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Saturday 18 Nov 2017

रचना को नि:संग भाव से समझना आलोचना-कर्म की खूबी है

डॉ. शिबन कृष्ण रैणा
2/537 अरावली विहार
अलवर , राजस्थान- 301001
मो 9414216124
डॉजीवन सिंह न केवल राजस्थान में हिन्दी आलोचना के पर्याय हैं अपितु समूचे हिंदी आलोचना-जगत में इन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। राजस्थान साहित्य अकादमी के सर्वोच्च मीरा सम्मान 2001 से विभूषित जीवन सिंह की कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं जिन में प्रमुख हैं- कविता की लोक-प्रकृति, कविता और कवि कर्म और शब्द और संस्कृति। डॉ जीवन सिंह की आलोचना-पद्धति के प्रतिमान निकष जीवन-सापेक्ष हैं। समाज की जटिलताओं के बीच तथा इतिहास, परम्परा एवं संस्कृति की गहरी समझ के दायरे में रचना में व्याप्त सुन्दरता और गुणवत्ता को गहराई, व्यापकता और नि:संग भाव से समझना इनके आलोचना-कर्म की खूबी है।;
प्रस्तुत है डॉ जीवन सिंह से डॉ. शिबन कृष्ण रैणा की बातचीत।

प्र.आपको राजस्थान में एक प्रगतिशील, जनवादी आलोचक के रूप में जाना जाता है। कृपया सबसे पहले यह बतलाएं कि साहित्य-आलोचना में प्रयुक्त होने वाले प्रगतिशील, प्रगतिवाद और जनवाद प्रत्ययों में आपस में क्या कोई समानता है? ये तीनों एक दूसरे के पर्याय हैं या इनमें कोई भिन्नता है?
उ. वैसे इन तीनों प्रत्ययों का प्रयोग एक दूसरे के आसपास होता रहा है किन्तु इन तीनों में पर्याप्त भिन्नता भी है। जहां तक प्रगतिशीलता  का सवाल है यह धारणा दकियानूसीपन के विरुद्ध उस आधुनिक भावबोध के लिए है जिसमें प्रगति को मुख्य कारक माना गया है। लेकिन इस शब्द का प्रयोग बहुत व्यापक अर्थ में होता है। जो भी प्रतिक्रियावाद का विरोध करता है वह प्रगतिशील हो सकता है। इसी वजह से प्रेमचंद हर साहित्यकार को स्वभाव से प्रगतिशील कहते हैं। जहां तक प्रगतिवाद का सवाल है इस शब्द का प्रयोग एक निश्चित कालखंड में लिखी गयी उन रचनाओं के लिए किया गया जो माक्र्सवादी विचारधारा से प्रेरित होकर लिखी गयी थी। स्वाधीनता, समानता और भाईचारा जनवाद के तीन बड़े मूल्य रहे हैं जब इन तीन मूल्यों को पाने के लिए संघर्ष किया जाता है तो वह जनवाद के लिए किया गया संघर्ष होता है।
प्र. जीवन सिंह जी यह  बतलाएं कि आप हिंदी साहित्य के रचना और आलोचना क्षेत्र में कैसे आए? उस परिवेश और वातावरण के बारे में कुछ विस्तार से बतलाइये जिसमें आपका लालन-पालन हुआ? क्या आप साहित्य को भी किसी भी तरह से बंधन मुक्ति में सहायक मानते हैं?
उ. मेरा जन्म  एक किसान परिवार में हुआ, पूर्वी राजस्थान के भरतपुर जिले के एक सीमान्त गांव जुरहरा में जुलाई 1947 में। ये वे दिन थे जब देश की जनता को लगभग दो सौ साल से चली आ रही अंग्रेजी औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति मिलने ही वाली थी। साहित्य को भी बंधनमुक्ति का एक माध्यम माना जाता है लेकिन वह राजनीति जैसा सत्ताकेंद्रित माध्यम नहीं होता, जो सत्ता के दांवपेचों में अपना कर्तव्य तक भूल जाता है। साहित्य व्यक्ति के अन्तरंग पर ज्यादा काम करता है। वह बाहर के संसार को देखकर व्यक्ति को भीतर से बदलने का प्रयास करता है। हालांकि यह बदलाव बहुत कठिन होता है। व्यक्ति अपने परिवेश की सीमाओं से जब तक मुक्त होकर एक विशुद्ध इंसान के स्तर तक नहीं आता, तब तक वह तरह तरह की बंधन-बेडिय़ों से जकड़ा रहता है। यही कारण है कि सत्ता और साहित्य की आपस में ज्यादा पटती नहीं। अक्सर साहित्य को सत्ता के विरोध में खड़ा होना पड़ता है। इस वजह से दोनों में एक खिंचाव, द्वंद्व और तनाव बना रहता है। जिन युगों में यह तनाव और द्वंद्व नहीं रहा उन दिनों का साहित्य दरबारी साहित्य कहलाया। बहरहाल जिस कालखंड  में  मेरा जन्म हुआ, तब तक  देश का भारत और पाकिस्तान में विभाजन तय हो चुका था, जो किसी भी प्रवहमान ऐतिहासिक सभ्यता और संस्कृति के लिए बेहद दुखदायी और त्रासभरी स्थिति  थी। एक देश के दो टुकड़े होना यह विचार ही दुर्भाग्यपूर्ण था। इस वजह से हमारा इलाका उस  समय दंगों और मारकाट का मैदान बना हुआ था। बहुत बुरा समय था वो। हमारा मेवात का यह इलाका तबाही के कगार पर था। कगार क्या भारी तबाही मची हुई थी। यहां के मेव मुस्लिम होने की वजह से पाकिस्तान जा रहे थे। यद्यपि वे जाना नहीं चाहते थे क्योंकि वे इस्लाम मतावलंबी होने के बावजूद यहाँ की हिंदी-संस्कृति को मानते थे। उनकी भाषा, बोली, उनके अनेक तरह के जीवन-संस्कार हिंदी थे। उनको यह मालूम ही नहीं था कि उर्दू क्या होती है? फारसी क्या होती है? वे हिंदी-राजस्थानी की क्रियाओं का व्यवहार करते थे। जैसे आपके यहाँ कश्मीर की भाषा-बोली में सभी कश्मीरी एक हैं। संस्कृति का एक बड़ा सूत्र भाषा के भीतर होता है जिसे सभी लोग मिलकर रचते हैं। आप देखिये ललद्यद, हब्बा खातून, दीना नाथ नादिम और महजूर में क्या फर्क है। ये सभी एक ही कश्मीरियत की रचना करते हैं। दुर्भाग्य सामान्य जन का यह रहा है कि हमारी जिन्दगी के सारे फैसले सत्ता का खेल खेलते रहने वाले कुछ मु_ीभर लोग करते हैं। पाकिस्तान बनाने के फैसले पर कोई जनमत संग्रह नहीं हुआ था। इस देश में रह रहे कुछ नवाबजादों और अंग्रेजों की मिलीभगत थी यह विभाजन। मेरा जन्म उसी जुलाई माह की उन्नीस तारीख को हुआ जब हमारे इलाके में मारकाट मची हुई थी। इसके बाद  देश अगस्त में आजाद हुआ छब्बीस दिन  बाद। जगह-जगह पर हिन्दू-मुस्लिम टकराहटें और झगड़े-फसाद हो रहे थे। मेवात का इलाका होने की वजह से मेव समुदाय पर पाकिस्तान जाने का दबाव बना हुआ था। 19 दिसंबर 1947 को मेवात के घासेड़ा गाँव में महात्मा गांधी के आश्वासन के बाद ही मेव समुदाय आश्वस्त हो पाया  था कि भारत एक सेक्युलर देश है। लोकतंत्र तभी बनता है जब सेक्युलरिज्म को अपनाया जाय। यह उसकी पहली और जरूरी शर्त है। यह हमारा सौभाग्य है कि हम आज सेक्युलर देश के नागरिक हैं। पाकिस्तान में ऐसा कहाँ है? यहाँ सभी मतावलंबियों को अपने मत के अनुसार जीवनचर्या चलाने का अधिकार है। चूंकि उस समय लोग पाकिस्तान जा रहे थे, इस आधार पर आज भी उन दिनों को हमारे यहां भग्गी के दिन ही कहते हैं। मेरे दादा जी अक्सर बतलाते थे कि जो मेव पाकिस्तान जा रहे थे, वे अपने खेतों से लिपट-लिपट कर बहुत रोये थे। मेव किसानों को अपनी जमीन से वैसा  ही लगाव था जैसा कि हर किसान को अपनी जमीन से हुआ करता है। अनेक हिन्दू परिवार भी हमलों के डर से अपने गाँव छोड़कर पास के शहरों और बड़े कस्बों में चले गए थे। लेकिन हमारा परिवार अपना गाँव छोड़कर कहीं नहीं गया था। विघटनकारी कुटिलताओं की वजह से अनेक लोग न चाहते हुए भी घुन की तरह पिस गए। आज भी हमारा यह एक ऐसा सीमान्त गाँव है जहां उत्तर-पश्चिम में हरियाणा की सीमा लगती है तो उत्तर-पूर्व में उत्तर प्रदेश की। हमारा यह इलाका एक ऐसे संधि स्थल पर है जहां सांस्कृतिक तौर पर ब्रज और मेवात की सीमाएं मिलती हैं। आपको मालूम है कि हिंदी का ब्रज साहित्य कितना खास और महत्त्वपूर्ण है। मेवाती लोक साहित्य भी अपने अनूठेपन के लिए जाना जाता है। हमारे घर पर मेवाती और ब्रज लोक साहित्य का वातावरण बना रहता था। मीरासी और नट ढोला-आल्हा गाने के लिए अक्सर हमारी बैठक पर आते थे। दूसरी बात यह है कि हमारे गांव में पिछली डेढ़ सदी से लगातार रामलीलाएं होती चली आ रही थी। जो व्यक्ति में अपने तरीके से साहित्य का संस्कार पैदा करती हैं। रामलीला की पहली पंचायत आज भी हमारी बैठक पर ही होती है। रामलीला चूंकि तुलसी कृत रामचरितमानस के आधार पर होती हैं इसलिए साहित्य का संस्कार इस दिशा से भी आता है और यह लगभग पूरे गाँव का संस्कार बन जाता है। गाँव में संगीत के भी कई अखाड़े रहे हैं। यह भी व्यक्ति को साहित्य की ओर प्रेरित करता है। यह अलग बात है कि इसके बावजूद अपने प्रयत्नों से ही अपने संस्कारों को विकसित कर सकता है और उनको सही दिशा में ले जा सकता है।
प्र. अपनी प्राम्भिक शिक्षा-दीक्षा के बारे में कुछ बताइए।
उ. परिस्थितियाँ तो अनेक लोगों की समान होती हैं किन्तु उनमें व्यक्ति की अपनी जीवन-दृष्टि ,अनुभव और उसकी आकांक्षाएं भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। गाँव से  मिडिल स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद 1960 की जुलाई में मैं आगे पढऩे के लिए अपने गाँव से लगभग अस्सी किलोमीटर दूर भरतपुर गया। भरतपुर में मैं हमारे गाँव के हमारे परिवार के एक बेहद नजदीकी मित्र परिवार के साथ तीन साल तक यहां के नदिया मोहल्ले में रहा, यहीं से मैंने हिंदी-संस्कृत के साथ नागरिक शास्त्र वैकल्पिक विषय लेकर हायर सेकेेंडरी परीक्षा उत्तीर्ण की। स्कूल के हमारे एक अध्यापक थे गोपेश शरण आतुर। स्वयं ब्रज भाषा के कवि थे और कक्षा में हर विद्यार्थी को कविता लिखने की ओर प्रेरित करते थे। शनिवार के दिन वे छात्रों से केवल कविता ही लिखवाते थे। छंद का अभ्यास कराते थे। दोहा, कवित्त, सवैया, कुण्डली छंदों में जैसी भी बने, अभिव्यक्ति करो। जो कुछ सामने नजर आता है उसे ही छंदों में बांधो। इनकी भाषा ब्रज या खड़ी बोली या मेवाती कोई भी हो सकती थी। यहीं से मैं अपनी बातों को छंदों में कहने का अभ्यास करने लगा। जो कुछ हम देखते थे उसे ही छंद में बांधकर प्रस्तुत कर देते थे। दूसरे यहाँ  घर में भी साहित्य का वातावरण था। जिस परिवार के साथ मैं रहता था, वह प्राचीन संस्कारों वाला होने के कारण हिंदी ही नहीं, संस्कृत साहित्य के प्रति  भी खास तौर से प्रतिबद्ध था। तीसरे, भरतपुर की हिंदी साहित्य समिति द्वारा शहर में निर्मित साहित्यिक वातावरण। ब्रज भाषा का अंचल होने की वजह से भरतपुर में साहित्य के प्राचीन संस्कार बद्धमूल रहे हैं। इसके बावजूद कुछ ऐसे लोग भी वहां थे, जो साहित्य में नवीन प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करते थे। यह है मेरे साहित्यिक संस्कारों की पृष्ठभूमि और परिवेश। जिसकी बुनियाद में संस्कृत-हिंदी का पुराना साहित्य रहा है। यहाँ पर यह बतला दूं कि इस समय तक नए साहित्य के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी। हमारे अध्यापक भी नए साहित्य के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते थे। आगे मैं अलवर के राजर्षि कालेज में पढ़ा, यहाँ नए साहित्य का वातावरण अवश्य था, किन्तु वह निजी स्तर पर ही ज्यादा था। नयी कविता के प्रशंसक, जयसिंह नीरज और जुगमंदिर तायल यहाँ मेरे अध्यापक रहे किन्तु यहाँ भी दूसरे अधिकांश अध्यापक पुराने साहित्य में ही ज्यादा रूचि रखने वाले थे। स्नातकोत्तर उपाधि मैंने राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर के हिंदी विभाग से हासिल की किन्तु यहाँ भी ऐसा माहौल नहीं मिला कि साहित्य की नयी प्रवृत्तियों में अपना मन रमा सकूँ। जो कुछ पढ़ा-लिखा वह सब पारंपरिक साहित्य और उसकी शास्त्रीयता के प्रति मेरी अभिरुचि को बढ़ाने वाला था। सच तो यह है कि हमारी शिक्षा प्रक्रिया व्यक्ति-जीवन के सामने रोजी-रोटी के अलावा शायद ही कोई बड़ा प्रयोजन सामने रखती हो। हम पढ़ते हैं कुछ पाने के लिए। आसान और ऊंचा रोजगार मिले इसलिए व्यक्ति पढ़ता है। साहित्यकार या देश का बेहतरीन ईमानदार नागरिक बनने के लिए शायद ही कोई पढ़ता-लिखता हो। यह अलग बात है कि किसी वजह से कोई साहित्य की तरफ  चला जाय। वैसे भी हमारा समाज साहित्य को आज भी कोई बड़ा काम नहीं मानता। असल बात तो यह है कि साहित्य को हमारे यहाँ आज भी एक स्वतंत्र काम नहीं माना जाता।
प्र.आप कविता को छोड़कर आलोचना की दिशा में कैसे  मुड़े? आप आलोचना और वह भी प्रगतिशील-जनवादी आलोचना लेखन की तरफ  कैसे मुड़ गए?
उ. दरअसल, जीवनयात्रा की तरह रचना की यात्रा में भी कई तरह के घूम-मोड़ और पड़ाव आया करते हैं। ये यात्राएं कभी नाक की सीध में नहीं चला करती। हम जिस तरह के वातावरण में रहते हैं सामान्यतया वैसे ही हमारे विचार और काम भी होते हैं किन्तु कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि जिन्दगी की राहें नया मोड़ ले लेती हैं। मैंने भी कभी यह नहीं सोचा था कि मेरा नजरिया इस तरह से बदल जाएगा। इसकी वजह मैं अपना गाँव में पैदा होना और वहाँ की गरीबी एवं समाज में व्याप्त गहरी विषमता को मानता हूं। गरीबी से बड़ा कोई दु:ख नहीं होता और विषमता से बड़ा अन्याय। वैसे भी जिन्दगी उस गति का नाम है जो अनेक तरह के घुमावों, ठहरावों और पड़ावों से पूरी होती है। मेरे कालेज शिक्षा में रहते हुए लगातार होने वाले स्थानान्तरणों से भी मुझे जगह जगह के अनुभव हुए खट्टे-मीठे-कड़वे सभी तरह के और नए नए लोगों से मिलना और उनके विचारों के संपर्क में आने से यह सब हुआ। पता नहीं कौन, कब और कहाँ ऐसा संपर्क हो जाय कि जीवन को कोई दृष्टि मिल जाय। अपने को हमेशा नयी चीजों के प्रति जिज्ञासु बनाए रखने से भी बदलाव हो जाते हैं। हुआ यह कि जब 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा कर प्रतिपक्षियों को जेलों में डाल दिया तो मेरा तबादला गवर्नमेंट कालेज दौसा से बूंदी कर दिया गया। यहाँ पर यह बतला देना प्रासंगिक होगा कि मैं जयपुर से हिंदी में एम ए करने के बाद 1968 में लोहिया कालेज चूरू में हिंदी का अस्थायी व्याख्याता नियुक्त हुआ था। 1969 में सुजानगढ़ कालेज में रहा और 1970 में सरदारशहर में। कभी कोई एक ठिकाना नहीं रहा, लगभग हर साल नयी जगह देखने को मिली। नौकरी भी अभी तक स्थायी नहीं हुई थी। इसके बाद 1970 में मेरा चयन मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग से हिंदी व्याख्याता पद पर हो जाने की वजह से मैं राजस्थान छोड़कर मध्य प्रदेश चला गया। संयोग से यहाँ मेरी पहली नियुक्ति 1971 में सवाई माधोपुर के पास चम्बल के उस पार मुरैना जिले के श्योपुर कलां के शासकीय कालेज में हुई। उस समय हम लोग सवाई माधोपुर के पाली घाट पर नाव से चम्बल पार करके श्योपुर कलां पहुंचते थे। उस समय तक इस इलाके में दस्युओं का भी भारी आतंक था। यद्यपि लोकनायक जयप्रकाश नारायण उनका समर्पण कराकर उनको मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रहे थे। चम्बल के बीहड़ों का इलाका था यह। मशहूर कवि मुक्तिबोध का जन्म 1917 में इसी कस्बे में हुआ था। उनके पिता ग्वालियर रियासत में उस समय यहां के कोतवाल थे। जब मैं इस कस्बे के कालेज में गया तो मुक्तिबोध और उनके पिता से सम्बन्धित तरह तरह की  कहानियां और मिथ सुनने को मिले थे। मुक्तिबोध की कविता से मेरी पहली जानकारी यहीं हुई थी। यद्यपि 1964-65 में अलवर के राजर्षि कालेज में स्नातक उपाधि का अध्ययन करते हुए एक कविता प्रतियोगिता में प्रथम आने पर पुरस्कार के रूप में मुझे मुक्तिबोध की एक साहित्यिक की डायरी प्रदान की गयी थी। लेकिन उनके साहित्य के बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता था। यहाँ श्योपुर में जब आया तो मुक्तिबोध को शांत हुए इस समय तक सात साल हो चुके थे। लेकिन यही समय था जब मुक्तिबोध की कविता के महत्त्व को समझा जा रहा था। इस इलाके को देखकर उनकी लम्बी कविता चम्बल की घाटी में के बिम्बों और रूपकों को समझने में काफी मदद मिलती है। यहाँ से भी मेरी मानसिकता में कुछ परिवर्तन आया, जिससे मुझे भाव के साथ विचार और जीवनदृष्टि का रिश्ता समझ में आने लगा और मैं यह भी जानने लगा कि जिन्दगी के यथार्थ को समझने के लिए जीवन-दृष्टि कितनी जरूरी होती है। जीवन-दृष्टि के बिना साहित्य को न दिशा मिलती है और न ही उसमें गति आती है। मुक्तिबोध मेरे लिए तभी से आकर्षण बन गए। वहाँ उस समय मुक्तिबोध साहित्य समिति के अंतर्गत साहित्य चर्चाएँ हुआ करती थी। खासतौर से कवि-गोष्ठियां। मैं भी उनमें जाता था। बड़ा उत्साह था मन में। उन्हीं दिनों बांग्लादेश बना था। उस समय एक बड़ा कवि सम्मेलन कराया गया था। यहाँ कवियों के साथ उर्दू के शायर भी थे। संयोग से मैं यहाँ एक साल ही रहा। 1972 में राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित होने पर मैं गुजरात की सीमा पर स्थित राजस्थान के राजकीय महाविद्यालय सिरोही में आ गया। यहीं से स्थानांतरित होकर दौसा आया और फिर आपातकाल में दौसा से बूंदी। बूंदी ने मेरे साहित्यिक जीवन को एक ऐसी दिशा प्रदान की जो आज तक मेरे लिए लक्ष्य तक पहुंचने का साधन बनी रही है। सरकारी नौकरी और आपातकाल का आतंक। वातावरण में भारी तनाव लेकिन भीतर से बेचैनी और आतंरिक आक्रोश। बाहर से झूठा समर्थन और भीतर से विरोध, यह थी उस समय मन की गति। नौकरी की सबसे बड़ी सीमा है कि वह व्यक्ति को आजाद ख्याल नहीं रहने देती। नौकर कितना ही उच्च पदस्थ क्यों न हो वह होता है पराधीन ही। यही वजह है कि किसी भी बड़े परिवर्तन के लिए व्यक्ति को स्वाधीन होना जरूरी है क्योंकि इस संसार में सारी लड़ाई स्वाधीनता के लिए ही है। साहित्य भी स्वाधीनता और  समानता के लिए ही रचा जाता रहा है। पराधीन सपनेहु सुख नाही, सही कहा  है बाबा तुलसीदास ने। जब व्यक्ति को मन की आजादी नहीं मिलती तो वह भीतर ही भीतर छटपटाता है और उसके लिए कोई रास्ता खोजता है यद्यपि इस समय तक कोई रास्ता सूझ नहीं रहा था। फिर भी कुछ लोग थे जो भीतर ही भीतर सोच रहे थे। इस दमघोंटू वातावरण की आलोचना कर रहे थे। बूंदी में साहित्य का माहौल तो था किन्तु वह कवि सम्मेलनी किस्म का ज्यादा था। कुछ विचारवान पत्रकार अवश्य थे। लेकिन विचार की यात्रा के लिए उसमें बहुत कम जगह थी। जबकि विचारधारा के बिना जीवन दृष्टि नहीं मिला करती। विचार और विचारधारा ऐसे कारक हैं जो व्यक्ति को आलोचना की ओर ले जाते हैं। व्यक्ति जब अपने समय की स्थापनाओं के विरुद्ध या समर्थन में तर्क करने लगता है तो आलोचना पैदा होती है। इसकी पूर्ति उन दिनों कोटा में होने वाली गोष्ठियों से हुई जिनमें इस समय की प्रखर आलोचना हो रही थी। ये गोष्ठियां यद्यपि खुले माहौल में नहीं होती थी। मथुरा से सव्यसाची आते थे और वे मजदूरों और श्रम के नजरिए से आपसी रिश्तों को देखने की बात कहते थे। यही से यह समझ बनी कि जब तक हम श्रम के नजरिए से सम्बन्धों को नहीं देखते तब तक पूरे समाज के रिश्तों को नहीं समझ पाते। इसमें अपने वर्तमान के प्रति आलोचना का भाव उत्पन्न होता है। इसी से मेरे मन में एक नए आलोचक ने जन्म लिया जो आगे चल कर समकालीन कविता से जुड़ गया। समकालीन कविता में भी उस लोकधर्मी कविता से, जो जनपदों के आधार पर अपने समय के रिश्तों को देखती थी। मैं तो यह मानता हूँ कि जीवन में अनेक तरह के संयोग होते हैं जो हमारी दिशा को ही बदल देते हैं। यहाँ से मैं कोटा-भरतपुर होकर अपने गाँव आता जाता था। रास्ते में एकाध बार भरतपुर अपने पुराने ठीये पर ठहरा तो एक दिन संयोग से कवि और ओर पत्रिका के सम्पादक विजेंद्र जी से मुलाकात हो गयी। विजेंद्र जी भरतपुर कालेज में अंग्रेजी पढ़ाते थे और प्रगतिशील कविता लिखते थे तथा कृति ओर नाम की पत्रिका निकालते थे। प्रेस में पत्रिका छप जाने के बाद वे उसकी जिल्दबंदी के लिए उसे आदर्श कुटीर उद्योगशाला पर लाते थे। विद्यार्थी जीवन में मैं यहीं पर रहता था और फुर्सत में जिल्दबंदी के काम में सहयोग भी करता था। विजेंद्र जी की उस समय की इन कविताओं में नए सम्बन्धों के साथ भरतपुर के आसपास का देशी ग्रामीण माहौल बोलता था। ग्रामीण पृष्ठभूमि का होने की वजह से यह मुझे अच्छा लगता था इस वजह से यह कविता भी अच्छी लगने लगी। मैं अब इस नयी मुक्त छंद वाली कविता में रूचि लेने लगा। विजेंद्र जी के आग्रह पर उनसे जल्दी-जल्दी मिलना होने लगा। हम अक्सर भरतपुर के घने वन में घूमने जाते। कविता पर पूरी रात बातचीत करते। बाहर सभा-गोष्ठियों में भी मिलना होने लगा। यहीं से मेरी नयी शुरुआत हुई। एक नयी जीवन-दृष्टि मिल जाने से सब कुछ जैसे एक साथ पलट गया। पुराने के साथ नया जुड़ गया। अच्छी बात यह रही कि नए के साथ पुराना भी बना रहा। पहले पुराना ही पुराना था अब उसमें नया भी जुड़ गया।
प्र. आपको मैंने तुलसी की चौपाइयों को अपनी बातचीत में अक्सर उद्धृत करते हुए सुना है। आप मध्यकालीन कवि तुलसी से आज के समय की संगति कैसे बिठा लेते हैं? इस बिंदु पर भी कुछ प्रकाश डालिए।
उ. डाक्टर  साहब, आपने देखा है कि इसी आधुनिक जमाने में निराला जैसे क्रांतिकारी कवि ने तुलसीदास के जीवन चरित को आधार बनाकर तुलसीदास के नाम से एक आधुनिक प्रबंध काव्य लिखा। नरेश मेहता ने संशय की एक रात नाम से लम्बी कविता लिखी। समकालीन कवि त्रिलोचन ने भी कहा-तुलसी बाबा भाषा मैंने तुमसे सीखी, मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो। अमृतलाल नागर ने मानस का हंस उपन्यास लिखा। इसके अलावा भी ऐसा बहुत कुछ और है जो तुलसी के आसपास का है। वैसे तुलसी की जीवनदृष्टि को लेकर प्रगतिशील खेमे में वाद-विवाद भी कम नहीं हुआ। विचारकों-आलोचकों के दो खेमे बन गए। इनमें आपस में खूब बहस चली। आज भी यह बहस जारी है। प्रगतिशीलता में भी मतभिन्नता रहती है कि आप चीजों को कैसे और किस कोण से समझते हैं। कुछ विचारक परम्परा के प्रवाह के रूप में प्रगतिशीलता को देखने की बात कहते हैं और वैसा ही करते भी हैं। इस समय के ऐसे आलोचकों में रामविलास शर्मा का नाम लिया जा सकता है जो यह मानते हैं कि तुलसी की कविता सामंत विरोधी मूल्यों की कविता है। जबकि दूसरा खेमा यह मानता है कि परम्परा से अलग होकर ही आधुनिक हुआ जा सकता है। मेरी पटरी इस तरह के विचारकों से नहीं बैठती। हमारा जीवन एक प्रवाह की तरह है जैसे नदी बहती है। कई बार नदी पहाड़ों में लुप्त सी हो जाती है। लेकिन वह अपनी जगह पर आकर ठहरती है। बहरहाल इसी बहस में से मैं तुलसी का जब अपने लिए अन्वेषण करता हूँ तो मुझे तुलसी अपनी सारी वैचारिक सीमाओं के बावजूद लोक जीवन की कविता के बहुत समीप मिलते हैं। मैं तुलसी को उन्हीं के अनुसार संग्रह और त्याग के अनुसार ग्रहण करता  हूँ। मैं यह मानता हूँ कि तुलसी के मन में लोक समाया हुआ है। उनके जैसा व्यापक लोकसामीप्य शायद ही किसी दूसरे कवि में मिले। इस सम्बन्ध में डाक्टर विश्वनाथ त्रिपाठी ने बहुत महत्त्वपूर्ण काम किया लोकवादी तुलसीदास पुस्तक लिखकर। यह तुलसी को समझकर उसे भीतर से खोलने वाली किताब है। आज भी मेरा मन तुलसी साहित्य में रमता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मैं तुलसी के हर वाक्य को ब्रह्म वाक्य मानता हूँ। तुलसी के साहित्य में ऐसा भी बहुत कुछ है जो आज हमारे काम का नहीं। उनकी धारणाएं और मान्यताएं अब पुरानी पड़ चुकी हैं।
प्र. आपके आलोचना कर्म के बारे में बतलाइये कि वर्तमान युग में आपने किन कवियों और विषयों को अपनी आलोचना के केंद्र में रखा है?
उ. मेरी पहली किताब कविता की लोकप्रकृति के नाम से पिछली सदी के नब्बे के दशक में आयी। इसमें मैंने समकालीन कविता को लेकर कुछ सैद्धांतिक निबंध लिखे और कुछ व्यावहारिक आलोचना को लेकर। व्यावहारिक आलोचना नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, कुमारेन्द्र, विजेंद्र, अरुण कमल, प्रेमशंकर रघुवंशी आदि कवियों की कविताओं पर लिखी हैं। यह पिछली सदी का आठवाँ दशक था, जिसमें उक्त कवियों की खासी चर्चा हो रही थी। इस समय प्रगतिशील-जनवादी कविता को सबसे ज्यादा स्वीकृति  प्राप्त थी। इन कवियों ने हिंदी कविता को मध्य वर्ग की सीमित चेतना से बाहर निकाल लेने का जरूरी काम किया था। अब हिंदी कविता जनपदों तक फैल गयी थी। नयी कविता युग में अज्ञेय और उनके स्कूल के कवियों की कविता का बोलबाला रहा। बाद में नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन की कविता को ज्यादा महत्त्व मिला। यह सब साहित्य में प्रगतिशील आन्दोलन के फैलते जाने की वजह से था। बहरहाल इसी प्रक्रिया से मैं प्रगतिशील आन्दोलन के समीप आया। इसके बाद मैंने कविता और कवि कर्म पुस्तक  प्रकाशित कराई जिस पर राजस्थान साहित्य अकादमी ने अपना सर्वोच्च सम्मान मीरा पुरस्कार दिया। तीसरी पुस्तक भाषा और संस्कृति के सवालों पर शब्द और संस्कृति लिखी। चौथी किताब लोकदृष्टि और समकालीन कविता बहुत जल्दी आने वाली है वह छपकर लगभग तैयार हो चुकी है। शब्द और संस्कृति  पुस्तक में मैंने खासतौर से भक्त कवियों सूर, तुलसी, कबीर, मीरा आदि पर लिखा है और हिंदी भाषा के सवालों पर भी।