया उतरे तो उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान देखते ही बनती थी।
बता दूं कि नर्मदा की छाती पर बने पुल का हरदा की ओर से आने वाला भाग हंडिया कहलाता है और उस पार का नेमावर। नेमावर देवास जिले में है और हंडिया हरदा जिले में। वे वहीं घाट पर लगी बेंच की ओर इशारा करते हुए ले गए और कुछ देर तक नर्मदा को निहारते रहे। फिर सतपुड़ा बुलाए वाला मेरा सबसे पसंदीदा गीत, पहले वही सुनाया।
लेकिन आगे आपसे बात जारी रखूं। एक बात कहूं। ऐसा बिल्कुल न समझना कि बेटे का मां से ज्यादा लगाव रहता है, तो वह पिता को भूल ही जाता है। यकीनन वे मां के पास ही थे, लेकिन पिता की कठिनाइयां और परेशानियां उन्हें लगातार महसूस होती रही। उनके पास कई खत थे पिता सतपुड़ा के भेजे हुए।
रुकिए पहले पिता का पुत्र को लिखा हुआ एक खत पढ़ते हैं।
अभी-अभी ख़त मिला
सतपुड़ा के शिखरों से
जिसके ऊपर मोहर लगी बरगद की
सागुन,साज,सतकटा, शीशम ने मिलकर
जिसमें अपनी करुण-कथा लिखवाई है
महुआ, तेंदू, खेर, अचार-आँवला हर्र-बहेड़ों ने
अब तक की अपनी सारी चोटें गिनवाई हैं
लाल-लाल फूलों के रस में
बर्र की मोटी क़लमों से
जो लिखा पलाश ने अपने हाथों
पढ़कर उसको बार-बार आँसू आते हैं
इस पिता की इन कठिनाइयों, परेशानियों और दुखों से ये बेटा अक्सर बेचैन ही रहा और विचलित होता रहा।
हां तो उस दिन हम नेमावर किनारे थे।
तो नेमावर पहुंचते ही उनके मुंह से एक गीत सुना, जो वैसे तो विदाई का है, लेकिन मंैने आगमन पर ही सुना। फिर उन्होंने बलड़ी, बड़केश्वर जो सरदार सरोवर बांध में डूब चुके गांव थे, उनकी सालों पुरानी बातों की पिटारी खोली और 40 साल आगे चल रहे युवा को 30 साल पुरानी नर्मदा की यादों में ले गए। जहां कंडे थे, बाटियां थी, पेड़ थे, दोपहर थी, शाम थी और उनकी सबसे बेहतरीन एक कविता नर्मदा की एक शाम थी। मैं काल के उस पार था और सांझ से श्रंृगार कर रही नर्मदा अपने बेटे, नर्मदा के कवि को सुन रही थी। उन्होंने कई कविताएं सुनाईं, नर्मदा सुनती रही और मैं भीतर रचता रहा।
वाकई इस एक दशक से भी ज्यादा पुराने साथी के साथ इंदौर, भोपाल, शाजापुर, होशंगाबाद जैसे शहरों की कई साहित्यक यात्राएं हुईं, लेकिन नेमावर की वह यात्रा आजीवन स्मृति में जगह बना गई। नर्मदा को देखते हुए उनका पुलकित होता बालमन देखते ही बन रहा था। हम साथ-साथ तकरीबन चार घंटे नर्मदा के किनारे घूमते, बतियाते और नर्मदा को निहारते रहे। इस दौरान उन्होंने ढेर सी बातें कीं और कुछ ग्रामीणों के साथ गप्प भी। नर्मदा किनारे, नर्मदा के कवि के साथ नर्मदा पर कविताएं सुनना!
अहा ! कैसा अप्रतिम सौंदर्य से भर देने वाला समय था वह।
तस्वीरें बहुत कुछ बयां करती हैं। मान लीजिए कि लिखने पर शब्द नर्मदा में बह जाते हैं इसलिए लिख नहींरहा, जो नहीं लिख रहा वह नर्मदा में मिल जाएगा। ठीक वैसे ही जैसे रघुवंशी जी ने जो कविताएं नर्मदा में बहाईं जब भी नर्मदा जाएं तो अंजुरी में उनकी कविताएं भर लाना और घर में छिड़क देना, घर कविताओं से महकेंगे। या फिर जब भी नर्मदा नहाने जाना, तो उनकी कविताएं जरूर पढऩा या नर्मदा में नहाकर कविताएं अंजुरी में घर ले आना। बाकी तो नर्मदा अपना काम करेगी और कविताएं अपना।
वैसे इस नोट्स को भी अधूरा समझें।
जानता हूं, लेख में लय नहीं है, कोई शैली नहीं है और मैं बातों को दोहरा रहा हूं, इसलिए माफी चाहूंगा, लेकिन एक अजीज दोस्त को इतनी औपचारिकता के साथ मैं कैसे याद कर सकता हूं। सपाट, सीधा और भाव विहीन। ना, ये तो हुआ ही नहीं कभी।
हां तो मैं कह रहा था। आप प्रेमशंकर रघुवंशी का जितना भी साहित्य है और उसमें भी जो काव्य संग्रह हैं, उनमें आपको कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अपनी मां नर्मदा बहती दिखाई देगी और दूसरे छोर पर आपको दिखाई देगा पिता सतपुड़ा।
दरअसल, नर्मदा उनके जीवन में कई-कई रूपकों और प्रतीकों के साथ आई है। कभी वह आस्था की नदी है, तो कभी वह कवि के भीतर बहने वाले अतीत की वह पुरातन नदी है, जहां उसका अंचल पैदा होकर, खेलता कूदता उसी के किनारे पर विलीन हो गया। अब इसे भाग्य कहें या कुछ और कि अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा नर्मदा के किनारे बिताने वाले कवि की अपनी मां नर्मदा के प्रति कृतज्ञता ही है कि उन्होंने नर्मदा पर सबसे ज्यादा कविताएं लिखीं।
वैसे प्रकृति के साथ एक आत्मीय संबंध बनाकर उसे जीवन पर्यंत अपने सृजन की हर यात्रा में साथ रखने वाले रघुवंशीजी की कविताएं प्रकृति के शोषण के खिलाफ भी उतनी ही अविराम गति से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती रहीं। देखो सांप तक्षक नाग तो अपने आप में एक पूरी लंबी कविता है, जिसे लिखने के लिए वे जाने कितने दिनों जंगलों में सपेरों के साथ घूमे और सांपों को प्रतीक बनाकर पूंजीवादी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया।
खास यह भी है कि उनके सभी कविता संग्रहों जिनमें शुरुआती संग्रहों आकार लेती यात्राएं, पहाड़ों के बीच, तुम पूरी पृथ्वी हो कविता, पकी फसल के बीच, नर्मदा की लहरों से, मांजती धुलती पतीली (सभी कविता-संग्रह), अंजुरी भर घाम, मुक्ति के शंख,सतपुड़ा के शिखरों से  (गीत-संग्रह) हैं में प्रकृति और पर्यावरण की चिंता को बखूबी उठाया गया है। पूंजीपतियों की जेब भरने में खाली होते जंगलों, निढाल होते सतपुडा, और कंगाल होते आदिवासी जनों की आवाज बनती इन कविताओं के स्वर हैं।
कितनी मैली कर दीं नदियां
नदियों को
नहलाए कौन?
कितनी कर दी हवा प्रदूषित
साफ़ इसे
करवाए कौन?
मेरे दोस्त का प्रकृति और पर्यावरण के प्रति एक विशेष लगाव रहा। वह उनके परिवार के सदस्य की तरह ही रहे। गांव और प्रकृति से यही उनका संबंध उनकी कविताओं में भी दिखाई दिया। उनकी कविताएं तो गांव के तो हर सुख- दुख, उत्सव, पर्व, त्यौहार और उसकी परंपराओं के बीच पलते मानवीय संबंधों के साथ रचती-बसती रही, जबकि जीवन की यायावरी में शामिल कस्बों की सादगी, आत्मीयता उन्हें अपने में पूरा करती रहीं। उनका मन लोकभाषा, लोकजीवन में रची-पगी कविताओं को रचने वाला एकदम बच्चा बन रहा। बल्कि अभी जनवरी में ही जब वे गंभीर रूप से बीमार हुए तो अक्सर जब बाहर बैठते तो पक्षियों, पौधों और पेड़ों को बेहद करीब से निहारा करते। उनकी कविताओं को पढ़कर इस देश से उसकी असली लोक गंध के साथ परिचित हुआ जा सकता है।
जिस बरगद की छांव तले रहता था मेरा गांव।
वह बरगद खुद घूम रहा अब नंगे नंगे पांव।।
रात-रात भर इस बरगद से किस्से सुनते थे
गली द्वार बाड़े के बिरवे जिनकी गुनते थे
बाखर बाखर कहीं नहीं थी कोई भी खाई
पशु-पक्षी मौसम जड़ चेतन थे भाई-भाई
किंतु अचानक उलटी-पलटी संबंधों की नाव।
इस बरगद का हाल देखकर अम्मा रोती है
भूख खेत में खलिहानों में अब भी सोती है
नहा रही कीचड़ पानी से घर की मर्यादा
चक्रवात चाहे जब उठते पहले से ज़्यादा
हुए बिवाई से घायल अब चंचलता के पाँव।
उनकी जिंदगी का पूरा समय गांवों, कस्बों, देहात अंचलों और लोक के बीच गुजरा। जहां एक ओर उनकी कविताओं में लोक की सुगंध रही, ग्रामीण जन जीवन के बीच प्रकृति के सान्निध्य से प्रवाहित होता प्रेम, अनुराग और लगाव पूरी गर्माहट के साथ बना रहा, वहीं दूसरी ओर इन्हीं के बीच उनके अपने जीवन के रंग भी बरकरार रहे, जिसमें परिवार, रिश्तेदार नातों और यहां तक गांव देहातों व दूर दराज के अंचलों में रहने वाले लोगों को भी वे याद करते रहे, उनकी अपनी चीजों के साथ।
फिर प्रकृति की हर आहट की उन्हें बेहद करीब से खबर रहती थी। कई दफे शाम को लंबी सैर ने इस बात को अक्सर साबित भी किया। इंदौर रोड पर सालों तक जब वे शाम को घूमने निकलते तो कई ऐसे पेड़ थे, पौधे थे, जिनका नाम तक उन्होंने रख दिया था, तो कइयों से वे बतियाते चलते। दूर आसमान में बादलों की छटाओं, बनते बिगड़ते आकारों को देखकर बहुत सी बातें वे अपने गांव, देहात, रिश्ते परिवार वालों और नातेदारों की भी करते।
 एक दिन बताया था उन्होंने कि माय डियर फ्रेंड मैं एक दिन गांव गया, तो गांव में प्रवेश करते ही पता है, क्या हुआ?
मैंने पूछा- कौतुहल के साथ पूछा क्या?
तो बोले-
गांव में दाखिल होने के पहले
बरगद को टेरा
तो वह
जटाजूट छिटकाये चौके तक चला आया
दूध भरा दोना लिए
सोडल बाबा से
आवाज़ें लगाईं खेतों को
तो वे फसलों सहित
खलिहानों तक महकते चले आए
शहर से लौटकर
जब भी आता
थूनी-थूनी रम्हा उठता मेरा गांव।
मैं मुस्कुरा दिया।
फिर याद आई जाने कितनी ऐसी अनगिनत कहानियां और किस्से, जो उन्होंने कई दफे, बातों में चर्चाओं में, बैठकों में आवारगी में, तफरीह में सुनाई थी।
एक बार उन्होंने उन्होंने अपने मां के संदूक की कहानी सुनाई थी, तो एक बार गोबरया की, तो वहीं एक दिन बाबा के लोटे की कहानी सुनाई थी।
बाबा की लोटे की कहानी कुछ-कुछ याद है, आप भी सुनिए।
ताख में रखा है बाबा का लोटा
और लोटे के पीछे बैठी
छिपकली जानती है-
बाबा के पानी पीने का ढंग
और झींगुर, टिड्डे, चींटियाँ भी
जब भी ताख में रखे लोटे पर
हथेली लगा ओखभर पानी पीते बाबा
छोटी, बड़ी बूँदें लोटे के भाल पर आ बैठतीं
जिनसे प्यास बुझाते
झींगुर, टिड्डे, चींटियाँ, छिपकली, साथ-साथ
ताख में रखा बाबा का तांबिया लोटा
घर के सामने से निकलते हर प्यासे को
तृप्त कर
दो घड़ी छाँव में बिठा
सुख-दुख के हाल-चाल पूछता
बांटता दिन रात पानी की दमक सबमें
ताख में रखा बाबा का लोटा
पानीदार खजाना है तृप्ति का!!
खैर, दोस्त के नहीं रहने पर, उसके साथ बिताए दिनों की जाने कितनी कितनी बातें आपको याद आती हैं। कई कविताएं, कहानियां और कई किस्से। वो होता है न क्या भूला जाए और क्या याद किया जाए।
लेकिन एक बात कहूं। उनके साथ मुझे रहते हुए समझ आया था कि ग्रामीण अंचल में रचे-बसे और प्रकृति से आत्मीय संबंध की डोर में बंधे प्रो. प्रेमशंकर रघुवंशी जी से मेरा जाने कितना पुराना रिश्ता था। एक ऐसा आत्मीय संबंध और स्नेह का रिश्ता जो बहुत ही कम लोगों से बना और पिछले 15 सालों से बाहर रहते हुए भी और प्रगाढ़ हुआ। हरदा में जब से लिखने-पढऩे की दुनिया को समझने के लिए आंख खोली, वे सहज रूप में सामने उपस्थित मिले। अनगढ़ कविताओं, कच्ची कहानियों और आधी-अधूरी समझ से भरे लेखों को उन्होंने ही मांझा, समझ दी और स्वाभाविक मौलिक रचनाशक्ति के हिसाब से उसे आकार देने के लिए भीतर एक सृजनशक्ति का विकास किया। मेरे भीतर का छोटा-मोटा कहानीकार और कवि उनकी ही बदौलत सांसे ले रहा है।
साल 2000 से लेकर 2004 तक का समय हरदा में उनके साथ ही बीता। उन्होंने साहित्य के प्रति रुझान को एक नई दिशा दी। समीक्षात्मक दृष्टि को पैदा किया। एक आधे-अधूरे गांव और पूरे कस्बे हरदा में उन्होंने ही लोक अंचल, ग्रामीण जीवन और सहज देशज सभ्यता के दर्शन कराए। लगातार बातचीत, कभी भी घर आ धमकने की स्वतंत्रता और शाम को घूमने के दौरान रात में तब्दील हुई सैकड़ों शामों ने भीतर बहुत कुछ घटा दिया। वे दिन अनमोल थे और उनसे बातचीत में गुजारा गया समय जीवन की स्मृतियों में अमिट है।
अब जब भी वे स्मृतियां हरी होती हैं, तो उनके प्रति आत्मा की कृतज्ञता से भर उठता हूं। महानगर के कोलाहल में उनके गीत और कविताएं आज भी बरबस हरदा की ओर खींचती हैं।
हां एक बात और जाते-जाते।।!
जाने कितनी यात्राएं इस मित्र के साथ हुई। जोगा भोपाल, शुजालपुर, इंदौर और वह अंतिम यात्रा नेमावर की, नर्मदा किनारे की। उस भीड़ भरी बस में एक युवा की तरह वह 75 साल का बूढ़ा दोस्त और पूरी शाम नर्मदा किनारे लंबी बातचीत और कुछ बेहतरीन कविताओं का पाठ। सब कुछ अविस्मरणीय है जिंदगी में।
मेरे दोस्त प्रेमशंकर तुम्हारा इस तरह जाना बहुत दु:ख दे रहा है। आंखे नम हैं और तुम्हारी स्मृतियों में डूबी हुई हैं। अब मैं रोज शाम किसके पास बैठूंगा, किससे बातें करुंगा, अपने दु:ख अपना सुख किससे साझा करुंगा।
अब तुम्हारे बिना हरदा सूना हो गया, खामोश हो गया और कविताएं मौन हो गईं।
मैं जानता हूं तुम इस बार लौटने के लिए नहीं गए हो क्योंकि समारोह हो चुका है इस जीवन का और तुम राम राम कह चुके हो।
सतपुड़ा और नर्मदा भी तुम्हें राम राम कह रहे हैं और मैं भी मेरे प्यारे दोस्त।
लेकिन तुम आना जरूर आना।।!
सतपुड़ा जब याद करे - फिर आना
आना जी नर्मदा बुलाए जब
धवल कौंच पंक्ति गीत गाएं जब
चट्टानें भीतर ही भीतर जब सीझ उठें
आना जब सुबह शाम झरनों पर रीझ उठे
छरहरी वन तुलसी गंधिल आमंत्रण दें
आना, जब झरबेरी लदालद निमंत्रण दें
महुआ की शाखें जब याद करें फिर आना
अलविदा प्रेमशंकर रघुवंशी...