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Friday 24 Nov 2017

अथ काटना कुत्ते का भइया जी को

डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया
ए-7, फारचून पार्क, जी-3, गुलमोहर पार्क, भोपाल(म.प्र.) 462039
जब भइया जी को कुत्ते ने काटा तो बस्ती में तहलका मच गया। पूरे शहर में यह खबर आग की तरह फैल गई। जहां नहीं फैल पाई थी वहां स्वयं भइया जी ने पहुंचा दी ताकि लोग यह शिकायत न कर सकें कि उन्हें खबर ही नहीं मिली। भइया जी स्वयं खबर लेने-देने में गहरी दिलचस्पी रखते हैं। जब तक शहर की पूरी जानकारी न मिल जाए तब तक वे बेचैन रहते हैं। कई बार तो अखबार वाले भी कुछ समाचारों की पुष्टि उन्हीं से करके छापते हैं। भइया जी जितने बड़े साधक और साहित्यकार हैं उतने ही बड़े खबरनवीस भी। सभी क्षेत्रों का उन्हें गहरा न सही, पर व्यापक अनुभव तो है ही। नेतागिरी तक में वे चंचु प्रहार कर चुके हैं। ऐसे अनूठे भइया जी को जब कुत्ते ने काट लिया तो खबर तो बनेगी ही।
खबर पाते ही लोग दौड़ पड़े भइया जी की ओर आत्मीयता और सहानुभूति बताने, क्योंकि सुख-दुख के प्रसंग ही आत्मीयता प्रमाणित करने के सबसे अनुकूल सार्वजनिक अवसर होते हैं। वह जमाना गया जब भीतर ही भीतर आत्मीयता, स्नेह और श्रद्धा की भावना रखी जाती थी। अब तो बाहर का महत्व है। भीतर का क्या भरोसा? भीतर कुछ, बाहर कुछ। इसलिए आजकल बाहर मैदान के सामने खड़ा करके लिखवाकर प्रमाणित कराया जाता है कि आपके भीतर श्रद्धा, आस्था और आत्मीयता है अथवा नहीं। भीतर की भावना छाती फाड़कर दिखानी पड़ती है। बाहर के लिए दो मिनट की दरबार में हाजिरी, फिर प्रशंसा तथा समर्पण के दो बनावटी शब्द ही पर्याप्त होते हैं।
तो भइया जी के यहां सहानुभूति और आत्मीयता प्रदर्शित करने वालों का तांता लगा हुआ है। वे लोग भी शामिल हैं जो पहिले ही सुनकर हंसी उड़ा चुके थे। कहते थे अच्छा हुआ काट लिया बुड्ढे को। वहां कुत्ते के पास क्या करने गए थे? घर बैठे चैन नहीं तो कुत्ते तो काटेंगे ही। ऐसे लोग भइया जी के दरबार में सबसे अगली पंक्ति में मौजूद हैं। बाहर दुखी और भीतर से प्रसन्न। दरबार में भांति-भांति के प्रश्न और भांति-भांति के उत्तर। अलग-अलग प्रकार की बातें सुझाव और अपनी ओर आकर्षित करने के तरीके। भइया जी सभी के केन्द्र में। सभी को देखते-पहचानते और न आने वालों के बारे में भीतर ही भीतर सोचते-समझते और हिसाब लगाते हुए। सभी के प्रश्नों, जिज्ञासाओं, आशंकाओं, सुझावों का समाधान कर रहे हैं। बार-बार लगभग वही-वही प्रश्न क्रमश: आने वालों द्वारा किए जाते हैं और भइया जी के वही-वही उत्तर ग्रामोफोन के रिकॉर्ड की तरह दोहराए जाते हैं। कभी-कभी थोड़ा परिवर्तन और विस्तार भी दिया जाता है। जो छूट जाता है, उसे घर के परिजन पूरा कर देते हैं। कुत्ते के काटने का ऐसा वर्णन हो रहा है जैसे लंका विजय करके हनुमान या महाभारत जीतकर अर्जुन अथवा चुनाव जीतकर कोई नेता अपनी करनी और उपलब्धियों का वर्णन अपने मातहतों-चमचों और कृपाकांक्षियों को सुना रहा हो। भइया जी की कथा सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह हर बार दोहराई जा रही है। जो दरबार में पहुंच गया वह बीच में उठ नहीं सकता- अन्यथा उसका उसी प्रकार अनर्थ हो सकता है जैसे भगवान सत्यदेव की कथा को बीच में छोड़कर जाने वाले का बिना प्रसाद के होता है।
कोई मुग्ध होकर, कोई द्रवित होकर, कोई विवश होकर, कोई आश्चर्यचकित होकर, कोई ऊबकर उनका वर्णन सुन रहा है। इससे भइया जी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वे समदर्शी और आत्मदर्शी हैं। अपनी तरह सभी को देखते हैं। भइया जी जो कहें उसे मानिए। अगर यह गुंजाइश न हो तो दरबार में मत जाइए। भइया जी की हार्दिक इच्छा है कि यह समाचार अखबारों में भी छप जाए और नेता और अधिकारी भी जाकर उन्हें धन्य करें ताकि वे शान से बतला सके कि कौन-कौन देखने आए थे। आखिर कुत्ता रोज-रोज तो किसी को काटता नहीं। अब जब काट ही लिया है तो उसे पूरी तरह भुनाया जाए। इससे महत्ता और लोकप्रियता का भी अनुमान लग जाता है।
भइया जी ने खचाखच भरे दरबार में अपना फटा कुरता और पाजामा तथा मलहम-पट्टी लगे हाथ-पांव और कंधों को प्रदर्शित करते हुए सबकी जिज्ञासा शांति के लिए बताया कि रात के अंधेरे में वे टार्च लेकर एक सामाजिक कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने जा रहे थे तभी वंचित परिवार के एक कुत्ते ने उन्हें काट लिया। वह कुत्ता कैसे पीछे से उन पर झपटा, कैसे उन्होंने दुत्कारा, कैसे वे भागे, कैसे गिरे, फिर उठकर कुत्ते का मुकाबला कैसे किया और कहां-कहां कुत्ते ने काटा- इस सबका पूरे अभिनय के साथ सविस्तार वर्णन भइया जी ने किया तो स्वाभाविक है कि सहानुभूति प्रदर्शकों ने भरे गले से अपनी आत्मीय संवेदना व्यक्त की। किसी ने कहा- 'अरे राम-राम। कितनी बुरी तरह से काटा है। कपड़े फाड़कर साले ने बेचारों की दुर्गति बना दी।Ó  किसी ने खुदा को याद करते हुए आह भरकर कहा- 'या खुदा। दुश्मन की तरह वार किया। अल्ला की दुआ से भइया जी बच गए। नहींजाने क्या हो जाता।Ó किसी एक और की आवाज आई- 'बुढ़ापे में कुछ भी हो सकता था। हड़बड़ाहट में गिरने से हड्डी टूट जाती। पेट नोच लेता तो आंते बाहर आ जातीं। क्या कुछ नहीं हो सकता था। भगवान की कृपा ही रही कि काटा जरूर, पर कोई गंभीर घटना नहीं घटी।Ó लेकिन कुत्ता काटने से पहिले की अपेक्षा बाद में बड़ी परेशानी होती हैं, एक और आवाज आई।
बहरहाल संवेदनाओं की झड़ी लग रही थी और भइया जी उसमें पूरी तरह डूबे जा रहे थे। जैसे प्रशस्ति गान किया जा रहा हो। कई लोग कुरता पाजामा और भइया जी के विभिन्न अंगों को छूकर ऐसे दिख रहे हैं जैसे किसी कीमत रत्न की परख कर रहे हों। कुछ पूछ रहे थे कि कुत्ता पालतू है या सड़क छाप। किस रंग का है, काला है या सफेद? उसे इंजेक्शन लगा है या नहीं? जिस दिन कुत्ते ने काटा उस दिन कौन सा दिन था। रविवार या बुधवार तो नहीं था? क्योंकि हर दिन का असर अलग-अलग होता है। भइया जी के सभी हितैषी थे। धीरे-धीरे आगे की कार्रवाई और चिकित्सा पर बात आ गई।
हिन्दुस्तान में दूसरों की समस्या या तकलीफ दूर करने के लिए हर व्यक्ति ज्ञानी होता है। मर्ज की दवा तो बता देंगे और समस्या होगी तो समाधान सुझा देंगे। एक ने कहा- ''कुत्ता अगर पालतू है तो मालिक के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट करना चाहिए। ऐसा नालायक कुत्ता कि भइया जी जैसे सज्जन बुजुर्ग को काट लिया जो चींटी से भी डरते हैं। तभी दूसरे ने बताया कि कुत्ते का मालिक तो कुत्ते से ज्यादा खतरनाक है। सुनते ही वह आइडिया 'ड्रापÓ कर दिया। तीसरे ने कहा कि कुत्ते को दस दिन बाद घर बांधकर 'वॉचÓ करना चाहिए। सुनते ही माताजी ने विरोध किया- 'घर में इन्हीं की झंझट क्या काम है कि एक ऐसी मुसीबत मोल ले ली जाए। वे खुद जाकर रोज देख आया करेंगे। घर में पड़े-पड़े इनके पास काम ही क्या है। बक बक ही तो करते रहते हैं।Ó तभी चौथे ने कहा- 'पर कुत्ते पर नजर रखना तो जरूरी है। कहीं मर-मुर गया तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी।Ó 'मर जाएगा तो क्या तुम हाथ लगा लोगे?Ó पांचवें ने टोका। छठे ने आह भरी- 'भइया जी जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार को काटकर कुत्ते ने बड़ा अनर्थ किया। अत: हम सभी का कर्तव्य है कि भइया जी से ज्यादा उस कुत्ते की चिंता करें जिससे दस दिन वह स्वस्थ बना रहे। बाद में कुछ भी हो ताकि भइया जी की सेवाएं साहित्य और समाज को बहुत दिनों तक मिलती रहे।Ó यह सब सुनकर ऐसे लग रहा था मानो किसी व्यक्ति की दीर्घायु के लिए प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया हो।
अंत में तय हुआ कि भइया जी ही स्वयं कुत्ते के दर्शन करने कुशल क्षेम लेने के लिए दस दिन तक लगातार दो बार जाएंगे क्योंकि दूसरा कोई दस दिन तक परेशानी मोल लेने के लिए तैयार नहीं हुआ। कहा गया कि दूसरा कोई देखने में भूल-चूक कर सकता है। तभी किसी ने कहा- 'इसकी क्या गारंटी है कि भइया जी से भूल-चूक नहीं होगी? अंधेरे में तो सारे कुत्ते एक से ही दिखते हैं।Ó
उम्र में बड़े किन्तु विचारों से जवान वैज्ञानिक सोच के कवि चतुरेश ने सुझाया कि 'सबसे पहले कुत्ता काटने के चौदह इंजेक्शन अस्पताल में लगवाएं जाएं। फिर कुत्ते को देखने-सुनने पर विचार करें। अजीब बात है कि सभी लोग भइया जी की कम, कुत्ते की ज्यादा चिंता कर रहे हैं जैसे कुत्ता उनसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो।Ó तभी त्रिपुंड जी ने कहा- 'कुत्ते के मामले में विज्ञान की बजाय ज्ञान से काम लेना चाहिए। कुत्ते रोज लोगों को काटते हैं। कभी इतना गंभीर चिंतन नहीं देखा गया। लोग भूल जाते हैं कि इंजेक्शनों का साइडइफेक्ट खतरनाक होता है। इसलिए भइया जी को दस कुएं झंकवा दिए जाएं तो काफी है।Ó डॉ. शिशिरानंद ने अपनी आधिकारिक आवाज में असहमति व्यक्त करते हुए कहा- 'भइया जी साधारण व्यक्ति नहीं है। दुर्लभ प्रजाति के जीव हैं। नगर के गौरव और अमूल्य निधि हैं। इनके साथ कोई प्रयोग या लापरवाही नहीं करना चाहिए। कभी-कभी तो कुत्ते के काटने का प्रभाव दस-पांच साल बाद भी होता है। मैं तो एक युग से जानवरों से ही 'डीलÓ कर रहा हूं। अत: इंजेक्शन लगवाना तो 'मस्टÓ है।Ó तभी बरसाने लाल ने मजाक किया- 'मतलब आप भइया जी को जानवर मान रहे हैं।Ó शिविरानंद ने मानो मजाक की पुष्टि की- 'फिलहाल जब तक कुत्ते के काटने का असर है तब तक वही मानने का नियम है। आजकल चौदह की बजाय एक ही इंजेक्शन लगाया जा सकता है। कीमत जरूर लगभग तीन हजार रुपए होगी।Ó तीन हजार सुनते ही भइया जी के मुख से चीख निकल गई, जैसे कुत्ते ने फिर से झपट्टा मारा हो। तभी दधीचि जी ने मध्य मार्ग सुझाते हुए अपना मंतव्य प्रगट किया- चतुरेश, शिशिरानंद और त्रिपुंड जी तीनों अपनी-अपनी जगह सही हैं। दोनों पद्धतियां समाज में स्वीकृत हैं। अच्छा यह हो कि दस दिन तक कुत्ते पर नजर रखी जाए और तब तक झाड़-फूंक करवा ली जाए। यह भी शर्तिया इलाज है। कुएं भी झंकवा लिए जाएं। मैकू चौधरी झाड़ता भी है और दवा भी देता है। यदि कुत्ता काटने का प्रभाव होता है तो व्यक्ति दवा खाते ही भौंकने लगता है। मैकू चौधरी के पड़ोसी फैयाज ने अपने अनुभव बताया कि उन्होंने अपने बकरे को चौधरी  की दवा पिलाई थी तो वह दस बारह बरस तक स्वस्थ रहा किन्तु भौंकता जरूर रहा। यों, उसे मौलवी साहब से झड़वाया भी था। अब चाहे जिसका असर हुआ हो। बरसाने लाल ने फिर फुलझड़ी छोड़ी- अगर कहीं ऐसा भइया जी के साथ हो गया तब क्या होगा? अभी ही क्या कम भौंकते हैं।
भइया जी अचानक तुनक पड़े। 'लोग कुत्ता पालने का शौक तो करते हैं पर उनके रखरखाव और देखभाल पर जरा भी ध्यान नहीं देते। पालो तो ठीक से पालो। बच्चों की तरह। कुत्ता पालना कोई खेल नहीं है।Ó मौका पाकर उन्होंने अपने पालतू कुत्ते को आवाज दी। पीलू-पीलू-पीलू। झब्बेदार बालों वाला पीलू मस्त चाल में धीरे-धीरे आया और भइया जी की गोद में बैठ गया। भइया जी ने उसे पुचकार कर बड़े प्यार से थपथपाया और लोगों का ध्यान आकर्षिक करते हुए कहा- 'हमारे पीलू को देखिए। बच्चे की तरह रहता है। हम लोग जमीन नहीं सूंघने देते। हमारी मुन्नी रोज इसको उत्तम साबुन के लोशन और साफ पानी में नहलाती है। तेल-कंघी करती है। दूध-दलिया, दवायुक्त बिस्कुट, चाकलेट, टॉनिक देना, डॉक्टर को बुलाना, दवाइयां, टेबलेट, इंजेक्शन देना रोज की रुटीन है। हमारे साथ में ही सोता है। माताजी और मुन्नी के हाथ से खाता है। कभी-कभी रुठ जाता है तो दिन-दिन भर नहीं खाता। मनाना पड़ता है। बड़ा लाड़ला और जिद्दी है। क्यों पीलू। बुरा तो नहीं मान रहे कि हम तुम्हारी निन्दा कर रहे हैं? निन्दा नहीं है प्यारे। लोगों को बता रहे हैं कि कुत्ते को कैसे पालना चाहिए। कुत्ता बड़ा समझदार जानवर है। हमारा पीलू रेडियो बड़े ध्यान से सुनता है। टीवी देखता है। आने-जाने वालों को दरवाजे तक भेजकर नमस्कार करता है। जिसे पसंद नहीं करता, उस पर भौंकता भी है।Ó तभी पीलू ने अचानक जोर-जोर से भौंकना शुरू कर दिया- 'भौं...भौ...भौ...भौ..भौं...Ó 'अरे यह क्या कर रहे हो पीलू? यह सब लोग तो अपने ही परिवार के लोग हैं।Ó फिर लोगों की ओर उन्मुख होकर कहा- 'पीलू भौंक नहीं रहा। सबको नमस्कार कर रहा है। यही इसकी 'स्टाइलÓ है।Ó ऐसा लगा जैसे भइया जी कुत्तों की भाषा भली प्रकार समझते हों। उन्होंने बताया कि 'पीलू पर हजारों रुपए माहवार का खर्चा है। साथ में प्रथम श्रेणी में यात्रा करता है। कार में घूमता है। कभी अकेले नहीं छोड़ते। यदि छोडऩा पड़ा तो दिन में तीन-चार बार उसके नहाने, खाने, सोने, शौच करने की सूचना फोन पर ली जाती है।Ó सब सुनकर लगा कि हम लोगों का जीवन कितना बेकार है। अच्छा होता कि भइया जी के पीलू हो जाते। दधीचि जी ने नहले पर दहला चलाते हुए कहा- 'आप ठीक कहते हैं। हमारे रिश्तेदार के घर भी एक कुत्ता था वह रोज मंदिर जाता था। मंगलवार का व्रत रखता था और रामायण सुनता था।Ó सभी को लगा कि निश्चित रूप से कुत्ता आदमी से हर मायने में अधिक ईमानदार, धार्मिक और समझदार है। कुत्ते के सामने आदमी कुछ भी नहीं है। मौका पाकर सुरेश बाबू ने बीच में टोका- 'भइया जी, बुरा मत मानना। जब आपके कुत्ते ने आपके पड़ोसी के खेलते हुए बच्चे को दौड़कर काटा था तो आप उसे देखने तक नहीं गए। कहा था कि लोगों को बच्चे संभालकर रखना चाहिए। तब सिद्धांत दूसरा था। अपने लिए कुछ और दूसरों के लिए कुछ और। अब जब कुत्ते सिर चढ़कर मनमानी कर रहे हैं तो रो रहे हैं।Ó
मैं भइया जी और दधीचि जी की बात पर गौर कर रहा हूं। सचमुच कुत्ता बड़े काम का समझदार जानवर है। तभी तो आजकल कुत्ता पालने का शौक जोरों पर है। लोग बच्चों को नौकरानी के पास रखते हैं। पैदल चलाते हैं, गलती करने पर मारते-पीटते-दंडित करते हैं और असुविधा होने पर झूलाघर में छोड़ देते हैं। पर कुत्तों को गोद में लेकर पुचकारते हुए घूमते हैं। सुबह शाम स्वयं शौच कराते हैं। नौकरानी छू ले तो डांटते हैं। साथ में खिलाते-पिलाते, सुलाते हैं। कार में लेकर चलने में शान का अनुभव करते हैं। जरा आवाज आई कि दौड़ पड़ते हैं। डॉक्टरों को रोज बुलाकर दिखाते हैं। स्वयं का छोटा बालक लेकर चलने में हीनता का अनुभव करते हैं। कुत्ते को गोद में लेना प्रतिष्ठा और बड़प्पन का प्रतीक मानते हैं तभी तो कुत्तों का व्यवहार बच्चों जैसा और बच्चों का व्यवहार कुत्तों की तरह हो रहा है।
प्रश्न उठता है कि आखिर भइया जी को कुत्ते ने क्यों काटा होगा? असल में भइया जी सामान्ती स्वभाव के अनुरूप झकाझक कपड़ों में थे। ऊपर से कुत्ते पर टार्च की रोशनी मारी। कुत्ते को लगा कि दलित बस्ती के कुत्ते को वह सामंती व्यक्ति अपनी चमक और रोशनी से चकाचौंध करना चाहता है। मेरा मालिक दिनभर परिश्रम कर पसीने से लथपथ फटे मैले-कुचैले कपड़ों में आता है और इनके कपड़ों पर एक दाग भी नहीं। हम दर-दर की ठोकरें खाएं और ये तथा इनके कुत्ते मालपुए खाएं। गाडिय़ों में घूमें। झकाझक कपड़ों की शान बघारें। आदमी-आदमी तथा कुत्ते-कुत्ते में भेद करें। उसके भीतर की अपमान की व्यथा आक्रोश की आग बनकर भड़क उठी और जैसे ही भइया जी उधर से निकले कि उसने आक्रमण करके कुरता-पाजामा को तार-तार कर दिया। हाथ-पांव-कंधों को दांत और नाखूनों से खरोंच डाला मानो घोषित कर दिया कि अवसर मिलते ही हम अपने अपमान का बदला लेने से नहीं चूकेंगे। वंचित का यह कुत्ता एक दिन सामंतों की बस्ती में अपना झंडा अवश्य गाड़ेगा।
मुझे याद आया कि कुछ दिन पूर्व साहित्य में जबरन नाक घुसडऩे वाले उलूक जी और कड़वी वाणी के लिए विख्यात अहंकारी दुर्गुण जी को भी कुत्तों ने काटा था। उस समय भी मैंने कुत्ते का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया था और इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि आजकल साहित्यकार सत्ता और समर्थों का गायक बनकर सम्मान और पैसे के पीछे भाग रहा है। दीन-हीन शोषितों की बिरादरी का यह रचनाकार सुखभोगी बनकर भ्रष्ट हो रहा है। अत: इसे सचेत कर सही मार्ग पर लाना जरूरी है। मुझे भइया जी को कुत्ते द्वारा काटे जाने का कारण और समाधान मिल गया। मैं कुत्तों की ओर से अपने साहित्यकार बंधुओं को आगाह करता हूं कि वे पद, पुरस्कार और सम्मान की ओर भागकर अपने को पथभ्रष्ट न करें। सत्य मार्ग पर चलें। जरूरतमंदों और शोषितों के साथी बनकर समाज की विसंगतियों पर प्रहार करें। अन्यथा उन्हें कुत्तों के प्रहार से नहीं बचाया जा सकता। झाड़-फूंक और इंजेक्शन भी उनकी रक्षा नहीं कर सकेंगे।
पुनश्च- अभी-अभी सूचना मिली है कि भइया जी की माता जी को भी उन्हीं के पड़ोसी के कुत्ते ने काट लिया है, उनका प्रिय कुत्ता पीलू बाहर आया तो बाहरी कुत्ते ने ईष्र्यावश उस पर आक्रमण कर दिया। ममतामयी माताजी अपने प्रिय पीलू की रक्षा के लिए दौड़ पड़ीं क्योंकि गोद में पलने वाले कुत्ते अपनी रक्षा नहीं कर सकते। वे तो देखने भर के शो पीस होते हैं। पीलू तो डर से दुम दबाकर भीतर घुस गया और बेचारी माता जी पर बाहरी कुत्ते ने गुस्सा निकाला। अब वे भी झाडफ़ूंक आदि के चक्कर में भइया जी की बराबरी कर रही हैं। इसलिए भइया जी की बिरादरी के भाई बहिनों, 'सावधानÓ।  जमाना करवटें बदल रहा है। केवल सहानुभूति दिखाने और दवा बताने से काम नहीं चलेगा। सोच में भी परिवर्तन करना जरूरी है ताकि कुत्ते साथी बनकर रहें, काटें नहीं।