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Sunday 19 Nov 2017

\'फंदा\' जीवन-वास्तव के बगैर

पल्लव
 393 डी.डी.ए., कनिष्क अपार्टमेंट्स
ब्लाक सी एंड डी,
शालीमार बाग़,
दिल्ली-110088
'फंदा' बसंत त्रिपाठी की कहानी है जो 'परिकथाÓ के जनवरी फरवरी 2009 अंक में प्रकाशित हुई थी। जाहिर है तब से अब तक विदर्भ के किसानों की कहानी आगे बढ़ चुकी है। कोई दो केंद्र सरकारें इस बीच बदल गईं। बसंत मूलत: कवि हैं और अभी-अभी उनका एक कहानी संग्रह भी भारतीय ज्ञानपीठ से आ चुका है। सवाल यह है कि मनरेगा और दूसरे लोक लुभावने नारों के बावजूद किसानों की हालत जस की तस क्यों है? यह किसी एक प्रदेश की, किसी एक दल विशेष की सरकार का मामला नहीं है बल्कि इसके पीछे गहरे सामाजिक कारण भी तलाशे जाने जरूरी हैं। भूमंडलीकरण के नब्बे के ताज़ा दौर के बाद देश में मध्य वर्ग में भारी बढ़ोतरी हुई है लेकिन अफ़सोस यह है कि अमीरी और गरीबी की चौड़ी खाई इस मध्य वर्ग के बढऩे से और चौड़ी ही हुई है। मध्य वर्ग के बढऩे से वह नहीं हुआ जिसके होने की आशा मनमोहन सिंह जी ने वित्त मंत्री रहते हुए की थी। क्या साहित्य इस जटिल आर्थिक परिघटना को समझ रहा है? इधर के सालों में काशी का अस्सी, ईंधन, दौड़ जैसे उपन्यास इस विषय पर आए। ऐसे में एक छोटी कहानी क्या कह सकी जो उसे पढऩा आवश्यक है? आइये देखें।
 यह कहानी देवाजी सरोदे नामक किसान की आत्महत्या से उपजती है और इस हत्या का कारण तलाश करते हुए कथाकार बसंत त्रपाठी ठेठ वर्धा जिले के समुद्रपुर गांव पहुंचते हैं। कहानी का वाचक अमित किसानों की आत्महत्या पर एक प्रोजेक्ट कर रहा है और जब वह देवाजी तक पहुँचता है तो उसका सामना किसी अहा ग्राम्य जीवन वाले किसान से नहीं होता। देवाजी भिड़ते ही पूछते हैं- 'क्यों साब, गाँव के भीतर कोई सुराग नहीं मिल रहा है क्या?Ó फिर यह जानकर कि वह 'रिसर्चÓ कर रहा है उनका सवाल सुनिए - 'अच्छा, तो तुम कांट्रेक्टर हो। तुम्हारी पगार मासिक नहीं, सालाना बनती है। क्यों साब... कितने में लिया है यह कांट्रेक्ट?Ó समस्याओं का एनजीओकरण कर पैसा बनाने की प्रवृत्ति पर देहात का आदमी ही खरे ढंग से बोल सकता है। आगे और देखिए - 'साब, गाँव के भीतर जाओ। वहां पुलिस तुमको आत्महत्या करने वालों के बारे में कुछ बताएगी। उनकी घरवालियों से पूछो, वे भी रोते-धोते कुछ बताएँगी। बाप तो दोनों में से एक ही का जिन्दा है, वह भी कर्ज की रकम की कुछ मालूमात देगा। मरने वालों के बच्चों और परिवार का जिकर कर देना..... हो गया तुम्हारा कांट्रेक्ट पूरा। फिर दूसरी आत्महत्याओं का इंतजार करना। वैसे आजकल तुम लोगों को बहुत दौड़भाग करनी पड़ रही है न। क्या करें साब, कभी-कभी तो तुम लोगों को दौड़ाने का मौका मिलता है, वरना जिंदगी भर तो हम ही दौड़ते रहते हैं।Ó यह आज का किसान है। साफ़ साफ़ पूछता हुआ और साफ़ साफ़ समझता हुआ। लेकिन फिर भी निरुपाय। यह निरुपायता कहाँ से आ रही है? क्या तमाम तकनीकों और सूचनाओं के बावजूद किसान को अपने असल दुश्मनों की पहचान है? और पहचान के बाद क्या किसान का अपने उन दुश्मनों से लडऩा सम्भव है?
कहानी इस लिहाज से बड़ी बात करती है। वह आगे तक जाती है। अमित के यह पूछने पर कि दलाल तो पहले भी थे, फिर आत्महत्याएं क्यों तो देवाजी का यह उत्तर हमारी व्यवस्था का सही विवरण है - 'बात तुम्हारी बरोबर है, साब। दलाल तो पहले भी थे। लेकिन उनके पास की ताकत से ज्यादा ताकत हमारे पास थी, जीने की ताकत। और चीजों पर उनकी पकड़ भी इतनी मजबूत नहीं थी। पहले हम उनसे कर्ज लेते थे और फसल अपनी उगाते थे। कर्ज हम अब भी उनसे ही लेते हैं, बैंकों में भी मुँह मार लिया करते हैं लेकिन फसल अपनी नहीं उगा पाते। अब तो हम उन बीजों को बोते हैं जो बाजार में सरकार भेजती है। हमारी फसल और हमारे बीज दोनों की बाजार में अब कोई कीमत नहीं रह गई है। ये कपास देख रहे हो न! सफेदी फलों से झाँकने लगी है। पहले इसे देखकर हमारे पुरखे नाचने लगते थे। बैल-बंडी दुरस्त करने लगते थे। लेकिन अब इन्हें देखकर हमको कोई उत्साह नहीं होता। क्या कीमत रह गई है इनकी बाजार में ? इस साल का कपास दीवाली तक सरकार की मंडियों में ठूँस दो तो होली तक पैसा मिलेगा, वह भी पहले से बहुत कम। सरकार के हाकिम कहते हैं, पैदावार बढ़ाओ। पैदावार बढ़ाते हैं तो कीमत कम कर देते हैं। आखिर हारा हुआ काश्तकार रोज-रोज मरने से एक बार मरने का रास्ता चुन लेता है। बोलो क्या गलत करता है?Ó आगे एक जगह वह वाचक से पूछता भी है - सच सच बताओ,अपनी बही वगैरा देखकर, क्या तुमको लगता है कि हालात बरोबर हो जाएंगे? कज़ऱ् की मियाद ख़त्म होते-होते जिंदगी खत्म हो जाती है। अपने बच्चों को कर्ज की किश्त के अलावा हम कुछ भी नहीं दे पाते। खेतों में फसल पकनी शुरू हुई कि पाटिल की दौड़-भाग भी शुरू हो जाती है। सरकार को भी शेती में अब कोई मुनाफ़ा नहीं दिख रहा है। शहरी लोग फारम हाउस के लिए जमीन खरीद रहे हैं। हम काश्तकार  खेत-मजूरी की राह में ढकेले जा रहे हैं। सरकार अब विदेशों से धान्य मंगाने लगी है बताओ, एक काश्तकार, काश्तकारी छोड़ के कैसे जिएगा? इस बात पर विचार करने का कोई तरीका है हमारे पास नहीं है कि गेहूं या धान की वास्तविक कीमत कितनी बढ़ी है? किसान को उसके श्रम का मूल्य मिल सके, यह कैसे सम्भव हो? अरहर की दाल दो सौ रुपये किलो पहुँच गई और तब भी अरहर उगाने वाला किसान आत्महत्या कर रहा है। यह कैसी उलटबांसी है जो सुलझ नहीं सकती ?
आकस्मिक नहीं है कि चीज़ों को देख समझ रहे इस होशियार किसान देवाजी को भी आत्महत्या का रास्ता चुनना पड़ा। देवाजी की आत्महत्या अमित को विचलित करती है क्योंकि देवाजी पढ़ा लिखा किसान था, अपने समय के यथार्थ को पहचानता और उससे जूझता हुआ किसान। यही नहीं अमित की महँगी सिगरेट छीन कर पी जाने में भी उसे कोई संकोच नहीं हुआ था। वह जानता था कि किसके पैसे से सिगरेट आ रही है। उसने कहा था - 'साब, मेरा नाम तुम दैनिक के कोने में नहीं, बीच में देखोगे। लिखा होगा कि देवाजी गणपतराव सरोदे ने काश्तकारों के जीवन-वास्तव को बदलकर रख दिया।Ó जीवन तो बदला किंतु देवाजी की पत्नी का, जो अब कर्ज ओढ़े बैठी विधवा है।
बसंत की यह कहानी समस्या का चित्र ही नहीं खींच देती अपितु इसके वास्तविक कारण तलाश करने की जिद करती है। असल दुश्मन की तलाश। बसंत की मानें तो असल दुश्मन और कोई नहीं खाता पीता वह वर्ग जो अपने समय की सच्चाई को चुभला रहा है और मजे मार रहा है। कहानी के प्रारंभ में अमित से स्टडी रूम का चित्र और बेडरूम में पत्नी की उघड़ी जाँघें दरअसल अपना औचित्य कहानी के अंत में साबित करती हैं। विश्व बैंक के प्रोजेक्ट से अमित खोज कर रहा है कि किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं। क्या यह अपने आप में एक क्रूर सच्चाई नहीं है कि ऊपरी लीपापोती में नयी व्यवस्था की घनघोर दिलचस्पी है। वह मानवाधिकार से लगाकर थर्ड जेंडर के लिए चिंतित है। लेकिन देवाजी के शब्दों में 'जीवन वास्तवÓ को बदलना कौन चाहता है? किसान आत्महत्या का तार अगर देवाजी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जोड़ रहे हैं तो वह गलत नहीं है। वे कह चुके हैं -'हमारे जानने और न जानने से क्या फर्क पड़ता है। फर्क तो इससे पड़ता है कि सरकार क्या मान रही है?Ó सरकार का मानना किसान के मानने से बहुत दूर हो गया है। बावजूद इसके कि भारत का मजबूत कृषि आधार और बचत के पुराने संस्कार ही थे जो पलट-पलट कर आ रहे मंदी वाले खतरों से भिड़ते हैं। हमारे देखते-देखते किसान को मुफ्त का बीज मिलना बंद हो गया। यह और भी बड़ी कलाकारी है कि अधिक अन्न उपजाने के सपने में संकर बीज आए जिनमें यह खासियत होती है कि बंपर फसल के बाद उन्हीं के बीजों को उगाने पर भी वे बढिय़ा पैदावार नहीं देते। तो इस तरह किसान का अपना बीज उत्पादन और बीजों को परिवर्धित करने का देशी ढंग ख़त्म हो गया। बीज खरीद, खाद खरीद, ट्रेक्टर, कीटनाशक, कटाई और फसल निकालने के लिए फिर मशीनों के उपयोग ने लागत में जितनी बढ़ोतरी की है क्या उसी अनुपात में किसान को रिटर्न मिल रहा है? यदि नहीं तो इसका गुनहगार कौन है? कौन है जो मध्य वर्ग की क्रय शक्ति लगातार बढ़ाता है ताकि टीवी, फ्रिज, गाड़ी, मकान, हवाई यात्रा इत्यादि इत्यादि के ग्राहक बढ़ें। लेकिन यह कैसा खेल है जिसमें किसान की कीमत पर मध्य वर्ग के खाते पीते लोग बढ़ रहे हैं। इन लोगों की भाषा और मुहावरे तक पालतू बनाने की तस्वीर कहानी में दिखाई दे रही है। बसंत किसी भी आडम्बर के बिना सहज अंदाज में पूरी कहानी कह देते हैं और कहानी का यह सहज अंदाज ही अंतत: उस निहितार्थ को समझने की दृष्टि देता है जब देश में कृषि व्यवस्था चौपट हो जाएगी और पेप्सी-कोका कोला की तरह 'जीवन वास्तवÓ के तमाम पदार्थ भी आयात करने की मजबूरी होगी। विचार इस बात पर भी करना होगा कि हमारी सरकारों को भर भर कर्ज देने वाला विश्व बैंक शिक्षा से लगाकर कृषि तक के तमाम अनुदानों को रोकता है लेकिन उनके देशों में तो अन्न उपजाने वाले को भर तनख्वाह से लगाकर तमाम सुविधाएं देने में इन आकाओं को कोई तकलीफ नहीं है। कहानी का ऐतिहासिक महत्त्व यह है कि किसानों की आत्महत्या पर हिंदी में यह पहली कहानी थी जो कारणों की तलाश करती हुई ठेठ विदर्भ तक जाती है और खाली हाथ नहीं लौटती।