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Wednesday 22 Nov 2017

आदरणीय सुरजन जी,अक्षर पर्व के फरवरी अंक में आपकी प्रस्तावना पढ़ कर यह प्रतिक्रिया लिखना आवश्यक समझा।

आदरणीय सुरजन जी
अक्षर पर्व के फरवरी अंक में आपकी प्रस्तावना पढ़ कर यह प्रतिक्रिया लिखना आवश्यक समझा।
 महेंद्र राजा जैन
वर्धा हिंदी शब्दकोश
सन्दर्भ :प्रस्तावना,अक्षर पर्व, फरवरी अंक
अक्षर पर्व के प्रत्येक अंक में ललित सुरजन जी की प्रस्तावना किसी न किसी ऐसे विषय पर होती है जिस पर किसी अन्य पत्रिका में शायद ही कभी कुछ पढऩे को मिलता है। मेरे इस कथन की पुष्टि इस बात से भी होती है कि फरवरी अंक में उन्होंने हिंदी शब्दकोशों पर विचार करते हुए विशेष रूप से वर्धा हिंदी शब्दकोश की ओर ध्यान दिलाया है। यह शब्दकोश छपे लगभग दो वर्ष हो रहे हैं, पर इस विषय पर, जहां तक मुझे पता है, अभी तक किसी भी साहित्यिक पत्रिका में कुछ भी नहीं लिखा गया है। ललित जी से मैं कभी मिला नहीं पर अक्षर पर्व और देशबन्धु के माध्यम से मैंने उन्हें जितना जैसा जाना है उसके आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि राजेंद्र यादव के समान वे बहुपठित (देशी-विदेशी साहित्य) और महत्वपूर्ण विषयों पर बहुत ही सुलझे हुए विचारों वाले व्यक्ति हैं, अत: वर्धा हिंदी शब्दकोश के सम्बन्ध में उनका लिखा यह वाक्य पढ़कर कुछ आश्चर्य हुआ कि एक विश्वविद्यालय ने जो एक बड़ा महत्वपूर्ण कार्य कुछ वर्ष पहले संपादित किया उसकी जैसी चर्चा और प्रशंसा होनी चाहिए थी वह आज तक नहीं हुई।
अभी लगभग एक वर्ष पूर्व तक ओम थानवी जनसत्ता के सम्पादक थे, उनके सम्पादन काल में रविवारी जनसत्ता के प्रत्येक अंक की हिंदी साहित्य जगत में बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा की जाती थी। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि उस समय कई शहरों में लोगों ने अपने हाकर से कह कर रविवारी जनसत्ता की अग्रिम बुकिंग करा रखी थी क्योंकि प्राय: हर शहर में उसकी सीमित प्रतियां ही आती थीं। इलाहाबाद में तो मैंने स्वयं दो बार कुछ अधिक मूल्य देकर उसकी प्रतियां खरीदीं।
वर्धा हिंदी शब्दकोश प्रकाशित होने के एक माह के अन्दर ही ओम थानवी ने ही उस पर जनसत्ता में लगभग आधे पृष्ठ का लंबा लेख लिखा। उसके बाद तो यह कोश इस प्रकार चर्चित-विवादित  हुआ कि लगभग आठ-दस माह तक उसके सम्बन्ध में कुछ-न-कुछ छपता रहा। यदि मैं गलत नहीं हूँ तो कहा जा सकता है कि हिंदी साहित्य के इतिहास में शायद ही कोई कोश या पुस्तक, इस प्रकार चर्चित-विवादित हुई। मुझे विश्वास है कि उस समय ललित जी यदि देश में रहे होंगे तो उन्होंने भी वर्धा हिंदी शब्दकोश के सम्बन्ध में लिखे गए वे लेख देखे-पढ़े होंगे, पर जान पड़ता है कि उन्हें इस कोश सम्बन्धी विवाद का स्मरण नहीं रहा, कमलकिशोर गोयनका, रीतारानी पालीवाल, राजकिशोर, रमेश दवे, महेंद्र राजा जैन, सुनीता सराफ, उर्मिला जैन, अवनिजेश अवस्थी, सुरेश सलिल, महावीर सरन जैन आदि ने अपने-अपने ढंग से इस कोश के सम्बन्ध में लिखा, जिसका निष्कर्ष कमलकिशोर गोयनका के शब्दों में कहा जा सकता है कि प्रकाशक द्वारा इस कोश को अविलम्ब वापिस लिया जाना चाहिए।
इस शब्दकोश के प्रधान सम्पादक रामप्रकाश सक्सेना ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के निवर्तमान कुलपति विभूतिनारायण राय को कोश का प्रेरणास्रोत बतलाया है, इस पर ओम थानवी  का कहना है कि जिस अनर्थ को यह कोश स्थापित करता है उसका कुछ श्रेय इसके प्रेरणास्रोत को भी दिया जाना चाहिए। अनर्थ इसलिए कि यह कोश बेहिसाब अंग्रेजी शब्दों को शामिल कर उन्हें बहुमूल्य मान्यता प्रदान करता है और वह भी केंद्र सरकार द्वारा स्थापित एक हिंदी विश्वविद्यालय की मान्यता यह कोश अधकचरी हिंदी यानी हिंगलिश को संक्रमण काल की भाषा बताते हुए भी लगभग स्वीकृति प्रदान कर देता है। प्रमाण हैं कोश में सम्मिलित अंग्रेजी के वे शब्द जिनके लिए हिंदी में सहज शब्द और अनेक समानार्थी पहले से उपलब्ध और प्रचलित हैं। तुर्रा यह कि कोश की पीठ पर बाकायदा ऐलान है कि अंग्रेजी शब्दों के संबंध में फैली अराजकता से वर्धा हिंदी शब्दकोश प्राय: मुक्त है। इस पर ओम थानवी ने ठीक ही पूछा है-मुक्त है या युक्त है।
इस कोश के प्रेरणास्रोत विभूति नारायण राय और सम्पादक रामप्रकाश सक्सेना के अनुसार वर्धा हिंदी शब्दकोश की बुनियादी अवधारणा के पीछे यही सोच काम कर रही है कि हमारे समय की समावेशी हिंदी के अधिकतम प्रचलित शब्द इस कोश में स्थान पा सकेें। पर क्या यह सच है? हाथ कंगन को आरसी क्या ! ओम थानवी के अनुसार इस शब्दकोश में नई प्रविष्टियों के कुछ विचित्र नमूने देखिए: अंडरस्टैंडिंग, अटैच्ड, अपीलिंग, अरेस्ट, अर्बन, असेसर, आइसबर्ग, इंजील, इनसालवेंट, इंटरप्रेटर, इंटलेक्चुअल, इंट्रोडक्शन, इंडिकेशन, इंडेफ्थ, डबलटन, हेल्थ, हेमीस्फियर, हीलियम, हारवेस्टर, स्पैनर, स्पेड, स्प्रेयर, स्कै्रप, स्किपर, क्रॉइल, कॉड, लिबरेशन, लिबिडो, लाइवल, रुटीन, रिव्यू, रिलीफ, रिफॉर्म, रिफार्मर, रिफार्मेटरी, मैन, मैटर्न, बैकयार्ड, बैटलशिप, फीलिंग, फील्डवर्क, फीवर, फिक्शन, प्रोटेक्शन, ड्रामेटाइजेशन, ड्रीमगर्ल, ड्रेन, ड्रिंक, डेमोक्रेसी, डेफिनिशन, डिस्क्रिप्शन, डिजॉल्व, डि रेगुलेशन, ट्रीटमेंट, क्रॉनिक, क्लासिफिकेशन, क्लाइमेट, कामर्सियालाइजेशन, कैजुअल्टीए हॉट आदि। कोई बताए कि क्या ये हिंदी के शब्द हैं? या यही कि ये शब्द किसी हिंदी शब्दकोश में किस किस आधार पर शामिल किये जाने चाहिए।
सुरजन जी के अनुसार वर्धा हिंदी शब्दकोश की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें अंग्रेजी के वर्तमान में प्रचलित अनेकानेक शब्दों का समावेश किया गया  है और इस कारण यह ऐसा ग्रंथ है जिसकी प्रति हर हिन्दीभाषी और हिन्दीप्रेमी के घर में होना चाहिए। क्या वे मानते हैं कि अंग्रेजी के उपरोक्त शब्द अब हिंदी में सहजता से आ गए हैं और उन्हें इस या किसी भी हिंदी कोश में शामिल करना ही चाहिए या क्या वे इन शब्दों का प्रयोग अपने प्रकाशनों में करते हैं या करेंगे, क्योंकि हिंदी का सामान्य पाठक इन शब्दों का अर्थ जानता या समझता है और अंग्रेजी के इन शब्दों के लिए हिंदी में कोई शब्द नहीं हैं !   
इसी प्रकार ओम थानवी ने भी ठीक ही पूछा है कि प्रचलित श्रेष्ठ विकल्पों के बीच क्या वाटर या स्पेलिंग को इसलिए हिंदी शब्द का दर्जा दे दिया जाना चाहिए, क्योंकि बोलचाल में कुछ लोग पानी या वर्तनी की जगह इन शब्दों को बोलते हैं? बोलचाल में लोग पत्नी या बीवी को भले वाइफ कहते हों, वाइफ  शब्द को अंग्रेजी शब्दकोश से आयात करने से पहले क्या सोचना नहीं चाहिए? स्पष्ट ही नए हिंदी प्रयोगों की जगह वर्धा कोश का ध्यान इंग्लिश प्रयोगों पर अधिक गया है। बुल्के जैसे विद्वान कोशकार इंग्लिश के लिए हिंदी में अंग्रेजी शब्द चला कर गए हैं, पर वर्धा हिंदी कोश में हमें सर्वत्र इंग्लिश शब्द का ही प्रयोग मिलता है!
रीतारानी पालीवाल ने भी ठीक ही कहा है कि अंग्रेजी शब्दों के संबंध में हिंदी शब्दकोशों में फैली, अराजकता से वर्धा हिंदी शब्दकोश प्राय: मुक्त है, जैसे दावे किए जा सकते हैं, लेकिन ऐसे कथनों को गर्वोक्ति के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता। अवनिजेश अवस्थी के अनुसार जिन अंग्रेजी शब्दों को इस कोश में समावेशी हिंदी के नाम पर सम्मिलित किया गया है, वह गैर जरूरी ही नहीं, अवैज्ञानिक भी हैं। कोश निर्माण का अपना एक विज्ञान है, उसको तैयार करने की निश्चित प्रविधि है। कोश निर्माण के समय किसी भी अन्य ग्रंथ की अपेक्षा अतिरिक्त सावधानी रखने की अनिवार्यता इसलिए भी है कि कोश का प्रयोग केवल अर्थ जानने के लिए नहीं होता, सही वर्तनी के लिए भी वह मानक होता है। यह सच है कि समय के साथ-साथ आवश्यकतानुरूप हर भाषा में दूसरी भाषा से कुछ शब्द जुड़ते ही रहते हैं। यह स्वाभाविक भी है और (भाषा) वैज्ञानिक सत्य भी, पर ऐसे शब्दों का आगमन तभी स्वाभाविक होता है, जब किन्हीं कारणों से उस भाषा में उस शब्द के लिए कोई शब्द न हो।
इस कोश के प्रधान संपादक ने अपनी भूमिका में लिखा है-अभी तक हिंदी में जितने भी शब्दकोश हैं, वे वर्णक्रम में नहीं हैं। इसका क्या अर्थ है या हो सकता है? अगर वर्धा हिंदी शब्दकोश के पहले के सभी शब्दकोश वर्णक्रम में नहीं हैं, तो फिर किस क्रम में हैं? क्या रामचंद्र वर्मा, बदरीनाथ कपूर, हरदेव बाहरी आदि नौसिखियों ने अपने शब्दकोशों में जो क्रम रखा, वह गलत है? संपादक महोदय ने भूमिका में ही यह भी लिखा है- मेरी व्यक्तिगत इच्छा तो यह थी कि पूरा कोश वैज्ञानिक ढंग से बनाया जाए और वर्णक्रम में हो। क्या इससे यह समझा जाए कि यह कोश भी न तो वैज्ञानिक ढंग से बना और न वर्णक्रम में है? फिर किस क्रम में है?
इसी प्रकार प्रधान संपादक महोदय का यह भी कहना है कि हिंदी समाज बहुत कम हिंदी शब्दकोशों का प्रयोग करता है। यह उन्होंने कैसे और कहां से प्राप्त सूचना के आधार पर लिखा? क्या उन्होंने खुद कोई सर्वे किया है? अगर उनका ऐसा कहना सच है तो क्या कारण है कि अब  तक राजपाल हिंदी शब्दकोश (हरदेव बाहरी) के बाईस, लोकभारती वृहत प्रामाणिक हिंदी कोश (रामचंद्र वर्मा, बदरीनाथ कपूर) के चौदह और ज्ञान शब्दकोश (ज्ञानमंडल) के छह संस्करण छप चुके हैं। वृहत हिंदी कोश के सात संस्करण और सातवें संस्करण के कोई दस पुनर्मुद्रण हो चुके हैं। ग्यारह खंडों का हिंदी शब्दसागर संशोधित-परिवर्धित हुआ और उस संस्करण की भी तीन आवृत्तियां हो चुकी हैं। पांच खंडों वाले मानक हिंदी कोश (हिंदी साहित्य सम्मलेन) के भी अब तक तीन संस्करण छप चुके हैं।
प्रूफ की अशुद्धियां तो मानो हिंदी प्रकाशनों की नियति ही बन गई है। वर्धा हिंदी शब्दकोश भी इसका अपवाद नहीं है, पर इसमें तो सभी सीमाएं पार कर दी गई जान पड़ती हैं। इस कोश में आपको इंग्लिश और हिंदी महीनों के नाम तो जानने को मिलेंगे ही, यह भी जानने को मिलेगा कि साल में कितने महीने होते हैं। आप कहेंगे कि यह तो एक स्कूली बच्चा और गांव-देहात का आदमी भी जानता है, इसलिए इस कोश में अलग से यह जानकारी देने की क्या आवश्यकता थी? जी नहीं, यह जानकारी देना आवश्यक था, क्योंकि कोशकार मानते हैं कि इस विषय में केवल हम-आप नहीं, दुनिया भर के सभी लोग अज्ञानी हैं और जब हम-आप खुद नहीं जानते, तो फिर बेचारे बच्चे क्या जानेंगे। विश्वास न हो तो देखिए इस कोश में दिए गए इंग्लिश महीनों के नाम- मन डे, वेंज डे, थर्ज डे आदि। इसी प्रकार हिंदी महीनों के नाम हैं-सोमवार, मंगलवार, बुधवार आदि, यानी साल भर में केवल सात महीने! अंग्रेजी नाम जिस रूप में लिखे गए हैं वह इस कोश के निर्माताओं का अपना अलग आविष्कार माना जाना चाहिएए क्योंकि किसी भी अंग्रेजी या हिंदी कोश में ये नाम इस प्रकार-मन डे, वेंज डे, थर्ज डे आदि, लिखे हुए नहीं मिलेंगे। यहां प्रश्न यह भी है कि सही रूप क्या है- मंडे, या मन डे ; क्योंकि प्रधान संपादक की भूमिका में मंडे लिखा है और परिशिष्ट में मन डे। अगर परिशिष्ट में देशों और उनकी राजधानियों के नाम, विराम चिह्न, नाप तौल और प्रूफ रीडिंग के संकेत चिह्न आदि भी दे दिए जाते तो कोश की उपयोगिता अवश्य बढ़ती। कोश का उपयोग करने वालों के लिए ये सूचनाएं निश्चित ही उपयोगी होतीं।
कोश में एक परिशिष्ट हिंदी में प्रचलित इंग्लिश शब्दों या पदबंधों के संक्षिप्त रूप का भी है और इसमें राजद, राकांपा और बसपा को तो शामिल किया गया है, पर शायद भाजपा को अछूत मान कर छोड़ दिया गया है। फिर भी बात केवल इतनी नहीं है। क्या ये नाम वास्तव में इंग्लिश शब्दों या पदबंधों के संक्षिप्त रूप हैं। कदापि नहीं, क्योंकि राष्ट्रीय जनता दल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, बहुजन समाज पार्टी का तो इंग्लिश से कोई संबंध नहीं जान पड़ता है। इसी प्रकार यहां 'आपÓ को भी शामिल किया गया है, जो 'आम आदमी पार्टीÓ का संक्षिप्त रूप है।
इससे भी अधिक रोचक बात यह है कि इस सूची में बहुप्रचलित 'यूनेस्कोÓ नहीं है। यूएनइएससीओ जरूर है, जो आज तक कहीं सुनने-पढऩे में नहीं आया। यूके और यूएनओ भी नहीं हैं। इसी प्रकार क्या आपने कहीं नाटो (यूरोपीय देशों के सैन्य संगठन) के लिए एनएटीओ सुना या लिखा देखा है? शायद नहीं। अगर नाटो के लिए एनएटीओ देना ही था, तो फिर सीटो क्यों नहीं है? क्या इसलिए कि यह एशिया के 'तथाकथितÓ पिछड़े देशों का संगठन है? इसी प्रकार एलएलबी तो है पर एमए, बीए, पीएचडी और डीलिट नहीं हैं। यूरोपीय राजनीति की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इयू (यूरोपियन यूनियन) और यूएसए भी नहीं हैं। काल की गणना वाला 'बी सीÓ तो है, पर 'ए डीÓ नहीं है।
इसी प्रकार और भी नाम हैं जो नहीं हैं, पर होने चाहिए थे। इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वाइडब्ल्यूसीए (यंग वीमेन्स क्रिश्चियन एसोसिएशन) नहीं है, पर वाईएमसीए है। कहीं-कहीं पदबंधों के सभी नाम नहीं दिए गए हैं, जैसे 'एमपीÓ का अर्थ केवल मेंबर आफ पार्लियामेंट यानी सांसद बताया गया है, जबकि 'एमपीÓ का अर्थ 'मध्यप्रदेशÓ भी होता है। सीआइडी, सीबीआइ, एफबीआइ तो हैं पर पाकिस्तान की आइएसआइ और रूस की केजीबी नहीं है। इडी और एलआइयू भी नहीं हैं। और सब खेलों के नाम तो हैं, पर 'हॉकीÓ नहीं है (शायद इसलिए कि पिछले कई वर्षों से भारत ओलंपिक में पिछड़ता रहा है)।
इस परिशिष्ट में कुछ नाम होने या न होने की बात अगर छोड़ दें, तो भी यह परिशिष्ट बहुत भ्रष्ट और असुविधाजनक है, क्योंकि यहां जो नाम दिए गए हैं, वे न तो देवनागरी लिपि के क्रम में हैं, न ही रोमन लिपि के क्रम में। इन दोनों का ही घालमेल है। इससे यह पता लगाने में मुश्किल होती है कि कौन-सा शब्द कहां है।
'टायलेटÓ अंगरेजी का शब्द है और कोश में इसका अर्थ केवल 'शौचालयÓ बतलाया गया है, जबकि इस शब्द का प्रयोग प्रसाधन विधि, प्रसाधन सामग्री और प्रसाधन घर के लिए भी होता है। (देखें अन्य हिंदी शब्दकोश)। इस कोश में टेंट तो है, पर 'टेन्टÓ नहीं है। कोश में 'टेंटÓ का अर्थ बतलाया गया है 'धोती की कमर में पडऩे वाली लपेटÓ। इससे पता चलता है कि 'धोती की भी कमर होती हैÓ।
इस शब्दकोश के एक प्रधान संपादक हैं, एक सहायक संपादक और पांच संपादक मंडल के सदस्य हैं। संपादन में इसके अलावा छियासठ लोगों का विशेष सहयोग भी मिला है, यानी कुल मिला कर तिहत्तर विद्वानों ने यह कोश तैयार किया है। कोश में या कहीं भी इनमें से किसी के भी संबंध में कुछ नहीं बताया गया है कि वे कौन हैं, कहां रहते हैं या उनकी क्या योग्यताएं हैं। फिर भी इतना तो अनुमान लगाया ही जा सकता है कि सभी वर्धा, दिल्ली या किसी एक जगह नहीं रहते और यह भी माना जा सकता है कि कुलपति महोदय ने यहां काफी सोच-समझ कर देश भर के इन चुने हुए विद्वानों को इस परियोजना से जोड़ा होगा। यह भी माना जा सकता है कि प्रधान संपादक के निर्देशानुसार संपादक मंडल के सदस्यों ने अपना-अपना दायित्व निभाया होगा। पर किस प्रकार?
देश के अलग-अलग भागों में रहने वाले सभी सदस्यों में किस प्रकार सामंजस्य रहा होगा। यह सभी के लिए उत्सुकता का विषय है। पत्र-पत्रिकाओं में प्राय: अलग-अलग शहरों में रहने वाले संपादक मंडल के सदस्यों के नाम दिए रहते हैं। एक साहित्यिक मासिक पत्रिका के सम्पादक मंडल के एक सदस्य उज्जैन में रहते हैं, एक भोपाल में और एक गुना में। क्या ये सब लोग साप्ताहिक या मासिक मीटिंग में किसी एक जगह एकत्र होकर सलाह-मशविरा कर किसी पुस्तक या पत्रिका में दी जाने वाली रचनाओं के संपादन के संबंध में बात करते हैं या उसमें छपने वाली सामग्री को अंतिम रूप देते हैं? इसी प्रकार इस कोश की तैयारी के समय और कोश के प्रकाशन के पूर्व क्या संपादक और सभी संपादकीय सलाहकार कभी एक साथ मिले होंगे? अगर हां, तो क्या सभी ने एकमत या बहुमत से कोश के अंतिम रूप पर सहमति दी होगी? ये और इसी प्रकार के कुछ और प्रश्न हैं, जो सभी हिंदी प्रेमियों के मन में उठ रहे होंगे, पर जिनका उत्तर शायद कभी नहीं मिलेगा। फिर भी इस बात का उत्तर तो संपादक या उसके सहयोगियों को देना ही चाहिए कि इतने विद्वानों के होते हुए कोश में उपरोक्त प्रकार की गलतियां कैसे रह गर्इं? क्या किसी का भी ध्यान इन बातों की ओर नहीं गया? इसका उत्तर भी जाने-अनजाने सक्सेना साहब ने यह घोषित कर दे ही दिया है कि इस कोश निर्माण के पूरे कार्यकाल में संपादक मंडल की यानी तिहत्तर में से केवल पांच लोगों की (और इन पांच में भी प्रधान संपादक और सहायक संपादक नहीं थे। इन दोनों का नाम संपादक मंडल में नहीं है) केवल एक मीटिंग हुई। पूछा जा सकता है कि कुलपति महोदय ने देश के प्रतिष्ठित भाषाविदों, शब्द-विज्ञानियों और उपलब्ध शब्दकोशकारों की उपेक्षा करके ऐसे व्यक्तियों को क्यों चुना, जिनका शब्दकोश के निर्माण से दूर-दूर तक भी कोई संबंध नहीं था, जैसे निर्मला जैन ने अपने शोध-विषयों के साथ आधुनिक हिंदी काव्य, आलोचना, पाश्चात्य काव्यशास्त्र पर भी काम किया है, पर उनके पास कोशनिर्माण और शब्द-विज्ञान का कोई अनुभव नहीं था।  ऐसे अनुभवहीन व्यक्तियों को शब्दकोश के संपादक-मंडल में क्यों रखा गया? क्या इसलिए कि ये प्रोफेसर रहे हैं और प्रोफेसर सर्वज्ञ होता है, या मित्र-मंडल के सदस्य होने के कारण! जो हो, इस बात में कोई संदेह नहीं कि इस एकखंडीय कोश के संपादन के लिए तिहत्तर संपादकों की टीम रख कर तत्कालीन कुलपति विभूतिनारायण राय ने निश्चय ही दुनिया भर में एक रिकार्ड कायम किया है। आज तक किसी भी बड़े से बड़े कोश के संपादन के लिए (इसमें आक्सफोर्ड और कैंब्रिज के विश्वप्रसिद्ध कोश भी हैं) संपादकों की ऐसी लंबी कतार नहीं रखी गई। इसलिए इस बात के लिए गिनीज़ वल्र्ड रिकाड्र्स के साथ ही लिम्का बुक आफ  रिकाड्र्स में भी राय साहब का नाम शामिल किए जाने की मांग हम सबको करनी चाहिए।
कमल किशोर गोयनका ने वर्तमान कुलपति महोदय को सलाह दी है कि वे यह कोश वापस लें। बात तो ठीक है, पर क्या आज तक किसी हिंदी या भारतीय प्रकाशक या लेखक ने अपनी किसी पुस्तक की खामियां जानने के बाद वह पुस्तक वापस ली? अवनिजेश अवस्थी ने शायद इतनी जल्दी (डेढ़-दो वर्ष की अवधि में) यह कोश तैयार कर लिए जाने पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखा है कि श्यामबहादुर वर्मा का वृहत हिंदी कोश तो उनकी बीस वर्षों की साधना का फल है। जान पड़ता है कि अवस्थी जी को अपने स्कूली जीवन में पढ़ा गणित का सरल सा सिद्धांत याद नहीं रहा कि अगर एक व्यक्ति कोई काम बीस वर्ष में करता है, तो वही काम तिहत्तर व्यक्ति कितने समय में कर डालेंगे?
उर्मिला जैन इस कोश के सम्पादक सक्सेना जी की राय से सहमत हैं कि वर्धा हिंदी शब्दकोश पिछले सभी कोशों से भिन्न और विशिष्ट है, पर इसके लिए उनके अपने कारण हैं। सक्सेना साहब ने अपने को अज्ञेयजी के पदचिह्नों पर चलते हुए बताया है कि अज्ञेयजी मूल भाषा के शब्दों को हिंदी में लिखते समय उसी रूप में लिखना पसंद करते थे। अत: क्या सक्सेना साहब बताएंगे कि इस कोश में प्रयुक्त लालटेन शब्द किस भाषा का है और इंग्लिश शब्द लैंटर्न का हिंदी में सही उच्चारण क्या है? वे यह भी बताएं कि स्वयं उनके द्वारा उद्धृत इंग्लिश शब्द (मंडे) वे हिंदी में किस प्रकार लिखेंगे-मंडे, मनडे, मन्डे या इन तीनों रूपों में? और ये तीनों या इनमें से उनके द्वारा स्वीकृत कौन-सा रूप किस वर्णक्रम के अनुसार इस कोश में कहां मिलेगा? उर्मिला जी को तो इनमें से कोई भी रूप इस कोश में किसी भी क्रम में नहीं मिला, जबकि कोशकार के अनुसार यह शब्द अब हिंदी में सामान्यतया प्रयुक्त इंग्लिश शब्द है। याद आया कि उन्होंने यह शब्द लिखे जाने का एक अन्य रूप भी बताया है और वह है मन डे जो मूल कोश में नहीं है, पर परिशिष्ट में पृष्ठ 1255 पर दिया गया है। कोई सम्पादक अपने हिंदी शब्दकोश के लिए शब्दों का चयन किसी वैज्ञानिक पद्धति के बजाय रामदेव, आसाराम जैसों के प्रवचनों और टीवी चैनलों की भाषा से करे, इससे अधिक हास्यास्पद बात और क्या हो सकती है! शायद इन्हीं अर्थों में यह कोश विशिष्ट है।
इस संदर्भ में सम्पादक द्वारा बताई गई इस कोश की अच्छाइयों का स्मरण हो आना स्वाभाविक है। उन्होंने लिखा है, एक अच्छे कोश में मानक वर्तनी का प्रयोग और वर्तनी की एकरूपता अनिवार्य शर्त है। वर्धा कोश ने ही यह शर्त निभाई है। सभी कोशकार विद्वान होते हैं। पर हमारे यहां लगभग सभी कोशकार वर्तनी की एकरूपता का पालन नहीं करते। इस सन्दर्भ में हम फिर कोशकार द्वारा उद्धृत इंग्लिश शब्द मंडे की ओर लौटें। पहले उन्होंने इस शब्द की जो चार वर्तनी बताई हैं, उनमें से कौन सी वर्तनी मानक है? क्या कोशकार के जनसत्ता में छपे लेख में प्रयुक्त मंडे को मानक माना जाए? अगर हां, तब तो उनका दावा वर्धा कोश ने वर्तनी की एकरूपता की शर्त निभाई है, थोथा साबित होता है, क्योंकि इस कोश की भूमिका में तो मंडे लिखा गया है, पर परिशिष्ट में मन डे, यानी उनके कथन के अनुसार सभी कोशकार विद्वान होते हैं, पर हमारे यहां लगभग सभी कोशकार वर्तनी की एकरूपता का पालन नहीं करते।
ओम थानवी के लेख पर कोश के प्रधान सम्पादक रामप्रकाश सक्सेना ने अपनी प्रतिक्रया में कहा है कि जिस मिशन की भावना से मैं प्रधान संपादक की हैसियत से वहां गया था, वह पूरी तरह सफल नहीं हो पाया, क्योंकि वहां राय एंड निर्मला जैन प्राइवेट कंपनी की तरह विश्वविद्यालय चलता था। शर्त तो यह थी कि कोश में केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा निर्धारित मानक वर्तनी का प्रयोग किया जाएगा, बाद में राय साहब इस निर्णय से मुकर गए। इस कारण मैंने इस्तीफा दे दिया था। फिर भी मैंने काफी मेहनत की व कोशिश की। मैं मूलत: भाषाविज्ञ हूं तथा मेरा सरोकार हिंदी से है। यदि ऐसी ही बात है तो फिर कोशकार कौन है? फिर भी इस बात का उत्तर तो प्रधान संपादक को देना ही चाहिए कि जब आपने इस्तीफा दे दिया था और वह स्वीकृत भी हो चुका था, तो आपने प्रधान संपादक के रूप में अपना नाम क्यों जाने दिया? क्या इससे यह भी स्पष्ट नहीं है कि कुलपति महोदय अपने किए-धरे का सारा ठीकरा प्रधान संपादक के सिर फोडऩा चाहते थे? उचित तो यह होता कि प्रधान संपादक के रूप में कुलपति महोदय का ही नाम जाता।
संजीव चन्दन के अनुसार विभूतिनारायण राय ने हिंदी विश्वविद्यालय की सारी योजनाएं कुछ लोगों को कृतार्थ करने के लिए बनाई थीं। उनमें से एक योजना यह कोष निर्माण की, भी थी।
सुनीता सराफ ने ठीक ही लिखा है कि अंग्रेजी भाषा सीखने के इच्छुक विदेशी छात्रों के लिए इंग्लैंड में इंग्लिश फॉर फॉरेनर्स, जैसी पुस्तकें लिखी जाती और प्रकाशित होती हैं। क्या यह उचित नहीं होता कि इस कोश का नाम भी हिंदी भाषा सीखने वाले विदेशियों के लिए वर्धा हिंदी शब्दकोश रखा जाता? सक्सेना साहब क्या इस बात का जवाब देंगे कि अगर इस कोश का उपयोग करने के पहले इसकी भूमिका पढ़ लेना आवश्यक है और कोश केवल या मुख्यत: विदेशी विद्यार्थियों के लिए है, तो क्या हिंदी सीखने वाले विदेशी विद्यार्थी भूमिका में लिखी बातें समझ पाएंगे? क्या वे भूमिका में प्रयुक्त प्रेरणार्थक, नासिक्य, आक्षरिक, सकर्मक, व्युत्पादक, व्युत्पत्ति जैसे शब्दों का अर्थ समझ पाएंगे?
सन्दर्भ 8 ए, बंद रोड एलेनगंज इलाहाबाद  मो. 099415347351